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How Can We Avoid Living Immoral Life?

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1.आचारहीन जीवन जीने से कैसे बचें? (How Can We Avoid Living Immoral Life?),हम अधम जीवन न जीएं (Let Us Not Live Mediocre Life):

  • आचारहीन जीवन जीने से कैसे बचें? (How Can We Avoid Living Immoral Life?) इसमें आचार से तात्पर्य है चरित्र,चाल,अच्छा चाल-चलन,व्यवहार,आचरण संबंधी नियम आदि।आचारहीन जीवन के बिना अध्ययन-अध्यापन को ठीक प्रकार से अंजाम नहीं दे सकते हैं।आचारहीन जीवन जीने से छात्र-छात्राएं फालतू के कार्यों में अनावश्यक समय बर्बाद करते हैं।
  • जो समय छात्र-छात्राओं को अध्ययन में व्यतीत करना चाहिए उस समय को मौज-मस्ती,सोशल मीडिया,गप्पे हाँकने में व्यतीत करते हैं।इस तरह धीरे-धीरे उन्हें फालतू के कार्यों में समय व्यतीत करने की लत लग जाती है।बात यहां तक ही नहीं है बल्कि छात्र-छात्राएं अश्लील हरकतें करने,नशा करने,मादक पदार्थों का सेवन जैसे कार्यों में लिप्त हो जाते हैं।
  • ऐसी बात नहीं है कि छात्र-छात्राएं ही निकृष्ट कार्य करते हैं बल्कि अध्यापक भी निकृष्ट कार्यों में लिप्त पाए गए हैं।
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2.आचारहीन जीवन (Ethless Life):

  • संसार में ऐसे लोग भी दिखलाई देते हैं जो नीच कोटि के होने पर समुन्नत और संपन्न बने हुए हैं,किंतु इन उदाहरणों से उत्तम जीवन जीने का महत्त्व नहीं घट जाता।नीचता कितनी संपन्न और धन वैभव से भरी क्यों ना हो,साधारण स्थिति में रह रही उत्तम चरित्र के सम्मुख टिक नहीं सकती।मनुष्य एक महान व्यक्तित्व है,उसका सबसे पहला लक्ष्य उत्तम चरित्र ही है;बाद में धन,दौलत और पद प्रतिष्ठा।उत्तम चरित्र मनुष्यता का भाव-पर्यायी है।जिसने लोभ,लालच अथवा अयोग्य उदाहरणों से प्रेरित होकर उत्तम चरित्र को त्याग दिया,फिर उसने अपने पास रखा ही क्या? मनुष्य यदि मनुष्यता से रीता होकर भौतिक विभूतियों से संपन्न हो जाए तो क्या वह आशा कर सकता है कि उसे मनुष्य संबोधन से ही बुलाया जाए।निकृष्ट व्यक्ति भले ही आकार-प्रकार और सूरत-शक्ल में मनुष्य दीखता रहे,किंतु वस्तुतः वह मनुष्य न होकर कुछ ओर ही होता है।
  • भौतिक विभूतियों को प्राप्त करने के लोभ में जो दिव्य तत्त्व उत्कृष्टता का त्याग कर देता है,वह उस मनुष्य की तरह ही मूर्ख माना जाएगा,जो रंगीन काँच के लोभ में हीरे-मोती का त्याग कर देता है।कहां तो छाया की तरह चंचल,बादल की तरह अस्थिर और नश्वरता के दोष से दूषित भौतिक विभूतियां,जिसका भावाभाव दोनों ही दुःखदायी होते हैं और कहां मन,बुद्धि और आत्मा के साथ समग्र व्यक्तित्व को तेजस्वी बना देने वाली उत्कृष्टता।इतना अंतर होते हुए भी जो उत्कृष्टता की अपेक्षा भौतिक विभूतियों को अधिक महत्त्व देकर निकृष्टतम बन जाने को तैयार है,उसकी बुद्धि,भाग्य और भविष्य पर तरस खाना ही पड़ेगा।
  • भौतिक विभूतियों और लौकिक संपदाओं का भी अपना एक महत्त्व है,किंतु उसी सीमा तक जिस सीमा तक उनकी प्राप्ति कर,प्रयत्न और उपलब्धि मनुष्य की उत्कृष्टता को प्रभावित न कर पाए।जिस बिंदु से भौतिक विभूतियों और लौकिक संपदाओं की ऐषणा उत्कृष्टता को प्रभावित करने लग जाएँ,वहीं से वे सर्वथा त्याज्य बन जाती है।
  • निकृष्टता की तुलना में उत्कृष्टता का गौरव न कभी कम हुआ है और ना कभी आगे होगा।उत्कृष्ट महानुभाव लोग कितनी ही विषम तथा विपन्न परिस्थिति में क्यों न संतोष किए हों,तब भी वे उस निकृष्ट की तुलना में संसार में सम्मानित बने रहेंगे,जिसने असत् मार्गों तथा उपायों द्वारा धन-दौलत इकट्ठी कर रखी है।संसार में दुष्टता और धूर्तता कितनी ही बढ़ जाए एवं सज्जनों का जीवन कितना ही कठिन क्यों ना हो जाए,तथापि यह युग प्रभाव अधिक दिन नहीं ठहर सकता।अंततः उत्कृष्टता को ही स्थिरता और सफलता का श्रेय मिलेगा।संसार की सद्संपत्तियों पर उसी का अधिकार होगा और उसी की जाति का शंखनाद गूँजेगा।

