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3 Tips to Make Student Self-sufficient

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1.छात्र छात्राओं को आत्मनिर्भर बनाने की 3 टिप्स (3 Tips to Make Student Self-sufficient),छात्र-छात्राएँ आत्मनिर्भर कैसे बनें? (How Students Become Self-sufficient?):

  • छात्र छात्राओं को आत्मनिर्भर बनाने की 3 टिप्स (3 Tips to Make Student Self-sufficient) के आधार पर माता-पिता,अभिभावक,शिक्षक तथा छात्र-छात्राएं स्वयं जान सकेंगे कि आत्मनिर्भर बनने में किन-किन बातों का ध्यान रखा जाए तथा छात्र-छात्राओं में आत्मनिर्भर बनाने के लिए नींव किस प्रकार डाली जाए? शिक्षा विकास का आधार है।बालक के जन्म से उसकी शिक्षा प्रारंभ हो जाती है।शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण,शारीरिक विकास,आध्यात्मिक उन्नति,मानसिक विकास इत्यादि के साथ-साथ बालक को आत्मनिर्भर बनाना भी है।आत्मनिर्भरता के साथ पुरुषार्थ जुड़ा हुआ है।बिना पुरुषार्थ के आत्म-निर्भर नहीं बना जा सकता है।इसलिए बालक के विकास की प्राथमिक और आधारभूत शर्तें आत्मनिर्भर और पुरुषार्थ दोनों ही है।बालक को इन दोनों की शिक्षा देना माता-पिता,अभिभावकों और शिक्षकों का प्रमुख दायित्व है।
  • बच्चों के संस्कारों,स्वभाव को उसी तरह चलाया,पिघलाया,मोड़ा,ठोस किया और मन मुताबिक अलंकार के रूप में ढाला जा सकता है जिस प्रकार सुनार आग की भट्टी में सोने को गलाता,तपाता और आभूषण बनाता है।माता अंजनी ने महाबली हनुमान,माता जीजाबाई ने वीर शिवाजी,माता सुभद्रा ने वीर अभिमन्यु को तैयार किया था।महारथी अर्जुन और साध्वी सुभद्रा के प्रयत्नों का ही फल था कि 14 वर्षीय राजकुमार अभिमन्यु में साहस,शौर्य और युद्ध विद्या में वयोवृद्ध नरेशों के से गुण विद्यमान थे।
  • भारत को स्वतंत्रता मिली तब भारत सदियों की दासता से मुक्त तो हुआ परंतु लोगों के पुराने मूल्यों से चिपके पूर्वाग्रह,श्रम से अरुचि,अनैतिक तरीकों से धन-सत्ता हासिल करना,मुक्ति की बड़ी-बड़ी बातें हाँकने में माहिर परंतु साहस के स्थान पर भयभीत रहने की प्रवृतियां मौजूद रही।जब तक वातावरण,शिक्षा का ढर्रा तथा लोगों की मानसिकता नहीं बदली जाएगी तब तक आत्मनिर्भर भारत,आत्मनिर्भर छात्र-छात्राओं का निर्माण दिवास्वप्न ही है।
  • कोई भी बालक अपने साथ अपार संभावनाएं लेकर जन्म लेता है।उसमें अन्य गुणों के साथ आत्मनिर्भर होने की संभावना भी छिपी रहती है।घर में आत्मनिर्भरता का अनुकूल वातावरण मिले तो बालक की सृजनात्मक प्रवृत्ति,आत्म-निर्भर बनने की प्रबल आकांक्षा और स्वयं को उपयोगी सिद्ध करने की प्रयत्नशीलता विकसित होती और सक्रियता बढ़ती है।
  • माता-पिता द्वारा सतर्कता न बरतने और बच्चों को भरपूर सहयोग न देने के कारण बालक-बालिकाएं आलसी और पराश्रित हो जाते हैं।किसी बालक को समृद्ध,सम्पन्न और उन्नतिशील बनाने की कल्पना को साकार किया जा सकता है जब वहां के बालकों को प्रारंभ से ही आत्म-निर्भरता का पाठ पढ़ाया जाए।
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2.छात्र-छात्राओं के आत्मनिर्भर न बनने के कारण (Due to Students not Becoming Self-sufficient):

