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How to recognize children’s talent in mathematics?

1.गणित में बालकों की प्रतिभा को कैसे पहचाने?( How to recognize children’s talent in mathematics?)-

गणित में प्रतिभा का पता लगाने के लिए गणित के अध्यापक को कमजोर तथा प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के व्यक्तित्व की विशेषताओं की जानकारी हो तो वह अध्यापन विधि में आवश्यकतानुसार सुधार कर सकता है। बहुधा अध्यापक लगातार पढ़ाते चले जाते हैं किंतु उन्हें यह ज्ञात नहीं होता कि उनके विद्यार्थियों में सीखने की कितनी क्षमता है।परीक्षाफलों से ही गणित के अध्यापक को अपने अध्यापन के प्रभाव का संकेत मिलता है।यदि पढ़ाते समय ही विद्यार्थियों के व्यवहार एवं अभिव्यक्तियों के माध्यम से अध्यापक को अपने अध्यापन की उपयोगिता की जानकारी मिल जाए तो उसके प्रयत्न में सुधार हो सकता है।
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2.गणित में प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का वैयक्तिक गुण(Individual qualities of talented students in mathematics)-

प्रभुत्वशाली,स्वचालित,हार पर विजय,आत्मविश्वास,प्रसन्नचित्त एवं उत्साही, धनात्मक दृष्टिकोण,परिश्रमी,अध्ययन के प्रति रुझान, व्यवधान पर विजय,उच्च शाब्दिक क्षमता,उच्च सहनशक्ति,शैक्षणिक रूचि,संतुलित,आत्म संयमी,स्थिर,उदार,जागरूक,पौरुषपूर्ण,चिंतनशील,विश्वसनीय,अविचलित, प्रसन्नचित्त ,आशावादी, विनम्र ,सफलता की ओर अग्रसर, विषय में गहन रुचि।

3.गणित में कमजोर विद्यार्थियों की पहचान( Identification of weak students in mathematics)-

आरामतलबी, कम स्थिर, निराशावादी, भटकने वाला, ध्यान में निरंतरता का अभाव ,आलसी,अनुज्ञाकारी ,सहभागिता में कमी ,असफलता से घबरा जाना, वंचित, चिंतित रहनेवाला, उद्वेलित, अंहकारी,कुसमायोजित,अशांत, उत्तेजित होने वाला,आक्रामक, पुरातनपंथी, अनुशासनहीन, रूढ़िवादी, भयभीत, निष्क्रिय, बहानेबाज, अस्थिर,चिड़चिड़ा।

उपर्युक्त विशेषताओं की सहायता से विद्यार्थियों को कक्षा में पहचान कर कक्षाध्यापन को सही दिशा प्रदान कर सकता है। गणित में सफल एवं असफल विद्यार्थियों की पहचान कर अध्यापक उन्हें व्यक्तिगत परामर्श द्वारा उनके समायोजन में सहयोग कर सकता है।कक्षा में व्यक्तिगत मार्गदर्शन में उपयुक्त विशेषताएं अत्यंत सहायक है।

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4.बालकों की गणित में प्रतिभा को कैसे पहचानें?(How to recognize children’s talent in mathematics?)-

