Satsang Ka Jeevan Par Asar:Kyon Achchhi Sangati hi Saflta ki Kunji Hai?
1.सत्संग का जीवन पर असर:क्यों अच्छी संगति ही सफलता की सीढ़ी है? (Satsang Ka Jeevan Par Asar:Kyon Achchhi Sangati hi Saflta ki Kunji Hai?):
- सत्संग का जीवन पर असर (Satsang Ka Jeevan Par Asar) विशेषकर विद्यार्थी जीवन में महत्त्व है।जानिए कैसे अच्छी संगति और अनुशासन से आप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।सभी विद्यार्थियों के लिए Guide.
- आपको यह जानकारी रोचक व ज्ञानवर्धक लगे तो अपने मित्रों के साथ इस गणित के आर्टिकल को शेयर करें।यदि आप इस वेबसाइट पर पहली बार आए हैं तो वेबसाइट को फॉलो करें और ईमेल सब्सक्रिप्शन को भी फॉलो करें।जिससे नए आर्टिकल का नोटिफिकेशन आपको मिल सके।यदि आर्टिकल पसन्द आए तो अपने मित्रों के साथ शेयर और लाईक करें जिससे वे भी लाभ उठाए।आपकी कोई समस्या हो या कोई सुझाव देना चाहते हैं तो कमेंट करके बताएं।इस आर्टिकल को पूरा पढ़ें।
Also Read This Article:गणित का विद्यार्थी सत्संगति करे
2.सत्संग:जीवन बदलने वाली संगति (Satsang:Life-Changing Fellowship):
(1.)कुसंगति VS सत्संगति:अन्तर और प्रभाव (Bad Fellowship vs Satsanga:Difference and Impact):
- कुसंगति का मुख्य रूप एक ही है-दुष्ट विचारों का संग। मनुष्य के शरीर का संचालन मन-मस्तिष्क के ही संकेतों,निर्देशों से होता है।जैसे विचार और जैसी भावनाएँ होंगी,वैसे ही कर्म की प्रेरणा होगी और इन तीनों के सम्मिलित प्रभाव से व्यक्तित्व विनिर्मित होगा। विचारों का संग दो प्रकार से होता है-पहला साहित्य के अध्ययन से,दूसरा व्यक्तियों के संपर्क से।संगति दोनों ही प्रभावकारी होती है।साहित्य,इंटरनेट की भी और व्यक्ति की भी।सस्ता साहित्य,सनसनीखेत खबरें और बातें,अश्लील साहित्य तथा गपोड़ेबाज,नशेबाज,जुआरी,सटोरिया,कलही,दुर्व्यसनी व्यक्ति,इंटरनेट,सोशल मीडिया अपना दुष्प्रभाव डालते ही हैं।भली-बुरी दोनों ही प्रकार की प्रवृत्तियाँ प्रोत्साहन से पनपती हैं।प्रोत्साहन और अवसर न मिलने पर मुरझाकर धीरे-धीरे मृतप्राय अवस्था में जा पहुंचती हैं।कुसंगति दुष्प्रवृत्तियों को बढ़ाती है और सत्प्रवृत्तियाँ उसकी प्रचण्ड आँच से झुलसती जाती हैं।
- नशीली दवाएँ न तो स्वादिष्ट होती हैं,न ही उपयोगी।व्यर्थ की वस्तु में जिसका कोई जायका भी ना हो,कौन पैसा फूँकेगा? नशेबाजी की शुरुआत सौ में से निन्यानवे बार ऐसे लोगों के संग का प्रभाव,परिणाम होती है,जो स्वयं उस नशे के अभ्यस्त हो जाने के कारण उस नशीली वस्तु का तरह-तरह से आकर्षक वर्णन करते रहते हैं या फिर उस नशे का अभ्यास एक पुरुषार्थ का काम मानते हैं।किसी तरह की झूठी,हवाई गरिमा उस नशे के साथ जोड़ने और नए साथी से उसे अपनाने का आग्रह करते रहते हैं।संकोच और झिझक भरी उत्सुकता से ही नशेबाजी की शुरुआत होती है,फिर धीरे-धीरे वही आदत गहराई तक उतरती जाती है और वह छुड़ाए नहीं छूटती।
