Recognize Unity of Science and Philosophy:Vigyan Aur Darshan ka Gehra Rishta
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1.विज्ञान और दर्शन की एकता को पहचानें:विज्ञान और दर्शन का गहरा रिश्ता (Recognize Unity of Science and Philosophy:Vigyan Aur Darshan ka Gehra Rishta):
- विज्ञान और दर्शन की एकता को पहचानें (Recognize Unity of Science and Philosophy),क्यों पहचानें जानिए इस लेख में विस्तृत व्याख्या? क्या विज्ञान और दर्शन अलग-अलग हैं? यदि नहीं तो किस तरह जुड़े हुए हैं?
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2.दर्शन और विज्ञान के अनुसार जगत (The world according to philosophy and science):
- दर्शन की भाषा में जगत को माया,मिथ्या एवं धोखा कहा जाता है।माया शब्द जिज्ञासा का भी विषय है और कुछ लोगों के लिए उपहास का भी विषय है।माया वस्तुतः रूप तत्व एवं नाना रूपात्मक जगत के साथ सम्बन्ध भावना,मैं,मेरा और तू तेरा,का हेतु है
सांख्य दर्शन के अनुसार सत,रज,तम इन तीन गुणों के आविर्भाव-तिरोभाव द्वारा रूप का निर्माण होता है और इसी प्रक्रिया-आविर्भाव-तिरोभाव के अन्तर्गत जगत के पदार्थों के रूप में परिवर्तन होता रहता है।चूंकि रूप अस्थायी,परिवर्तनशील एवं नाशवान है,इसीलिए उसको भ्रान्ति कहा जाता है।उसके मूल माया को ‘मिथ्या’ कहने का यही कारण है।हम किसी वस्तु को इस क्षण जिस रूप में देखते हैं,अगले क्षण वह उस रूप में नहीं रहती है।इसी कारण रूपात्मक जगत तथा उसका हेतु हमारा इन्द्रिय ज्ञान ‘मिथ्या’ है। - जीव-विज्ञान के आचार्य शरीर का निर्माण करने वाली कोशिकाओं को सतत परिवर्तनशील मानते हैं।इस दृष्टि से भी रूपात्मक जगत अस्थायी और परिवर्तनशील ठहरता है।इस क्षण का रूप ज्ञान अगले क्षण की दृष्टि से मिथ्या है।भौतिक विज्ञान के विद्वानों के मत्तानुसार दर्शन की उपस्थिति परमाणु के व्यवहार में परिवर्तन कर देती है।इस प्रकार परमाणु का व्यवहार निरपेक्ष न होकर व्यक्ति सापेक्ष ठहरता है।
परमाणु वही है,उसका व्यवहार वहीं है,परन्तु दो व्यक्ति उसको दो रूपों में देखते हैं।एक व्यक्ति का इन्द्रिय ज्ञान दूसरे व्यक्ति की दृष्टि में मिथ्या है।ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान सापेक्ष होने के कारण शत-प्रतिशत विश्वसनीय नहीं माना जा सकता है।एक ही घटना अथवा वस्तु का वर्णन विभिन्न दृष्टाओं द्वारा विभिन्न प्रकार से किया जाता है। - गणितज्ञ दिशा की भ्रान्ति (Illusion of Time) को स्वीकार करके अपारता (Infinity) की मान्यता द्वारा गणित की समस्याओं का समाधान प्राप्त करते हैं और तदनुसार लघु एवं विशाल तथा निकट एवं दूर की सम्भावनाओं को व्यर्थ कहते हैं।इसी प्रकार दार्शनिक समय की सापेक्षता के कारण कालगत भ्रान्ति (Illusion of Time) के निराकरण हेतु अनादिता एवं अनन्तता (Eternity) को स्वीकार करते हैं।
वे भूत और भविष्य को मिथ्या कह कर वर्तमान की अनुभूति को जीवन का साध्य मानते हैं।जब दिशा और काल से सम्बन्धित सूचनाएं व्यक्ति सापेक्ष होने के कारण भ्रांत एवं अविश्वसनीय ठहरती है,तब हम यही कहेंगे कि विज्ञान और दर्शन दोनों ही जगत को भ्रांतिमय अथवा माया रूप स्वीकार करते हैं।
3.सर्वत्र ब्रह्म व्याप्त (Brahma pervades everywhere):
- दिग्मण्डल में व्याप्त विद्युत,घर्षण द्वारा व्यक्त की जाती है।घर्षण,विद्युत के अप्रकट एवं प्रकट रूपों के मध्य एक सेतु का कार्य करता है।इसी प्रकार ‘इच्छाशक्ति’ ब्रह्म के अव्यक्त रूप एवं व्यक्त रूप (मूल प्रकृति) के मध्य सेतु-स्थापन करती है।इस प्रकार जगत के निमित्त कारण ब्रह्म और उसके उपादान कारण मूल प्रकृति का अमिन्नत्व स्पष्ट है,व्यक्त और अव्यक्त सर्वथा सापेक्ष है।
