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Education not become an election issue

1.शिक्षा चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनती है?(Why does education not become an election issue?)-

शिक्षा चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनती है (Why does education not become an election issue?) ,इस आर्टिकल में इसके बारे में विस्तृत रूप से बताया गया है।भारत में ही नहीं बल्कि अन्य विकसित देशों में भी शिक्षा चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनती है?( Why does education not become an election issue?) भारत तथा विश्व के अधिकांश देशों में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है।जिन देशों में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली नहीं है, वहां भी जनता लोकतांत्रिक शासन प्रणाली लागू करने के लिए आन्दोलन करती रहती है।किसी भी शासन प्रणाली के अपने गुण व दोष होते हैं।दोष रहित कोई भी शासन प्रणाली नहीं है। यहां चुनावी मुद्दा बनने से तात्पर्य यह है कि लोकतान्त्रिक देशों में शिक्षा चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनती है? ( Why does education not become an election issue?) सामान्यतः मतदान या चुनाव लोकतान्त्रिक शासन का मुख्य पहलू है।
लोकतन्त्र में वही सरकार या शासक शासन करता है जो जनता द्वारा चुना जाता है।लोकतान्त्रिक देशों में द्विदलीय तथा बहुदलीय व्यवस्था लागू होती है। शिक्षा व्यक्तियों तथा युवाओं का विकास करने, रोजगार दिलाने का माध्यम है। शिक्षा के द्वारा व्यक्ति का सर्वांगीण विकास किया जाता है।अब मुख्य प्रश्न यह है कि शिक्षा चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाती है?(Why does education not become an election issue?).
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2.शिक्षा चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनती है?(Why does education not become an election issue?)-

लोकतान्त्रिक देशों में दलीय शासन प्रणाली है।जिस दल को बहुमत मिल जाता है,वही दल देश व राज्यों में शासन करता है।दलों में जो बुद्धिजीवी नेता होते हैं वे दल द्वारा लागू किए जाने वाले मुद्दों को घोषणा पत्र में शामिल करते हैं।दलों की मुख्य सोच यही होती है कि येन केन प्रकारेण सत्ता कैसे हासिल की जा सकती है? इसलिए वे अपने घोषणापत्र में वही मुद्दे शामिल करते हैं जिनके आधार पर सत्ता प्राप्त की जा सकती है।वे ऐसे संवेदनशील तथा ज्वलंत मुद्दों को शामिल करते हैं जिनके आधार पर जनता की भावनाओं को उभारा जा सके तथा जनता को उसमें तात्कालिक लाभ नजर आता हो। जैसे-आरक्षण,राम मन्दिर निर्माण, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाना, आतंकवाद,सीएए,एनआरसी, तलाक कानून इत्यादि।इन मुद्दों के आधार पर जनता भावुक होकर किसी एक दल के पक्ष में मतदान करती है।इसका अर्थ यह नहीं है कि ये मुद्दे सुलझने नहीं चाहिए।इन मुद्दों का हल होने में देश का हित ही है परन्तु इनमें से कुछ मुद्दे ऐसे है कि उनको सुलझाने से एक पक्ष खुश होता है तो दूसरा पक्ष नाराज होता है। परन्तु किसी भी मुद्दे को लटकाये रखने से वह मुद्दा देश के लिए नासूर बन जाता है। इसलिए मुद्दो को सुलझाने में ही देश का हित है।
शिक्षा भी ऐसा ही मुद्दा है जिससे हर सरकार लटकाए रखना चाहती है और कोई सरकार इसे सुलझाने का प्रयास करती है तो तथाकथित सेक्युलर पार्टियों के शरीर पर सांप लोटने लगते हैं। लेकिन हमें ऐसा लगता है कि यदि शिक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे को सुलझा दिया जाए तो भारत की बहुत-सी समस्याओं का समाधान तो हो ही सकता है बल्कि कई नई समस्याएं भी पैदा नहीं होगी।

3.शिक्षा की पुरातन व्यवस्था (Ancient system of education)-

प्राचीन समय में शिक्षा राज्य का विषय नहीं था।शिक्षा समर्पित तथा ऋषि-मुनियों द्वारा गुरुकुल में प्रदान की जाती थी। ऋषि-मुनि निर्लोभी थे।वे शिक्षा को व्यवसाय नहीं बनाना चाहते थे।गुरुकुल तथा स्वयं का जीवन निर्वाह करने के लिए वे समाज तथा राज्य से सहायता लेते थे।उनका कार्य दान-दक्षिणा से ही चलता था।उनमें धन कमाने की किंचित मात्र भी कामना नहीं थी।गुरुकुल तथा आश्रम गांव व शहर के बाहर वन तथा अरण्यों में होते थे।ऋषि-मुनि किसी प्रकार की मोह ,माया व प्रपंच में नहीं पड़ते थे।इसलिए प्राचीन काल में योग्य तथा व्यावहारिक शिष्य तैयार होते थे।