  • बालक-बालिकाओं की आधारशिला अर्थात् नींव जन्म के बाद पांच-सात वर्षों में रखी जाती है।नींव कमजोर होगी तो इमारतें भी खंडहरों में परिवर्तित होती चली जाएगी।यदि बालक को इन्हीं दिनों में आत्मनिर्भरता का अभ्यास कराया जाए तो उसका भविष्य भव्य और उज्जवल हो सकता है।बालक को किसी वस्तु पानी,जूते,जुराब,कपड़े इत्यादि की आवश्यकता होती है तो उसे लाने के लिए मां को पुकारता है और लाने का आग्रह करता है।मां बच्चों के प्रति ममता रखने और उसकी आकर्षक बोली में फँसकर उसकी मांग को पूरी कर देती है।यहीं बालक हर काम अपने माता-पिता से कराने की कोशिश करता है।धीरे-धीरे बालक की आदत बन जाती है।बड़ा होकर भी बच्चा छोटे-मोटे कार्यो के लिए माता-पिता पर आश्रित हो जाता है।ऐसी स्थिति में बालक अपनी सक्रियता खो देते हैं।
  • दूसरा कारण है विद्यालयों में बालक-बालिकाओं को केवल सैद्धान्तिक शिक्षा दी जाती है क्रियात्मक शिक्षा बिल्कुल नहीं दी जाती है।स्काउटिंग,एनसीसी,समाजोपयोगी कार्यों में उन्हें शामिल नहीं किया जाता है।न बच्चों को स्कूलों में शिक्षा का कोई अन्य क्रियात्मक शिक्षा का कार्यक्रम किया जाता है।खेलकूद,शारीरिक कसरत,व्यायाम के लिए कोई प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है।इस प्रकार स्कूलों में भी परावलम्बन की शिक्षा ही मिलती है।
  • ओर तो ओर गृहकार्य भी अधिकांश बालक-बालिकाएं पासबुक,कुंजियों और होशियार छात्र-छात्राओं से नकल करके उतार लेते हैं अथवा अपने माता-पिता से गृहकार्य करवा लेते हैं।
  • तीसरा कारण है कि बालक-बालिकाओं को घर-परिवार तथा विद्यालयों में किसी कार्य को करने का उत्तरदायित्व नहीं सौंपा जाता है।ऐसी स्थिति में बालक-बालिकाएं क्यों दौड़-धूप और परिश्रम करेंगे?
  • चौथा कारण है बालक-बालिकाओं को घर-परिवार तथा स्कूलों में ऐसी सुविधाएं ही दी जाती है जिनमें आसक्त होकर बालक-बालिकाएं आलसी,निकम्मे,अकर्मण्य और कामचोर हो जाते हैं।उदाहरणार्थ यदि गर्मी के मौसम में बालक-बालिकाओं को कुलर में बैठकर पढ़ने की सुविधा दी जाएगी तो थोड़ी देर में वह पढ़ते-पढ़ते बिस्तर पर लेट जाएगा और सो जाएगा।सुख-सुविधाओं में आसक्ति से ऐसे ही दुष्परिणाम देखने को मिलेगा।
  • पाँचवा कारण है बालक-बालिकाओं के मोबाइल फोन की लत लगना।मोबाइल फोन की लत लग जाने के कारण बालक-बालिकाएं घंटों सोशल मीडिया पर चैटिंग करने,फिल्में देखने तथा अश्लील तस्वीरें देखने में व्यतीत कर देते हैं।मोबाइल फोन का उचित उपयोग नहीं करते हैं।ऐसी स्थिति में बालक-बालिकाएं आत्मनिर्भरता का पाठ कैसे पढ़ेंगे?
  • छठा कारण है शिक्षा प्रणाली में अनेक परिवर्तनों के बावजूद मूलरूप से मैकाले की बनाई हुई शिक्षा प्रणाली मौजूद है।मैकाले की शिक्षा प्रणाली का मूलमंत्र है शरीर से परिश्रम करना बड़प्पन की पहचान नहीं है।जो मानसिक चिंतन करने और परिश्रम करने की कार्यक्षमता को उत्पन्न ही नहीं होने देती है।
  • सातवाँ कारण है आत्म-निर्भरता की सार्थकता को न समझना।अपने कपड़े खुद धोना,अपने कमरे की सफाई खुद करना,घर के छोटे-मोटे कार्यों में सहयोग देना इत्यादि छोटे-छोटे कार्य हैं परंतु इनसे आत्म-निर्भरता,परिश्रम,पुरुषार्थ की ऐसी नींव लगती है जिससे व्यक्तित्व का विकास होता है।

