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Comprehensive Study Guide for Student:The Path to Success

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1 1.विद्यार्थियों के लिए सम्पूर्ण अध्ययन गाइड:सफलता का मार्ग (Comprehensive Study Guide for Student:The Path to Success):

1.विद्यार्थियों के लिए सम्पूर्ण अध्ययन गाइड:सफलता का मार्ग (Comprehensive Study Guide for Student:The Path to Success):

  • विद्यार्थियों के लिए सम्पूर्ण अध्ययन गाइड:सफलता का मार्ग (Comprehensive Study Guide for Student:The Path to Success) अध्ययन के लिए पिलर आर्टिकल है।अध्ययन करना एक गहन और व्यापक विषय है।इस लेख में संक्षिप्त में समस्त तकनीक के बारे में बताएंगे।साथ ही कलाकार की तरह अध्ययन कैसे करें,इसके बारे में भी बताएंगे।इसलिए यह लेख थोड़ा लम्बा होगा अतः यह एक पिल्लर लेख है।

(1.)रणनीतिक परीक्षा की तैयारी और प्रेरणा (Strategic Exam Preparation and Motivation):

  • विद्यार्थी अध्ययन करता है तो इसका मुख्य फोकस रहता है परीक्षा को उत्तीर्ण करना।परंतु अध्ययन करने के लिए परीक्षार्थी को चाहिए कि वह भूत व भविष्य में न खोया रहे।इसके लिए हमने “3 Tips for Living in Present to Study” लेख लिखा है।विद्यार्थी जब तक वर्तमान पर अपना ध्यान केंद्रित करके अध्ययन नहीं करेगा तब तक न तो उसकी परीक्षा की तैयारी ठीक ढंग से हो सकती है और ना उसके भविष्य के लिए अध्ययन फलदायी है।
    इसके लिए आपको पढ़ाई में बाधक तत्त्वों को हटाना होगा और वर्तमान में मन को केंद्रित करने के उपाय करने होंगे।
  • परीक्षा में अच्छी परफॉर्मेंस नहीं कर पाते हैं,कम अंक प्राप्त करते हैं तो उसका यह भी एक कारण है कि हम अपने अध्ययन की आलोचना या समीक्षा (Review of Study) नहीं करते हैं।हमने आलोचना या समीक्षा पर विस्तार से “How to Criticize Yourself for Studying?” लेख पोस्ट किया हुआ है।उसमें यही बताया है कि सही प्रकार से आलोचना या समीक्षा करने का अर्थ है अध्ययन में की गई त्रुटियों,कमियों को पहचान कर उसमें सुधार करें।सुधार करने से आपकी अध्ययन करने की आदतों में सुधार होगा।यह सुधार ही आपको परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कराएगा।
  • आप अध्ययन के लिए समय न देखें बल्कि किया गया अध्ययन कितना आत्मसात हुआ है इस पर ध्यान केंद्रित करें।एकाग्रता तथा रुचिपूर्वक किया गया थोड़े समय का अध्ययन भी अच्छा परिणाम दिलाता है और इसके अलावा हम बहुत से घंटों तक पुस्तक लेकर बैठे रहें तो उसका कुछ भी परिणाम नहीं निकलेगा।आप अध्ययन करने के बारे में “3 Best Tips for Students to Study“को पढ़ेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि एकाग्रता और रुचि का कितना फर्क पड़ता है? अध्ययन करने में अन्य अनेक कारकों का भी फर्क पड़ता है।उनमें बहुत से कारकों का यहाँ हम संक्षिप्त में उल्लेख करेंगे।
  • केवल पढ़ते रहना ही नहीं चाहिए।यह भी सोचना चाहिए कि किसलिए पढ़ रहे हैं और क्या पढ़ा जाए? यानी अध्ययन परिणाम केंद्रित (लक्ष्य) नहीं होगा तो ऐसा अध्ययन अंधेरे में तीर मारने के समान है।हमने “How to Make Study Result-Focused?” लेख में विस्तार से बताया है।परिणाम केंद्रित अध्ययन दृढ़ इच्छाशक्ति,सकारात्मक चिंतन से ही अपने लक्ष्य तक पहुंचाता है।अर्थात परीक्षार्थी तभी परीक्षा में सफलता अर्जित करता है।यदि आप लक्ष्य केंद्रित अध्ययन नहीं करेंगे और जो सामने आएगा उसे ही मस्तिष्क में ठूँसते रहेंगे तो लक्ष्य से भटक जाएंगे।
  • छात्र-छात्राओं को परीक्षा की तैयारी के लिए विषय की प्रकृति को भी समझना चाहिए।गणित विषय (प्रैक्टिकल) और विज्ञान विषय (थियोरेटिकल) को पढ़ने का एक ही तरीका नहीं है।गणित अभ्यास से हल होती है तो विज्ञान को समझकर और नोट्स बनाए जाते हैं।पढ़ने की गति तेज होती है तो एकाग्रता सधती है। सार्थक और परीक्षा केंद्रित अध्ययन के लिए “5Tips to Develop Art of Study for Exam” लेख में हमने विस्तार से बताया है।अध्ययन के लिए ये जितने भी लेख लिखे हैं उनको हमने सत्यम कोचिंग सेंटर (Satyam Coaching Centre) में 23 साल के पढ़ाने के अनुभव के आधार पर लिखा है।इसका एक-एक वाक्य हमारे अनुभव से होकर गुजरा है तभी हम इतनी गहराई से तथा अध्ययन की हर बारीक बात का उल्लेख करते हैं।
  • कई बार सत्रारम्भ से ही कठिन परिश्रम करते रहने पर भी अध्ययन के स्तर में सुधार नहीं होता है और प्रदर्शन गिरता जाता है।रैंकिंग टेस्ट,प्रीबोर्ड मासिक टेस्ट,क्लास टेस्ट से हमें पता चलता है कि हमारे अध्ययन के स्तर में सुधार हो रहा है या नहीं।यदि आपका प्रदर्शन निरन्तर गिर रहा हो और परीक्षा निकट हो तो हमारे स्मार्ट लेख “5 Golden Tips for Reading Now or Never“को पढ़ेंगे तो आपको सटीक रणनीति का पता चलेगा।ऐसी स्थिति में पूरी क्षमता और शक्ति को पूरी तरह झोंक देने पर ही सफलता प्राप्त की जा सकती है।

