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Impact of Marcket Guides on Students:Students Are Less Serious About Their Studies (A Critical Analysis)

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1.छात्र-छात्राओं पर मार्केट गाइड्स का दुष्प्रभावःछात्र-छात्राएँ अपनी पढ़ाई को लेकर कम गम्भीर (एक आलोचनात्मक विश्लेषण) [Impact of Marcket Guides on Students:Students Are Less Serious About Their Studies (A Critical Analysis)]:

  • छात्र-छात्राओं पर मार्केट गाइड्स का दुष्प्रभाव (Impact of Marcket Guides on Students) के बारे में जानिए कि कैसे छात्र-छात्राएँ गाइड़ों के भक्त बन गए है? आज की शिक्षा यही तो सीखाती है कि डिग्री ले लो और वही छात्र-छात्राएँ कर रहे हैं।और इसीलिए युवा पीढ़ी भटक रही है।

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2.बाजार गाइड़ों से अटा पड़ा (The market is littered with guides):

  • आधुनिक युग में उत्तीर्ण होने के शॉर्टकट तरीके ईजाद किए जा रहे हैं।कैसे थोड़ा-सा व कम समय पढ़कर उत्तीर्ण हुआ जा सकता है।और अब तो एआइ (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का जमाना आ गया है तो सीधे छात्र-छात्राएँ परीक्षा में आने वाले प्रश्नों और उनके उत्तर तत्काल जान लेते हैं।उन्हें अपडेट और अपग्रेड जानकारी मिल जाती है।गाइड़ों को छापने और बाजार में आने में थोड़ा वक्त तो लगता है लेकिन एआई (Artificial Intelligence) तो ऐसा माध्यम है जो 24/7 घन्टे आपके पास मौजूद है।
  • पुस्तक विक्रेता (Guides sellers) छात्र-छात्राओं की इस मानसिकता को भाँप चुके है।इसलिए घड़ाधड़ मार्केट में वन वीक सीरिज,गाइड,सॉल्वड पेपर्स,एग्जाम किट (Exam Kit),डेस्क वर्क (Dest work),वनडे सीरिज आदि अनेक नामों से आ रही हैं।छात्र-छात्रा भी इसी प्रतीक्षा में रहते हैं कि कब परीक्षा उत्तीर्ण होने का मसाला मिले और वे एक-दो रात में पढ़कर उत्तीर्ण हो जायें।
  • गाइड़ों,सीरिज आदि का पनपने का मुख्य कारण यह है कि शिक्षक या तो स्कूल-कॉलेज में पढ़ाते नहीं है और पढ़ाते भी है तो नाम मात्र की पढ़ाई कराते हैं।या इस तरह से पढ़ाते है कि पढ़ाया हुआ छात्र-छात्राओं के सिर से ऊपर निकल जाता है।कुछ शिक्षकों को तो यह ही पता नहीं होता है कि उन्हें क्या पढ़ाना है और किस तरह पढ़ाना है।उन्हें पढ़ाना बोझ लगता है,अगर उनसे ज्यादा पूछताछ की जाती है तो सजेस्ट (Suggest) करते हैं कि गूगल पर सर्च कर लो।
  • इस तरह गाइड़ों,सीरीजों और इंटरनेट (एआई) का धन्धा फल फूल रहा है।बाजार में एक से एक या अनेक नामों की सीरीज और गाइडें अटीपड़ी है।बाजार तो पुस्तकों से भी भरा हुआ है परन्तु आजकल के अटामिक बच्चे (Atomic children) उन्हें सूंघते ही नहीं है।कुछ गुणी छात्र-छात्राएँ तथा स्वाध्याय,सत्संगी व्यक्ति ही पुस्तकें खरीदते है और पढ़ते हैं।सीरिज और गाइड़ों की बिक्री हाथोहाथ बिक जाती है और गाडडे बेचने वाले (Book sellers) और छापने वाले प्रकाशक (Publishers) मालामाल हो रहे हैं।
  • पुस्तक बिक्रेता पुस्तकें न बिकने से मक्खियाँ मारते हैं और पुस्तकों के स्टॉक में लगाई गई पूँजी के ब्याज (Interest of capital) की भरपाई भी न होने के कारण सिर धुनते है।छात्र-छात्राओं को कोई पुस्तक विक्रेता पुस्तक खरीदने के लिए प्रेरित करता है तो छात्र-छात्राएँ टका-सा जवाब देते हैं कि हम कोई संन्यासी या तपस्वी थोड़े ही हैं जो पुस्तकें पढ़ने का
    तप करेंगे और भगवान की प्राप्ति करेंगे।