3.छात्र-छात्राएं आत्मनिर्भर कैसे बनें? (How do Students Become Self-sufficient?):

  • बालक-बालिका को आत्म-निर्भरता का पाठ पढ़ाने की शुरुआत माता-पिता,अभिभावक अर्थात् घर-परिवार से शुरू होती है क्योंकि बालक-बालिका सर्वप्रथम इन्हीं के संपर्क में आता है।उन्हें इस तथ्य से भली-भांति परिचित होना चाहिए कि बालक-बालिकाओं की सहायता करना एक बात है परंतु आत्मनिर्भर बनाना सर्वथा दूसरी।बच्चों से काम कराने,स्वयं का कार्य स्वयं करने तथा सहयोग लेने की कला का ज्ञान भी उन्हें होना चाहिए। छोटे-छोटे स्वयं के कार्य स्वयं बच्चों से कराने पर बच्चों का मनोबल बढ़ता है और घर की व्यवस्था भी सुधरती है।सही,व्यवस्थित एवं सुनियोजित तरीके से काम करने वाले बालक की सराहना करने,प्यार,दुलार भरे प्रोत्साहन देने,उपहार देने से उसका साहस ओर भी अधिक बढ़ जाता है।बच्चे में सहयोग-सहकार की प्रवृत्ति का विकास होता है।बच्चे का व्यक्तित्व एक उद्यमी के रूप में ढलता जाता है।जिम्मेदारी और अनुशासन का भाव उत्पन्न होने से गंभीरता आती और किसी भी काम को छोटा-बड़ा समझे बिना पूरा करने में मनोयोग और तत्परता का परिचय सतत देता रहता है।
  • ध्यान रहे बच्चों को मारने-पीटने,धमकाने से नहीं वरन सहानुभूतिपूर्वक सहयोग-सहायता की अपेक्षा करके उन्हें कामकाजी और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
  • घर में किसी कार्य का उत्तरदायित्व सौंपते समय बच्चों की सलाह-परामर्श लेना भी आवश्यक है जिससे उनमें काम करने से बुद्धि का विकास होता है।कार्य सौंपने का उत्तरदायित्व दैनिक,साप्ताहिक और मासिक व्यवस्था के अनुरूप किया जा सकता है।किसी भी कार्य का उत्तरदायित्व सौंपते समय लड़के-लड़की का भेद वाला दृष्टिकोण न अपनाया जाए।लड़के-लड़की दोनों से सभी तरह के कार्यों में हाथ बंटाने की अपेक्षा करनी चाहिए।कोई भी कार्य जब चुनौती के रूप में सौंपा जाता है तो बच्चे उसे अपनी पूर्ण शक्ति,सामर्थ्य और क्षमता के अनुसार पूरा करने का प्रयास करते हैं।
  • इससे उनमें कर्त्तव्य भाव का विकास होता है।उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यों में त्रुटियाँ भी हो सकती है परंतु सुयोग्य माता-पिता उसमें किसी भी प्रकार की मीन-मेख न निकालकर उसे सही कर देते हैं,सुधार देते हैं।इससे बच्चों को सीखने का अवसर मिलता है।
  • बच्चों को उनकी रुचि और क्षमता के अनुरूप ही कार्य सौंपना चाहिए,हो सकता है बच्चों के स्वतंत्र रूप से कार्य करने में कुछ त्रुटि हो जाए।यदि माता-पिता मिलकर काम करें तो काम को सार्थक तरीके से किया जा सकता है।बच्चे यदि किसी कार्य को शीघ्रता से निपटा देते हैं तो उन्हें पुरस्कृत करने का प्रावधान अवश्य रखा जाए।परन्तु लोभ,लाभ,प्रलोभन को प्रोत्साहित करने का वातावरण न बनाया जाए अन्यथा बच्चे हर कार्य को पूरा करने के एवज में कुछ न कुछ चीज,रुपया लेने की डिमांड करने लग जाएंगे।
  • दूसरा उपाय है कि विद्यालय में छात्र-छात्राओं को स्काउटिंग,एनसीसी,समाजोपयोगी कार्य,वृक्षारोपण,बड़े-बुजुर्गों को साक्षर करने के लिए तथा इनमें क्रियात्मक रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाए।शिक्षा संस्थानों में कोई भी जयन्ती मनाने,वार्षिकोत्सव,स्वतंत्रता दिवस,गणतंत्र दिवस इत्यादि पर छात्र-छात्राओं को उत्तरदायित्व सौंपा जाए।
  • तीसरा उपाय है कि बच्चे किसी कला-कौशल को सीखने की जिज्ञासा प्रकट करें तो उनकी मांग के अनुसार साधन,सुविधा जुटाने तथा भरपूर सहयोग करने में सहायता करनी चाहिए ताकि उनकी छिपी हुई प्रतिभा को फलने-फूलने का अवसर मिले।
  • चौथा उपाय यह है कि समाज में कोई भी कार्यक्रम हो तो उसमें सक्रिय भूमिका निभाएं।यदि आपको कोई जिम्मेदारी सौंपी जाए तो उसको पूर्ण दक्षता से करें।छात्र-छात्राओं को किसी भी कार्यों को करने की पहल भी करनी चाहिए।इस प्रकार छात्र-छात्राओं में आत्म-निर्भरता और पुरुषार्थ को छोटे-छोटे कार्यों से उभारा,निखारा जा सकता है।

