7 Tips to Be Problem-Solving Education
1.समस्याएँ सुलझाने वाली शिक्षा होने की 7 टिप्स (7 Tips to Be Problem-Solving Education),शिक्षा कैसी होनी चाहिए? (What Should Education Be Like?):
- समस्याएँ सुलझाने वाली शिक्षा होने की 7 टिप्स (7 Tips to Be Problem-Solving Education) के इस लेख में बताया गया है कि शिक्षा हमारे जीवन की समस्याओं को सुलझाने वाली होनी चाहिए।
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2.शिक्षा हमारे लिए अनिवार्य आवश्यकता (Education is an indispensable requirement for us):
- शिक्षा विकसित राष्ट्र की एक अनिवार्य आवश्यकता है।सीखने और सिखाने के लिए बहुत कुछ किया जा रहा है।छात्रों और अध्यापकों की विशाल जनसंख्या साक्षर होने में लगी हुई है और साक्षर होकर हम समझ रहे हैं कि शिक्षित हो रहे हैं।शिक्षा नीति पर कई आयोग बैठते हैं,चर्चाएं होती हैं,मसौदा तैयार होता है,उसे सरकारों के सामने प्रस्तुत किया जाता है और सरकारें उसे लेकर स्टोर रूम में पटक देती है,जिस पर समय के साथ धूल जम जाती है और समय के साथ उस आयोग की बातों को भुला दिया जाता है।फिर वही पुराना ढर्रा चलता रहता है।परंतु क्या सीखा जाए और क्या सिखाया जाए,इसका अभी तक निर्धारण नहीं हो पाया है।
- दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं का उत्पादन और उपयोग-उपभोग करने की कला,मानव-जीवन की ऐसी आवश्यकता है,जो हर एक को सीखनी चाहिए।पढ़ाई में उसका समुचित स्थान होना चाहिए।व्यक्तित्व के विकास में जिन सद्गुणों की आवश्यकता है,उसका महत्त्व,स्वरूप और प्रयोग सिखाना अध्यापकों का उद्देश्य होना चाहिए।समाज की सुव्यवस्था के लिए व्यक्ति और समूह के पारस्परिक संबंध क्या हों? दोनों एक-दूसरे के पूरक बनकर कैसे रहें? इस प्रश्न को मात्र समाजविज्ञान की पुस्तकों द्वारा नहीं सुलझाया जा सकता,बच्चों को इस संदर्भ में व्यावहारिक ज्ञान सिखलाना होगा।जीवन पुस्तकों की परिधि में सीमित नहीं है।सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को पढ़ने-लिखने के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है।असली पढ़ाई वह है,जो अभ्यास से अनुभव में आती है।जीवन-क्षेत्र में उतरने पर प्रस्तुत आवश्यकताओं की पूर्ति और समस्याओं के समाधान का व्यावहारिक ज्ञान ही कारगर हो सकता है।शिक्षा का उद्देश्य इसी प्रयोजन को पूरा करना होना चाहिए।
- शरीर से निरंतर काम लेना पड़ता है,पर उसके क्रिया-कलाप संरक्षण,विकास और सुधार की जानकारी हर व्यक्ति को होनी चाहिए।बात-बात में डाॅक्टर का दरवाजा खटखटाते रहा जाए और शरीर से संबंधित बनाव-बिगाड़ के संबंध में अपरिचित रहा जाए तो समझना चाहिए कि शिक्षा का एक अति महत्त्वपूर्ण अंग,उपेक्षा के गर्त में डाल दिया गया।आहार-विहार के सिद्धांतों से अपरिचित और स्वास्थ्य संवर्द्धन और रोग निवारण की विधि-व्यवस्था से अनजान व्यक्ति के बारे में यही कहा जा सकता है कि उसे शिक्षा के प्रथम चरण से भी परिचित नहीं कराया गया।ऐसे शिक्षार्थी विश्वविद्यालय की स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने पर भी,जीवन क्षेत्र में एक-एक प्रकार से अशिक्षित ही बने रहेंगे।गृहस्थ बनकर मनुष्य को रहना पड़ता है।जन्म से लेकर मरण-पर्यन्त उसे परिवार का अंग ही बने रहना पड़ता है।कुटुंब को एक राष्ट्र ही कहना चाहिए।उसका संचालन राज्य-शासन की तरह ही कुशलता,दूरदर्शिता,और अनुभवशीलता की अपेक्षा करता है।अनाड़ी व्यक्ति के लिए परिवार,विग्रह का केंद्र ही बना रहता है,जबकि सुनियोजित ढंग से व्यवस्थित किए गए जाने पर वही छोटा घर-परिवार हर्षोल्लास,उत्कर्ष और लोकहित का समर्थ माध्यम बन सकता है।
