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Thursday, 19 September 2019

Growth Mindset in Learning Neglect Fixed Mindset in Math Course Design

September 19, 2019

Growth Mindset in Learning Neglect "Fixed" Mindset in K-12 Mathematics Course Design

1.भूमिका (Introduction) -

इस आर्टिकल में बताया गया है कि गणित सीखने के लिए विकास की मानसिकता का क्या योगदान है। यदि हम निश्चित मानसिकता के साथ के स्थान पर विकास की मानसिकता रखें तो इसमें कोई सन्देह नहीं है कि गणित को सीखने में कुछ न कुछ योगदान जरूर होता है। इसके साथ ही अन्य पहलुओं का भी वर्णन किया गया है।
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Growth Mindset in Learning Neglect Fixed Mindset in Math Course Design

Growth Mindset in Learning Neglect Fixed Mindset in Math Course Design

2.सक्रिय जागरूकता (Active Awareness) -

गणित को कोई भी सीख सकता है इसके लिए जिज्ञासा, रुचि और सक्रिय जागरूकता की आवश्यकता है। यदि गणित में आपकी थोड़ी सी भी जिज्ञासा या रुचि है तथा सक्रिय जागरूकता है तो आप गणित सीखने में आगे बढ़ सकते हैं।

3.विकास मानसिकता (Mentality Development) -

विकास अधिकांश रूप से व्यवसाय और कंपनियों में प्रचलित है तथा विकास का अर्थ अधिकांशतः व्यवसाय व कंपनी के विकास से लिया जाता है। पूर्वकाल तक शिक्षा तथा निगमों में बंधें हुए या निश्चित नियम के अन्तर्गत कार्य किया जाता था। परन्तु वर्तमान युग में विकास माॅडल को हर क्षेत्र में प्रयोग किया जाने लगा है।
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ज्यों-ज्यों गणित की लोकप्रियता बढ़ने लगी इसके फलस्वरूप अनेक गणितज्ञों की रुचि बढ़ी और इस दिशा में अनेक अध्ययन होने लगे। उन्होंने अनुभव किया कि विभिन्न आयु स्तर पर गणित सम्बन्धी विद्यार्थियों में अनेक परिवर्तन होते हैं। विद्यार्थियों में समय के साथ गणित सम्बन्धी परिवर्तन होते हैं उनका वैज्ञानिक अध्ययन ही गणित शिक्षा में विकास कहा जाता है।
बालक अपने जीवनकाल में जो गणित सम्बन्धी ज्ञान अर्जित करता है, बोध इसी पर आधारित है। यह कोई वंशानुगत क्षमता नहीं है। जन्म के समय बालक में किसी प्रकार के गणित का बोध करने की क्षमता नहीं होती है। वह गणित शिक्षा के नाम पर केवल रोना जानता है। बालक में परिपक्वता के साथ गणित सीखने की योग्यता बढ़ती जाती है। वह अपनी ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से देखकर, सुनकर या अनुभूति के द्वारा गणित के प्रत्ययों को समझने की कोशिश करता है। धीरे-धीरे इन प्रयासों द्वारा उसे गणित का बोध होने लगता है। उसके ज्ञान के विकास के साथ-साथ उसकी वातावरण में रुचि बढ़ती है। वातावरण उसके लिए अर्थपूर्ण होता जाता है।
परिपक्वता बालक को शारीरिक और मानसिक रूप से गणित का बोध करने के लिए तैयार करती है। गणित के बोध के लिए परिपक्वता और ज्ञानेन्द्रियों का विकास आवश्यक है।
गणित के बोध की क्षमता उन बालकों में अधिक होती है जिनमें मानसिक विकास स्वरूप से अधिक होता है तथा उन बालकों में बोध का विकास सामान्य से कम होता है जिनकी मानसिक क्षमताओं का विकास सामान्य से कम होता है।
Growth Mindset in Learning Neglect Fixed Mindset in Math Course Design

Growth Mindset in Learning Neglect Fixed Mindset in Math Course Design

ज्यों-ज्यों बालकों में स्मृति, कल्पना और चिन्तन का विकास होता जाता है उनमें गणित सम्बन्धी प्रत्ययों का विकास भी होने लगता है।

(1.)स्मृति (Memory) -

स्मरण एक प्रकार की मानसिक प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य धारण की गई विषय-सामग्री का पुन: स्मरण कर चेतना में लाकर पहचानने का प्रयास करता है। विषय-सामग्री को धारण करने के लिए उसे सीखना आवश्यक है। परन्तु बालक चिन्ताग्रस्त रहता है तो उसका पुन: स्मरण उतना ही कम हो जाता है।

(2.)कल्पना (Imagination) -

कल्पना गत अनुभवों से सम्बंधित होती है इसमें हमेशा नवीनता पाई जाती है। बालक को कल्पना में यह अनुभव होता है कि कल्पना से सम्बन्धित अनुभव नवीन है। कल्पना पूर्व अनुभवों पर आधारित वह प्रक्रिया है जो रचनात्मक (Constructive) होती है परन्तु आवश्यक नहीं है कि सृजनात्मक (Creative) भी हो।
बालक जब पुन:स्मरण अर्थात् स्मृति और कल्पना करना सीख लेता है तब उसका गणित कौशल व ज्ञान अधिक बढ़ जाता है। इस योग्यता के प्राप्त होते ही बालक गणित की उन वस्तुओं के सम्बन्ध में भी विचार करने लग जाता है जो उसके सामने नहीं होती है। कल्पना का महत्त्व विभिन्न विकासात्मक प्रक्रियाओं में है।
कल्पना के विकास के साथ ही बुद्धि के क्षेत्र में गणित के लिए खोज प्रवृत्ति विकसित होने लगती है।