- जुआ,गाली-गलौज,आलस्य में पड़े रहना,ताश-शतरंज चौपड़-कैरम आदि में अधिक समय बर्बाद करना,फैशन की अति आदि अनेक दुष्प्रवृत्तियों की छाया मित्रों के ही कारण पड़ती है।जिसके साथ दोस्ती होती है,उनकी आदतों के साथ भी दोस्ती होने लगती है।उनकी इच्छा अनुरोध को टालना-ठुकराना अनुचित तथा कष्टदायक लगने लगता है।उनके साथ चलने में प्रसन्नता का अनुभव होता है।जिसका व्यक्तित्व प्रभावशाली होता है,उसके गुण-दोषों का भी प्रभाव संपर्क क्षेत्र में पड़ता ही है।
आंतरिक और सामाजिक दोनों ही प्रकार के भय-लज्जा,संकोच आदि का प्रभाव मन में प्रबल रहता है।उसके कारण मनोविकार रहते हुए भी कुमार्ग पर सहसा कदम उठा सकना कठिन होता है।यह झिझक कुसंग से समाप्त हो जाती है।कुसंगति से अश्लील बातों में रस मिलता है और इस प्रक्रिया की परिणिति पतन के गहरे में गर्त में गिरने की ही होती है।दुष्ट-दुराचारियों के संपर्क से मासूम किशोर बच्चे-बच्चियाँ अनजाने ही अपना भविष्य अंधकारमय बनाते जाते हैं।
(2.)सत्संग का अर्थ और विद्यार्थी जीवन (Meaning of Satsang and Student Life):
- दूषित भावनाओं,दुष्प्रवृत्तियों से सतत जागरूकता आवश्यक है।विद्यार्थी के अधःपतन का हेतु यही दुष्प्रवृत्तियाँ हैं,जो कुसंग से ही पल्लवित,पुष्पित,फलित होती हैं।कुसंग का दुष्प्रभाव अनिवार्य है।अतः इससे आत्मरक्षा आवश्यक है।अपना संपर्क दूषित-विकृत आदतों से ग्रस्त विद्यार्थियों से नहीं बढ़ने देना चाहिए।अन्यथा उस दुर्गुण के प्रति मन की जुगुप्सा कम होने लगती है।दोषों की भयानकता को तो समझना चाहिए,पर उनका ही सदा विचार और स्मरण नहीं करते रहना चाहिए।सद्गुणों-सत्प्रवृत्तियों के चिंतन-मनन में अधिक समय लगना चाहिए व संकल्पपूर्वक उस रास्ते पर चल पड़ना चाहिए।सर्वोत्तम उपाय है-सत्संग।श्रेष्ठ और प्रभावशाली विद्यार्थियों का अपने ऊपर सुप्रभाव पड़ता ही है।ऋषियों के आश्रमों में सिंह-गाय एक साथ,एक घाट पर पानी पीते थे।क्योंकि प्रेम,अहिंसा और सदाशयता से विनिर्मित प्रबल भावना-प्रवाह वहां बहता था।चंदन के समीपवर्ती छोटे-बड़े पौधे भी सुगंधित हो जाते हैं।फूल जिस भूमि पर टूट-टूट कर गिरते हैं,वहाँ की मिट्टी में खुशबू आ जाती है।
- सद्गुणी-सज्जनों और श्रेष्ठ विद्यार्थियों का भी प्रभाव पड़ता ही है।सुसंगति को पारस की उपमा दी गई है।लोहा पारसमणि छूते ही सोना बन जाता है,यह उपमा सज्जनों के संपर्क में आए साधारण विद्यार्थियों के व्यक्तित्व-विकास को समझने के लिए दी जाती है।सत्पुरुषों के संपर्क से सत्प्रवृत्तियाँ अनायास बढ़ती हैं।
- जैसे:कबिरा संगत साधु की ज्यों गंधी की बास।
जो कछु गंधी दे नहीं तौ भी बास सुवास।। - प्रभात होने पर कमल की कली अनायास खिलने लगती है।सत्प्रवृत्तियाँ भी प्रत्येक विद्यार्थी के भीतर विद्यमान रहती हैं।आवश्यकता उनके विकास की होती है।वह काम श्रेष्ठ व्यक्तित्व की उपस्थिति में होने लगता है।जरूरी नहीं है की श्रेष्ठ व्यक्ति कुछ कहें,शिक्षा उपदेश दें,तभी वैसा विकास हो।उनके जीवन की स्वच्छता,शांति,पवित्रता और महत्ता समीपवर्ती अंतकरण पर गहरा असर डालती है और प्रकाश तथा प्रेरणा देती है।उस उत्तम वातावरण में दोष असह्य और ग्लानिकारक प्रतीत होने लगते हैं और छूट ही जाते हैं।