3.शिक्षा में व्यावहारिक बातें हों (There should also be practical things in education):
- शिक्षा विधि-व्यवस्था में मानव जीवन की पूर्ति के लिए समुचित स्थान होना चाहिए।आजीविका,धन खर्च करने की कला,स्वच्छता,आहार की गुणशीलता नष्ट न होने देना,प्रजनन,बच्चों का पालन-पोषण,दांपत्य संबंध,भाई-बहनों का तालमेल बुजुर्गों की सुविधा,प्रतिष्ठा,आतिथ्य व परिजनों की दिनचर्या,विग्रहों का समाधान आदि अगणित विषय ऐसे हैं जिन्हें सही तरीके से न जानने के कारण पारिवारिक जीवन का सारा आनंद-उल्लास चला जाता है और रुष्ट-असंतुष्ट रहकर किसी प्रकार दिन कटते हैं।शिक्षा यदि पारिवारिक व्यवस्था और विकास का व्यावहारिक शिक्षण दे सकने में समर्थ ना हो तो उसे अधूरी ही कहा जाएगा।
- शिक्षा से आत्मनिर्भरता (करियर) का उद्देश्य ही जुड़ा है,तो आजीविका उपार्जन के लिए नौकरी ही एक मात्र रास्ता खुला रहे यह लज्जा की बात है।आज के अधिकांश युवा अपने जीवन की आधी आयु तो नौकरी के लिए,प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने में ही खपा देते हैं।यह जाने बिना ही की वे नौकरी के लिए योग्य हैं या नहीं केवल नौकरी के आकर्षण से ही वह ऐसा करते हैं।नौकरी आपत्ति धर्म है।कोई मनुष्य अपना आर्थिक बोझ न उठा सके अथवा किसी उत्पादन कार्य में संलग्न हो तो,उसे नौकरी की जरूरत पड़नी चाहिए।प्रत्येक शिक्षित यदि नौकरी की आकांक्षा करें,हर छात्र के सामने नौकरी ही लक्ष्य हो तो उसे सार्वजनिक पौरुष का पतन ही कहना चाहिए।इसे शिक्षा-प्रयोजन की भयानक असफलता कह सकते हैं।
4.शिक्षा का उद्देश्य (Purpose of Education):
- शिक्षा का उद्देश्य जीवन की सर्वांगीण समस्याओं का समाधान ही हो सकता है,होना भी चाहिए इसी श्रृंखला में एक प्रश्न करियर (आजीविका उपार्जन) का भी है।उसे शिक्षा के अविच्छिन्न अंग के रूप में इस प्रकार जुड़ा रहना चाहिए कि पढ़ाई के उपरांत अपनी रोटी जॉब करके कमा सकते में समर्थ हो सके।इस देश का प्रधान व्यवसाय कृषि एवं पशुपालन है।प्रस्तुत भूमि में यदि कुशलतापूर्वक कृषि की जाए,विधिवत पशुपालन किया जाए तो इस देश की तीन-चौथाई जनता सुरम्य वन के शांतिमय,स्वास्थ्यवर्द्धक वातावरण का आनंद लेते हुए अपनी आजीविका भली प्रकार उपार्जित कर सकती है।
- गृह उद्योगों का क्षेत्र दूसरा है।यदि विदेशी मुद्रा का उपार्जन और उसके बदले विलासिता की चीजें मँगाने का आग्रह छोड़ दिया जाए तो आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के लिए विकेंद्रित गृह उद्योगों को प्रोत्साहन देने की नीति ही अपनानी पड़ेगी।तब जापान की तरह गृह उद्योगों को स्थापित व विकसित करना पड़ेगा।गांव-गांव मुहल्ले-मुहल्ले ऐसे छोटे कारखाने खड़े करने पड़ेंगे,जिनमें सभी को काम मिल सके और उस क्षेत्र की आवश्यकता पूर्ण हो सके।उत्पादन,संग्रह और विक्रय के लिए सहकारी समितियों का एक तंत्र गृह उद्योगों के साथ-साथ खड़ा किया जा सकता है।कृषि और पशुपालन से बची हुई जनता को इस प्रयोजन में खपाया जा सकता है।इस तरह आज जो बेकारी की समस्या एक विभीषिका के रूप में सामने खड़ी है,उसका समाधान सुविकसित शिक्षा-पद्धति द्वारा सहज ही संभव हो सकता है।गृह उद्योगों की सहकारी समितियों की सारी जानकारी यदि व्यवस्था से जुड़ी हुई हो तो देश में न बेकारी दिखाई पड़े और न नौकरी के लिए लालायित रहने वाली दूसरों का मुँह देखने की परावलम्बी हेय मनोवृत्ति का कहीं दर्शन हो।