(2.)वैज्ञानिक और प्रभावी अध्ययन (Scientific and Effective Study Techniques):

  • अध्ययन केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने का माध्यम ही नहीं है बल्कि इससे जीवन जीने की तकनीक भी सीखी जाती है।जीवन जीने की तकनीक आती है ज्ञान अर्जित करने से।ज्ञान अर्जित करने के लिए “How to Increase Knowledge From Study?” के लेख द्वारा आप समझेंगे कि कैसे धीरे-धीरे कोर्स की पुस्तकें पढ़ने के साथ-साथ थोड़ा समय देकर हम व्यावहारिक ज्ञान की बातें भी सीख सकते हैं।
  • हमें घिसे-पिटे और परंपरागत तरीके से ही पढ़ते नहीं रहना चाहिए।बल्कि पढ़ने का स्मार्ट तरीका अपनाना चाहिए।आप “How to Develop Right Attitude to Study?” लेख को पढ़कर जान सकते हैं कि हमारे पढ़ने का सही तरीका कैसा हो? पढ़ने का सही नजरिया और स्मार्ट तरीका अपनाने से छात्र-छात्राओं को समय की कमी भी महसूस नहीं होती है क्योंकि पढ़ने का स्मार्ट तरीका हमारे समय की बचत करता है।जबकि रटने की आदत से ना तो पढ़ा हुआ समझ में आता है और न वह हमारे जीवन में उपयोगी है।
  • अध्ययन को अनासक्तिपूर्वक करने पर ही इस प्रकार का अध्ययन किया जा सकता है।अनासक्तिपूर्वक अध्ययन करने का अर्थ होता है कि अध्ययन कर्त्तव्य समझकर करना चाहिए,फल में आसक्ति रखकर नहीं।हमने “6 Best Tips on How to Study Detached” में यही बताया कि अध्ययन फल में आसक्ति रखकर किया जाता है तो वह उपयोगी नहीं होता है।परिणाम हमारे हाथ में नहीं होता है।यदि असफलता मिलती है तो दुःखी होते हैं और सफलता मिलती है तो आसमान में उछलते हैं।जबकि अनासक्तिपूर्वक अध्ययन में हम असफलताओं को सहज भाव से स्वीकार करते हैं और अपनी कमियों में सुधार करके आगे प्रयत्न जारी रखते हैं।
  • अध्ययन को वैज्ञानिक विधि से करने पर अध्ययन का श्रेष्ठ रूप निखर कर आता है।”6Secret of How to Study Scientifically” में हमने यही बताया कि अध्ययन इतना डूबकर करना चाहिए कि स्वयं के अस्तित्व का और अपने आस-पास की चीजों का ध्यान भी न रहे।ऐसा अध्ययन आत्मसात होता है।

