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6 Best Techniques on How to Educate

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1.शिक्षा कैसी हो की 6 बेहतरीन तकनीक (6 Best Techniques on How to Educate),शिक्षा के द्वारा मानव निर्माण के 6 मंत्र (6 Spells for Human Creation Through Education):

  • शिक्षा कैसी हो की 6 बेहतरीन तकनीक (6 Best Techniques on How to Educate) के आधार पर शिक्षा कैसी होनी चाहिए और किस प्रकार शिक्षित किया जाना चाहिए के बारे में जानेंगे।वर्तमान शिक्षा का ढर्रा ठीक नहीं है,इसे दुरुस्त करने की अत्यन्त आवश्यकता है।यदि समय रहते कदम उठा लिया जाएगा तो हम नए युग का निर्माण कर सकेंगे।
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2.शिक्षा का वास्तविक अर्थ (The Real Meaning of Education):

  • शिक्षा जीवन को सत्यम,शिवम,सुंदरम से समन्वित करती है।इसके द्वारा बुद्धि का शिवत्व,हृदय का सौंदर्य और आत्मा का सत्य स्वरूप झलकता है।शिक्षा अंतःप्रकाश को व्यवहार में उतारने का कार्य करती है।यह चरित्र में समुज्जवलता,चिंतन में उत्कृष्टता एवं व्यवहार में उदात्त भाव भरती है।एक ओर जहां इसे भौतिक पक्ष समृद्ध होता है,वहीं दूसरी ओर यह आत्मिक उत्थान की ओर अग्रसर होने का भी उचित एवं श्रेष्ठ माध्यम है।शिक्षा का तात्पर्य है-जिसके द्वारा विद्या ग्रहण की जाए,उसे शिक्षा कहते हैं।’सा विद्याया विमुक्तये’ कहकर विद्या की महत्ता प्रतिपादित की जाती है।अर्थात् शिक्षा वह जो सन्मार्ग प्रदान करें,सन्मार्ग की प्राप्ति अज्ञान के अभाव से ही संभव है,’ऋतं ज्ञानेन मुक्ति:’।यह विद्या शब्द के अत्यंत निकट है,जो कि सत्ता,ज्ञान और लाभ अर्थवाची ‘विद्’ धातु से बनी है।सत्-चित-आनंद प्रदात्री ही विद्या है।अतः जिसके माध्यम से व्यक्ति का सर्वांगीण विकास यानि भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास हो,वह विद्या ही शिक्षा कहलाती है।
  • शिक्षा में नैतिकता एवं आत्मिक विकास का स्वाभाविक समावेश होता है।इसके कारण ही राष्ट्र संपन्न और समृद्ध बनता है।इसे कल्पलता के सदृश माना गया है।शिक्षा अज्ञान का निवारण करती है तथा व्यवहार जगत में सहिष्णुता एवं कमर्ठता का पाठ पढ़ाती है।नीतिशतक में कहा गया है कि “विद्या माता की तरह रक्षा करती है,पिता की तरह हित के कार्यों में लगाती है,स्त्री की तरह खेद को दूर करके मनोरंजन करती है,धन को प्राप्त कराकर चारों ओर यश फैलाती है।विद्या कल्पलता के समान क्या-क्या सिद्ध नहीं करती? अर्थात् सब कुछ करती है।
  • निश्चित रूप से शिक्षा मनुष्य को अपने स्वरूप का बोध कराती है।यह मानव में मानवता का रहस्योद्घाटन करती है।यह मानवीय अंतःकरण का ऐसा श्रृंगार है,जिससे भावना एवं संवेदना जाग्रत होती है।इसके संवेदन सूत्रों से ही व्यक्ति एवं समाज आपस में जुड़ते हैं।इसी कारण शिक्षित समाज में प्रेम एवं सामंजस्य का सौहार्दपूर्ण वातावरण स्वयमेव बना रहता है।
  • भारतीय मनोविज्ञान ने मानव की मूल प्रकृति को आध्यात्मिक माना है।अपनी इसी आध्यात्मिक प्रकृति के कारण मनुष्य सचेतन से आत्मचेतन की ओर उन्मुख होता है।इसी लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए वह अविज्ञात के अनावरण की जिज्ञासा करता है।परम सत्य को जानने के लिए वह निरंतर अनुसंधान एवं अनवरत खोज में लगा रहता है।ऋषियों के अनुसार मानव की सबसे बड़ी विशेषता है कि उसमें एक ऐसी चेतना विद्यमान है,जिसमें वह अपने सीमित भौतिक अस्तित्व से ऊपर उठ सकता है।यही विशेषता मनुष्य को पशु से भिन्न ठहराती है।
  • मनुष्य अपनी इसी आध्यात्मिक प्रकृति के कारण ही कला,संस्कृति,सदाचार और धर्म के स्वरूप को अभिव्यक्त कर सका है।उसने अपने व्यावहारिक जीवन को भी इसी परिप्रेक्ष्य में ढाला,सँवारा और गढ़ा।तत्त्ववेत्ता मनीषियों ने इसी गढ़ने-सँवारने की प्रक्रिया को ही शिक्षा एवं विद्या के रूप में निरूपित किया है।वस्तुतः ये दोनों ही आपस में एक-दूसरे से संबंधित हैं।एक में जहां लौकिक जीवन की गुत्थियों को सुलझाया जाता है,तो दूसरे में आंतरिक जगत का अन्वेषण किया जाता है।हालांकि दोनों में ही आत्मा के ज्ञान स्वरूप का साक्षात्कार किया जाता है।मनीषियों के अनुसार,ज्ञान का यह स्रोत कहीं बाहर नहीं है,प्रत्युत आत्मा के अनावरण से ही इसका प्रकटीकरण होता है।