5.सामाजिक कर्त्तव्यों का पालन (Performing social duties):
- बड़े कारखानों ने गृह उद्योगों का मार्ग अवरुद्ध किया है।इन्हें सीमित और नियंत्रित किया जाना चाहिए।यह हजार को काम देकर लाख को बेकार बनाते हैं।लाभ से चंद लोगों की जेबें भरते हैं।विदेश से केवल मशीनें आदि उत्पादन के लिए अनिवार्य साधन मंगाए जाएं और उसके बदले में ही कुछ चीजें भेजी जाएं।विलासिता की निरर्थक चीजें मँगाना,उनके लिए मुद्रा उपार्जन के नाम पर बड़े कारखाने खड़े करना,सर्वदा गलत अर्थ नीति है।इस प्रतिदान को पूँजीपतियों का षड्यंत्र कहा जा सकता है।जन स्तर पर इसका घोर विरोध होना चाहिए,अन्यथा बेकारी की समस्या का हल निकल ही नहीं सकेगा।
- सामाजिक कर्त्तव्य और उत्तरदायित्वों को हृदयंगम करना शिक्षा का उत्तरदायित्व है।अपने देश में गणित,संसार का इतिहास,संसार की राज्य प्रणालियां,जीव विज्ञान,पदार्थ विज्ञान,रेखा गणित आदि उन विषयों की पाठ्यपुस्तकें भरी पड़ी हैं जो सामान्य जीवन में कदाचित ही किसी के काम आती हैं।उन विषयों में विशिष्ट बनने वालों के लिए वे विषय भले ही खुले रहे,पर सामान्य नागरिकों के लिए उपर्युक्त विषयों को तथा सामान्य छात्र-छात्राओं के लिए उपर्युक्त विषयों की सामान्य जानकारी के रूप में किताबों का सिलेबस सीमित किया जा सकता है।शिक्षा का क्रम प्रारंभिक कक्षाओं में मातृभाषा में चलाया जा सकता है।इसमें छात्रों का तीन-चौथाई दिमाग जो निरर्थक भार वहन करता रहता है,बच जाएगा और उस बौद्धिक बचत को उस उपयोगी जानकारी में नियोजित किया जा सकता है,जिससे उन्हें समर्थ,सुरक्षित और आत्मनिर्भर जीवन जीने में,सुयोग्य नागरिक बनने में सुविधा मिले।
- सामाजिक ज्ञान इसी प्रकार की उपयोगी जानकारी में है।प्रजातंत्र में वोट का कितना महत्त्व है,उसका उपयोग कैसे करना चाहिए,इसके बारे में भी बताया जाना चाहिए।नागरिक कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों का दर्शन नहीं,व्यवहार सिखाना चाहिए।असामाजिकता,अनैतिकता,अनुशासनहीनता कितनी विघातक है उसे अगणित उदाहरणों समेत समझाया जाना चाहिए विवेचना-समीक्षा की योग्यता बढ़ाना नहीं,शिक्षा का प्रयोजन एक निर्धारित ढांचे में ढालने का होना चाहिए।सरकारों का काम है कि शिक्षण प्रक्रिया की वर्तमान लुंज-पुंज प्रणाली को बदले,जनता का कर्त्तव्य है कि सार्थक शिक्षण प्रक्रिया की ऐसी माँग करे जिसे पूरा करने के लिए शासन को सहमत होने के लिए विवश ही होना पड़े।यदि ऐसा ना हो तो सेवा संगठन इस दिशा में आगे आएँ एवं अनौपचारिक शिक्षण की व्यवस्था बनाएँ।यह व्यावहारिक और संभव है क्योंकि शिक्षा निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों में संचालित करने की व्यवस्था है।
- यदि वर्तमान अव्यवस्था और दिशाहीन युवाओं को सही रास्ते पर लाना है तो शिक्षा ही एक ऐसा अस्त्र है,यह अस्त्र ही नहीं ब्रह्मास्त्र है जिसमें बदलाव करके उन्हें (युवाओं) सही मार्ग पर लाया जा सकता है।शिक्षा हमें पशु से इंसान बनाती है।शिक्षा हमारा कायाकल्प करती है।शिक्षा हमारा पूरी तरह से रूपांतरण करने में सक्षम है।अंग्रेजों और विदेशियों ने शिक्षा को अपने ढाँचे में ढालकर शासन करने में सक्षम रहे थे।शिक्षा के द्वारा ही हमारे देश की विशिष्ट संस्कृति है,जिसकी धारा आज भी प्रवाहमान है।वैदिक संस्कृति आज भी जीवित है।
6.युवाओं को शिक्षा के द्वारा ही सुधारना संभव (It is possible to improve the youth only through education):