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3.बाजारू गाइ‌डों की उपयोगिता (Usefulness of Marketable Guides):

  • उपर्युक्त जो विवरण दिया गया है उसमें यह बताया गया है कि गाइड़ों का उद्योग किस तरह फल-फूल रहा है।इसकी उपयोगिता पर कुछ चर्चा की जाए।
    गाइडें यदि ‘गाइड’ ही रहें,तो वे उपयोगी हैं और उनके कारण छात्र-छात्राओं के अध्ययन के प्रति गम्भीरता में कमी नहीं आनी चाहिए।यानी गाइडें पुस्तकों का विकल्प नहीं होनी चाहिए बल्कि उसकी सहायक हों तो ही उनकी महत्ता है।
  • छात्र कभी कक्षा में पढ़ाई हुई बात को ठीक तरह समझ नहीं पाता है अथवा भूल जाता है।ऐसे अवसर पर ‘गाइड’ छात्र का मार्गदर्शन कर देती है और छात्र की बैचेनी को बहुत कुछ तत्काल कम कर देती है।कभी ऐसा भी होता है कि कोई अध्यापक किसी समय किसी विषय को अच्छी तरह छात्र-छात्राओं को नहीं समझा पाता है।इस कमी को गाइड पूरा करती है।
  • पुस्तकों में प्रश्न परीक्षाओं के दृष्टिकोण से ही नहीं बनाये जाते हैं बल्कि छात्र-छात्रा के ज्ञानवर्धन के लिए बनाये जाते हैं।गाइडों से यह पता चल जाता है कि परीक्षा में किस पैटर्न से प्रश्न पूछे जाते हैं और उनका उत्तर किस ढंग से कितना और क्या-क्या देना है।प्रश्नों की प्रकृति मालूम होने पर छात्र-छात्राएँ परीक्षा के दृष्टिकोण से प्रश्नों के उत्तर तैयार कर पाता है।
  • पिछले वर्षों में कौन-कौनसे प्रश्न आए हैं और कौन-कौनसे प्रश्न रिपीट (Repetation of questions) होते हैं।परीक्षा के समय विद्यार्थी सम्पूर्ण पुस्तक का रिवीजन नहीं कर सकता है अतः कम समय में विषयवस्तु का रिवीजन कर लेता है।पुस्तकों में कुछ विषयवस्तु समझाने के लिए भी दी जाती है जबकि गाइडों में प्रश्नों के उत्तर टु द पाइंट (To the point) होते हैं,जिसको तैयार करने में छात्र-छात्रा को बहुत अधिक माथापच्ची नहीं करनी पड़ती है।
  • गाइडों से प्रश्नों का उत्तर देने पर परीक्षा जैसा माहौल तैयार हो जाता है जिससे छात्र-छात्रा को यह पता चल जाता है कि उसकी तैयारी का स्तर (Level of preparation) कैसा है? अर्थात् किस टॉपिक पर पकड़ कमजोर है।कमजोर टाॅपिक की फिर से तैयारी कर सकता है।
  • कभी ऐसा भी होता है कि बीमारी,आवश्यक कार्य आदि के कारण छात्र या छात्रा कक्षा में अनुपस्थित रहता है और उसकी अनुपस्थिति की अवधि में अध्यायक बहुत कुछ पढ़ा देते है।उस कमी को पूरा करने का कार्य अच्छी गाइड अच्छी तरह कर देती है।कहने का तात्पर्य यह है कि एक अच्छी गाइड एक ट्यूटर (Tutor) एवं सहायक पुस्तक (Collateral Book) का कार्य करती है और अपेक्षाकृत कमजोर छात्र-छात्राओं को परीक्षा उत्तीर्ण करने में सहायक होती है।
    कुछ कांसेप्ट ऐसे होते हैं जो थ्योरीटिकल रूप से पुस्तकों से पढ़े जाएं तो समझ में नहीं आते हैं लेकिन उन्हें ही प्रश्नोत्तर तरीके (Q & A Methods) से पढ़ा जाए तो अच्छे से समझ आ जाते हैं।गाइडे विशेष तौर पर प्रश्नोत्तर विधि से ही लिखी जाती है।सुकरात अपने छात्रों को प्रश्नोत्तर विधि (Dialoge) विधि से ही पढ़ाते थे और छात्र-छात्राओं को अच्छी तरह समझ में आ जाता था।