3.दार्शनिकों के अनुसार शिक्षा (Education according to philosophers and thinkers):

  • महर्षि अरविंद के शब्दों में,मस्तिष्क को ऐसा कुछ भी नहीं सिखाया जा सकता है,जो जीव की आत्मा में सुप्तज्ञान के रूप में पहले से विद्यमान ना हो।
  • युगदृष्टा स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा में अंतर्निहित सत्य को बताते हुए कहा है,मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है।ज्ञान मनुष्य का स्वभाव सिद्ध है।कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता,सब अंदर ही है।हम जो कहते हैं कि मनुष्य जानता है,यथार्थ में मानव शास्त्र-संगत भाषा में हमें कहना चाहिए कि वह आविष्कार करता है,अनावृत या प्रकट करता है।अतः  समस्त ज्ञान चाहे वह भौतिक अथवा आध्यात्मिक,मनुष्य की आत्मा में है।बहुधा वह प्रकाशित न होकर ढका रहता है और उसका आवरण धीरे-धीरे हटने लगता है,तब हम कहते हैं कि हम सीख रहे हैं।युगनायक स्वामी विवेकानंद ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा है कि-“शिक्षा से आत्मविश्वास जगता है और आत्मविश्वास से अंतर्निहित ब्रह्म भाव जाग उठता है।शिक्षा का सुशिक्षा होना मात्र पाठ्यक्रम पाठ्यपुस्तकों तथा परीक्षाओं के घेरे में बंद नहीं है,यह जीवन,धर्म,विश्वास,सेवा एवं प्रेम की शिक्षा का समन्वित रूप है।आज ऐसा न समझे जाने के कारण ही इतनी वैमनस्यता,विषमता एवं वितंडावाद पनप उठा है।शिक्षा भावात्मक होनी चाहिए,निषेधात्मक नहीं।भावात्मक विचार संस्कारों के नियंत्रक हैं।वे जीवन निर्माण तथा चरित्र निर्माण में सहायक होते हैं।आज ऐसी ही शिक्षा की आवश्यकता है।
  • स्वामी रामतीर्थ शिक्षा को स्वतंत्रता तथा मोक्ष की प्राप्ति का साधन मानते हैं।संत तिरुवल्लुर के अनुसार,अनश्वर महान संपत्ति केवल शिक्षा ही हो सकती है।कविवर रविन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं,श्रेष्ठ शिक्षा वह नहीं जो केवल जानकारी दे,सच्ची शिक्षा वह है,जो हमारे जीवन और वातावरण में सामंजस्य स्थापित करे।जो भी हो,इतना सच है कि शिक्षा जीवन को अभिव्यक्त करती है।इसके द्वारा जीवन जीवंत एवं जाग्रत हो उठता है।इसी कारण दिव्य जीवन संघ के संस्थापक स्वामी शिवानंद ने शिक्षा के सत्य को निरूपित करते हुए कहा है,वास्तविक शिक्षा का उद्देश्य मन को नियंत्रित करना,अहंकार नष्ट करना,दैवी गुणों का संवर्द्धन करना और ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करना होता है।मनीषी एडीसन ने कहा है,मानव-जीवन के लिए शिक्षा वैसी ही है,जैसे किसी संगमरमर-खंड के लिए मूर्तिकला।
  • इस तरह देखा जाए,तो शिक्षा का लक्ष्य कुछ निर्माण करना नहीं,बल्कि मनुष्य में पूर्व संचित सुषुप्त शक्तियों का जागरण,अनावरण और विकास करना है।महान् दार्शनिक डॉक्टर राधाकृष्णन ने शिक्षा को मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता का विकास माना है।उन्होंने शिक्षा का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा है कि शिक्षाओं,विद्याओं और अभ्यासों का अंतिम उद्देश्य एवं लक्ष्य मानव को प्रबुद्ध,सुसंस्कृत,उन्नत,निरोगी,विकसित एवं पूर्ण बनाना ही माना गया है।वेदकालीन शिक्षा में ज्ञान को आत्मसात करने,नवीन सृष्टि करने तथा मेधा,पौरुष,पराक्रम और ऋतंभरा-प्रज्ञा का चिंतन एवं भावधारा आदि का समावेश था।इस तरह शिक्षा का मूल उद्देश्य मानवता का विकास एवं उसकी पूर्णता ही सिद्ध होता है।अतः इसका स्वरूप पूर्ण वैज्ञानिक है।

4.शिक्षा का आधुनिक एवं प्राचीन मत (Modern and Ancient Doctrine of Education):