- छात्र-छात्राओं,युवाओं के सामने आज अनेक समस्याएं खड़ी हैं।इन समस्याओं का उन्हें कोई मार्ग नहीं सूझता है क्योंकि आज की शिक्षा दिशाहीन,सैद्धांतिक है,व्यावहारिक नहीं है,मानव को खड़ा करना नहीं सिखाती है।मसलन आज का युवा सबसे अधिक करियर को महत्त्व देता है परंतु आज के शिक्षण संस्थानों में पढ़ाया तो जाता है परंतु आज के युवाओं को यह पता ही नहीं है कि वह क्या पढ़े और क्यों पढ़े? छात्र-छात्राओं को तो क्या पता होगा,शिक्षकों को ही पता नहीं है कि वे बच्चों को क्या पढ़ाएँ और उन्हें सही मार्गदर्शन कैसे दें।
- शिक्षण संस्थानों में काउंसलर की नियुक्ति की जाए तो वे छात्र-छात्राओं को सही मार्ग दिखा सकते हैं।आज छात्र-छात्रा नवीं-दसवीं उत्तीर्ण करने के बाद सोचता है कि उसे कौन सा ऐच्छिक विषय लेना चाहिए,कौन-से क्षेत्र का चुनाव करना चाहिए,इसका पता ही नहीं है।या तो माता-पिता अथवा अपने मित्रों के देखा-देखी या अपरिपक्व शिक्षकों के सुझाव के अनुसार विषय का चुनाव करता है,अपने करियर का चुनाव करता है।करियर के ये मार्गदर्शक न तो उनकी मौलिक प्रतिभा के बारे में कुछ जानना चाहते हैं और न ही सही दिशा दिखाते हैं।
- अथवा छात्र-छात्रा इंटरनेट पर वीडियो या वेबसाइट्स पर लेख देखकर अपनी दिशा तय कर लेता है।कुछ पत्र-पत्रिकाओं में भी इस तरह के लेख छपते हैं कि अमुक छात्र-छात्रा को यह विषय लेना चाहिए,इस क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहिए।ये सभी मार्गदर्शक एक सामान्य थ्योरी प्रकाशित कर देते हैं।जबकि हर छात्र-छात्रा अद्वितीय होता है।किसी में कोई प्रतिभा होती है तो किसी में दूसरी।किसी में खेल खेलने की प्रतिभा होती है तो किसी में भजन,संगीत,लेख लिखने या कंप्यूटर सीखने की प्रतिभा होती है।
- बालक की रुचि,योग्यता,क्षमता और मौलिक प्रतिभा को पहचानकर उसकी सही काउंसलिंग की जा सकती है।काउंसलर की शिक्षण संस्थान में नियुक्ति हो तो वह छात्र-छात्रा को नजदीक से देखकर,उसके चाल-चरित्र,रुचि को पहचान लेता है,उसकी हाॅबी और प्रतिभा की जाँच कर लेता है।ऐसी स्थिति में वह ठीक से उसकी काउंसलिंग कर सकता है।
- परंतु काउंसलर बहुमुखी प्रतिभावान,आध्यात्मिक ज्ञान,व्यावहारिक ज्ञान से सम्पन्न,विद्वान और ज्ञानी होना चाहिए।एक प्रोफेशनल काउंसलर में मुश्किल से ऐसी योग्यता मिलती है और न ही वे बालक को करीब से देख चुके होते हैं,उनके चाल-चरित्र से अनभिज्ञ होते हैं,ऐसी स्थिति में केवल आधा-एक घंटे में कैसे काउंसलिंग की जा सकती है,यह विचारणीय प्रश्न है।
आज के युवा तथा छात्र-छात्राएं भेड़चाल से डिग्री पर डिग्री लिए जाते हैं अथवा केवल मार्केट की डिमांड देखकर उसी विषय या करियर क्षेत्र का चुनाव कर लेते हैं।इस प्रकार की शिक्षा आज न ओढ़ने के काम में आती है और ना बिछाने के काम आती है।ऐसे भटके हुए युवाओं और डिग्रीधारी युवाओं को सही दिशा व करियर का पता नहीं होता है तो वे निराश व हताश होकर अपराध जगत की ओर मुड़ जाते हैं।बहुत से युवा तो पढ़ते समय ही ऐसे काम करने लग जाते हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिए।जैसे ड्रग्स,मादक पदार्थों का सेवन करना,अय्याशी करना आदि।यह आज की शिक्षा की सबसे बड़ी विकृति है।इस शिक्षा में काउंसलर एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो शिक्षा की दिशा और दशा को सुधार सकता है।इससे सेकुलर पार्टियों व नेताओं के पेट में दर्द भी नहीं होगा।काउंसलर कैरियर संबंधी ही नहीं बल्कि निराश,हताश,गलत दिशा में जा रहे युवकों को सही दिशा दे सकता है,चरित्र निर्माण के गठन में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है। - उपर्युक्त आर्टिकल में समस्याएँ सुलझाने वाली शिक्षा हो की 7 टिप्स (7 Tips to Be Problem-Solving Education),शिक्षा कैसी होनी चाहिए? (What Should Education Be Like?) के बारे में बताया गया है।