(3.)तनाव प्रबन्धन और मानसिक कल्याण (Stress Management and Mental Well-being):

  • अध्ययन करने से मन पर तनाव हावी ना हो।इसके लिए हमने “4 Tips for Executing Study Plan” लेख में बताया है कि अध्ययन योजना पर अमल करने पर कोर्स समय पर समाप्त होता है और तनाव हावी नहीं होता है।समय पर कोर्स पूरा नहीं होगा तो काम के बोझ से तनावग्रस्त हो जाएंगे।
  • छात्र-छात्राओं को आपस में तालमेल बिठाकर पढ़ना चाहिए “6 Co-ordinated Reading Techniques” में बताया गया है कि तालमेल के अभाव में छात्र-छात्राओं में टकराव होता है और वे तनावग्रस्त हो जाते हैं।संवेदनहीन हो जाते हैं।
  • विषयवस्तु को समझकर पढ़े।रटने से मस्तिष्क पर अनावश्यक बोझ पड़ता है और हम तनावग्रस्त हो जाते हैं।हमने “9 Important Elements of Reading Habits” में बताया है कि पढ़ने की सही आदत कैसे विकसित करें।अध्ययन में बोरियत न हो और विषय को रुचि (श्रद्धा) पूर्वक पढ़ते हैं तो मस्तिष्क पर तनाव हावी नहीं होता है।
  • जो छात्र-छात्राएँ स्वयं अध्ययन नहीं करते हैं दूसरों पर आश्रित रहते हैं और समझते हैं कि बहुत अच्छा काम किया है।वस्तुतः ऐसे विद्यार्थी स्वयं को धोखा देते हैं,ऐसे विद्यार्थियों का मानसिक कल्याण नहीं हो सकता है।हमने इस पर “Why Should Students Study on Their Own?” में विस्तार से उल्लेख किया है कि पराश्रितता छात्र के मस्तिष्क को कितना पंगु बना देती है।अध्ययन में मदद उतनी ही और बहुत आवश्यक होने पर ही लेनी चाहिए।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में विद्यार्थियों के लिए सम्पूर्ण अध्ययन गाइड:सफलता का मार्ग (Comprehensive Study Guide for Student:The Path to Success) के बारे में बताया गया है।

2.कलाकार की तरह कैसे पढ़े? पढ़ने के 5 अलौकिक मंत्र (How to Read Like Artist? 5 Supernatural Spells to Read):