- आइन्स्टीन के सापेक्षता सिद्धान्त (Theory of Relativity) के अनुसार भी पदार्थ और ऊर्जा एक ही तत्च के दो नाम और रूप है।वस्तुतः जगत के समस्त पदार्थ सर्वव्यापी ऊर्जा के विभिन्न स्तरीय घनीभूत रूप हैं।स्पष्ट है आधुनिक विज्ञान भी ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ के सिद्धान्त को स्वीकार करता है।अंतर यह है कि विज्ञान ब्रह्म के लिए ऊर्जा शब्द का प्रयोग करता है।
- वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा यह भी प्रमाणित है कि सूक्ष्मतम स्तरीय पदार्थ का निर्माण परमाणुओं की सरलतम मिलन-विधि द्वारा सम्पन्न होता है।निम्नतर सतर पर प्रोटोप्लाज्ग (Protoplasm) के निर्माण में 16 पदार्थों (तत्त्व) का योग रहता है।उच्चतम स्तर पर एक ही प्रकार के परमाणु पदार्थ का निर्माण करते हैं।
स्थूल (निम्न स्तर) से सूक्ष्म की ओर अग्रसर होने पर हमको पदार्थ का निर्माण अधिकाधिक सरल दिखाई देता है अर्थात स्थूल कुटिलता का और सूक्ष्म सरलता का प्रतीक हैं।इसी से विकास का लक्षण सूक्ष्म के प्रति उन्मुख होना है।प्रेमागार प्रभु की उपासना बालक रूप में इसी लक्ष्य को लेकर की जाती है कि हम कुटिलता का त्याग करे और बालक की सरलता धारण करें। - प्रकृति में सब प्रकार के परमाणु उपस्थित रहते हैं।प्रत्येक परमाणु में जीवन भी रहता है और चेतना भी रहती है।प्रत्येक शरीर का निर्माण उसकी आवश्यकतानुसार परमाणुओं के चयन द्वारा होता है।मन की वृत्ति के अनुसार इन परमाणुओं में तथा इनके द्वारा निर्मित शरीर के रूप में परिवर्तन होता रहता है अथवा साधना द्वारा किया जा सकता है।
- एक कसाई और एक साधक के स्थूल शरीर स्थित परमाणुओं के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा उक्त भेद प्रत्यक्ष किया कुरूप हो जाते है तथा सद्भावना एवं प्रेम से परिपूर्ण व्यक्ति का सौंदर्य दिनोंदिन निखार पाता है।
- विद्युत की अभिव्यक्ति पदार्थ के विभिन्न स्तरों पर विभिन्न रूपों में होती है।अभिव्यक्ति के अनुरूप उसका उपयोग किया जाता है।निम्नतम स्थूल स्तर पर उसकी अभिव्यक्ति प्रकाश के रूप में बिजली के बल्ब (Electric Bulb) के रूप में होती है और अब तक अनुभूत उच्वतम स्तर पर इसकी अभिव्यक्ति विद्युत चुम्बक (Electro magnet) के रूप में होती है।
- इच्छाशक्ति (Will Power) को हम यदि विद्युत के समकक्ष मान लें तो हम कह सकते हैं कि यह चेतना के विभिन्न स्तरों पर विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त होती है।निम्नतम स्तर पर वह मूलवृत्ति (Instinct) के रूप में होती है।उच्चतम स्तर पर उसकी अभिव्यक्ति प्रेम के रूप में होती है।प्रेम और विद्युत् चुम्बक दोनों आकर्षण के हेतु हैं,अत. मूलतः समान स्तरीय है।अव्यक्त अनुभूति का विषय है और व्यक्त अनुभव का।जो आज अनुभूति का विषय है,वही कल अनुभव का विषय बन जाता है।यही विकास है,अतः हम कह सकते है कि ब्रह्म निर्गुण है और उसकी अनुभूति की वाहिका चेतना उसका सद्गुण रूप है।
अंधकार अव्यक्त है और प्रकाश व्यक्त रूप है।चेतना के अभाव में ब्रह्म की और अंधकार के अभाव में प्रकाश की परिकल्पना नहीं की जा सकती है।
4.अनुभूति को अनुभव बनायें (Make the realization into an experience):

Unity of Science and Philosophy:Female teacher gives practical physics to female students in the lab
- जिसने अनुभूति को अनुभव का विषय नहीं बनाया है वह कैसे कह सकता है कि उसने जीवन में किसी प्रकार की साधना की है?