3.चिन्तन (Thinking) -

चिन्तन एक उच्च ज्ञानात्मक (Cognitive) प्रक्रिया है, जिसके द्वारा ज्ञान संचय होता है। इस मानसिक प्रक्रिया में बहुधा स्मृति, कल्पना आदि मानसिक क्रियाएं सम्मिलित होती है। बालक के सामने जब गणित की कोई समस्या उपस्थित होती है तो वह उस समस्या से सम्बन्धित क्षेत्र में कठिनाई का अनुभव करने लगता है। कठिनाई को दूर करने के लिए वह चिन्तन करता है ।इसके लिए वह समस्या का विश्लेषण करते समय वर्तमान अनुभवों को अपने गत अनुभवों के आधार पर वह समस्या समाधान के सम्बन्ध में अनुमान करता है जिससे उसके सामने कई समाधान सामने प्रस्तुत होते हैं। उनमें से वह उचित समाधान का चयन करता है अर्थात् वह इस कार्य के लिए निर्णय लेता है कि कौनसा उचित हो सकता है और कौनसा अनुचित है।
चिन्तन तथा कल्पना दोनों ही ज्ञानात्मक व रचनात्मक प्रक्रियाएं हैं। दोनों क्रियाओं में गत अनुभवों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। चिन्तन की सहायता से बालक समस्या के विभिन्न पहलुओं को समझने की कोशिश करता है क्योंकि पहलुओं को समझे बिना समस्या समाधान नहीं हो सकता है। दूसरी ओर कल्पना में समस्या समाधान की परिस्थिति को नये-नये रूपों में देखता है। चिन्तन में तर्क की प्रधानता होती है जबकि कल्पना में तर्क का अभाव होता है।

4.विकास का मूल आधार (Background of Development) -

विकास की मूल धारणा व्यवसाय एवं कम्पनियों से अन्य क्षेत्रों में विकसित हुई है इसलिए विकास के माॅडल में व्यावसायिकता है। इस प्रकार शिक्षा तथा गणित शिक्षा का भी व्यावसायिकरण हो गया है। व्यावसायिक भावना रखना बुरा नहीं है यदि विद्यार्थियों के हितों और कल्याण का पूरा ध्यान रखा जाए परन्तु यदि व्यावसायिकता में विद्यार्थियों के हितों को नुकसान पहुंचाया जाये और अपना स्वार्थ सिद्ध किया जाए तो ऐसी व्यावसायिकता की भावना गलत है। चूँकि शिक्षा में व्यावसायिकता में कई संस्थाएं मात्र धन अर्जित करने में ही संलग्न रहती है तथा विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की तरफ उनका ध्यान नहीं रहता है तो ऐसी व्यावसायिकता से विद्यार्थियों को नुकसान ही होता है। दीर्घकालीन दृष्टि से ऐसी संस्थाओं के लिए भी यह नुकसानदायक है।
5.विद्यार्थियों के विकास की स्थिति (Position of Development of Students) -
विद्यार्थियों को गणित सीखने के लिए विकास की मानसिकता अपनाने के लिए कहा जाता है तो लगभग आधे विद्यार्थियों का नकारात्मक उत्तर रहता है कि उन्हें गणित विषय का चुनाव ही नहीं करना है जबकि गणित का हर क्षेत्र में महत्त्व है तथा गणित का उपयोग होता है। ऐसी स्थिति इसलिए निर्मित हुई है क्योंकि शिक्षा पर शासन का अधिकार हो गया है और उसमें राजनैतिक हस्तक्षेप होता है।
इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि कुछ शिक्षकों को गणित विषय अच्छा लगता है और उन्हें गणित विषय अपने लिए ठीक लगता है तो वे सोचते हैं कि गणित विषय औरों के लिए भी ठीक होगा। गणित विषय में जिसकी रुचि नहीं है, उन पर गणित विषय थोंपना या पढ़ाना ज्यादती है उसमें शिक्षक को प्रतिरोध का ही सामना करना पड़ता है।
आज का युग लोकतान्त्रिक युग है और सबको अपनी इच्छा व रुचि, योग्यता के अनुसार कार्य करने का अधिकार है। इसलिए किसी पर जबरन गणित थोंपना न्यायसंगत नहीं है।

6.गणित में श्रेष्ठता का मापदंड(Criterion of Superiority in Mathematics) -

यदि गणित में आप अच्छा करना चाहते हैं तो गणित से प्रेम व प्यार करना होगा उसके प्रति अपनी रुचि व जिज्ञासा को बनाए रखना होगा। चाहे कितनी ही कठिन समस्या आ जाए। इसके लिए आपको धैर्य धारण करना होगा। हालांकि गणित में काव्यात्मकता नहीं है परन्तु लगातार आप गणित का अभ्यास करते रहेंगे तो गणित के क्षेत्र में जो हासिल करेंगे उसे देखकर आप खुद आश्चर्यचकित रह जाएंगे।

7. गणित की वर्तमान स्थिति (Current position of Mathematics) -

 गणित अब व्यावहारिक होती जा रही है अर्थात् हमारे जीवन के कई भागों में इसका प्रयोग किया जाता है, इसमें क्रियात्मक गणित का भी योगदान है। हमें भी अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में गणित का प्रयोग करना चाहिए जिससे गणित में आपकी रुचि जागृत हो।
इस प्रकार गणित के क्षेत्र में विकास का माॅडल अच्छा ही है यदि इसका सदुपयोग किया जाए तो अर्थात् इसमें जो व्यावसायिकता है उसको सही अर्थ में लेने की जरूरत है।