  • कलाकार की तरह कैसे पढ़े? पढ़ने के 5 अलौकिक मंत्र (How to Read Like Artist? 5 Supernatural Spells to Read) द्वारा जानिए कैसे पढ़ना चाहिए? पढ़ने के लिए हमारे अंदर कौन सी क्षमताएं होनी चाहिए? यों पढ़ने के बारे में हमने अनेक लेख लिखे हैं जिनके बारे में ऊपर उल्लेख किया जा चुका है।
  • पढ़ना एक आर्ट है।यह आर्ट (Art) बताती है कि हम किस विधि से पढ़ें कि विषयवस्तु की सही समझ पैदा हो सके और इसे हम ठीक ढंग से व्यक्त एवं संपादित कर सकें।छात्र-छात्रा पढ़ता है तो उसे विषय की समझ होनी चाहिए,शिक्षक पढ़ता है तो उसे बेहतर ढंग से व्यक्त करना आना चाहिए,परंतु पढ़ना तो दोनों को ही पड़ता है।
  • एक को अपनी परीक्षा (exam) के लिए पढ़ना पड़ता है तो दूसरे को समझाने के लिए।यह भी आवश्यक है कि पढ़ाई में रुचि (interest) पैदा हो,जिससे पढ़ने का कार्य सुचारू रूप से चलता रह सके।रुचि तब पैदा होती है,जब विषय का उद्देश्य एवं औचित्य का ज्ञान हो।
  • रुचिपूर्वक पढ़ना तभी संभव हो पाता है,जब हमें उस विषय के उद्देश्य का पता हो कि आखिर हम उसे क्यों पढ़ रहे हैं और उस विषय का हमारे जीवन से क्या संबंध है।जब तक यह बात स्पष्ट नहीं हो पाती है कि विषय का औचित्य (Justification of the topic) क्या है और उसकी हमारे निजी जीवन में क्या उपयोगिता एवं आवश्यकता है,तब तक विषय गधे की पीठ पर चंदन की लकड़ी ढोने के समान भारवत् ही प्रतीत होता है।
  • गधा चंदन को ढोता तो रहता है,परंतु वह उसके महत्त्व एवं सुगंध से वंचित बना रहता है।ठीक इसी प्रकार हम भी विषय को ढोते रहते हैं,पर हमें यह भी पता नहीं रहता है कि जिस कक्षा में हम पढ़ते हैं,उसका पाठ्यक्रम क्या है और क्यों है? सब कुछ एक बोझ-सा,रुचिहीन मालूम पड़ता है,परंतु ठीक इसके विपरीत जब हमें विषय का लाभ एवं उपयोगिता की जानकारी हो जाती है तो रुचि स्वतः पैदा हो जाती है और हमारा मन पढ़ने में रमने (Engrossed in reading the mind) लगता है।पढ़ने के लिए हमें अपनी क्षमताओं का अनुभव होना चाहिए।ये क्षमताएं हैं:(1.) पढ़ने की आंतरिक क्षमता (Internal Ability to Read);(2.) विषय को सीखने की क्षमता (Ability to Learn Subject);(3.)पढ़े हुए को व्यक्त करने की क्षमता (Ability to Express what is Read);(4.)पढ़े हुए का स्मरणशक्ति (Memory of the Read)
  • आपको अध्ययन करने की कला का यह लेख पढ़ने से पहले “परीक्षा हेतु अध्ययन की कला विकसित करने की 5 टिप्स (5Tips to Develop Art of Study for Exam) को पढ़ना चाहिए।
  • अब विद्यार्थियों के लिए सम्पूर्ण अध्ययन गाइड:सफलता का मार्ग (Comprehensive Study Guide for Student:The Path to Success) के बारे में कुछ ओर नई बातें पढ़ने के के बारे में सीखते हैं।

(1.)पढ़ने की आंतरिक क्षमता (Internal ability to read):

  • आंतरिक क्षमता के अंतर्गत हमारी समझ कितनी है,यह आता है।इसमें यह देखने की बात है कि क्या हमारी क्षमता इतनी है कि हम विषय का निर्वाह कर सकें और उसे समझ सकें।यदि हमारी क्षमता यह नहीं है कि हम गणित विषय (Mathematics Subject) को समझ सकें और इसके बावजूद गणित की पढ़ाई करें तो यह विषय हमें कभी समझ में नहीं आएगा;क्योंकि इसके लिए हमें कितनी मानसिक ऊर्जा को इसमें लगाना पड़ेगा,उतनी हम नहीं लगा सकते।
  • यदि हम इसमें अपनी मानसिक ऊर्जा नहीं लगाएंगे तो हमारे सिर से निकल जाएगा।हम गणित की किताब लेकर बैठे रहेंगे,पर पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा।शिक्षक पढ़कर चला जाएगा,पर हम अपनी उधेड़बुन में फंसे रह जाएंगे और कुछ भी समझ नहीं आएगा।

(2.)विषय को सीखने की क्षमता (Ability to learn subject):

  • विषय की समझ पैदा करने के लिए आवश्यक है कि हमारी मन:स्थिति उस विषय के साथ संबंध हो जाए और जैसे ही यह संबंध सूत्र जुड़ने लगता है तो विषय की समझ पैदा होने लगती है।फिर हम विषय की गहराई के साथ-साथ उसके विस्तार एवं व्यापकता को जानने लगते हैं और इसके साथ ही हम एक विषय को अन्य विषयों के साथ जोड़कर देख सकते हैं एवं वह अपने जीवन में कितना उपयोगी एवं आवश्यक है,यह भी समझ सकते हैं।
  • जब यह समझ पैदा हो जाएगी तो हमारे सीखने की क्षमता भी विकसित हो जाएगी।इसके बाद हम उस विषय को और अधिक गहराई से सीखने का प्रयास करेंगे।