अग्नि रूप ऊर्जा उत्पत्ति का आरम्भ घर्षण (Friction) की प्रक्रिया से आरम्भ होता है।वर्तमान काल में उसकी अंतिम प्रक्रिया संयोजन (Fusion) है।परमाणुओं के संयोजन की प्रक्रिया के आधार पर हाइड्रोजन बम बनाया जाता है।इस प्रकार मानव सभ्यता घर्षण की अवस्था से आरम्भ होकर क्रमागत प्रक्रिया (Chain Reaction) तथा विभाजन (Fission of Atom) प्रक्रिया से होती हुई अब संयोजन अथवा संश्लेषण की अवस्था को प्राप्त हो गई है।दर्शन की भाषा में इसको आनंदमय कोष में चेतना की अनुभूति कहा जाता है। - हमारी वृद्धिगत अन्तर्राष्ट्रीयता के प्रति प्रवृत्ति इस तथ्य का द्योतन करती है कि हम विश्व नागरिकता में विश्व के कल्याण का और विश्व-मानव में मानवता का दर्शन के एकदम निकट पहुँच गए हैं।हम इसे चाहे विज्ञानजन्य परिस्थितियों की आवश्यकता कह दें अथवा हृदयस्थ पारमार्थिकता की व्यक्त रूप होने की ललक कह दें। साध्य की दृष्टि से दोनों बातों में कोई अन्तर नहीं है। विज्ञान और दर्शन सापेक्ष और अभिन्न है।
- दोनों का उद्देश्य एक ही है “सत्य की खोज” परन्तु सत्य की खोज का रास्ता अलग-अलग है।विज्ञान कैसे (How) का जवाब देता है और दर्शन क्यों (Why) का।गणित को विज्ञान की रानी (Queen of sciences) कहा जाता है,लेकिन इसका आधार तर्क है जो दर्शन का हिस्सा है।इस प्रकार गणित भी दर्शन से जुड़ा हुया है। बिना दर्शन के विज्ञान निष्ठुर (blind) है और बिना विज्ञान के दर्शन अपंग (Lame) है।एक बेहतर समाज के लिए दोनों की एकता जरूरी है।
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5.विज्ञान का क्या अर्थ है? (What does science mean?):
- विज्ञान का अर्थ है:विशिष्ट ज्ञान।किसी चीज का व्यवस्थित,क्रमबद्ध रूप से प्राप्त ज्ञान विज्ञान है।इसका आधार कारण और प्रभाव होता है यानी यदि कोई कार्य हो रहा है तो उसका क्या कारण है? विज्ञान सिर्फ कही गई बात पर यकीन नहीं करता है।यह प्रयोग,निरीक्षण और साक्ष्य पर स्वीकार किया जाता है।अगर कोई सत्य साबित नहीं कर सका तो उसे विज्ञान प्रामाणिक नहीं मानता।
6.दर्शन और विज्ञान में अन्तर (Difference Between Science and Philosophy):
- दर्शन और विज्ञान दोनों का ही विषय सत्य की खोज करना है,लेकिन दोनों का तरीका और दायरा अलग है। दर्शन विचार,तर्क (logic) और गहरी सोच पर चलता है जबकि विज्ञान के सोच का तरीका प्रमाण,संशयों का परीक्षण और प्रयोग पर चलता है।प्रश्न:दर्शन बड़े और मूलभूत प्रश्न पूछता है,हम कौन है? जीवन का उद्देश्य क्या है? सही और गलत क्या है? जबकि विज्ञान ऑपरेशनल सवाल पूछता है।ये चीजें कैसे काम करती है? ब्रह्माण्ड कैसे बना? दायरा:दर्शन का क्षेत्र असीमित है।ये मृत्यु के बाद जीवन या चेतना (consciousness) पर भी बात कर सकता है जहाँ प्रयोगशाला परीक्षण सम्भव नहीं है।जबकि विज्ञान सिर्फ उसी चीज पर बात करता है जिसे नापा,तोला या देखा (physical/material world) जा सके।संक्षिप्त में हम कह सकते हैं कि विज्ञान का ध्यान कैसे पर होता है,वहाँ दर्शन का ध्यान क्यों पर होता है।
7.धर्म और विज्ञान में अंतर (Difference Between Religion and Science):