4.शिक्षा की आधुनिक व्यवस्था (Modern system of education)-

आधुनिक युग में शिक्षा राज्य का विषय है।शिक्षा निजी तथा सरकारी स्तर पर प्रदान की जाती है।प्राचीन काल में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य आध्यात्मिक था जबकि सांसारिक व व्यावहारिक जीवन में अपने कर्त्तव्यों का पालन करना गौण उद्देश्य था।
वर्तमान समय में शिक्षा में आध्यात्मिक पक्ष का बिल्कुल ही समावेश नहीं है। वर्तमान समय में विद्यार्थियों को भौतिक शिक्षा प्रदान की जाती है।भौतिक शिक्षा के आधार पर विद्यार्थी केवल आजीविका प्राप्त कर सकता है।परंतु आध्यात्मिक तथा नैतिक पक्ष की अवहेलना करने से छात्र-छात्राओं में उच्छृंखलता, उद्देश्यहीन, अनुशासनहीनता जैसे कई दुर्गुणों का समावेश हो रहा है।

5.मनुष्य में सात्विक गुणों का अभाव (Sincific qualities lacks in man)-

आधुनिक शिक्षा में आध्यात्मिक तथा नैतिक गुणों का समावेश नहीं है।आध्यात्मिक तथा नैतिक शिक्षा के द्वारा मनुष्य को स्वयं का बोध होता है ,व्यक्ति का पूरी तरह रूपांतरण हो जाता है।आध्यात्मिक तथा नैतिक शिक्षा के द्वारा मनुष्य को यह बोध हो जाता है कि उसके लिए क्या सही है,क्या गलत है, उसके जीवन का क्या उद्देश्य है तथा उस उद्देश्य को कैसे प्राप्त किया जा सकता है? वह कौन है तथा कहां से आया है?व्यक्ति को उपर्युक्त बातों का बोध ही नहीं है तो वे अपने अधिकारों तथा अपने जीवन के लिए श्रेष्ठ शिक्षा को शामिल करने के लिए कैसे आंदोलन करेंगे?वे राजनीतिक दलों को क्यों बाध्य करेंगे कि उनके लिए उचित शिक्षा का प्रबंध किया जाए?
आधुनिक शिक्षा केवल लोगों को साक्षर करती है ।ज्यादा से ज्यादा इस शिक्षा के आधार पर रोजगार पाया जा सकता है। परंतु रोजगार प्रदान करने में भी आधुनिक शिक्षा पूरी तरह सक्षम नहीं है।आधुनिक शिक्षा केवल सैद्धांतिक तथा भौतिक विषयों का ज्ञान प्रदान करती है।आधुनिक शिक्षा, व्यावहारिक शिक्षा प्रदान करने में अक्षम है।इसलिए सांसारिक जीवन के कर्त्तव्यों का निर्वाह भी व्यक्ति ठीक से नहीं कर पाता है।

6.सज्जन व्यक्तियों का निष्क्रिय होना (Be inactive of gentleman persons)-

आधुनिक युग में जो सज्जन व्यक्ति हैं वे शिक्षा की उपयोगिता समझते हुए भी जनता को शिक्षा की उपयोगिता न तो समझाते है और जनता को शिक्षा के प्रति जागरुक नहीं करते हैं। यदि करते भी हैं तो फुटकर रूप में जिससे आज के राजनीतिक दल कोई तवज्जो नहीं देते हैं तथा न ही राजनेताओं तथा दलों को वास्तविक शिक्षा को लागू करने ,इसे चुनावी मुद्दा बनाने का दबाव बनाते हैं।
आधुनिक युग में जो ऋषि-मुनि, संत-महात्मा हैं वे यह ठीक से जानते हैं कि शिक्षा का प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कितना अहम योगदान है।इसके लिए वे गुरुकुल खोल देते हैं।अब भारत जैसे देश में दस बीस गुरुकुल भी हों तो वे बहुत कम है ,उनके द्वारा सीमित संख्या में छात्रों को शिक्षित किया जा सकता है जो कि ऊंट के मुंह में जीरे के समान नगण्य है। अर्थात् उसका नगण्य प्रभाव पड़ता है। ऋषि-मुनि,सन्त-महात्मा यदि राजनीतिक दलों को बाध्य करें तो शिक्षा चुनावी मुद्दा बन सकता है।