  • आधुनिक शिक्षा के तीन प्रमुख आधार माने गए हैं।ये हैं:दार्शनिक,मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक-सांस्कृतिक। शिक्षा दर्शन में शिक्षा की आवश्यकता एवं अनिवार्यता पर बल दिया गया है।शिक्षा मनोविज्ञान के अंतर्गत शिक्षा के सिद्धांतों,प्रतिमानों,विधियों तथा प्रणालियों का विस्तार से वर्णन किया जाता है।मनोविज्ञान के अनुसार,व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास शिक्षा का परम लक्ष्य है।शिक्षा के सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू में उसके विषय एवं सामयिकता पर प्रकाश डाला गया है।शिक्षाविदों ने आधुनिक शिक्षा के तीन प्रमुख घटकों का उल्लेख किया है-शिक्षक,शिक्षार्थी और शिक्षण प्रक्रिया व विषय।प्राचीन काल में भी शिक्षा इन्हीं तीन मूल बिंदुओं पर आधारित थी।परन्तु इसके स्वरूप व क्रियान्वयन में उत्कृष्टता एवं ग्राह्यता का आग्रह था।
  • शिक्षा देने वाला शिक्षक या गुरु वह व्यक्ति है,जो शिक्षा को सहज एवं सरल ढंग से छात्र के मन-मस्तिष्क में उतार देता है।प्राचीन काल में चार प्रकार के शिक्षकों का वर्णन मिलता है-आचार्य,प्रवक्ता,श्रोत्रिय एवं उपाध्याय। विद्यार्थी को संस्कार-सूत्रों से जो आबद्ध करे उसे आचार्य कहते थे।आचार्य शिक्षार्थी के अंदर संस्कार एवं शिक्षा का बीजारोपण करता है।आर्षग्रन्थों के गूढ़ एवं सूत्र रूप से भरे बड़े ज्ञान-भंडार की सरल,सहज एवं सुंदर भाषा में व्याख्या करने वाले को प्रवक्ता कहा जाता है।हालांकि वर्तमान समय के प्रवक्ताओं में वह बात नहीं है,जो प्राचीन काल में होती थी।छंद अर्थात् वेदों की शाखाओं को कंठस्थ रखने वाले एवं शिक्षार्थी को कंठस्थ कराने वाले शिक्षक श्रोत्रिय कहलाते थे।लौकिक एवं वैज्ञानिक साहित्य का अध्ययन-अध्यापन करने वाले को अध्यापक या उपाध्याय कहा जाता था।
  • अध्यापक का ज्ञान,शैली,संप्रेषण एवं व्यवहार बड़ा ही महत्त्वपूर्ण होता है,क्योंकि इसी के माध्यम से वह अपने विद्यार्थियों को ज्ञान का बोध करा सकता है।आधुनिक शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षकों की विशेषताओं का इन बिंदुओं के अंतर्गत आकलन किया है-सम्यक ज्ञान,कुशल शैली,सरल एवं सुबोध भाषा,मधुर व्यवहार,सत्यवादिता,निष्पक्षता,न्यायप्रियता एवं विद्यार्थियों के प्रति स्नेह व सद्भावपूर्ण दृष्टिकोण।विनोबा भावे ने शिक्षकों में तीन गुणों को रेखांकित किया है- शिक्षक के मन में शिक्षार्थी के प्रति प्रेम और वात्सल्य की भावना,शिक्षक की निरंतर अध्ययनशीलता एवं शिक्षक का वर्तमान राजनीति में सक्रिय न होना।इन गुणों से युक्त शिक्षकों को डॉ. राधाकृष्णन ने समाज का प्रकाशस्तंभ कहा है।पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर जाकिर हुसैन का कहना है कि सच्चे शिक्षक ही हमारे भाग्य-विधाता हैं।
  • सच तो यह है कि शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों ही एक-दूसरे के पूरक होते हैं।इनके मध्य पवित्र ज्ञान का संबंध होता है।श्रद्धापूर्वक शिक्षा ग्रहण करने की इच्छा रखने वाला शिक्षार्थी होता है।छात्र के गुणों के बारे में सिद्धांत कौमुदी में इस तरह कहा गया है-“गुरुर्दोषानावरणं छत्रम्,ततशीलम् अस्थ इति छात्रम्।” इसी को उपनिषद इस तरह से कहता है-“यानि अस्माकम अनवद्यानि तानि त्वया उपाख्यानि नो इतराषि।”प्राचीनकाल में छात्र शिक्षक के पास श्रद्धाभाव से पहुँचता था।शिक्षक उसे संस्कारों की भट्टी में गला-ढलाकर अपने अंतर्निहित विद्यागर्भ में प्रविष्ट कराता था।इसी उदात्त भावना से शिक्षक को अंतेवासी शब्द से अलंकृत किया जाता था।शिक्षक,शिक्षार्थी को उसके अनुकूल शिक्षा प्रदान करता था।

5.वर्तमान शिक्षा को सृजनशील बनायें (Make current education creative):