4.आत्मनिर्भर बनने का दृष्टान्त (The Parable of Becoming Self-sufficient):

  • सोनू और मोनू दोनों में गहरी दोस्ती थी।दोनों ने गणित विषय ऐच्छिक विषय के रूप में ले रखी थी।गणित में गणित के शिक्षक कोई गृहकार्य बताते तो मोनू,सोनू से नकल कर लेता था।कोई प्रश्नावली समझाई जाती थी तथा प्रश्नावली के सवाल हल करने के लिए कहते तो मोनू,सोनू की नोटबुक से नकल कर लेता।कक्षा में कोई सवाल हल करने के लिए दिया जाता तो मोनू,सोनू के बगल में बैठता था और उसकी नकल कर लेता था।
  • सोनू,मोनू को कहता कि तुम्हें खुद को सवालों को हल करने का प्रयास करना चाहिए तो मोनू कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देता था।मोनू,सोनू की खुशामद करके उसको खुश रखता इस प्रकार दोनों दोस्तों की जिंदगी गुजर रही थी।दोनों के दिन हंसी खुशी से गुजर रहे थे।
  • कुछ दिनों बाद निखिल नाम के विद्यार्थी ने स्कूल में प्रवेश लिया।वह भी उनके साथ रहने लगा।साथ रहते-रहते वह दोनों के व्यवहार से परिचित हो गया।वह यह भी जान गया कि दोनों के कार्य करने का रंग-ढंग और जीने का तरीका कैसा है? निखिल ने महसूस किया कि मोनू पूरी तरह सोनू पर निर्भर है तथा मोनू के आलसीपन की सजा सोनू भुगत रहा है।साथ ही उसने यह भी महसूस की इस कार्यप्रणाली से मोनू आत्मनिर्भर नहीं हो सकता है,हालांकि सोनू ने कभी भी इस बात का जिक्र नहीं किया था।
  • एक दिन सोनू और निखिल बातें कर रहे थे।बातें करते-करते मोनू के आलसीपन की चर्चा भी सामने आई।निखिल ने सोनू से कहा कि सोनू तुमने उसकी आदत बिगाड़ी है।सोनू ने पूछा,ऐसा कैसे?निखिल ने कहा कि अपनी नोटबुक नकल करने के लिए तुम्ही तो देते हो,कक्षा में पास बिठाकर सवाल की नकल तुम्हीं कराते हो।सोनू ने कहा कि अगर मैं ऐसा नहीं करूंगा तो कक्षा में गणित अध्यापक जी उसको डाटेंगे और पिटाई करेंगे,घर पर माता-पिता से डाँट-डपट मिलगी सो अलग।निखिल ने कहा कि डाँट-डपट और पिटाई से वह मर थोड़े जाएगा परंतु वह इस तरीके से अपने पैरों पर खड़ा होना नहीं सीख सकेगा।वह तुम्हारा दोस्त है और ऐसा करके तुम अपने दोस्त का अहित कर रहे हो।उसे नकल करवा-करवाकर ओर निकम्मा बनाओगे।हाँ किसी सवाल विशेष में कुछ मदद करना तो जायज है परंतु पूरी तरह तुम्हीं पर निर्भर होना गलत है।