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7.राजनैतिक दलों का सत्ता लोलुप होना (Political parties to have power)-

राजनीतिक दलों का मुख्य उद्देश्य सत्ता हासिल करना है। देश के हित में क्या है ? शिक्षा कैसी होनी चाहिए? शिक्षा के वर्तमान स्वरूप में कैसा बदलाव करना चाहिए जो हर व्यक्ति को आत्मनिर्भर तथा हर तरह से सक्षम बनाएं,ऐसे मुद्दों से उनको कोई लेना देना नहीं है।उनके घोषणापत्र में वे ही मुद्दे शोभा पाते हैं जिनके आधार पर वोट प्राप्त किए जा सकते हैं।
कोई भला आदमी यदि शिक्षा जैसे गम्भीर तथा जीवन को गहराई से प्रभावित करने वाले मुद्दों को उठाता है या उनको शासन में लागू करना चाहता है तो वे विपक्षी दल जिन्होंने धर्म-निरपेक्षता का चोगा पहन रखा है वे धर्म निरपेक्षता का ढोल पीटने लगते हैं।वे कहते हैं कि देश के संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ की जा रही है।अगली बार जनता उनके बहकावे में आकर ऐसे दल को सत्ता से हटा देती है अर्थात् उनको वोट नहीं देती है।

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8.मुख्य मुद्दों का प्रभाव (Key issues impact)-

भारत की जनता आज भी धर्म ,फिल्मों तथा क्रिकेट जैसे मुद्दों को महत्व देती है।यदि कोई इनसे छेड़छाड़ करता है तो जनता उनके खिलाफ हो जाती है।
शिक्षा में आध्यात्मिकता तथा नैतिक गुणों का समावेश करते ही तथाकथित सेकुलर पार्टियां ऐसे दल के विरोध में हो जाती है।सारे दल ऐसे दल के खिलाफ हो जाते हैं।
दरअसल वास्तविक शिक्षा वही है जिसमें प्रगतिशीलता तथा नवीनता जैसे गुणों का भी समावेश हो। परन्तु इन सभी गुणों का समावेश करने से तथाकथित सेकुलर पार्टियों के पेट में दर्द चालू हो जाता है।उन्हें यह डर सताने लगता है यदि एक बार जनता जाग गई या जागने की प्रक्रिया लागू कर दी गई तो वे सत्ता हासिल नहीं कर पाएंगे।इसलिए वे भी यही चाहते हैं कि शिक्षा जैसा सबसे मुख्य मुद्दा मृत ही पड़ा रहे तो अच्छा है।जनता ,युवा तथा देश के लोग सोए हुए ही रहे तो अच्छा है।इसलिए शिक्षा चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनती है ( Why does education not become an election issue?) इसमें उपर्युक्त कारण तो शामिल हैं ही, आगे ओर उन कारणों पर गौर करते हैं।

9.सच्ची शिक्षा को शामिल करने का उपयुक्त समय (Suitable time for inclusion of true education)-

दरअसल सच्ची शिक्षा अर्थात् आध्यात्मिक व नैतिक शिक्षा को भौतिक शिक्षा के साथ शामिल करने का उपयुक्त समय था, भारत देश को स्वतन्त्रता लागू होते ही।ज्यों ही भारत को स्वतन्त्रता हासिल हुई थी तभी इस प्रकार की शिक्षा को शामिल करना था। परन्तु आध्यात्मिक शिक्षा को भौतिक शिक्षा के साथ समावेश तभी किया जा सकता था जबकि देश की बागडोर सही हाथों में आती।उदाहरणार्थ सरदार पटेल जैसे नेताओं के हाथ में सत्ता होती तो यह संभव हो सकता था।परंतु देश की बागडोर ऐसे तथाकथित सेकुलर नेताओं के हाथ में आ गई जो विदेश में पढ़े लिखे थे।
विदेशों में उस समय भौतिक शिक्षा का ही प्रभाव था।इसलिए जो व्यक्ति जिस प्रकार की शिक्षा अर्जित करता है ,उसे वही अच्छी शिक्षा प्रतीत होती है।वैसे भी भारत में विदेशी शिक्षा प्रणाली लागू थी। 
इसलिए हमने एक बहुत अच्छे अवसर को खो दिया जबकि सही व अच्छी तथा देश की संस्कृति के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था लागू की जा सकती थी।उपर्युक्त कारणों से शिक्षा चुनावी मुद्दा क्हीं बन पाती है?( education not become an election issue)