4.मार्केट गाइड्स का दुष्प्रभाव (Side Effects of Market Guides):

  • परन्तु अन्य वस्तुओं की भाँति गाइडों का भी दुरुपयोग होने लगा है।इनके कारण पाठ्‌यपुस्तकों का अध्ययन कुछ कम हो गया है,क्योंकि परीक्षा में उत्तीर्ण होने योग्य सामग्री प्रायः गाइडों में मिल जाती है,इतना ही नहीं,गाइडों के भरोसे रहने वाले परीक्षार्थी परीक्षा के आसपास केवल एक या डेढ़ महीने पढ़ते हैं और उत्तीर्ण हो जाते हैं।
  • शेष वर्ष वे मौज-मस्ती मारते हैं।यह कहते हुए संकोच होता है कि कुछ ऐसे भी अध्यापक हैं जो गाइडों को पढ़कर कक्षा में बच्चों को पढ़ाते हैं,वे भी पाठ्य-पुस्तकों (Text-Book) को कहने भर के लिए पढ़ते हैं।पाठ्यक्रम (Syllabus) में निर्धारित सहायक पुस्तकों को तो ये अध्यापक शायद ही पढ़ते हों।ये गाइड से सहायक पुस्तकों का काम चला लेते हैं।
  • गाइडों के बने-बनाए उत्तरों से छात्रा-छात्राओं की मौलिक सोच और प्रोब्लम्स साल्विंग की क्षमता खत्म होती जा रही है।क्योंकि उन्हें अपना दिमाग लगाने या दिमाग पर जोर डालने की जरूरत ही नहीं पड़ती है।दिमाग पर जोर डालने या सोचने से दिमाग खुलता है। छात्र-छात्राओं की रटने की आदत पड़‌ती है (गाडडो से)।
    गाइडें छात्र-छात्राएँ अल्पकालिक लक्ष्य अर्थात् परीक्षा को उत्तीर्ण करने के नजरिए से पढ़ते है,ज्ञान अर्जित करने के लिए नहीं।परीक्षा में प्रश्न-पत्र देते ही पढ़ा हुआ बिल्कुल मस्तिष्क से गायब हो जाता है।
  • पुस्तकों,संदर्भ पुस्तकों और पाठ्यपुस्तकों (Reference Books) से दूरी बढ़ती जा रही है।एनसीईआरटी/मानक पुस्तकों को न पढ़ने से गहरी अवधारणाएँ अधूरी रह जाती हैं।क्योकि पुस्तकें और रेफरेंस बुक्स पढ़ने से कई बिन्दु ऐसे आते हैं जो छात्र-छात्राओं को सोचने के लिए विवश करते हैं।
    जब कोर्स की पुस्तक का कोई सवाल या गणित की प्रमेय छात्र-छात्रा को समझ में नहीं आता है,तो वह दिमागी कसरत करने के बजाय तुरन्त गाइड खोल लेता है।बना-बनाया हल मिल जाने से छात्र स्वयं समस्या का समाधान (solving of problems) करने की क्षमता खो देता है,उसकी मानसिक क्षमता कमजोर हो जाती है।
  • गाइड्स में अक्सर डीप कांसेप्ट्स (कि कोई फॉर्मूला कैसे बना) को छोड़ कर सीधे फॉर्मूलों पर या परीक्षा के लिए दी गई ट्रिक्स पर निर्भर हो जाता है।छात्र की सोच यह होती है कि परीक्षा उत्तीर्ण हो गई तो पढ़ाई पूरी हो गई,पर आगे चलकर आईआईटी (IIT),जेईई (JEE) या किसी प्रतियोगिता परीक्षा (competitive Exam) में उनका बेस कमजोर रह जाता है।
  • मानक पुस्तकों,एनसीईसारटी की बुक्स,संदर्भ पुस्तकों से छात्र डरने (Book phobia) लगता है क्योंकि इन पुस्तकों की भाषा थोड़ी गहरी समझ पैदा करने वाली होती है।गाइडस की आदत पड़‌ने के बाद छात्र-छात्राएँ पुस्तकों की भाषा से भय खाते है और इन्हें पढ़ना उन्हें (छात्रों को) बोझ लगने लगता है।गाइडों में सामग्री भी घटिया और काम चलाऊ होती है,उनमें अनेक अशुद्धियाँ होती हैं जिससे छात्र-छात्रा दिग्भ्रमित हो जाता है।