(3.)पढ़े हुए को व्यक्त करने की क्षमता (Ability to express what is read):

  • सीखने की क्षमता विकसित हो जाने पर हम अपरिचित विषय के साथ भी गहरा तारतम्य जोड़ सकते हैं।यह कला आ जाने से हम अनेक नए विषयों को एक साथ संबंधित करके समझने लगते हैं एवं तुलना कर सकते हैं।इससे हमारा बौद्धिक विकास होता है।
  • विषय की मूलवस्तु एवं मुख्य बिंदुओं (Knowledge of Basics and Key Points) का ज्ञान हो जाने से यह विषय समझने एवं सीखने में अत्यन्त आसान हो जाता है।इस प्रकार हम उस विषय का बेहतर ढंग से निर्वाह कर सकते हैं।फिर उसे याद करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।याद तो तब करना पड़ता है,जब हमें विषय समझ में नहीं आता है।समझ आ जाए तो विषय स्वतः स्मृतिपटल पर अंकित हो जाता है।इसलिए उपनिषद कहता है कि विषय की बेहतर समझ पैदा करो,उसे याद नहीं करो।

(4.)पढ़े हुए का स्मरण शक्ति (Memory of the Read):

  • सामान्य रूप से विद्यार्थी अपने विषय को विभिन्न प्रकार से याद करता है और सामने अपने दिमाग को उससे संबंधित आंकड़ों से ठूँसने भरने लगता है।एक प्रश्न याद किया,फिर दूसरा,फिर तीसरा इस प्रकार ढेरों प्रश्न दिमाग में भर दिए जाते हैं।दिमाग प्रश्नों का खजाना (Filled the questions in my mind) बन जाता है,पर परीक्षा के समय यदि किसी प्रश्न का उत्तर याद नहीं आया और इसके परिणामस्वरूप तनाव पैदा हो गया तो फिर स्थिति इतनी विपन्न एवं भीषण हो जाती है कि कहा नहीं जा सकता है।ऐसे में दिमाग खिचड़ी बन जाता है और प्रश्नों का गलत उत्तर आने लगता है।
  • दिमाग की एक निश्चित खास बनावट एवं बुनावट होती है।किसी चीज को कैसे याद किया जाए,उसके लिए उसे उस बुनावट के संग तारतम्य में रखना पड़ता है।इस तारतम्य में तब व्यतिक्रम आता है जब भावनात्मक असंतुलन की स्थिति पैदा होती है।भावनात्मक स्थिरता में स्मरणशक्ति अपने चरम पर होती है,परंतु अस्थिर अवस्था अत्यंत खतरनाक एवं हानिकारक होती है।
  • ऐसी स्थिति में सोच,समझ,स्मृति एवं अभिव्यक्ति (Thinking,Comprehension,Memory and Expression) क्षमता तहसनस हो जाती है और भारी क्षति होती है एवं कुछ भी याद नहीं रहता;सब कुछ क्षत-विक्षत खंडहर में परिवर्तित हो जाता है।सारी मेहनत,ऊर्जा,समय का फिर कोई मूल्य ही नहीं रह जाता है।अतः हमें भावनात्मक संबंधों को स्थिर बनाए रखना चाहिए,ताकि हमारी ऊर्जा,श्रम एवं समय विषयवस्तु की समझ पैदा करने में नियुक्त हो सके।
  • विषय की समझ हो और उसमें रुचि पैदा हो जाए तो उसकी अभिव्यक्ति हो सकती है।इस संदर्भ में विद्यार्थी विषय को बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर सकता है और शिक्षक उसे प्रतिपादित कर सकता है,व्यक्त कर सकता है।इस प्रकार पढ़ने में रुचि उत्पन्न होती है और हम ढेर सारे नए विषयों के प्रति आकर्षित होते हैं एवं उसे पढ़ने लगते हैं।
  • पढ़ना एक कला (to read is an art) है।उसका प्रारंभ हमें वहां से करना चाहिए,जहां उसका मूल विषय समाया रहता है,जिसके खोलने से सब कुछ खुलने लगता है।इस तरह हम सामान्य पढ़ाई को रुचिकर बनाते हुए स्वाध्याय के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं,जहां हमारे आंतरिक विकास की संभावना खुल जाती है।
  • आगे आर्टिकल पढ़ने से पहले आपको “6Secret of How to Steady Scientifically” को पढ़ना चाहिए।
  • विद्यार्थियों के लिए सम्पूर्ण अध्ययन गाइड:सफलता का मार्ग (Comprehensive Study Guide for Student:The Path to Success) का यह पिलर आर्टिकल है इसमें हर तकनीक की छूने की कोशिश की गई है।