3.हर तरह से सदाचरण श्रेष्ठ (Good Conduct is Superior in Every Way):

  • निकृष्टता तथा दुष्टता की आयु अधिक नहीं होती।तथापि उत्कृष्टता की परीक्षा के लिए उसको भी संसार में आगे का अवसर दिया जाता है।कमजोर और संदिग्ध व्यक्तियों को धोखे में डालने के लिए वह ज्वार की तरह बढ़कर आसमान छूने लगती है।किंतु कुछ ही समय बाद भाटे की तरह उतरकर भूमिसात हो जाती है।निर्बल अथवा संदिग्ध व्यक्ति उसके उस उफान को देखकर विचलित हो उठते हैं और भाटे की प्रतीक्षा किए बिना ही अधीर होकर समुन्नति का साधन मानकर निकृष्टता की नीति अपना लेते हैं।निकृष्टता के आधार पर संपन्न बनते लोगों का सामयिक उत्थान ही नहीं देखना चाहिए।उनकी उस दशा को भी इस जिज्ञासा से देखना चाहिए जो उनके कुकर्मों का परिणाम होती है।
  • उत्कृष्ट आदर्शों वाले सत्पुरुष अपना हर कदम खूब सोच-विचार और नाप-तोलकर रखते हैं।उन्हें कदम के बढ़ने की उतनी चिंता नहीं होती,जितनी कि उसके सही होने की।वे जो कुछ करते और कहते हैं,उसे पहले मर्यादा,सत्य और सुशीलता की कसौटी पर कस लेते हैं।इस सोच-विचार और पहचान-परख के कारण उनकी प्रगति अंधड की तरह नहीं हो पाती।उनके कदम जिम्मेदारी के साथ उठते,पड़ते और बढ़ते हैं।निश्चय ही उत्कृष्टता के पुजारी अंधाधुंध उन्नति तो नहीं कर पाते,तथापि वे जो कुछ उन्नति और प्रगति करते हैं,वह दृढ़,स्थायी और चिरजीवी होती है।उसके किसी भी कोण में पतन की संभावना का एक नगण्य सा भी बीज नहीं होता।
  • प्रदर्शन के विभ्रम से मुक्त होने के कारण इस अंधी तथा स्वार्थपूर्ण दुनिया में उत्कृष्टता जल्दी पहचानी नहीं जाती,किंतु एक बार जब वह पहचान ली जाती है तो फिर उसको समाज सिर आंखों पर चढ़ाए बिना नहीं रह सकता।किसी प्रतियोगिता में हजारों प्रत्याशी भाग लेते हैं।उनमें से बहुत से बड़े ही वाचाल,प्रदर्शनकारी शान-शौकत वाले और व्यक्तित्ववान भी होते हैं और बहुत से सरल,सीधे तथा साधारण भी।किंतु जब चुनाव होता है तो प्रदर्शनपूर्ण निकृष्ट प्रतियोगियों को दूध की मक्खी की तरह निकाल दिया जाता है और साधारण,सरल तथा सीधा प्रत्याशी अपनी उत्कृष्टता के कारण चुन लिया जाता है।
  • उत्कृष्टता में एक अलौकिक तेज तथा आत्मविश्वास रहता है जो हर जगह हर स्थिति और परिस्थिति पर अपना प्रभाव डालता रहता है।उत्कृष्टता भगवद तेज का ही एक अंश होता है,उसको ना तो दबाया जा सकता है और न पराजित।उत्कृष्ट व्यक्ति अभाव तथा कठिनाई में भी अपने तेज से दमकता रहता है,जबकि निकृष्ट व्यक्ति वैभव और विभूति की चमक के बीच भी मलिन तथा कलुषित बना रहता है।मानव जीवन की यह उपलब्धि कुछ छोटी उपलब्धि नहीं है।इसलिए किसी लोभ,लालच अथवा प्रेरणा में पड़कर मनुष्य को उत्कृष्टता से विमुख न होना चाहिए।
  • निकृष्ट उपायों द्वारा मिलनेवाले वैभव तथा ऐश्वर्य की अपेक्षा उत्कृष्टता की रक्षा के साथ गरीबी स्वीकार कर लेना अधिक श्रेयस्कर है।भगवान ने मनुष्य को सृष्टि का सर्वोत्कृष्ट प्राणी बनाया है और तदनुसार उससे उत्कृष्ट आचरण की आशा भी की है।अपने प्रभु अपने पिता और अपने रचयिता की आशा पर पानी फेरना अथवा उसके उपकारी निर्देश को न मानना भयानक कृतघ्नता है।बड़ा भारी विश्वासघात है।
  • बहुधा लोग सुखोपभोग के लिए धन की तृष्णा से प्रताड़ित रहा करते हैं।वे सोचा करते हैं कि अधिक से अधिक धन की सिद्धि होनी चाहिए,उसके लिए कितने ही निकृष्ट साधन प्रयोग क्यों न करना पड़े,चिंता नहीं।आज के समय के बहुत से लोग ऐसा कर भी रहे हैं।किंतु यदि गहरी और पैनी दृष्टि से देखा जाए तो पता चलेगा कि उस निकृष्ट धन से वे जिस सुख का उपभोग करते दिखलाई देते हैं,वह वास्तव में उनके दुःख का कारण बना होता है।उस वैभव और विभूति के बीच भी वे बड़े ही अशांत भीत और असंतुष्ट रहा करते हैं।धन के साथ वे जिन महापापों का संचय अपने अंतःकरण में कर लिया करते हैं,वे शोक-संतापों के रूप में प्रकट होकर उनका सुख-चैन छीनते रहते हैं।