- कुसंग से आत्मरक्षा और सत्संग में आत्मनियोजन का कर्त्तव्य भुलाया नहीं जाना चाहिए।दुष्प्रवृत्तियों के शमन और सत्प्रवृत्तियों के पल्लवन-प्रस्फुटन की व्यवस्था बनाई ही जानी चाहिए।यदि दुष्प्रवृत्तियों से संपर्क बन गए हैं तो उसे शिथिल करते चलना चाहिए।यदि दुष्ट-दुराचारियों से सम्पर्क बन गया है तो उसे शिथिल करते चलना चाहिए और सत्पुरुषों से थोड़ा भी परिचय है तो उसे घनिष्ठता की दिशा में विकसित करना चाहिए।साथ ही आत्मविश्वास एवं प्रखर चरित्र ही ऐसी सुदृढ़ नींव अपनी मनोभूमि में जमानी चाहिए कि दुष्प्रवृत्तियों का आक्रमण विफल होता रहे।दोष-दुर्गुणों के आक्रमणों के प्रति घृणा और तुच्छता के भाव रखना चाहिए तथा उदात्त मनोभूमि के साथ श्रेष्ठाताओं से मैत्री को गहरा करते रहना चाहिए।कई दुर्जन,दुराचारी,नशेड़ी ऐसे विद्यार्थी हैं जो विद्यार्थी का वेश धारण कर रखें हैं परन्तु वास्तव में वे विद्यार्थी नहीं हैं।
- यह सही है कि कुसंग की अपेक्षा सत्संग आज अत्यधिक कठिन हो रहा है।फिर भी जागरूक रहने पर वह सर्वथा दुर्लभ भी नहीं रहता।सत्साहित्य की संगति तो पूरी तरह अपने ही हाथ में है।उससे तो हमें कोई वंचित कर ही नहीं सकता।सत्साहित्य से संवेदनाओं और विचारों का उत्कर्ष भी सुनिश्चित ही है और जहां भीतर श्रेष्ठ प्रेरणाएँ भर जाएं,वहां क्षुद्रताओं के प्रति घृणा तथा विरक्ति स्थायी होने लगती है।
- उत्कृष्ट कोटि के सभा-सम्मेलनों,सांस्कृतिक क्रियाकलापों में सम्मिलित होते रहने का भी प्रभाव व्यक्तित्व पर पड़ता चलता है।जिन सभा-सम्मेलनों में जीवननिर्मात्री शिक्षा और दिशा दी जाती है,वहाँ उपस्थित होना चाहिए।इससे अपनी श्रेष्ठता भी बढ़ती और संकीर्णता को अवकाश नहीं मिल पाता।अपनी मनोवृत्ति उत्कृष्ट बन जाए तो सत्पुरुषों से संपर्क भी हो ही जाता है और तब उसके लाभ मिलते ही है।आवश्यकता इस दिशा में सतत सन्नद्ध एवं जागरूक रहने की है।
(1.)वातावरण (संग) और धैर्य (Environment and Patience):
- विद्यार्थी के स्वभाव में भली और बुरी दोनों ही प्रकार की प्रवृत्तियाँ हैं।शिक्षा,संस्कार और वातावरण (सत्संग) जिन प्रवृत्तियों को आकर्षित,आमंत्रित करते हैं,वे ही प्रवृत्तियां बढ़ती और फलती-फूलती हैं।
- शिक्षा और संस्कार जैसे स्वाभाविक निर्णायक तत्त्व भी वातावरण पर ही अवलंबित होती हैं और वातावरण (संग) भी वही कर करता है,जिसके की निकट संपर्क में रहना पड़ता है।वातावरण यों एक स्थिति का नाम है।जहां जिस प्रवृत्ति के लोग अधिक होंगे,वहां वैसा ही वातावरण (संग) उत्पन्न होगा।इन अर्थों से विद्यार्थी का स्वभाव इस बात पर निर्भर करता है कि वह कैसे विद्यार्थियों का साथ करता है? दृढ़ संकल्प और निष्ठावान विद्यार्थियों की बात अलग है अन्यथा विद्यार्थी अपने निकटवर्ती विद्यार्थियों की और परिस्थितियों से प्रभावित होकर ही कोई क्रिया-कलाप या गतिविधियां अपनाते हैं।इसके कारण कहा गया हैः
- संगति से गुण होता है,संगत से गुण जाय।