3.विद्यार्थियों की मुख्य समस्या (The main problem of the students):

  • अधिकांश छात्र-छात्राओं की समस्या स्मरणशक्ति कमजोरी,मन की अस्थिरता यानी एकाग्रता का ना होना,पढ़ाई में मन ना लगना,मन में उच्चाटन बना रहना,पाठ याद ना होना आदि से संबंधित होती है।
  • ऐसे छात्र-छात्राएँ स्मरणशक्ति के लिए टॉनिक,जड़ी-बूटी तथा ड्राई फ्रूट्स (सूखे मेवे) के बारे में पूछते हैं या प्रयोग करते हैं।अब टॉनिक,जड़ी-बूटी या ड्राई फ्रूट्स (Dry Fruits) शरीर पर तो असर करती है पर मन और आत्मा पर असर नहीं करतीं,संस्कारों पर नहीं करती,मनोवृत्ति पर नहीं करती।
  • इन पर असर करता है हमारा आचार-विचार,हमारा आचरण,हमारी दिनचर्या और हमारा ज्ञान (Wisdom)। विद्या का अध्ययन करने के लिए हमें उस विधि-विधान को समझना होगा,उस शैली और पद्धति को समझना होगा जो सही ढंग से पूर्ण रूपेण अध्ययन करने में सहायक सिद्ध हो।जो स्मरणशक्ति बढ़ाने,मस्तिष्क को सक्रिय रखने और बुद्धि को तीव्र करने वाला हो और हमारे ज्ञान भंडार में वृद्धि करने वाला हो।

4.अध्ययन की सर्वोत्तम प्रक्रिया (Best Course of Study):