5.मार्किट गाइडस से पढ़ने का निष्कर्ष (Conclusion to Side effects of reading from market guides):

  • एक छात्रा के लिए यह जरूरी है कि पहले पाठ्यपुस्तक को ठीक से पढ़े।पाठ्यपुस्तक को पढ़े बिना ही सीधे गाइड को पढ़ना छात्र-छात्रा के लिए बुरा है।अगर छात्र-छात्रा पाठ्यपुस्तक या संदर्भ पुस्तक पढ़ता है तो उसकी सोच का दायरा बढ़ता है,उसे सही स्थिति का ज्ञान होता है।पुस्तकें पढ़ने के बाद में रिवीजन,परीक्षा को समझने या स्वयं का मूल्यांकन करने के लिए उपयोग कर रहा है तो ऐसी स्थिति में गाइड उसके लिए मददगार टूल (support system) बन जाती है।
    बहुत सी गाइडे और सीरिज में अधकचरी जानकारी (Migraine information) और बहुत सी अशुद्धियों वाली होती हैं अतः छात्र-छात्राओं को स्तरीय और शुद्ध व मानक गाइड्स ही पढ़नी चाहिए अन्यथा परीक्षा में गलत उत्तर,आधी-अधूरी जानकारी वाला उत्तर लिखने से आप अच्छे अंक अर्जित नहीं कर पाएंगे।अधिकांश गाइड छापने वाले पब्लिशर्स का मुख्य फोकस केवल धन कमाना होता है।उन्हें छात्र-छात्राओं के भविष्य से खिलवाड़ करने का कोई पश्चाताप नहीं होता है।
  • हर चीज में दोष व गुण होते हैं अब यह हम पर है कि हम उसका उपयोग करते हैं या दुरुपयोग।यानी गुण या दोष व्यक्ति सापेक्ष होते हैं।गाइड्स का भी यदि सावधानी और सतर्कता के साथ उपयोग किया जाए तो यह हमारे लिए मददगार साबित हो सकती है।कोई चीज कितनी ही अच्छी हो उसका भी दुरुपयोग किया जा सकता है।
  • उदाहरणार्थ पुस्तकें अच्छी है परन्तु उनका उपयोग नकल करने (Imitation) या रटने में किया जाए तो वह हमारा कुछ भी भला नहीं कर सकती है।केवल गाइड्स का उपयोग परीक्षा के दृष्टिकोण के अलावा भी ज्ञानवर्धन के लिये किया जा सकता है।यदि उसको मनोयोगपूर्वक (concentration) पढ़ा जाए।चाकू से सब्जी और फल भी काटे जा सकते हैं और उससे किसी की हत्या भी की जा सकती है।
  • वस्तुतः हमारा ध्यान इस तरफ नहीं जाता है और हम अधिकांशतः उसका दुरुपयोग ही करते हैं।दुरुपयोग वही छात्र-छात्रा करता है जिसरी नकारात्मक सोच होती है। यद्यपि गाइडों का अपना उपयोग है,तथादि उनके कारण अध्ययन की गम्भीरता में निश्चित रूप से कमी आई है।
  • कारण स्पष्ट हैं छात्र-छात्रा रेडीमेड सामग्री का उपयोग करते हैं।दिमाग को काम लेने का प्रयास नहीं करते हैं। कम-समय में परीक्षा के नजदीक रटकर पास होने का जरिया मानते है।और ऐसा करके वे इस तरीके को सही और जायज मानते हैं।पूछने पर एक रटा-रटाया उत्तर होता है कि ऐसा सभी छात्र-छात्राएँ करते हैं,वे कौनसा अलग कर रहे हैं और इसमें बुरा है भी क्या?
  • यह एक छात्र के नजरिए से सही हो सकता है परन्तु व्यापक दृष्टिकोण से इस तरह की प्रवृत्ति नुकसानदायक है।
    उपर्युक्त आर्टिकल में छात्र-छात्राओं पर मार्केट गाइड्स का दुष्प्रभावःछात्र-छात्राएँ अपनी पढ़ाई को लेकर कम गम्भीर (एक आलोचनात्मक विश्लेषण) [Impact of Marcket Guides on Students:Students Are Less Serious About Their Studies (A Critical Analysis)] के बारे में बताया गया है।
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6.गाइड जीनियस बना देगी (हास्य-व्यंग्य) (The guide will make a genius) (Humour-Satire):

