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What is the Objectives of teaching Geometry?

रेखागणित शिक्षण के उद्देश्य क्या है?( What is the Objectives of teaching Geometry?)-

 

(1.)रेखागणित का परिचय(Introduction to

Objectives of teaching Geometry

)-

रेखागणित में संख्या तथा उनके प्रतीकों का ध्यान करते हैं और रेखागणित में संख्याओं आदि के संबंधों के धरातलीय एवं आकाशीय पक्षों का अध्ययन करते हैं जबकि अंकगणित तथा बीजगणित में संख्या तथा उनके प्रतीकों का अध्ययन करते हैं।रेखागणित के अध्ययन से हमें धरातल पर खींची गई आकृतियों के संख्यात्मक संबंधों एवं परिणामों का ज्ञान होता है।अंकगणित संख्याओं की भाषा है,बीजगणित प्रतीकों एवं संकेतों की भाषा है और रेखागणित धरातल पर खींची गई आकृतियों की भाषा है। रेखागणित,गणितशास्त्र का एक महत्वपूर्ण अंग है तथा इसके अध्ययन से विद्यार्थियों में तर्कपूर्ण ढंग से सोचने की आदत का विकास होता है।रेखागणित का तर्क एक विशेष प्रकार का तर्क होता है जो अनेक स्वयंसिद्धियों और अभिगृहीत पर आधारित होता है।
जीवन में अंकगणित की तरह हम रेखागणितों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग करते हैं।जितनी भी वस्तुओं का प्रयोग करते हैं उनकी आकृतियों को हम पहचानते हैं तथा इनके तत्वों के संबंधों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हम समझते हैं। आकृतियों का माप एवं परिमाण हमें उनकी ज्यामितीय विशेषताओं को समझने में सहायक सिद्ध होते हैं।हमारी संस्कृति एवं तकनीकी उन्नति में रेखा गणित का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।रेखागणित को हम गणित में सोचने की एक महत्वपूर्ण विधि कह सकते हैं।रेखागणित का अध्ययन तर्क सीखाने का सर्वश्रेष्ठ साधन माना जाता है।इस विषय का अध्ययन हमारी संस्कृति के प्रारम्भ से ही विशेष महत्त्व रखता आया है।
रेखागणित को आवश्यक निष्कर्षों का विज्ञान कहा जाता है।निगमनात्मक तर्क के विकास के लिए रेखागणित का अध्ययन एक उपयुक्त माध्यम है। स्थूल आकृतियों के निरीक्षण द्वारा रेखागणित का आरम्भिक अध्यापन कराया जाना चाहिए।रेखा गणित का अध्यापन एक वस्तुनिष्ठ और उपयोगी अध्ययन है। इससे निष्कर्ष सिद्ध किए जा सकते हैं तथा उनका सत्यापन संभव है।

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रेखागणित वस्तुओं के आकार ,विस्तार और स्थिति के अध्ययन का विज्ञान है।आज के विज्ञान में रेखागणित का उपयोग बढ़ता जा रहा है तथा इसका अध्ययन भौतिक प्रगति के लिए आवश्यक हो गया है।रेखागणित की अनेक शाखाओं का विकास हो चुका है तथा हो रहा है और यूक्लिड(Euclid) की ज्यामिति का महत्त्व एवं उपयोग कम होता जा रहा है।
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(2.)रेखागणित का अर्थ(Meaning of Geometry)-

ज्यामिति का अर्थ गणित की उस शाखा से है जिसमें भूमि का माप लिया जाता है।आज इस तकनीक का प्रयोग जीवन में अनेक क्षेत्रों में होने के कारण हम कह सकते हैं कि ज्यामिति गणित की वह शाखा है जिसमें बिंदु, रेखा ,रेखाखंड तरल एवं ठोसों का अध्ययन उनके आकार ,विस्तार तथा स्थिति के रूप में किया जाता है।इसे ज्यामिति कहते हैं

2.रेखागणित शिक्षण के उद्देश्य( Objectives of teaching Geometry)-

 

(1.)रेखागणित शिक्षण के सामान्य उद्देश्य(General objectives of teaching Geometry)-