  • सोनू की आंखें खुल गई और उसने उसी दिन से उसको नकल करवाना बंद कर दिया।कुछ दिन तो मोनू को डाँट-डपट खानी पड़ी।कुछ दिन स्कूल भी नहीं गया।परंतु मरता क्या न करता,आखिर उसने खुद परिश्रम करना चालू किया।धीरे-धीरे वह कुछ सवाल हल करने लगा तथा कड़ी मेहनत करने से उसे समझ में भी आया।खुद की मेहनत करने से जो उसे आत्म संतुष्टि हुई उससे उसको प्रेरणा भी मिली।
  • तब निखिल ने सोनू से कहा की बेवजह हर कदम पर तुमने उसकी सहायता करके बिगाड़ दिया था।वह तुम्हारा दोस्त है और दोस्त की मदद करना तुम्हारा फर्ज है परन्तु तुम्हें इतनी मदद भी नहीं करनी चाहिए कि वह आलसी और निकम्मा बन जाए।आत्म-निर्भर होने का आनंद ही कुछ अलग है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में छात्र छात्राओं को आत्मनिर्भर बनाने की 3 टिप्स (3 Tips to Make Student Self-sufficient),छात्र-छात्राएँ आत्मनिर्भर कैसे बनें? (How Students Become Self-Sufficient?) के बारे में बताया गया है।Also

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5.परम अंक 9 लकी नम्बर (हास्य-व्यंग्य) (Ultimate Number 9 Lucky Number) (Humour-Satire):

  • पहला दोस्त (दूसरे दोस्त से):एक छात्र 9 नम्बर को बहुत लकी नम्बर मानता था।उसके गणित के टेस्ट में 10 में से 9 नम्बर आते थे तो वह बहुत खुश होता था।वह हर चीज में 9 नम्बर का ही चुनाव करता था।चाहे उसकी अंडरवियर हो,बनियान हो,मोबाइल हो,गाड़ी की सीट नंबर हो या कोई भी चीज हो।एक बार उसने अखिल भारतीय गणित प्रतियोगिता में हिस्सा लिया।उसे 9 नम्बर के राज्य में 999999 रोल नम्बर मिले।
  • दूसरा दोस्तःफिर तो वह गणित प्रतियोगिता जीत गया होगा।
  • पहला दोस्तःअरे नहीं,वह 9 नम्बर पर आया था जबकि इनाम तीन को ही देना था।

6.छात्र छात्राओं को आत्मनिर्भर बनाने की 3 टिप्स (Frequently Asked Questions Related to 3 Tips to Make Student Self-sufficient),छात्र-छात्राएँ आत्मनिर्भर कैसे बनें? (How Students Become Self-Sufficient?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नः

प्रश्नः1.छात्र-छात्राओं के आत्मनिर्भर न रहने का प्रमुख कारण क्या है? (What is the Main Reason for Students not Being Self-Reliant?):