Wednesday, 18 September 2019

Basic Education And Teaching Mathematics

September 18, 2019

Basic Education And Teaching Mathematics

Basic Education And Teaching Mathematics

Basic Education And Teaching Mathematics 

1.बेसिक शिक्षा तथा गणित शिक्षण का परिचय (Introduction of Basic Education And Teaching Mathematics) -

इस आर्टिकल में बताया गया है कि बेसिक शिक्षा तीन माध्यमों द्वारा दी जाती है - प्रकृति (Nature), समाज (Society), और उद्योग (Craft) ।बालक का जीवन प्रारम्भिक काल में प्रकृति की गोद में व्यतीत होता है और परिवार में अपना जीवन व्यतीत करता है पश्चात समाज के सम्पर्क में आता है। इसलिए बेसिक शिक्षा में प्रकृति, परिवार और समाज में सन्तुलन स्थापित किया जाता है। गणित प्रकृति, परिवार और समाज में सम्बन्ध स्थापित करता है जो उद्योग में सहायक है। बालक को प्राकृतिक घटनाओं जैसे - सूर्य, चन्द्रमा, तारों के निकलने का समय, उनकी स्थिति तथा दिशा, ऋतुओं तथा वर्षा आदि के ज्ञान की आवश्यकता होती है। यह सब गणित द्वारा ही सम्भव है। इस प्रकार गणित प्राकृतिक घटनाओं को समझने में बहुत सहायक है। घर व समाज सम्बन्धी समस्याओं जैसे - खाने-पीने, कपड़े और मकान बनाने, लेन-देन में उठने वाले खर्चो के हिसाब-किताब, शादी, श्राद्ध और अन्य सामाजिक उत्सवों में हुए आय-व्यय के ब्योरों का सामना करना पड़ता है, वे सब समस्याएँ भी गणित के द्वारा ही सुलझायी जा सकती हैं। इस प्रकार सामाजिक समस्याओं में भी गणित की आवश्यकता पड़ती है। उद्योग में तो गणित का कदम-कदम पर उपयोग है। खेतों का क्षेत्रफल, बीजों की नापतोल और उनसे उत्पादित पदार्थों की तोल, भण्डार-बिक्री, खरीद-बिक्री, कागज, लकड़ी, लोहा, जस्ता, टीन आदि की बाजार दर, रंग, रस-द्रव्य (chemical) आदि का अनुपात के अनुसार उपयोग, लाभ-हानि का हिसाब फलाना आदि बातों का हल बिना गणित के सम्भव नहीं है। अतः गणित का उपयोग चारों प्रकार के माध्यमों-प्रकृति, परिवार, समाज और उद्योग में भलीभांति होता है।
Basic Education And Teaching Mathematics

Basic Education And Teaching Mathematics 

इसके अतिरिक्त बेसिक शिक्षा में इस बात पर भी ध्यान दिया जाता है कि बालक जो भी ज्ञान प्राप्त करे, वह विभिन्न क्रियाओं (Activities) के आधार पर प्राप्त करे। इसमें शिक्षा इस प्रकार दी जाती है कि ज्ञान (Knowledge) और कार्य (Activity) में परस्पर समन्वय (correlation) बना रहे ।गणित विभिन्न क्रियाओं और उनसे उत्पन्न ज्ञानों के जोड़ने में बड़ा उपयोगी है। जिस प्रकार भवन-निर्माण में गारा एक ईंट को दूसरी ईंट से जोड़ने में सहायक होता है, उसी प्रकार गणित भी विभिन्न क्रियाओं और ज्ञान के जोड़ने में सहायक होता है। इसलिए बेसिक शिक्षा में गणित की उपयोगिता को समझकर पाठ्यक्रम में इसका समावेश (Include) किया जाए ।
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2.बेसिक शिक्षा में गणित पढ़ाने का उद्देश्य (Objectives to Teach Mathematics in Basic Education) -

बेसिक शिक्षा में गणित पढा़ने का उद्देश्य विद्यार्थियों को इस योग्य बनाना है कि वे अपने उद्योग को तथा घरेलू व सामाजिक जीवन के सम्बन्ध में आने वाले हिसाब-किताब की नापतोल की समस्याओं को शीघ्रता से हल कर सकें। अतः बेसिक शिक्षा में गणित के व्यावहारिक तथा सांस्कृतिक मूल्य पर अधिक जोर दिया जाता है। गणित के अनुशासनात्मक (Disciplinary) मूल्य पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता है।
अत: अध्यापक को बेसिक शिक्षा में गणित पढ़ाते समय निम्नलिखित उद्देश्यों को ध्यान में रखना चाहिए -
(1.)बालक को दैनिक जीवन में काम आने वाले अंकों का भली-भाँति ज्ञान कराना चाहिए।
(2.)उद्योग और दैनिक जीवन में उठने वाली अनेक संख्या व ज्यामिति सम्बन्धी समस्याओं को शीघ्रता एवं शुद्धता से हल करने की क्षमता प्राप्त करानी चाहिए।
(3.)बालकों को किसी विषय पर स्वयं सोचने की, एकाग्रचित्त (Concentrate) होने की, उस पर सफल प्रयत्न (Effort) करने तथा उसको शब्दों, संकेतों या चित्रों द्वारा सूक्ष्म में व्यक्त करने के अवसर प्रदान करने चाहिए।