  • आज के आधुनिक परिदृश्य में भी इसे तीन रूपों में परखा जा सकता है-(1.)ज्ञानात्मक (2.)भावात्मक तथा (3.)क्रियात्मक।ज्ञानात्मक उद्देश्यों में समझना,रचना करना व मूल्यांकन पर जोर दिया जाता है।भावनात्मक पहलू के अंतर्गत विद्यार्थियो में सकारात्मक अभिवृत्ति को जाग्रत कर अध्ययन हेतु प्रेरित किया जाता है।क्रियात्मक प्रक्रिया प्राप्त ज्ञान व प्रेरणा को व्यावहारिक जीवन में उतारने पर बल देती है।वर्तमान युग में कम-से-कम समय में अधिक-से-अधिक ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया चल पड़ी है।इसलिए प्राथमिक स्कूलों से महाविद्यालयों,विश्वविद्यालयों तक ऐसी ही विधियाँ प्रयोग में लाई जा रही हैं।प्रयोग में लाई जाने वाली विधियों में भाषण या वाचिक विधि,सामूहिक विवेचना या संगोष्ठी विधि,सामूहिक प्रदर्शन विधि एवं पत्राचार विधि मुख्य है।इन्हें और सरल,सुबोध एवं व्यापक बनाने के लिए रेडियो,टेलीविजन एवं कंप्यूटर की सहायता ली जा रही है।
  • शिक्षा जगत के वर्तमान परिदृश्य में उच्चस्तरीय सिद्धांतों एवं अत्याधुनिक व्यवस्थाओं के बावजूद प्रतिपल विफलता एवं व्यतिक्रम बढ़ता जा रहा है।इस तथ्य की गहराई में जाने पर निष्कर्ष यही निकलता है कि आज की शिक्षा अर्थ एवं काम पर प्रतिष्ठित है।यह केवल जीविकोपार्जन या आजीविका का साधन बनकर रह गई है।जो शिक्षा वैभव-विलास से जुड़कर तप से मुंह मोड़ ले,वह भला चरित्र-चिंतन एवं व्यवहार में कैसे परिवर्तन ला सकती है।सत्य यही है कि आज का शैक्षिक परिदृश्य एकदम दिग्भ्रमित है।
  • वर्तमान शिक्षा को यदि सृजनशील बनाना है,तो शिक्षा के मूल्य,महत्त्व एवं उद्देश्य को सही ढंग से समझना होगा और प्राचीन भारतीय परंपरा को सामयिक रूप से प्रतिष्ठित करना होगा।शिक्षण प्रक्रिया में ऋषि-चेतना का समावेश करके ही उपर्युक्त विसंगतियों को दूर किया जा सकता है।वर्तमान शिक्षा में जीवन जीने की कला या अध्यात्मविद्या का समावेश आवश्यक है।इसके बिना सच्चे जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।आज पाश्चात्य जगत के शिक्षाशास्त्रियों यथा पैंटर,डेवी,फ्रीबेल,जेम्स आदि के विचारों के साथ भारतीय मनीषियों यथा स्वामी विवेकानंद,महर्षि अरविंद,लोकमान्य तिलक,ब्रह्मर्षि दयानन्द आदि के विचारों का समन्वय आवश्यक है।क्योंकि आज समाज को ऐसी शिक्षा चाहिए,जो मानव का निर्माण कर सके एवं समाज व राष्ट्र को विकसित एवं गतिशील बना सके।