- धर्म और विज्ञान का इतिहास में टकराव रहा है क्योंकि दोनों के मूल सिद्धान्त बिल्कुल अलग हैं।पहलू:धर्म का आधार आस्था (Faith),विश्वास और भगवदीय ग्रन्थ है जबकि विज्ञान का आधार संदेह (skepticism),सवाल उठाना और प्रमाण है।बदलाव:धार्मिक नियम और सत्य अक्सर स्थिर (fixed) होते हैं,इनमें आसानी से बदलाव नहीं होता है।जबकि विज्ञान हमेशा बदलता रहता है।नये सबूत आने पर पुराने सिद्धान्त को बदल दिया जाता है। केन्द्रःधर्म आत्मा,परमात्मा,नैतिकता (morality) और परलोक पर केन्द्रित है जबकि विज्ञान प्रकृति के नियमों और भौतिक संसार (physical matter) पर केन्द्रित होता है।
8.दर्शन और धर्म में अन्तर (Difference Between Philosophy and Religion):
- ये दोनों ही जीवन के गहरे सवालों से जुड़े हैं,पर इनमें एक बारीक रेखा है,दर्शन आपको स्वयं सोचने,सवाल करने और तर्क करने की स्वतन्त्रता देता है।दर्शन में आखिरी नियम या पाप-पुण्य का डर नहीं होता है।ये मुक्त चिंतन हैं।
- धर्म एक व्यवस्था है जिसकी आस्था सबसे ऊपर होती है।इसमें अक्सर एक निश्चित जीवन-शैली,पूजा-पद्धति और नैतिक नियम होते हैं जिन्हें मानना जरूरी होता है।
- दर्शन सवाल उठाता है और जवाब खोजता है।धर्म पहले से दिए गए जवाब पर विश्वास करना सीखाता है।
9.दर्शन,धर्म और विज्ञान में किसे प्राथमिकता दें? (Which one to give priority to in philosophy, religion and science?):
- ये एक बहुत पेचीदा प्रश्न है और किसी एक को दूसरे से बेहतर नहीं कहा जा सकता है।लेकिन इंसान,समाज और प्रगति की दिशा में देखें तो ये तीनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।हरेक का अपना-अपना महत्त्व है।विज्ञान (pragmatic priority,व्यावहारिक प्राथमिकता):अगर हमें सामाजिक विकास,बीमारियों का इलाज,प्रौद्योगिकी और भौतिक जीवन को बेहतर बनाना है,तो विज्ञान को सबसे पहले प्राथमिकता मिलनी चाहिए।इसके बिना समाज अंधविश्वास में डूब जाएगा।
दर्शन (Intellectual priority,बौद्धिक प्राथमिकता):विज्ञान हमें शक्ति देता है,पर हमें शक्ति का उपयोग कैसे करना है (नैतिकता),ये दर्शन सिखाता है।ये इंसानी सोच को हमेशा खुला और सचेत रखता है। - धर्म/अध्यात्म (Emotional/moral priority,भावनात्मक,नैतिक प्राथमिकता):इंसान को मानसिक शांति,सामाजिक एकता और मुसीबत के समय एक सहारा चाहिए होता है जो अध्यात्म और धर्म से मिलता है।
- तात्पर्य यह है कि किसी एक को चुनने के बजाय,एक स्वस्थ समाज के लिए विज्ञान की आँखों से देखना,दर्शन के दिमाग से सोचना और एक नैतिक दिल से जीना सबसे सही संतुलन है।किसी भी एक पक्ष को आवश्यकता से अधिक प्राथमिकता देना जीवन में असंतुलन पैदा कर देता है।जिसे हम प्राथमिकता देते है वह हमें अति की ओर ले जाता है और अति हर चीज की खराब होती है।
- जैसे रोटी में नमक ज्यादा हो तो खारी लगती है और रोटी में नमक न हो तो फीकी लगती है।इसलिए रोटी में स्वाद बना रहे इसके लिए न ज्यादा नमक अच्छा है और न बिल्कुल नमक का न होना अच्छा है।