3.बेसिक शिक्षा में गणित का पाठ्यक्रम (Mathematics Curriculum in Basic Education) -

बालक को किसी विशेष परिस्थिति में गणित के जिस ज्ञान की आवश्यकता होती है वही बात उस समय बालक को पढ़ाई जानी चाहिए। ऐसा करने से बालक रुचिपूर्वक गणित के ज्ञान को ग्रहण करता है। इस प्रकार वर्तमान आवश्यकता और बालक की रुचि, बेसिक शिक्षा में गणित का पाठ्यक्रम बनाने के मूल सिद्धान्त है।
यह पाठ्यक्रम बड़ा लचीला (Flexible) होता है ।इसमें कोर्स की सूक्ष्म रूपरेखा (Outline) दी हुई होती है। अध्यापक पढ़ाते समय उस कोर्स में से आवश्यक तथा बालकों की रुचि के अनुसार किसी भी विषय को चुनने में पूर्ण स्वतन्त्र होते हैं। पाठ्यक्रम में सैद्धान्तिक (Theoretical) और कृत्रिम (Artificial) गणित के लिए कोई स्थान नहीं होता है। इसमें विशेष बल इस बात पर दिया जाता है कि गणित का दैनिक जीवन से सम्बन्ध हो। स्व. डॉ. जाकिर हुसै ने बेसिक शिक्षा की मूल योजना में बताया था कि बेसिक शिक्षा सैद्धान्तिक अंकों तक ही सीमित न रखी जाय बल्कि उसका बहुत समीप सम्बन्ध उन व्यावहारिक समस्याओं से होना चाहिए जो बुनियादी कला-कौशल को सीखते समय उत्पन्न होती है। इसलिए बेसिक शिक्षा में गणित के पाठ्यक्रम में नीरस (Dry) भिन्ने (Fractions), काम और समय (work and Time) सम्बन्धी रूखे प्रश्न तथा निरर्थक (Meaningless) बीजगणित के गुणनखण्ड (Factors) आदि को तनिक भी स्थान प्राप्त नहीं है। इसमें उसी गणित को सम्मान प्राप्त है, जो हस्तकला ( Handicraft) में सामाजिक तथा मनोरंजन सम्बन्धी क्रियाओं और व्यावहारिक जीवन में आवश्यक होता है। रचनात्मक रेखागणित (Practical Geometry)  पर अधिक जोर दिया जाता है जिससे यह हस्तकला तथा घरेलू कामों में डिजायन और चित्र बनाने में सहायक हो सके। बीजगणित भी वही पढ़ाई जाती है जो अंकगणित के प्रश्नों को सरल करने में सहायक हो। बीजगणित के उन समीकरणों को पढ़ाया जाता है जो हस्तकला सम्बन्धी समस्याओं को हल करने में सहायक होते हैं।
Basic Education And Teaching Mathematics

Basic Education And Teaching Mathematics 

बेसिक शिक्षा में गणित के पाठ्यक्रम बनाने में प्रायः गणित को इसके व्यावहारिक कोर्स से पृथक कर दिया जाता है। पाठ्यक्रम में इसका सीधे तौर पर कोर्स लिख दिया जाता है, जैसे जोड़, बाकी, गुणा, भाग, दशमलव, ऐकिक नियम आदि ।इसका प्रभाव यह पड़ता है कि प्रायः अध्यापक बालकों को पढ़ाते समय उस कोर्स को दैनिक जीवन सम्बन्धी समस्याओं से बड़ी कठिनाई से जोड़ पाते हैं। अतः गणित कोर्स को दैनिक जीवन सम्बन्धी समस्याओं से जोड़ देना चाहिए।
गणित में दैनिक जीवन सम्बन्धी अनेक समस्याएं हैं, उनमें से कुछ निम्नलिखित है -

(1.)उद्योग सम्बन्धी -

त्रिभुज, चतुर्भुज, वर्ग व आयत आदि आकृतियों की क्यारियाँ बनाई जा सकती है। जब वे खेतों के लिए बीज व खाद और बिनौले तोलें, उस समय उनको तोल सम्बन्धी इकाइयाँ जैसे - किलोग्राम, ग्राम इत्यादि के बारे में बताया जा सकता है। खेतों व बागों में क्यारियाँ व मार्ग बनाते समय उनकी भूमि की पैमाइश करना, क्षेत्रफल आदि का निकालना सिखाया जा सकता है। खेत व बाग में उत्पन्न उपज, बुने हुए कपड़े को बिकवाकर उनकी लाभ-हानि (Profit and Loss) तथा व्यवहार गणित (practical Mathematics) का ज्ञान कराया जा सकता है। इसी सम्बन्ध में उनकी रसीद बही, रोकड़-बही और बैलेंस शीट (Balance Sheet) का ज्ञान भी सहज में हो जाएगा। खेती-बाड़ी में क्यारियाँ बनवाते समय उनको फील्ड-बुक (Field Book) भी सीखायी जा सकती है। वस्त्र बुनते समय उनकों गति (speed), घर्षण (Friction), आदि का भी ज्ञान कराया जा सकता है। बुने हुए वस्त्र पर डिजाइन करवाते समय ज्यामिति की विभिन्न आकृतियों का ज्ञान कराया जा सकता है। रँगवाते समय रंगों के हिसाब का ज्ञान हो जाता है। मिट्टी का माॅडल बनाने में ठोस ज्यामिति की आकृति-गोले (Sphere), घन (Cube) आदि का ज्ञान सरलता से दिया जा सकता है। जब वे मिट्टी के ढेलों से काम करेंगे तो उनकी गिनती का ज्ञान भी सहज में हो जायेगा। लकड़ी व मिट्टी के खिलौने बनाते समय नाप-तोल, विभिन्न पैमाइशें आदि सिखाई जा सकती है। उनको रँगने में रंगों को विभिन्न अनुपात में लाना बताया जा सकता है। इस प्रकार विभिन्न प्रकार के उद्योगों पर विभिन्न प्रकार की गणित की शिक्षा दी जा सकती है।