(1.)अक्सर हमारे दिमाग में यह प्रश्न उठता रहता है कि बालकों में किस प्रकार की प्रतिभा है तथा उसको कैसे पहचानें?बालक दिन-प्रतिदिन में जो भी क्रिया-प्रतिक्रिया तथा गतिविधियां करता है उसके आधार पर हम उनमें गणितीय प्रतिभा का पता लगा सकते हैं।
(2.)बालकों में गणितीय प्रतिभा को पहचानने के लिए माता-पिता,अभिभावक तथा शिक्षकों का आपस में संवाद अर्थात् वार्तालाप करना आवश्यक है।
(3.)बालक कई प्रकार की रुचियां तथा जिज्ञासाएं प्रकट करता है उनमें से जिस कार्य की रुचि व जिज्ञासा बार-बार प्रकट करता है उसके आधार पर उसकी प्रतिभा को पहचाना जा सकता है। जैसे वह बार-बार किसी सवाल का समाधान पूछता हैं या वह कहता है कि मेरा टेस्ट ले लो या कोई अन्य गणितीय पहेलियां इत्यादि की चर्चा करता है तथा रुचि प्रकट करता है तो बालक को गणित के क्षेत्र में आगे बढ़ाना चाहिए ।गणित में उसको बार-बार अवसर प्रदान करना चाहिए।
(4.)शिक्षकों से मिलकर यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि गणित में कितने अंक अर्जित करता है तथा क्या गणित विषय में बालक की रूचि है।साथ ही विद्यालय में कई बार टेस्ट लिए जाते हैं उनके आधार पर भी गणित की प्रतिभा है या नहीं उसे पहचाना जा सकता है।
(5.)कुछ बालक अंतर्मुखी तथा कुछ बालक बहिर्मुखी होते हैं।जो बालक बहिर्मुखी होते हैं वे तो अपनी रुचि व जिज्ञासा प्रकट करते रहते हैं तथा उनके चाल-चलन से भी प्रकट हो जाता है कि ऐसे बालकों में गणितीय प्रतिभा है या नहीं। परंतु अंतर्मुखी बालकों की प्रतिभा को पहचानना टेढ़ी खीर है।अन्तर्मुखी बालकों की प्रतिभा को पहचानने के लिए एक कुशल गुरु की आवश्यकता होती है अर्थात् माता-पिता और शिक्षकों को मनोविज्ञान,व्यवहारशास्त्र तथा दर्शन शास्त्र का अच्छा ज्ञान होना आवश्यक है।
(6.)अंतर्मुखी बालक अपनी रुचि व जिज्ञासा प्रकट न करें और उनके चाल-चलन तथा व्यवहार से भी आपको बालक की प्रतिभा का पता न चल पा रहा हो तो हमें उनके समक्ष अपनी तरफ से पहल करके पता लगाना चाहिए। जैसे आप उनको कोई गणित का सवाल पूछ सकते हो, यदि उसकी गणित में प्रतिभा होगी तो वह सहर्ष ही तैयार हो जाएगा और उसके अंदर छुपी हुई गणितीय प्रतिभा प्रकट हो जाएगी।गणित का टेस्ट,गणितीय पहेलियां,गणित के मॉडल, गणित के खेल इत्यादि के द्वारा आप उनमें गणित की प्रतिभा को परख सकते हो।पढ़ते समय वह किस प्रकार की पुस्तक को बार-बार पढ़ने का प्रयास करता है तथा एक-दो बार कोई प्रश्नावली समझाकर उसे प्रश्न पूछकर या टेस्ट के द्वारा यह पता लगा सकते हैं कि उसमें गणितीय प्रतिभा है या नहीं।यदि बालक अपनी तरफ से कोई रुचि प्रकट न करें तो हमें पहल करके, उसके बाद पता लगाना चाहिए कि बालक अपनी इच्छा भी प्रकट करता है या नहीं।यदि उसमें गणित की प्रतिभा है तो गणित में धीरे-धीरे उसको प्रशिक्षित करें।गणित के क्षेत्र में उसको नए-नए अवसर प्रदान करके ,उसे प्रोत्साहित करना चाहिए जिससे वह उसमें भाग ले सके। इस प्रकार उसकी प्रतिभा को निखारा जा सकता है।
(7.)याद रखिए आपकी बालक पर पैनी नजर रहनी चाहिए।वह किस प्रकार का खान-पान पसंद करता है,किस प्रकार के मित्रों के साथ उठना-बैठना पसंद करता है। माता-पिता,अभिभावक,परिवार के सदस्यों, संबंधियों तथा शिक्षकों से किस प्रकार का व्यवहार पसंद करता है? इन सब बातों को नोट करके बालक की प्रतिभा को पहचाना जा सकता है। बालक की गणितीय प्रतिभा को पहचान कर उसको तराशने की आवश्यकता होती है अन्यथा वह प्रतिभा सुप्त ही रह जाती है।

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(8.)हमेशा बालक के साथ सकारात्मक व्यवहार करें।बालक के साथ नकारात्मक व्यवहार न करें क्योंकि बालक के साथ आत्मीयता तथा अपनेपन का व्यवहार करते हैं तो बालक अपनी रुचि व जिज्ञासा प्रकट करता रहता है अन्यथा वह अपनी रुचि व जिज्ञासा आपके सामने प्रकट नहीं करेगा।आपके लिए उसकी प्रतिभा को पहचानना मुश्किल कार्य हो जाएगा।
(9.)बालक की जिस क्षेत्र में रुचि व जिज्ञासा नहीं है उस क्षेत्र में जोर जबरदस्ती से उसको आगे न बढ़ाएं क्योंकि रुचि व जिज्ञासा वाले क्षेत्र में अच्छा परिणाम प्राप्त होता है। बालक अरुचि वाले क्षेत्र में बालक आगे नहीं बढ़ सकता है‌।

5.समीक्षा( Review)-

वस्तुत: बालक की प्रतिभा का पता लगाना बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य है।हम सतर्कता ,सजगता,सावधानी व विवेक के द्वारा ही पता लगा सकते है।अन्यथा उसे अनचाहे क्षेत्र में आगे बढ़ाने का कोई परिणाम नहीं आता है। माता-पिता, शिक्षक आधुनिक युग में जो विषय प्रचलन में है उसमें बालक को आगे बढ़ाना चाहते हैं परंतु यदि बालक की बिल्कुल ही रुचि व जिज्ञासा जिस क्षेत्र में नहीं है उस क्षेत्र में बालक को आगे बढ़ाने पर वह आगे नहीं बढ़ पाता है।
बालक की रुचि व जिज्ञासा यदि गणित में है तब भी उसकी स्किल व प्रतिभा की जांच करना आवश्यक है क्योंकि केवल रुचि व जिज्ञासा का हमारी मानसिकता पर प्रभाव जरूर पड़ता है परंतु केवल उसके बल पर गणित की समस्याओं को हल नहीं किया जा सकता है।
गणित में प्रतिभा को निखारने के लिए उसकी प्रतिभा को तराशना पड़ता है ।माता-पिता और शिक्षकों को हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि थोड़ी भी लापरवाही हमारे लिए घातक हो सकती है।हम बात-बात पर यदि बालक पर बिगड़ जाएंगे तो ऐसे बालक की मानसिकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता जाता है।
सकारात्मक सोच का विद्यार्थियों में अच्छा प्रभाव पड़ता है, विद्यार्थी के आत्मविश्वास का विकास होता है। गणित जैसे विषय में प्रतिभा को पहचानना तलवार की धार पर चलना जितना कठिन कार्य है। इस प्रकार बालक की प्रतिभा को पहचान कर उसे आगे बढ़ाएं। केवल हमारी इच्छा व रुचि के आधार पर गणित को बालक पर थोपना उचित नहीं है।

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