बा़ँस फाँस और मिसरी,एक ही भाव बिकाय। - जैसे विद्यार्थियों के साथ रहना पड़ता है,जिनका निकट संपर्क मिलता है,उनके गुण ही सफल होकर विद्यार्थी को अपने समान बना लेते हैं।मिसरी की डली में पड़ी हुई बाँस की फाँस भी मिसरी के ही भाव बिकती है।विद्यार्थी निसर्गतः तो अपना कोई बना-बनाया व्यक्तित्व लेकर नहीं आता।बचपन में भी उसे जिस तरह के बच्चों की संगति मिलती है,वह वैसे ही हाव-भाव और रीति-नीति अपनाता है।वही आदतें आगे चलकर अपने अनुरूप स्वभाव के लोगों को खोज लेती हैं और वैसी प्रवृत्तियां अपनाती हैं।
परिस्थितिवश अच्छे विद्यार्थी भी जब बुरे वातावरण में फंस जाते हैं तो व्यक्तित्व में अपेक्षित दृढ़ता ना होने के कारण अच्छे स्वभाव के विद्यार्थी भी बुरी आदतें सीख लेते हैं।उदाहरण के लिए नशेबाजी को ही लें।नशे में न कोई जायका होता है और ना ही कोई उसकी आवश्यकता,उपयोगिता रहती है।फिर विद्यार्थी क्यों नशा करते हैं? सौ में से निन्यानवे विद्यार्थी अपने नशेबाज यार-दोस्तों के आग्रह पर बीडी-सिगरेट का कश लेते हैं। फिर धीरे-धीरे यह आदत उनके स्वभाव में इस कदर रच-पच जाती है कि छोड़ें नहीं छूटती।
- नशे की तरह ही जुआ खेलना,गाली-गलौज करना,निठल्ले बैठना,मुफ्तखोरी करना,समय बर्बाद करना,फैशन में रहना आदि कितनी ही ऐसी दुष्प्रवत्तियाँ हैं,जिन्हें विद्यार्थी अपने मित्र-मंडली में रहकर ही सीखता है।जिन विद्यार्थियों के साथ हम मित्रता करते हैं,स्वभाविक ही उनकी दुष्प्रवृत्तियों से भी मित्रता करने लगते हैं और न जाने कहां-कहां की गंदी आदतें सीख जाते हैं।यहाँ तक की कोई विद्यार्थी व्यभिचारी या चरित्रहीन बनता है तो उसके इस पतन का शत-प्रतिशत कारण उसकी संगति ही रहती है।अन्यथा आरम्भिक जीवन में तो सभी सदाचारी रहते हैं।सामाजिकता,लोकलाज,अपमान का भय और प्रचलित मान्यताओं की पाबंदी हमारे समाज में कुछ है ही इस प्रकार की कि विद्यार्थी का कुमार्गगामी होना कठिन है। कदम-कदम पर पग बढ़ाते हुए भय,संकोच और लज्जा उत्पन्न होती है।लेकिन कुसंग में,बुरे साथी मिलने पर यह लज्जा और झिझक छूट जाती है।बुरे साथियों के साथ गंदी हंसी-मजाक में रुचि लेने के साथ उत्पन्न होने वाला रस दिनोंदिन पतन के गर्त में धकेलता जाता है।
(2.)सफलता की सीढ़ी (The first step to success):
- इसके विपरीत अच्छे वातावरण में रहने और अच्छे लोगों की संगति का भी प्रभाव पड़ता है।न केवल मनुष्यों पर वरन पशु-पक्षियों पर भी उसका प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित देखा जाता है।प्राचीन काल में तो यह स्थिति हमारे लिए गौरवास्प्द ही कही जाएगी कि ऋषि-मुनियों के आश्रम में सिंह और गाय एक ही स्थान पर स्वतंत्र और निर्भय विचरण करते थे।आजकल पालतू पशु,पक्षियों पर भी वातावरण के प्रभाव को देखा जा सकता है।घर में पिंजड़े में पाले जाने वाले तोते वही बातें करना सीख जाते हैं,जो दिन-रात सुनते हैं।तोते गालियां भी बकते हैं और आने-जाने वालों का अभिवादन-स्वागत भी करते हैं।इस आधार पर प्राचीनकाल के उन विवरणों को भी गलत नहीं बताया जा सकता।क्योंकि जिस स्थान पर प्रेम और अहिंसा की सद्भावनाओं का प्रबल-प्रचण्ड प्रभाव विद्यमान हों,वहां कोई भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।शेर,चीते सर्कस में रिंग मास्टर के भय से अनुशासित रहते हैं,तो प्रेम तो भय से असंख्य गुणा शक्तिशाली है,उसका प्रभाव क्यों नहीं होगा?