(2.)घर और परिवार सम्बन्धी -

खाने-पीने, कपड़े व मकान बनवाने, पढ़ने-लिखने, लेन-देन के सम्बन्ध में उठने वाले हिसाब सम्बन्धी प्रसंगों में अनेक प्रकार से गणित की शिक्षा दी जा सकती है। बालकों के अभिभावकों (Guardians) की आय-कर (Income Tax) के सम्बन्ध में प्रतिशत सम्बन्धी प्रश्न कराये जा सकते हैं। डाकखानों व बैंकों में रूपयों को जमा करने, निकालने और उन पर ब्याज लगाने के प्रसंग में ब्याज सम्बन्धी प्रश्न कराए जा सकते हैं।

(3.)समाज सम्बन्धी -

स्कूल में सहकारी भण्डार (Co-operative Store) चलाकर बालकों को ब्याज, लाभ-हानि, साझेदारी (Partnership) तथा अंकगणित के अन्य प्रमुख नियम सरलता से बताये जा सकते हैं। स्कूल में हुए उत्सव का हिसाब भी बालकों से कराया जाये। इससे वे लेन-देन, खरीद और खर्च आदि बातों को सरलता से सीख सकते हैं। समाज में शादी, ब्याह, श्राद्ध और अनेक व्यावहारिक एवं सामाजिक कार्यों में लेन-देन, खरीद-बिक्री के प्रसंग में आयी हुई अनेक प्रकार की गणित बालकों को सिखायी जा सकती है।

4.उपकरण -

पाठ्यक्रम को बनाने के बाद गणित के लिए आवश्यक उपकरण और सामग्री का होना भी नितान्त आवश्यक है। इन उपकरणों और सामग्री से गणित का शिक्षण सरल एवं रोचक हो जाता है। इसके अतिरिक्त गणित शिक्षण में कुछ ऐसी सूक्ष्म बातें आ जाती हैं, जिनका समझना यदि सब विद्यार्थियों के लिए नहीं तो कुछ के लिए तो अवश्य ही असम्भव हो जाता है। ऐसी दशा में यदि उपकरण तथा चित्रादि दिखाकर सूक्ष्म बातें स्पष्ट कर दी जाएँ तो उसे बालक शीघ्र समझ लेते है। ब्लैकबोर्ड, पाॅइण्ट, खल्ली, झाड़न के अतिरिक्त ज्योमेट्रीकल सेट, चेन(chain) और मापने के यंत्र जैसे गिनने के सामान, ठोस ज्यामिति के विभिन्न रंगों की नालियाँ, भिन्न-भिन्न ऊँचाई और गहराई वाले सामान, विभिन्न आकृतियों के माॅडल जैसे गोला (sphere), घन (cube), आयताकार ठोस (Rectangular Solid), त्रिपार्श्व (Prism) और शंकु (Cone) आदि भिन्न-भिन्न प्रकार के सिक्के, विभिन्न घनत्व (density) वाले पदार्थ, तोल के विभिन्न प्रकार के बाँट, ग्राफ, चार्ट तथा विभिन्न प्रकार के चित्र व रेखाचित्र आदि आकर्षक ढंग से विद्यालय में सजे हुए होने चाहिए। यह भी बालकों को गणित-शिक्षण का एक साधन है। जहाँ तक हो सके, चित्र हाथ के बने होने चाहिए। इन उपकरणों की सफाई और व्यवस्था का प्रतिबन्ध भी अध्यापक और बालकों द्वारा होना चाहिए।