  • नीरज परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया।एक छात्र रोते हुए बोला,अबे यार मुझे भी गाइड के लिए बता देता।चार अन्य छात्र भी बोले,हमें भी गाइड के बारे में बता देते।
  • पहला छात्र:तुम सब चुप हो जाओ।गाइड क्या तुम सबको जीनियस बना देगी।

7.छात्र-छात्राओं पर मार्केट गाइड्स का दुष्प्रभावःछात्र-छात्राएँ अपनी पढ़ाई को लेकर कम गम्भीर (एक आलोचनात्मक विश्लेषण) [Impact of Marcket Guides on Students:Students Are Less Serious About Their Studies (A Critical Analysis)] से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नः

प्रश्नः1.बोर्ड परीक्षाओं के लिए कौनसी गाइड पुस्तकों का उपयोग सही है? (Which guides books are the right to use for board exams?):

उत्तर:परीक्षा के दृष्टिकोण से प्रारम्भिक रिजीजन (Quick Revision) में मदद मिल सकती है,लेकिन वैचारिक स्पष्टता (conceptual clarity) के लिए मानक पुस्तकों/पाठ्यपुस्तकों का कोई विकल्प नहीं है।

प्रश्न:2.छात्र गाइड्‌स पर निर्भर क्यों है? (Why are students relying on guides?):

उत्तर:सरल भाषा में बने-बनाए उत्तर मिलने और समय की कमी के कारण छात्र शार्टकट्स अपना रहे हैं जो उनके दीर्घकालिक विकास (long-term growth) के लिए नुकसानुदेह है।

प्रश्न:3.छात्रों को पुस्तकों से कैसे जोड़े? (How do you connect students with books?):

उत्तर:अध्यापकों,माता-पिता के सहयोग तथा व्यावहारिक और जीवनोपयोगी शिक्षा लागू करके।

उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा छात्र-छात्राओं पर मार्केट गाइड्स का दुष्प्रभावःछात्र-छात्राएँ अपनी पढ़ाई को लेकर कम गम्भीर (एक आलोचनात्मक विश्लेषण) [Impact of Marcket Guides on Students:Students Are Less Serious About Their Studies (A Critical Analysis)] की बेसिक टर्म्स के बारे में बताया गया है।

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