4.उत्कृष्ट जीवन कैसे जिएं? (How to Live a Decent Life?):

  • विवेकपूर्वक विचार करके निर्णय ले लें कि वैभव के बीच अशांत,असंतुष्ट और दुःखी रहने की अपेक्षा कठिन और अभावपूर्ण जीवन अंगीकार कर लिया जाए।मनुष्य की शोभा इसी में है कि वह उत्कृष्टता में अपना गौरव समझे और अल्प साधनों में भी संतोषपूर्वक अपनी आवश्यकताएँ पूरी करता चले,किंतु भूलकर भी निकृष्टता की ओर न जाए।उस अभावपूर्ण उत्कृष्ट जीवन में जो आत्मिक सुख,स्वर्गीय शांति और आत्मगौरव प्राप्त होगा,वह वैभवपूर्ण निष्कृष्ट जीवन की झूठी सुविधा से लाखों गुना महत्त्वपूर्ण है।
  • छात्र-छात्राएँ सफलता प्राप्त करने तथा दूसरों के सामने अपनी शान-शौकत दिखाने के लिए तथा जीवन में जल्दी से जल्दी सफलता अर्जित करने और धन-संपत्ति के लिए अनैतिक तरीके अपनाने लगते हैं।जैसे परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए नकल करना,परीक्षक को डराना-धमकाना,परीक्षा से पूर्व प्रश्नपत्र प्राप्त करने की जुगत भिड़ाना आदि।इन तरीकों को अपनाने तथा पकड़े जाने पर पूरा जीवन बर्बाद हो जाता है तथा परिवार,समाज में बदनामी होती है वह अलग।
  • अच्छे तरीकों,मेहनत करके तथा सही रणनीति अपनाने पर मनोवांछित सफलता नहीं मिले अथवा सफलता देर से मिले यह हो सकता है परंतु उत्कृष्ट तरीकों को अपनाने,मेहनत करने का आनंद ही कुछ अलग है।घर-परिवार,समाज व शिक्षण संस्थान का गौरव बढ़ता है।
  • अतः सुदृढ़ संकल्प,विवेक,धैर्य,साहस के साथ उत्कृष्टता का दामन थामे रखें।हमेशा अपने कोर्स की पुस्तकों तथा व्यवहारिक जीवन को उन्नत बनाने की पुस्तकों का अध्ययन करने में अपने आपको व्यस्त रखना चाहिए।शुभ कार्यों में अपने आपको व्यस्त रखना चाहिए।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में आचारहीन जीवन जीने से कैसे बचें? (How Can We Avoid Living Immoral Life?),हम अधम जीवन न जीएं (Let Us Not Live Mediocre Life) के बारे में बताया गया है।