5.विधि(Method) -

बेसिक शिक्षा में गणित की शिक्षण-पद्धति सीधे तौर पर नियम बताकर प्रश्न निकलवाने की नहीं है बल्कि सीखते समय जो समस्या खड़ी हो उसको हल करते हुए गणित सीखना चाहिए ;जैसे - किसी बालक ने एक दिन में 40 मीटर सूत काता और दूसरे दिन 35 मीटर। अब इस बात की आवश्यकता होगी कि उसने दोनों दिन में कितने मीटर सूत काता। इस समय अध्यापक को जोड़ का नियम सिखाने का अच्छा अवसर है। इस प्रकार क्राफ्ट के सम्बन्ध में अनेक समस्याएँ आयेंगी और उनका उपयोग करते हुए गणित का ज्ञान सहज में ही दिया जा सकेगा। अध्यापक को गणित की शिक्षा देते हुए भी विचार रखना चाहिए कि बेसिक कक्षाओं में बालक बहुत छोटे होते हैं, अतः उनको आगमन प्रणाली (Inductive Method) में पढ़ाना चाहिए क्योंकि निगमन प्रणाली (Deductive Method) के लिए काफी तर्क और समझ की आवश्यकता होती है।
ऐसा करने से जीवन सम्बन्धी वास्तविक प्रसंगों के सहारे गणित का शिक्षण हो सकेगा। कभी-कभी बेतुके और असत्य उदाहरण पुस्तकों में दिखाई देते हैं जैसे - एक आदमी की उम्र 14 साल है और उसके 3 बच्चे हैं। अब यह सोचने की बात है कि क्या 14 साल के लड़के के 3 बच्चे हो सकते हैं
? इसी प्रकार ऐसे प्रश्न भी किए जाते हैं जिनका उत्तर 20.5 आदमी आता है। क्या यह सम्भव है कि 20.5 आदमी हो सकते हैं? कभी-कभी ऐसे प्रश्न भी पूछे जाते हैं कि एक घोड़े का दाम 2 रूपये है तो8 घोड़े का दाम बताओं। क्या एक घोड़ा 2 रुपये का हो सकता है? अतः ऐसे प्रश्नों को बालकों से नहीं करना चाहिए जो कृत्रिम और असत्य हों। इसका बालकों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वे गणित को जीवन से असम्बन्धित समझकर एक अजीब और भयानक विषय समझ बैठते हैं। अध्यापक को चाहिए कि वह बालक से उन्हीं प्रश्नों को कराये जो संख्यात्मक, वर्णनात्मक, खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, खेल-खिलोने आदि से सम्बंधित और मनोरंजक हों। इसके साथ-साथ गणित से सम्बन्ध रखने वाली सामग्री का जैसे - गिनने के साधन, सिक्के, ज्याॅमैट्रीकल सैट, ठोस ज्यामिति की आकृतियों आदि का भी गणित पढ़ाते समय उपयोग करना चाहिए। ऐसा करने से बालकों में सहज प्रवृत्ति उत्पन्न होगी। उन्हें गणित में रस मिलेगा। वे गणित में रुचि लेने लगेंगे। उनमें शोध - Research) की प्रवृत्ति जाग्रत होगी और अपनी समस्याओं का हल अपने आप निकालने में समर्थ होंगे।
कभी-कभी अध्यापक एक गलती कर बैठते हैं, वे बालकों को गणित सीखाते समय उनको कुछ गलती करने पर धमकाते हैं और उनको बैंचों पर खड़ा कर देते हैं व उनको पीटते हैं। इसके अतिरिक्त गणित में सूक्ष्म और अबोधगम्य सिद्धान्तों को वे बालकों की उम्र और समझ का बिना विचार किए उन पर लादते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि बालक गणित के प्रति उदासीन हो जाते हैं और उससे कोसो दूर भागते हैं। रट-रटाकर वे चाहे परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते हैं परन्तु गणित का वास्तविक उपयोग अपने जीवन में नहीं ले पाते हैं। अतः अध्यापकों को चाहिए कि वे इन गलतियों से सावधान रहें। उनको चाहिए कि वे इस प्रकार के प्रेम का वातावरण बनायें कि बालक नि:संकोच अध्यापक से अपनी शंका का समाधान कर सकें और किसी बात को अध्यापक से पूछने में झिझके नहीं। गणित अध्यापक को यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि जब तक बालकों की रुचि विषय में रहे तभी तक गणित पढ़ानी चाहिए क्योंकि अनुकूल परिस्थिति और ठीक समय पर किया हुआ कार्य ही पूर्ण रूप से सफल होता है। जिस समय बालक गणित के किसी विषय को पढ़ते-पढ़ते ऊब जायें और उनको जब उसके पढ़ने में रुचि न रहे तो इसका परिणाम उसी प्रकार होगा जैसा कि बर्तन के भर जाने पर ओर पानी भरने से होता है। अतः बालकों की जब तक विषय में रुचि बनी रहे तभी तक उनको पढ़ाना चाहिए।
लड़कों में गणित के प्रश्नों को हल करने में शीघ्रता एवं शुद्धता (speed and accuracy) हो तथा गणित सम्बन्धी लेखन में कहीं भी किसी तरह की भूल न होने पाये। इसके लिए गणित-कार्य में अभ्यास (Drill) की आवश्यकता है। परन्तु अभ्यास इस प्रकार कराना चाहिए कि बालक उसके करने से ऊबे नहीं। अध्यापक को यह अभ्यास-कार्य खेल-पद्धति (Play-way-Method) द्वारा कराना चाहिए। अभ्यास-कार्य में प्रश्न इस ढंग से बालकों के सम्मुख चुनने चाहिए कि बालक उनमें रुचि लेते रहें। अध्यापक को किसी प्रश्न की लघु विधि(short cut) पर जोर नहीं देना चाहिए बल्कि उस क्रम से कराना चाहिए जिस क्रम से बालक सोचते हैं। कमजोर बालकों का भी गणित अध्यापक को ध्यान रखना चाहिए। तेज (Intelligent) और कमजोर (Weak) बालकों को यथासम्भव उनकी योग्यतानुसार पढ़ाना चाहिए। कमजोर बालकों को तेज बालकों के साथ लाने के लिए कभी-कभी अध्यापक बहुत जल्दी कर बैठते हैं। ऐसा करने से कमजोर बालक की नींव कमजोर रह जाती है जो आगे उन्नति में बाधक होती है। अशुद्ध उत्तर आने पर बालकों पर गुस्सा नहीं करना चाहिए बल्कि उनसे सही उत्तर निकलवाने की चेष्टा करनी चाहिए।