  • सृजनात्मक चिन्तन की महत्ता को समझा जा सके तथा उसे जीवन में उतारने-विकसित करने की कला ज्ञात हो सके, तो कोई भी व्यक्ति अपनी अदक्षता,अक्षमता एवं अज्ञानता को मिटाकर सक्रिय एवं सार्थक जीवन जी सकता है।विद्यार्थी जीवन में तो सृजनात्मक योग्यता का विशेष महत्त्व है।इससे उनमें निर्णयात्मक क्षमता का विकास होता है और वे अपनी समस्याओं,कमजोरियों,अज्ञानताओं का निदान आसानी से खोज लेते हैं।बौद्धिक दृष्टि से तो वे विकसित ही है साथ ही समाजोपयोगी कार्य करने की उनकी क्षमता में अभिवृद्धि होती है।
  • व्यक्तित्व को प्रतिभा संपन्न बनाने में पारिवारिक वातावरण का,स्कूली पाठ्यक्रम का,अभिभावकों-अध्यापकों का योगदान आवश्यक है।क्योंकि इस आधार पर विकसित हुई प्रतिभा ही बालकों का भविष्य उज्ज्वल बनाती है।पुस्तकों का भार इतना अधिक नहीं पड़ना चाहिए कि वे अन्य ऐसे कार्यों में भाग ही न ले सकें,जो प्रतिभा संवर्द्धन के लिए सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों के निमित्त आवश्यक है।
  • व्यक्तित्व की सृजनात्मक योग्यता की दृष्टि से अपने देश में बहुत कम ध्यान दिया जाता है।कम सृजनात्मक योग्यता वाले विद्यार्थियों की तुलना में उच्च सृजनात्मक क्षमता रखने वालों में सहनशीलता,स्वायत्तता,परिवर्तन,उपलब्धि एवं महत्त्व प्राप्त करने की कुशलता अधिक देखी गई है।ऐसी लड़कियों में परिवर्तन एवं सहनशीलता की भावना निम्न योग्यता वाले विद्यार्थियों की अपेक्षा अधिक थी।सृजनात्मकता के अभाव में लड़के अधिक उच्छृंखलता बरतते देखे गए हैं।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में शिक्षा कैसी हो की 6 बेहतरीन तकनीक
    (6 Best Techniques on How to Educate),शिक्षा के द्वारा मानव निर्माण के 6 मंत्र (6 Spells for Human Creation Through Education) के बारे में बताया गया है।