 रेखा गणित शिक्षण के सामान्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

(i.)बालकों को बहुत से रेखागणित संबंधी तथ्यों के बारे में ज्ञान कराना।
(iii.)इन तथ्यों का आपस में संबंध स्पष्ट करना।
(iii.)इन तथ्यों का दैनिक जीवन में उपयोग करना।
इसके साथ-साथ ही बालकों को रेखागणित संबंधी शब्दों का ज्ञान भी कराना।इनमें बिंदु(Point) ,वर्ग(Square), वृत्त(Circle), सीधा(Straight), लंबा(Long),पतला(Thin) आदि मुख्य हैं।परंतु अधिक शब्दावली का प्रयोग नहीं किया जाए।इस अवस्था में बालक को क्षेत्रफल(Area), आयतन(Volume) का ज्ञान अंकगणित से होता है परंतु उनका कोण(Angle)का सही ज्ञान उनको नहीं रहता है।उनको सीधी रेखा(Straight Line) का ज्ञान होता है।

(2.)रेखागणित शिक्षण के विशिष्ट उद्देश्य(Specific objectives of teaching Geometry)-

(i.)विद्यार्थियों में रेखागणितीय तथ्यों एवं सिद्धांतों को आधार बनाकर तर्कपूर्ण ढंग से सोचने की आदत डालना।
(ii.)विद्यार्थियों में रचनात्मक कल्पना शक्ति का विकास करना।
(iii.)विद्यार्थियों में यथार्थता,शुद्धता तथा स्पष्टता से मौलिक सिद्धांतों को समझने की क्षमता पैदा करना।
(iv.)विद्यार्थियों को आधारभूत प्रत्ययों, पदों ,निगमनात्मक तर्क के मूल तत्वों, परिभाषाओं और स्वयंसिद्धियों का ज्ञान देना।
(v.)विद्यार्थियों में वस्तुप्रेक्षण शक्ति का विकास करना।
(vi.)विद्यार्थियों को समांतर रेखाओं ,समरूप और समकोण त्रिभुजों ,अप्रत्यक्ष मापनों का ज्ञान देकर रचनात्मक कार्यों में दक्षता पैदा करना।

(vii.)विद्यार्थियों में समतलीय और ठोस पदार्थों के संबंधों को समझाकर उनके धरातलीय तथा अंतरिक्ष संबंधों को समझने की सूझ पैदा करना।
(viii.)विद्यार्थियों में रेखागणित का अन्य विषयों से सह-संबंध को समझने की योग्यता पैदा करना तथा समुच्चय भाषा में संबंधों को हल करने की क्षमता का विकास करना।
(ix.)विद्यार्थियों में दैनिक जीवन से संबंधित ज्यामितीय समस्याओं को हल करने की क्षमता का विकास करना।
(x.)विद्यार्थियों को ज्यामितीय आकृतियों को बनाना तथा नापना,उसके क्षेत्रफलों और आयतनों को ज्ञात करना तथा जीवन में उनका प्रयोग करने की योग्यता पैदा करना।
(xi.)विद्यार्थियों को आकार,आकृति,स्थिति,समता,समानता, अनुरूपता आदि प्रत्ययों का मूर्त ज्ञान देना तथा इनसे संबंधित साध्यों को समझने की योग्यता पैदा करना।
(xii.)विद्यार्थियों में ज्यामितीय तथ्यों,संबंधों निष्कर्षों आदि का विश्लेषण एवं संश्लेषण करने की क्षमता पैदा करना।
(xiii.)विद्यार्थियों को रेखागणितीय आकृतियों को पहचानने की योग्यता तथा उनके लिए निर्धारित संकेतों का प्रयोग करने की योग्यता पैदा करना।