  • जैसे प्रथम बार नई गणित की पुस्तक,आकर्षक गणित के अध्यापक को देखने पर कोई-कोई विद्यार्थी उसके सौंदर्य में इतना खो जाता है की मूर्तिवत होकर एकटक उसको देखने लगता है कि उसे अपने आस-पास का यहां तक कि स्वयं का बोध भी नहीं रहता है और स्वयं को,अपने मित्रों को कक्षा या बैग को भी भूल जाता है।
  • ठीक उसी तरह जब विद्या अध्ययन करने वाला कक्षा,प्रयोगशाला,घर या अन्यत्र,अपनी ज्ञान कर्म इंद्रियों और मन के,लक्षित विषय के अतिरिक्त अन्य सब विषयों के ज्ञान से रहित होकर,अपने लक्षित विषय के ज्ञान से इतना जुड़ जाता है कि,उस विषय (लक्षित) या भाव व्यवहार या क्रिया को,खुद के द्वारा अनुभव की जा रही क्रिया की अनुभूति और खुद के अस्तित्व के विद्यमान होने की अनुभूति को भी भूल जाता है तब इस स्थिति के परिणामस्वरूप सुने पढ़े जा रहे शब्द या उसके अर्थ या देखी जा रही पुस्तक के यथार्थ स्वरूप मात्र को अनुभव करना “अध्ययन या पढ़ाई” (study) कहलाता है।
  • पढ़ने के वास्तविक स्वरूप की अनुभूति होती है।छात्र-छात्रा पढ़ने योग्य पुस्तक या विषयवस्तु को पढ़ता है,उस काल में उसे केवल अपने उस लक्षित कंटेंट (विषयवस्तु) का बोध होना चाहिए क्योंकि यदि अध्ययन के दौरान अपने पढ़े जा रहे कंटेंट (विषयवस्तु) के ज्ञान के साथ-साथ,छात्र-छात्रा को कक्षा की दीवारों,टेबल,बेंच,छत,आंगन या घर पर भी कमरे,छत की दीवारों आदि का भी बोध हो रहा हो,अनुभूति हो रही हो या पुस्तक,पुस्तक की आकृति की उपस्थिति की अनुभूति होती है अथवा शरीर के अंगों को हिलाने-डुलाने की आदत के कारण शरीर के हिलने-डुलने की भी अनुभूति होती है तो यह अपने कंटेंट (विषयवस्तु) के साथ-साथ कमरे,दीवारों,पुस्तक,शरीर के अंगों आदि का अध्ययन करना भी कहलाएगा क्योंकि इस अवस्था में उसे अपने लक्षित कंटेंट (content) के ज्ञान की प्राप्ति के साथ-साथ,कमरे,कमरे की दीवारों,शरीर आदि बाह्य विषयों का भी ज्ञान प्राप्त होगा।
  • कमरे,कमरे की दीवारों,शरीर आदि का अध्ययन करना अर्थात् उनका ज्ञान प्राप्त करना तो उसका लक्ष्य नहीं था।परंतु ये बाह्य बाधक तो उसकी भूल या विवशता से अनधिकृत रूप से उसके मन में आ गए हैं।जबरदस्ती मन में घुसे हुए विभिन्न जानकारियां ये “बिन बुलाए मेहमान” छात्र-छात्रा के मन में आकर उसे अपने विषय में एकाग्रता बढ़ाने और लक्षित विषय के ज्ञान का सर्वोत्तम स्तर पर पहुंचने ही नहीं देते जिसके परिणामस्वरूप विद्यार्थी की,अपने लक्षित विषय का स्तर पर पहुंचने नहीं देते यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने (Accurate knowledge of the target subject) के लिए की जा रही प्रक्रिया रुक जाती है।इस कारण से,यह उस विषय की पढ़ाई को शुद्ध रूप से संपादित करना नहीं कहलाएगा।हां,इसे पढ़ने का असफल प्रयास करना अवश्य कह सकते हैं।
    जब छात्र-छात्रा मन में आए इन विभिन्न बाह्य ज्ञानों को पढ़ते समय दूर कर देता है तब दो प्रकार के बाधक ज्ञान और मन में विराजमान होकर ज्ञान को यथार्थ रूप में ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न करते हैं,ये आंतरिक बाधकों के रूप में उपस्थित होते हैं।पहले ये दबी हुई दशा में होते हैं पर इनकी प्रबलता बाह्य बाधकों के हटने पर प्रकट होती है।इस स्थिति में छात्र-छात्रा अपने पढ़े,सुने या देखे जा रहे हैं विषयों के ज्ञान को अनुभव करने के साथ निम्न दो आंतरिक ज्ञानों का भी अनुभव करता है:(1.) मैं पढ़ रहा हूं (नेत्रादि,इन्द्रियों की,अपने विषय से संबंध होने की क्रिया का ज्ञान)।(2.)मैं हूं (अपने अस्तित्व की विद्यमानता का ज्ञान)।
    इस प्रकार यह भी अपने लक्षित विषय के अध्ययन के साथ-साथ पढ़ने की क्रिया का और अपने अस्तित्व (Your Existence) के होने का अध्ययन करना कहलाएगा।अतः इन दोनों आंतरिक ज्ञानों को भी हटाना आवश्यक है क्योंकि विद्यार्थी का लक्ष्य तो केवल अपने ध्येय विषय के ज्ञान को ही ग्रहण करना होना चाहिए,तब ही उसे लक्षित विषय को पढ़ना कह सकते हैं।
  • एकाग्रता और ज्ञान के उच्च स्तर के कारण ये दोनों अनुभूतियां,एक तो अपने पढ़ने की क्रिया की और दूसरी अपने होने की,उस विद्यार्थी के मन से सर्वथा दूर हो जाती है,अलग-अलग हो जाती है,तब मन रूपी पर्दा (स्क्रीन) अपने ध्येयार्थ (अर्थमात्र) के ज्ञान रूप वाला ही हो जाता है क्योंकि तब वह अपनी पढ़ने की क्रिया को करने की ओर अपने आपकी,अनुभूति को भी भूलकर या तो देखे सुने जा रहे शब्द मात्र के ज्ञान को,या शब्द के अर्थ मात्र के ज्ञान को या देखी हुई वस्तु के ज्ञान मात्र को ही प्रतिक्षण अनुभव करता है।इसे उस ध्येय वस्तु की पढ़ाई करना या अध्ययन करना कहते हैं।
  • आप विद्यार्थियों के लिए सम्पूर्ण अध्ययन गाइड:सफलता का मार्ग (Comprehensive Study Guide for Student:The Path to Success) के इस आर्टिकल को ध्यान पूर्वक पढ़ें।
  • इस अवस्था के फलस्वरूप विद्यार्थी को लक्षित विषय का यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है अतः सूत्र रूप में पढ़ाई को इस तरह भी परिभाषित कर सकते हैं:ध्येय विषय के यथार्थ (वास्तविक) ज्ञान को प्राप्त करने के लिए की जा रही प्रक्रिया को पढ़ाई या अध्ययन करना कहा जाता है।ध्येय विषय यथार्थ ज्ञान=अध्ययन+एकाग्रता (True Knowledge=Study+Concentration)।यह सत्यम् कोचिंग सेन्टर (Satyam Coaching Centre) का अनुभव है।
  • हर छात्र-छात्रा अपने जीवन में सब प्रकार से उन्नति करना चाहता है,धन-संपत्ति,सम्मान और परिवार से मिलने वाले सुखों को प्राप्त करना चाहता है,अपने शरीर,मन,परिवार,समाज और राष्ट्र और विश्व को भी उन्नति की ओर अग्रसर करना चाहता है,परंतु इस प्रकार  की उन्नति के लिए सफलता प्राप्त करने वाले प्रयत्नों (कार्यों) को सर्वोत्तम स्तर पर संपादित करना अनिवार्य होता है।
  • सफलता दिलाने वाले कार्यों को सर्वोत्तम स्तर पर करने के लिए उन कर्मों को करने का सर्वोत्तम स्तर का ज्ञान प्राप्त होने के लिए उस ज्ञान को प्राप्त करने की प्रक्रिया यानी कि उस विषय का अध्ययन करना होता है।इससे क्या सिद्ध हुआ? यही कि जीवन में सर्वांगीण उन्नति करने के लिए एकमात्र साधन हैःयथार्थ ज्ञान को प्राप्त करने वाली अध्ययन की योग्यता का विद्यमान होना।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में विद्यार्थियों के लिए सम्पूर्ण अध्ययन गाइड:सफलता का मार्ग (Comprehensive Study Guide for Student:The Path to Success) के बारे में बताया गया है।
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5.असली बनाम नकली अध्ययन (हास्य-व्यंग्य) (Real vs Fake Studies) (Humour-Satire):