उत्तरःमाता-पिता की लापरवाही तथा सतर्कता की कमी के कारण छात्र-छात्राएं माता-पिता पर अत्यधिक निर्भर हो जाते हैं।ऐसे बच्चे आलसी हो जाते हैं और सौंपे गए उत्तरदायित्व से मुख मोड़ने लगते हैं।कुछ काम करेंगे भी तो विवशता अथवा हानि की आशंका को देखते हुए ही अन्यथा काम से बचने के लिए कोई न कोई बहाना बना लेंगे।अभिभावक भी बच्चों की कामचोर प्रवृत्ति को देखकर हैरान और परेशान हो जाते हैं।वस्तुतः बालक के विकास की जिम्मेदारी ठीक से न निभाने और आत्म-निर्भरता का गुण विकसित न करने के कारण ही ऐसी समस्या उत्पन्न होती है।

प्रश्न:2.आत्म-निर्भर बालक की क्या पहचान है? (What is the Identity of the Self-Sufficient Child?):

उत्तरःआत्म-निर्भर बालक बालिकाएं उत्साह,उमंग,जोश से भरे होते हैं।वे काम करने की पहल करते हैं।जो जिम्मेदारी सौंपी जाती है उससे कतराते नहीं है।आत्म-निर्भर बालक-बालिकाएं प्रसन्नचित्त,फुर्तीले,सक्रिय रहते हैं।वे केवल अपना कार्य ही नहीं करते हैं बल्कि दूसरे बालक-बालिकाओं का भी सहयोग,सहायता करते हैं परंतु यह भी ध्यान रखते हैं कि दूसरे छात्र-छात्राएं पूर्णतः उस पर आश्रित न हो जाएं।

प्रश्नः3.माता-पिता को बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए क्या करना चाहिए? (What Should Parents do to Make Children Self-Reliant?):

उत्तरःकिसान खेत में बीज बोने से लेकर फसल के बढ़ने और पकने तक की अवधि में देखरेख में जितनी सतर्कता दिखाता है,इसी के अनुपात में फसल प्राप्त करता है।देख-रेख के अभाव में पौधे सूख जाते हैं अथवा अविकसित रह जाते हैं।उनसे अच्छी फसल की आशा नहीं की जा सकती है।इसी प्रकार बच्चों के पालन-पोषण में समुचित देखरेख की जाए,उनकी आदतों,क्रियाकलापों एवं शिक्षा पर समुचित ध्यान दिया जाए तो सामान्य परिस्थितियों में पलने वाले बच्चे महान व्यक्ति बन सकते हैं।अतः प्रत्येक माता-पिता को किसान की-सी तत्परता,कर्तव्यनिष्ठा और जागरूकता का परिचय बच्चों के निर्माण में देना चाहिए।बच्चे के लिए साधन-सुविधाएं देने को जितना महत्त्व दिया जाता है उतना ही महत्व उसमें आत्म-निर्भरता और पुरुषार्थ की क्षमता के विकास को भी दिया जाना जरूरी है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा छात्र छात्राओं को आत्मनिर्भर बनाने की 3 टिप्स (3 Tips to Make Student Self-sufficient),छात्र-छात्राएँ आत्मनिर्भर कैसे बनें? (How Students Become Self-Sufficient?) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

3 Tips to Make Student Self-sufficient

छात्र छात्राओं को आत्मनिर्भर बनाने की 3 टिप्स
(3 Tips to Make Student Self-sufficient)

3 Tips to Make Student Self-sufficient

छात्र छात्राओं को आत्मनिर्भर बनाने की 3 टिप्स (3 Tips to Make Student Self-sufficient)
के आधार पर माता-पिता,अभिभावक,शिक्षक तथा छात्र-छात्राएं स्वयं जान सकेंगे कि
आत्मनिर्भर बनने में किन-किन बातों का ध्यान रखा जाए तथा
छात्र-छात्राओं में आत्मनिर्भर बनाने के लिए नींव किस प्रकार डाली जाए?

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