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7.छात्र के पेट में दर्द (हास्य-व्यंग्य) (Student’s Abdominal Pain) (Humour-Satire):
- छात्र (काउंसलर से):श्रीमान मेरे दसवीं में गणित में 55% व कुल 75% अंक प्राप्त हुए हैं।मुझे कौन-सा विषय लेना चाहिए।
- काउंसलर:आपकी पूरी रिपोर्ट देखने के बाद यही उचित लगता है कि आप आर्ट्स विषय लें और साथ में पार्ट टाइम कोई हुनर सीखें।
- छात्र:परंतु आज गणित का क्रेज ज्यादा है और मैंने 75% अंक प्राप्त किए,तो मेरा मन तो गणित विषय लेने का कर रहा है।
- काउंसलर (छात्र से):आपके गणित में 55% अंक है और पिछली कक्षाओं में भी रिकॉर्ड अच्छा नहीं है अब यदि आपके कब्ज है और एक गोली की जरूरत है उसकी जगह 10 गोलियां (हैवी डोज) लोगे तो आप अपने कपड़े और बिस्तरों को खराब कर दोगे,ऐसा लूज मोशन चालू हो जाएगा।
8.समस्याएँ सुलझाने वाली शिक्षा हो की 7 टिप्स (Frequently Asked Questions Related to 7 Tips to Be Problem-Solving Education),शिक्षा कैसी होनी चाहिए? (What Should Education Be Like?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.आज के छात्र-छात्रा की दशा कैसी है? (What is the condition of today’s students?):
उत्तर:आज के छात्र-छात्रा नौकरी के चक्कर में अपनी आधी उम्र तो माता-पिता पर बोझ बनकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
प्रश्न:2.शिक्षण संस्थान में काउंसलर ना हो तो क्या करें? (What to do if there is no counselor in an educational institution?):
उत्तर:अपने मित्र,माता-पिता,विद्वान शिक्षकों से परामर्श लें और अपने विवेक से निर्णय लें।
प्रश्न:3.आज की शिक्षा कैसी है? (How’s education today?):
उत्तर:आज की शिक्षा सैद्धांतिक है,व्यावहारिक नहीं और ऐसी शिक्षा मृतक के समान है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा समस्याएँ सुलझाने वाली शिक्षा हो की 7 टिप्स (7 Tips to Be Problem-Solving Education),शिक्षा कैसी होनी चाहिए? (What Should Education Be Like?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Satyam
Lekhak Ke Baare Mein (About the Author) **Satyam Narain Kumawat** **Website Name:Satyam Mathematics** *Owner:satyamcoachingcentre.in* *Sthan:Manoharpur,Jaipur (Rajasthan)* **Teaching Mathematics aur Anya Anubhav** ***Shiksha:**B.sc.,B.Ed.,(M.sc. star Ke Mathematics Ko Padhane ka Anubhav),B.com.,M.com. Ke vishayon Ko Padhane ka Anubhav,Philosophy,Psychology,Religious,sanskriti Mein Gahri Ruchi aur Adhyayan ***Anubhav:**phichale 23 varshon se M.sc.,M.com.,Angreji aur Vigyan Vishayon Mein Shikshaka Ka Lamba Anubhav ***Visheshagyata:*Maths,Adhyatma (spiritual),Yog vishayon ka vistrit Gyan* ****In Brief:I have read about M.sc. books,psychology,philosophy,spiritual, vedic,religious,yoga,health and different many knowledgeable books.I have about 23 years teaching experience upto M.sc. ,M.com.,English and science.