- फूल टूट-टूट कर जिस मिट्टी में गिरते हैं,वह भी फूलों की सुगंध ग्रहण करने लगती है।चंदन वृक्ष के आस-पास विद्यमान पेड़-पौधे भी चंदन की सुगंध से सुवासित हो जाते हैं तो फिर क्या कारण है कि वह सद्गुणी और सज्जन व्यक्तियों के संपर्क में रहकर व्यक्ति वैसा न बनने लगे।बुरे व्यक्तियों के संग से बुराइयाँ आती हैं तो यह भी निश्चित है कि अच्छे व्यक्तियों का संसर्ग करने पर व्यक्ति में अच्छी प्रवृत्तियां उभर कर आएँ।सत्पुरुषों के संपर्क में मनुष्य की सत्प्रवृत्तियाँ निश्चित रूप से उभरकर आती हैं।सूर्यमुखी का फूल उधर मुड़ता रहता है,जिधर कि सूरज होता है।सुबह होते ही कमल की कली का मुंह खुल जाता है।उसी प्रकार संसर्ग के अनुरूप ही मनुष्य की अंतरात्मा में भी सत्प्रवृत्तियाँ और सद्गुण उभर कर आने लगते हैं।
- प्रश्न उठता हैं कि अच्छी-बुरी प्रवृत्तियाँ दोनों ही विद्यमान हैं और अच्छाई अपने आप में शक्तिशाली है तो बुरे व्यक्तियों के संसर्ग से भय कैसा? यह ठीक है कि सत् तत्त्व सामर्थ्यवान और शक्तिशाली है,पर उसकी सामर्थ्य व्यक्ति के अपने आत्मबल के द्वारा ही विजयी या विजित होती है।शस्त्र अच्छे हों पास में बंदूक के स्थान पर बढ़िया राइफल हो,चलाना भी आता हो,पर वक्त पड़ने पर हाथ-पैर फूल जाए और साहस जवाब दे जाए तो अकेली बंदूक या राइफल क्या कर लेगी।हमारा स्वभाव लाख अच्छा हो,लेकिन इतना आत्मबल न हो कि बुरे व्यक्तियों से अप्रभावित रह सकें तो वही प्रवृत्तियाँ हम पर भी हावी हो जाती हैं।इसलिए संगति से होने वाले प्रभाव के महत्त्व को जानकर हमें चाहिए कि हम अपना संपर्क बुरी आदतों और बुरे स्वभाव के व्यक्तियों से न रखें।
- अतः आवश्यक है कि अपने संगी-साथियों का चुनाव करते समय विश्लेषण करें और समझ-बूझकर ही मित्रों का चुनाव करें।कुसंगति से बचना और अच्छे लोगों के साथ से लाभ उठाना ही सत्प्रवृत्तियों को विकसित करने का एकमात्र उपाय है।इस ओर उपेक्षा तनिक भी नहीं करनी चाहिए।अपना संपर्क दुष्ट और दुराचारी लोगों के साथ बन गया तो उसे छोड़ने में जरा भी प्रमाद या लापरवाही नहीं करनी चाहिए और सज्जनों से अपना संपर्क है तो उसे घनिष्ठ बनाने के लिए शक्तिभर प्रयत्न करना चाहिए।
- जीवन में सफलता केवल ऊंची डिग्रियों से नहीं,बल्कि ऊंचे चरित्र से मिलती है।सत्संग वह पारस पत्थर है जो लोहे रूपी साधारण इंसान को भी सोना बना देता है। जब हम सद्गुणों (Virtues) को अपने जीवन का हिस्सा बना लेते हैं,तो चुनौतियां खुद-ब-खुद छोटी होने लगती हैं। एक विद्यार्थी के रूप में, आपकी सबसे बड़ी पूंजी आपकी संगति और आपके संस्कार हैं।आज ही संकल्प लें कि आप अपनी ऊर्जा केवल सकारात्मक कार्यों और अच्छी संगति में ही लगाएंगे।
- छात्र-छात्राओं को शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए एक-एक घण्टे के अन्तराल पर पानी पीना चाहिये।पानी न पीने से शरीर में खुश्की और सुष्कता बढ़ती जिससे बैचेनी और चिड़चिड़ाहट बढ़ती है और पढ़ने से ध्यान भंग होता है।ये वीडियो देखें।
- उपर्युक्त आर्टिकल में सत्संग का जीवन पर असर:क्यों अच्छी संगति ही सफलता की सीढ़ी है? (Satsang Ka Jeevan Par Asar:Kyon Achchhi Sangati hi Saflta ki Kunji Hai?) के बारे में बताया गया है।
Also Read This Article:संगत का असर कैसे पड़ता है?