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10.निष्कर्ष (Conclusion)-

शिक्षा व्यवस्था में अब कैसे परिवर्तन लाया जा सकता है? शिक्षा में आध्यात्मिकता तथा नैतिकता जैसे विषयों को पाठ्यक्रम में कैसे शामिल किया जा सकता है?कैसे राजनैतिक दलों को शिक्षा को अपने घोषणा पत्र में शामिल करने हेतु बाध्य किया जा सकता है ?शिक्षा चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनती है? यह सारे प्रश्न हमारे तथा देश के अन्य शुभचिंतकों के मन में उठते होंगे।शिक्षा को चुनावी मुद्दा बनाने के लिए एक ऐसे योद्धा की जरूरत है जो इसे जन आन्दोलन बना दे। प्राचीन काल में वेद व वेदांगों का दुरुपयोग करके कर्मकाण्डों,नरबलि,पशुबलि का आधिक्य हो गया था जिसके प्रतिक्रियास्वरूप गौतम बुद्ध ने जन आंदोलन चलाया तथा जनता को जागरूक किया।जनता ने गौतम बुद्ध के विचारों का समर्थन किया और देखते-देखते समाज में जो पाखंड ,कुरीतियां ,वर्ण-व्यवस्था के दुष्प्रभाव ,धार्मिक उन्माद ,कर्मकांड जैसी कुप्रवृतियां थी उसके खिलाफ जनता जागरूक हुई।जनता तथा युवाओं को अपने आपके वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हुआ।फलस्वरुप जो भी दुष्प्रवृत्तियां थी उनको जड़ से उखाड़ फेंका गया।
आज शिक्षा को चुनावी मुद्दा बनाने के लिए एक ऐसे योद्धा की जरूरत है।वरना वर्तमान शिक्षा ने जड़े ऐसी जमा ली है कि सामान्य व्यक्ति के लिए इसे उखाड़ फेंकना बहुत मुश्किल है।लेकिन महामानव हमारे में से कोई तैयार होगा।
वर्तमान राजनीतिक दलों तथा सामाजिक व धार्मिक मान्यताओं को देख कर तो ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षा चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता है।यदि कोई दल शिक्षा को चुनावी मुद्दा नहीं बनाता है तो उसके उपर्युक्त कारण हैं।यदि कोई दल चुनावी मुद्दा बना भी लेता है तो यह मुद्दा जनता को आंदोलित नहीं कर सकता है।जनता तात्कालिक, ज्वलंत मुद्दों पर ही ध्यान देती है ।अभी जनता तथा भारत का युवा परिपक्व नहीं हुआ है कि उसे यह बोध हो कि दीर्घकालिक व तात्कालिक समस्याओं का समाधान शिक्षा के द्वारा किया जा सकता है।
एक उदाहरण से ओर समझाना चाहता हूं जैसे बलात्कार जैसे कुकृत्य के लिए फांसी की सजा का प्रावधान है।अभी हाल ही में चार बलत्कारियों को दिल्ली तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी, इसके अलावा हैदराबाद में चारों बलात्कारियों को एनकाउंटर में मार गिरा दिया गया था। इसके बावजूद बलात्कार की घटनाओं में कोई खास कमी नहीं आई।इसका मूल कारण यही है कि लोगों की मानसिकता जब तक परिवर्तित नहीं होगी तब तक इसी प्रकार की घटनाएं होंगी। लोगों की मानसिकता को शिक्षा के द्वारा ही बदला जा सकता है। यहां इस उदाहरण का यह तात्पर्य नहीं है कि बलात्कारियों को फांसी की सजा देना गलत है। कानून का भी फर्क पड़ता है। परन्तु वास्तविक रूप से शिक्षा के द्वारा ही मानसिकता को परिवर्तित किया जा सकता है। हालांकि अब लोगों की मानसिकता इस कदर बिगड़ गई है कि उसमें परिवर्तित करने में एक लम्बा समय लगेगा ,यदि आज शिक्षा में परिवर्तन किया जाता है तो।
शिक्षा को चुनावी मुद्दा बनाने के लिए गौतम बुद्ध जैसे योद्धा की जरूरत है जो घर-घर शिक्षा की अलख जगा सके। शिक्षा को चुनावी मुद्दा बनाने हेतु जन आंदोलन छेड़ना पड़ेगा।हमारे विचार से उपर्युक्त कारण हैं जिनकी वजह से शिक्षा चुनावी मुद्दा नहीं बनती है।तो देखा आपने शिक्षा चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनती है?(Why does education not become an election issue?).

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