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3.समीक्षा(Review)-

व्यक्ति के सांस्कृतिक ज्ञान हेतु रेखागणित का अध्ययन बड़ा महत्त्वपूर्ण है।इसके द्वारा व्यक्ति की तर्कशक्ति का विकास होता है।रेखागणित के अध्ययन से मनुष्य की बुद्धि तीव्र तथा तर्कशक्ति का विकास होता है।बालक में खोज करने की प्रवृत्ति पैदा होती है।वह वस्तुओं की आवश्यक बनावट पर ध्यान देता है। साधारण रेखाओं के द्वारा वह भिन्न-भिन्न सुन्दर नमूने तैयार करता है।
परंतु हमारे स्कूलों में रेखागणित के अध्यापन की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है।बालक साध्यों (Theorms) तथा अभ्यास (Exercises) के हलों को बिना समझे ही कण्ठस्थ कर लेते हैं।इसके साथ ही साथ बनावट या रचना(Construction) संबंधी प्रश्नों को भी बालक रट लेते हैं और परीक्षा में लिख आते हैं।समस्या के हल करने में किसी प्रकार का संश्लेषण(Synthesis) तथा विश्लेषण(Analysis) क्रिया का प्रयोग नहीं करते।इस तरह से रेखा गणित का मुख्य उद्देश्य सफल नहीं हो पाता।
एक योग्य और उत्साहित शिक्षक के लिए ज्यामिति मात्र एक महत्वपूर्ण विषय ही नहीं है,अपितु उसके लिए यह एक मोहक और आकर्षक वस्तु भी है।बालक एक ऐसी दुनिया में रहते हैं और विकसित होते हैं जो कि ज्यामितीय स्वरूपों से भरी हुई है।वे पहियों और सिक्के वस्तुओं में वृत्त, घड़ी की सुइयों में कोण,कमरे की दीवारों के मध्य समकोण, दीवारों, किवाड़ों में आयत, पेड़ के तनों और कोलतार के पात्रों इत्यादि में बेलन, नींबू,सन्तरों,गेंद इत्यादि में गोला ,पतंगों में बहुभुज आदि देखते हैं। कुछ वस्तुएं समतल, सुडौल तो दूसरी बेडौल और विषम तल होती हैं। आइसक्रीम में खाद्य शंकु के लिए तरसते हैं। सभी वस्तुएं कोई न कोई ज्यामितीय आकृति लिए होती है। भौतिक वस्तु कोई भी हो, उसके आकार में ज्यामिति अंतर्भावित है।ये अभिरचनाएं इतनी सामान्य लगती हैं कि इनकी विशिष्टताओं की ओर ध्यान नहीं जाता।प्राय:जब बालकों के ध्यान में उनको लाया जाता है तो इनकी ज्यामितीय विशिष्टताओं का बोध नहीं हो पाता।
किंतु स्थूल प्रकृति के कारण गणित शिक्षक ज्यामिति के शिक्षण को रुचिकर और प्रभावी बना सकता है।प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तरों में विद्यार्थी आयु की दृष्टि से पूर्व किशोरावस्था और किशोरावस्था के प्राथमिक काल में होते हैं।वह स्थूल विषयवस्तु को आत्मसात करने की अवस्था है। इसमें तार्किक चिंतन के लिए पृष्ठभूमि तैयार होती है। इसलिए ज्यामिति को जो कि तार्किक चिंतन को पैना करती है ,इस स्तर पर स्थूल रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। दूसरे इसके उपरांत स्तर से इसकी सामग्री को सूक्ष्म रूप दिया जाना चाहिए।
(2.)ज्यामिति का आज जो स्वरूप है उसे विद्यार्थी हल करने से भय खाते हैं।यदि ज्यामिति पर शुरू से ही इसकी कॉन्सेप्ट तथा बेसिक बातों को समझकर हल किया जाए तो विद्यार्थियों के लिए यह विषय आसान हो जाता है। ज्यामिति की बेसिक बातें न समझने तथा केवल रटने के कारण यह विषय हमारे लिए कठिन हो जाता है।इसलिए ज्यामिति को समझकर इसके सिद्धांतों को याद किया जाए तो यह विषय हमारे लिए सरल होता जाएगा।ज्यामिति के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखकर इसे हल किया जाए। जहां भी कठिनाई आती है उसको अपने मित्रों से ,शिक्षकों से मिलकर हल करें ,धीरे-धीरे यह विषय हमारे लिए रुचिकर हो जाएगा।

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