  • असली और नकली अध्ययन में फर्क बताओ।असली अध्ययन को दुनिया से बिल्कुल समाप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि असली नहीं रहा तो नकल किसकी होगी।

6.विद्यार्थियों के लिए सम्पूर्ण अध्ययन गाइड:सफलता का मार्ग (Comprehensive Study Guide for Student:The Path to Success) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.स्मृति का ज्ञान होने के कौनसे कारण होते हैं? (What are the reasons for having knowledge of memory?):

उत्तर:निमित्त से,रूप ग्रहण से,विपरीत वस्तु देखने से,स्मरणीय विषय में मन लगाने से,अभ्यास से,ज्ञान योग से और सुने हुए विषयों को पुनः सुनने से।

प्रश्न:2.अध्ययन की महत्ता क्या है? (What is the importance of the study?):

उत्तर:अध्ययन आनंद का,अलंकरण का और योग्यता का काम करता है।

प्रश्न:3.बुद्धिगत दोष कैसे दूर होता है? (How is the intellectual defect removed?):

उत्तर:शारीरिक व्याधि दूर करने के लिए जैसे अनेक प्रकार के व्यायाम हैं,वैसे ही मानसिक रूकावटों को दूर करने के लिए अनेक प्रकार के अध्ययन है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा विद्यार्थियों के लिए सम्पूर्ण अध्ययन गाइड:सफलता का मार्ग (Comprehensive Study Guide for Student:The Path to Success) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

*”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*

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