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6.छात्र और शिक्षक में बातचीत (हास्य-व्यंग्य) (Student and Teacher Interaction) (Humour-Satire):

  • छात्र द्वारा टेस्ट देने के बाद,छात्र ने टीचर से कहा:सर,आप मेरा मूल्यांकन कैसे करते हैं?
  • टीचर:तुम तो अनमोल हो,तुम जैसा छात्र मिलना मुश्किल है?
  • छात्र:सर ऐसी बात है तो मुझे आप उत्तीर्ण कर देना,मैंने उत्तरपुस्तिका खाली छोड़ दी है,एक भी सवाल हल नहीं किया है।मेरी कीमत वसूल हो जाएगी।

7.शिक्षा कैसी हो की 6 बेहतरीन तकनीक (Frequently Asked Questions Related to 6 Best Techniques on How to Educate),शिक्षा के द्वारा मानव निर्माण के 6 मंत्र (6 Spells for Human Creation Through Education) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.लड़कियां अग्रणी क्यों होती है? (Why do girls take the lead?):

उत्तर:लड़कियों को प्रायः जीवन के प्रारंभ से ही कुछ ना कुछ करते रहना एवं सक्रिय जीवन जीना पड़ता है अतः उनकी क्षमता का विकास एवं निखार भी तदनुरूप अधिक होता है।उनकी उपलब्धियां भी अपेक्षा अधिक बढ़ी-चढ़ी रहती है।शालीनता-सहनशीलता आदि सद्गुणों में भी वे सर्वोपरि मानी जाती हैं।

प्रश्न:2.रचनात्मक विद्यार्थी की क्या विशेषता है? (What is the characteristic of a creative student?):

उत्तर:घरेलू जीवन और अध्ययनकाल में जो विद्यार्थी किन्हीं रचनात्मक कामों में लग रहे वे आगे चलकर अच्छी प्रगति कर सके और जो छात्र मात्र किताबी कीड़े बने रहे अथवा सबसे अलग-अलग रहे,वे ज्यों-त्यों करके ही गुजारा कर सके।

प्रश्न:3.सृजनात्मक जीवन की क्या परिभाषा है? (What is the definition of a creative life?):

उत्तर:वह उपक्रम जिसमें व्यक्ति अपनी सामान्य विचारधारा से हटकर रचनात्मक दिशा में प्रवेश करता है और परिणामस्वरूप प्रतिभाशाली एवं व्यक्तित्व सम्पन्न बनता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा शिक्षा कैसी हो की 6 बेहतरीन तकनीक
    (6 Best Techniques on How to Educate),शिक्षा के द्वारा मानव निर्माण के 6 मंत्र (6 Spells for Human Creation Through Education) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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