- यह आधुनिक युग विज्ञानप्रधान युग है और आज हर पहलू पर वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करना अच्छा माना जाता है।विज्ञान के कार्य क्षेत्र दो हैं:एक तो ज्ञात यानी जितना मनुष्य द्वारा जान लिया गया है और दूसरा अज्ञात यानी जितना अभी जानना बाकी है,जिसे आज नहीं तो कल जाना जा सकता है या जान लिया जाएगा।जानने की वैज्ञानिक पद्धति का सम्बन्ध भौतिक जगत के पदार्थों से रहता है इसलिए विज्ञान ने अभी तक जो जाना है वह भौतिक (Material) जगत के बारे में जाना है और जितना और जान सकेगा वही भौतिक जगत के बारे में होगा।इसकी वजह है कि हर पदार्थ,हर तत्त्व का,हर भौतिक चीज का विश्लेषण करने के लिए विज्ञान उसके खण्ड-खण्ड करता चला जाता है ताकि उसके मूल तक पहुँच सके और उसके बारे में सब कुछ जान सके।पर इससे एक गड़बड़ यह हो रही है कि खण्ड-खण्ड और उपखण्डों में जो एक अन्तरतम पारस्परिक सम्बन्ध है,एक अविच्छिन्न तारतम्य है उसे विज्ञान देख-समझ नहीं पाता।
- धर्म यानी अध्यात्म भी तीन क्षेत्रों की बात करता है:ज्ञात,अज्ञात और अज्ञेय।ज्ञात वह है जिसे जान लिया गया है,अज्ञात वह है जिसे आज नहीं तो कल जान लिया जाएगा और अज्ञेय वह है जिसे सम्पूर्ण रूप से जाना नहीं जा सकता क्योंकि हमारी क्षमता सीमित और अपूर्ण है अतः सीमित और अपूर्ण होने की वजह से हम उस असीम और पूर्ण को जान ही नहीं सकते।जितना जानने की कोशिश करेंगे उतना ही यह जान पाएंगे कि अभी तो बहुत कुछ जानना बाकी है।इसलिए धर्म खण्ड-खण्ड से अखण्ड की ओर,पत्तों व शाखों से जड़ की ओर तथा परिधि से केन्द्र की ओर यात्रा कराता है। वह खण्ड-खण्ड नहीं करता बल्कि खण्ड-खण्ड को जोड़कर ‘अखण्ड’ की ओर संकेत करता है,उसकी तरफ प्रेरित और अग्रसरित करता है।
- उपर्युक्त आर्टिकल में विज्ञान और दर्शन की एकता को पहचानें:विज्ञान और दर्शन का गहरा रिश्ता (Recognize Unity of Science and Philosophy:Vigyan Aur Darshan ka Gehra Rishta) के बारे में बताया गया है।
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10.दार्शनिक की दुविधा (हास्य-व्यंग्य) (The philosopher’s dilemma)(Humour-Satire):
- एक बार एक दार्शनिक,एक धर्मशाला में ठहरे।उन्होंने धर्मशाला की छत की ओर देखा तो वहाँ गोबर लगा हुआ था।दार्शनिक सोच में पड़ गए कि यहाँ पशु कैसे गया होगा?
- इतनी ही देर में एक छात्र वहाँ आया,उसने पूछा क्यों महोदय क्या सोच रहे हो?
दार्शनिक ने अपनी दुविधा बतायी। - छात्र ने तत्काल पास में पड़े गोबर को उठाया और छत की ओर फेंका और गोबर छत पर चिपक गया।छात्र ने कहा इस तरह गोबर छत तक पहुँचा।
11. विज्ञान और दर्शन की एकता को पहचानें:विज्ञान और दर्शन का गहरा रिश्ता (Frequently Asked Questions Related to Recognize Unity of Science and Philosophy:Vigyan Aur Darshan ka Gehra Rishta) से सम्बच्चित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.विज्ञान किसे नहीं जान पाता? (Who doesn’t know science?):
उत्तर:विज्ञान एक अखण्ड यानी ब्रहम को नहीं जान पाता।क्योंकि उसकी दृष्टि स्थूल पर पड़ती है।
प्रश्न:2.धर्म क्या है? (What is Dharma?):
उत्तर:धर्म एक सार्वभौमिक तारतम्य यानी ‘यूनिवर्सल इंटरलिंकिंग’ है।
प्रश्न:3.धर्म और विज्ञान का मार्ग कौनसा है? (What is the path of religion and science?):
उत्तर:धर्म श्रेय मार्ग है और विज्ञान प्रेय मार्ग है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा विज्ञान और दर्शन की एकता को पहचानें:विज्ञान और दर्शन का गहरा रिश्ता (Recognize Unity of Science and Philosophy:Vigyan Aur Darshan ka Gehra Rishta) की बेसिक टर्म्स के बारे जान सकते हैं।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*