6.पाठ्यपुस्तक (Text-Book) -

कुछ लोगों की ऐसी धारणा है कि बेसिक शिक्षा में पाठ्यपुस्तक की कोई आवश्यकता नहीं होती है। परन्तु यह उनकी बहुत बड़ी भूल है। बेसिक शिक्षा के लिए पुस्तकों का होना अनिवार्य है परन्तु ये पुस्तकें बेसिक शिक्षा के सिद्धान्त पर लिखी होनी चाहिए। गणित की पाठ्यपुस्तक में जो प्रश्न दिये जायें, वे जीवन से सम्बंधित होने चाहिए। प्रश्न वास्तविक हों, उनमें कृत्रिमता की झलक न रहे। प्रश्नों को रखने का ढंग भी क्रमपूर्वक (systematic) हो ताकि सरल प्रश्न पहले आये और फिर अन्त में सबसे कठिन। मौखिक (Oral) तथा मानसिक प्रश्नों का भी समावेश होना चाहिए। गणित की अच्छी पुस्तकों में पुष्टि के लिए कहीं कहीं चित्र और आकृतियों का होना अनिवार्य है। 

Tuesday, 17 September 2019

Symbols in Mathematics

September 17, 2019

Symbols in Mathematics

1.गणित में प्रतीकों का परिचय (Introduction of Symbols in Mathematics) -

इस आर्टिकल में गणित में प्रतीकों के महत्त्व और उपयोगिता के बारे में बताया गया है। जिस प्रकार हमारे जीवन में धर्म तथा संस्था में प्रतीकों का महत्त्वपूर्ण स्थान है और जहां भी प्रयोग किए जाते हैं अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं उसी प्रकार गणित में भी प्रतीकों का महत्त्व है। प्रतीक संक्षिप्त रूप में प्रकट करने के बावजूद गागर में सागर की तरह अपनी भूमिका निभाते हैं। प्रतीकों के बिना गणित की कल्पना भी नहीं की जा सकती है इसलिए कहाँ पर कौनसा प्रतीक प्रयोग किया जाएगा इसको समझना बहुत आवश्यक है। प्रतीक के द्वारा गणित को सरल बनाने में मदद मिलती है और उसको कठिन होने से बचाया जा सकता है।प्रतीकों का प्रयोग करने से हमारे समय की बचत होती है साथ ही हम प्रतीक के द्वारा संक्षिप्त में गणितीय संक्रियाओं को तत्काल व शीघ्र समझ पाते हैं और दूसरों को समझा पाते हैं।इस प्रकार प्रतीक प्रकृति की अद्भुत रचना जो गणित की सुन्दरता को बढ़ाती है और उसमें चार चाँद लगा देते हैं। हमे इनका सदुपयोग करना सीखना चाहिए।
Symbols in Mathematics

Symbols in Mathematics 

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2.गणित में प्रतीक (Symbols in Mathematics) -

मानव जीवन में गणित का महत्त्व विदित है। गणित में प्रतीकों का बहुत महत्त्व होता है। यदि यह कहा जाए कि गणित का प्राचीनकाल से अर्वाचीन काल तक विभिन्न शाखाओं से जुड़े प्रतीकों को समझे बिना अब तक की यात्रा को समझा नहीं जा सकता है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। गणित ही नहीं धर्म तथा संस्कृति, साहित्य और कला की ऊँचाईयाँ भी प्रतीकों को समझे बिना नहीं समझी जा सकती है।
प्रतीक शब्द की व्याख्या आसान नहीं है और उनको पूरी तरह स्पष्ट करना तो ओर भी कठिन है। प्रतीकों के नए-नए अर्थ आते जा रहे हैं और ऐसे में उन्हें पूर्ण अभिव्यक्ति देना एक कठिन कार्य है। गणित के सन्दर्भ में यह कार्य कितना कठिन होगा इसका अनुमान इस तरह लगाया जा सकता है कि सैंकड़ों वर्षों के दौरान विकसित इस समूची परम्परा को प्रतीकों पर आधारित माना जाता है अर्थात् इसका भी क्षेत्र व्यापक अर्थों में जो बात कही जा रही है उसकी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के दौरान अर्थ के कई सोपान दृष्टिगत होते हैं।
हालांकि समय-समय पर विभिन्न गणितज्ञों ने गणित के प्रतीकों को सरल भाषा में समझाने का उपयोगी कार्य समय-समय पर किया है। प्रतीकों की लोकप्रियता ही इसका प्रमाण है कि गणित में इसका कितना उपयोग करते हैं।
प्रतीकों की बहुलता के बावजूद इनकी व्याख्या करना कठिन है। प्रायः यह माना जाता है कि संकेत और प्रतीक एक हैं, पर ऐसा नहीं है। चिन्ह या संकेत जहाँ रूढ़िगत प्रतीक को व्यक्त करते हैं वहीं प्रतीक वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हुए अदृश्य वस्तु का दृश्य संकेत है। प्रतीकों की यह दुनिया आनन्ददायक तो है ही परन्तु विस्मयभरी भी है। एक अर्थ खुलता है और और अगले ही पल विचार तथा चिंतन की दुनिया में ओर अर्थ सामने आ जाता है।
जिस प्रतीक का गणित में कुछ ओर प्रयोग होता है अन्य विषयों में कई बार कुछ नए अर्थ में प्रयोग हो जाता है। इस तरह प्रतीकों का दायरा लगातार न केवल बढ़ता है बल्कि उसे गरिमा भी देता है।
Note-If you want to know which symbols are in mathematics.please click below.
Mathematics Symbols 