4.छात्र का संग (हास्य-व्यंग्य) (Sang of Student) (Humour-Satire):
- मीनू (बबलू से):तुम गणित पढ़ते हो तो ऐसे लोफर किस्म के मित्रों का संग नहीं करना चाहिए।
- बबलू:थोड़ा मन बहलाव के लिए उनका संग करता हूं और फिर संसार में आए हैं तो हर प्रकार का स्वाद चखना चाहिए।
- मीनू:इस स्वाद चखने के चक्कर में बुरी आदतें गले पड़ जाएंगी फिर ना तो तुम गणित पढ़ सकोगे और नहीं घर-परिवार के काम के रहोगे।
5.सत्संग का जीवन पर असर:क्यों अच्छी संगति ही सफलता की सीढ़ी है? (Satsang Ka Jeevan Par Asar:Kyon Achchhi Sangati hi Saflta ki Kunji Hai?) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
Q: सत्संग का विद्यार्थी जीवन में क्या महत्व है?
Ans: सत्संग से विद्यार्थियों में सकारात्मक विचार (Positive thoughts) आते हैं, जिससे उनकी एकाग्रता (Concentration) और चरित्र का निर्माण होता है।
Q: जीवन में सद्गुण (Virtues) क्यों आवश्यक हैं?
Ans:सद्गुण हमें केवल एक अच्छा प्रोफेशनल ही नहीं, बल्कि एक अच्छा इंसान बनाते हैं, जो समाज में सम्मान और मानसिक शांति दिलाता है।
Q:बुरी संगति से कैसे बचें?
Ans:आत्म-जागरूकता और अच्छे साहित्य (Books) का साथ लेकर हम बुरी संगति को पहचान कर उससे दूर रह सकते हैं।
Q:क्या सत्संग केवल धार्मिक होता है?
Ans:नहीं,अच्छे विचारों वाले लोगों के साथ बैठना, अच्छी पुस्तकें पढ़ना और प्रेरणादायक चर्चा करना भी सत्संग ही है।
Q:क्या आज के डिजिटल युग में सत्संग मुमकिन है?
Ans:बिल्कुल डिजिटल युग में अच्छे Yubechnnel देखना,ज्ञानवर्धक ब्लाॅगस पढ़ना,प्रेरक Podcasts भी एक तरह का “डिजिटल सत्संग” ही है।
Q:बच्चों में सद्गुण कैसे विकसित करें?
Ans:बच्चे कहने से ज्यादा देखने से सीखते हैं।अगर घर और कोचिंग का माहौल अनुशासित और सकारात्मक होगा,तो बच्चे खुद-ब-खुद उन गुणों को अपनाएंगे।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा सत्संग का जीवन पर असर:क्यों अच्छी संगति ही सफलता की सीढ़ी है? (Satsang Ka Jeevan Par Asar:Kyon Achchhi Sangati hi Saflta ki Kunji Hai?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
| No. | Social Media | Url |
|---|---|---|
| 1. | click here | |
| 2. | you tube | click here |
| 3. | click here | |
| 4. | click here | |
| 5. | Facebook Page | click here |
| 6. | click here | |
| 7. | click here |