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5.फालतू सवाल का जवाब देना (हास्य-व्यंग्य) (Answering Useless Questions) (Humour-Satire):

  • बॉयफ्रेंड:आज हमारे स्कूल में गणित विषय में काम्पटीशन रखा गया है।उसमें फालतू सवाल का जवाब देना है।
  • गर्लफ्रेंड:अच्छा तुम फालतू सवाल का जवाब कैसे दोगे?
  • बॉयफ्रेंड:मैं सोच रहा हूं फालतू सवाल का जवाब,फालतू व्यक्ति ही बेहतर तरीके से दे सकता है।इसलिए मेरा विचार यह है कि तुम मेरे साथ चलती तो ज्यादा अच्छा रहता।

6.आचारहीन जीवन जीने से कैसे बचें? (Frequently Asked Questions Related to How Can We Avoid Living Immoral Life?),हम अधम जीवन न जीएं (Let Us Not Live Mediocre Life) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.अच्छे कार्य करने के लिए क्या करें? (What to do for Good Work?):

उत्तर:हमारा मन विचारों व भावनाओं के माध्यम से चलता है,जिस तरह के विचार मन में उठते हैं मन की ऊर्जा तरंगे उसी अनुसार परिवर्तित हो जाती है और मन की इन्हीं भावनाओं व विचारों को पोषण मिलता है अध्ययन व मनन से।मस्तिष्क को शरीर के अन्य अंगों की तरह ही स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम की आवश्यकता होती है,जो इसे अध्ययन से भरपूर मात्रा में मिल जाता है और जिन्हें नियमित रूप से पढ़ने की आदत होती है,वे ज्यादा संतुलित और सक्रिय रहते होते हैं।

प्रश्न:2.क्या अच्छे आचरण में रचनात्मकता का योगदान होता है? (Does Creativity Contribute to Good Conduct?):

उत्तर:नियमित अध्ययन से और विषय सामग्री पर चिंतन करने से रचनात्मकता का विकास होता है।हमारे मस्तिष्क में किसी भी विषय व घटना से संबंधित नए-नए तरह के विचार आते हैं,जो हमारे विकास में सहायक होते हैं।अध्ययन की आदत व्यक्ति को एक नया नजरिया प्रदान करती है।यह किसी भी चीज को नए तरीके से सोचने के लिए प्रेरित करती है।निरंतर अध्ययन से हमें अच्छे कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।एक अच्छी पुस्तक का अध्ययन हमें निकृष्ट चिंतन करने से ध्यान हटा देता है और हमें कुछ अच्छा चिंतन करने के लिए प्रेरित करता है।

प्रश्न:3.आज के तकनीकी युग में एकाग्र कैसे रहा जा सकता है? (How Can We Stay Focused in Today’s Technological Age?):

उत्तर:आज इंटरनेट,टीवी,मोबाइल फोन जैसी तरह-तरह की सूचना संबंधी तकनीकों के बीच में एकाग्र रह पाना बड़ी चुनौती बन गई है।लेकिन जब व्यक्ति अच्छी पुस्तक का अध्ययन करता है तो वह सहज ही एकाग्र हो जाता है।उस समय उसका ध्यान अनावश्यक कारणों से भटकता नहीं।यही कारण है कि वैज्ञानिक अब यह मानते हैं की निरंतर अध्ययन करने की क्षमता मानसिक एकाग्रता में वृद्धि करने के लिए काफी है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा आचारहीन जीवन जीने से कैसे बचें? (How Can We Avoid Living Immoral Life?),हम अधम जीवन न जीएं (Let Us Not Live Mediocre Life) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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