3.प्रतीकों का सम्बन्ध (Relation of Symbols) -

 प्रतीक मन तथा बुद्धि की वस्तु है, मन तथा बुद्धि, आत्मा की सम्पत्ति है। आत्मा अनन्त तथा चिरन्तन सत्य है । प्रतीक उस चिरन्तन सत्य का प्रतीक मात्र है। सच तो यह है कि जितना समझ में आ जाये, उतना ही कम है।
जहाँ तक गणित का सम्बन्ध है, वह प्रतीकों की खान हैं। जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र है जो प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों को ध्वनित न करता हो। कोई विद्वान इन्हें सीमित अर्थ में देखता है तो दूसरा असीमित अर्थ में। एक श्रृंखला बनती जाती है, अर्थों का इस तरह सम्पूर्ण विषय अलौकिकता से तादात्म्य स्थापित करने लगता है, मानव मन की अनन्त क्षमताओं को मुखर करता है। प्रतीकों की दुनिया काफी जटिल होने के बावजूद रोचक है और व्यापक इतनी कि इसमें चाहे गणित हो, दर्शन हों, साहित्य हो या कला,विज्ञान हो या अन्य शास्त्र सभी इसकी अनन्त सीमाओं में समाहित हैं।
प्रतीकों की व्यापकता, निरन्तरता और दार्शनिकता की पृष्ठभूमि से स्पष्ट है कि इस विषय पर लिखना आसान कार्य नहीं है। यो इस पर लिखना, आसान कार्य नहीं है। इस विभिन्न विद्वानों द्वारा रचनाओं की कमी नहीं है, पर उनमें कुछ ही स्तरीयता की ऊँचाईयाँ छू सकी है।

4.व्याख्या (Explanation) -

 सहज रूप में प्रतीक की व्याख्या करना कठिन है। इस शब्द के प्रयोग से हमारा जो तात्पर्य है, उस अर्थ में इस विषय पर देश में या विदेश में कोई भी ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। अंग्रेजी में प्रतीक को symbol कहते हैं जैसे संकेत, लक्षण, चिन्ह तथा मुद्रा आदि। चिन्ह के लिए अंग्रेजी में 'sign' शब्द है ।किन्तु संकेत आदि के लिए ये पर्यायवाची शब्द अनेक मिल जाएंगे पर वैज्ञानिक दृष्टि से उस भाषा में Symbol के अलावा दूसरा शब्द नहीं है। किन्तु प्रतीक न तो संकेत है, न लक्षण है और न चिन्ह है। यदि प्रतीक से तात्पर्य उस निशान से है जो किसी अदृश्य, सामने न दिखाई पड़नेवाला दृश्य, वस्तु का आभास है तो यह कहना शायद उचित न हो क्योंकि व्याकरण के अनुसार आभास का अर्थ मिथ्या होता है।

 5.विभिन्न शब्दकोश के अनुसार अर्थ (Meaning According to different Dictionary) -

अंग्रेज़ी शब्दकोश Oxford Dictionary के अनुसार अर्थ -
Symbol is a person, an object, an event etc. that represent a more general quality or situation :white has always been a symbol of purity in Western cultures. Ex. Mandela became a symbol of the anti-apartheid struggle.
Sign - A sign is number, letter etc. that has a fixed meaning, especially in science, mathematics and music, what is the chemical symbol for copper?
A list of symbols used on the map is given below.
Symbols in Mathematics

Symbols in Mathematics 

गणित शब्दकोश के अनुसार -
Symbol - A letter or mark of any sort representing quantities, relations or operations.
Algebraic Symbols - symbols representing numbers and algebraic combinations and operations with these numbers. 

Monday, 16 September 2019

coaching vs education in hindi || what is educational coaching by satyam coaching centre

September 16, 2019

via https://youtu.be/RoFMLMR8Yv4

Linear Differential Equations

September 16, 2019

Linear Differential Equations

इस आर्टिकल में रैखिक अवकल समीकरण के बारे  में बताया गया है.इसमेP औरQ  अचर या  फलन हैं इसलिए यह रैखिक अवकल  समीकरण है .अवकल गुणांक ज्ञात करके समीकण का पूर्ण हल ज्ञात किया जाता है..इसमें बाएं पक्ष कोy से गुणा करके तथा Q को समाकलन गुणांक से गुना करके  दाएं पक्ष का समाकलन  करते है.समीकरण को सरल करके रैखिक अवकल समीकण का सम्पूर्ण हल ज्ञात करते है.
रैखिक अवकल समीकरण की थ्योरी को प्रश्न के हल द्वारा समझाया गया है.यदि यह आर्टिकल पसंद आए तो अपने मित्रो के साथ शेयर एवं लाईक कीजिए .यदि आपको कोई समस्या हो या आपका कोई सुझाव हो तो कमेंट करके बताए .
Linear Differential Equations

Linear Differential Equations

Linear Differential Equation

Definition:A differential equation or the form  (dy/dx)+Py=Q……(1)
Where P and Q are constants or functions of x alone (and not of y) is called a linear differential equation of the first order in y.
To solve such an equation multiplying both sides of (1) by
.eʃPdx we have [(dy/dx)+Py]eʃPdx =Q eʃPdx          ……..(2)
Now (d/dx)[y eʃPdx ]=y(d/dx)[ eʃPdx]+ eʃPdx   (dy/dx)
=y. eʃPdx  (d/dx)[ʃPdx]+ eʃPdx  (dy/dx)
=y. eʃPdx .P+ eʃPdx (dy/dx)
Or (d/dx)[y. eʃPdx ]=[Py+(dy/dx)] eʃPdx
From (2) we get (d/dx)[y eʃPdx ]=Q eʃPdx
Integrating both sides with respect to x,we get
.y . eʃPdx =C+ʃQ eʃPdx dx where C is constant 
Linear Differential Equations

Linear Differential Equations