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Where to Use Doubt and Devotion?

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1.सन्देह और श्रद्धा का उपयोग कहां करें? (Where to Use Doubt and Devotion?),गणित के छात्र-छात्राएं सन्देह और श्रद्धा का उपयोग कैसे करें? (How Do Mathematics Students Use Doubt and Reverence?):

  • सन्देह और श्रद्धा का उपयोग कहां करें? (Where to Use Doubt and Devotion?) अर्थात् आधुनिक शिक्षा पद्धति में अध्ययन करने अथवा गणित का अध्ययन करने में सन्देह व श्रद्धा का उपयोग है या नहीं यदि है तो इन दोनों को कैसे उपयोग में लिया जा सकता है? सन्देह और विश्वास बुद्धि का विषय है और हृदय श्रद्धा करता है।श्रद्धा के विषय में फुटकर रूप में पूर्व लेखों में बताया जा चुका है तथा इस लेख का मूल विषय सन्देह के बारे में रखेंगे।श्रद्धा के विषय में उतना ही वर्णन किया जाएगा जितना सन्देह लिए आवश्यक है।
  • सन्देह,संशय और शंका समान अर्थ रखने वाले शब्द है,इनमें मूलभूत अंतर नहीं है।श्रद्धा व संशय को समझने के लिए श्रीमद्भगवदगीता के निम्न दो श्लोकों को ठीक से समझना होगा और समझकर उसके आशय पर विचार विमर्श करना होगा।गीता के चतुर्थ अध्याय के ये दो श्लोक निम्न हैंः
  • “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
    ज्ञानं लब्धवा परां शांतिमचिरेणाधिगच्छति।।”
  • अर्थात् श्रद्धा से युक्त,गुरुजनों की सेवा उपासना में लगा हुआ जितेंद्रिय व्यक्ति ज्ञान (तत्त्व ज्ञान) को प्राप्त करता है,तत्त्वज्ञान को प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शांति (मुक्ति) को प्राप्त करता है।इसका अगला श्लोक हैः
  • “अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
    नायं लोकोअस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।”
  • अर्थात् गुरुजनों से बतलाए हुए विषय को न समझने वाला,गुरुवाक्य तथा शास्त्रों में श्रद्धा से शून्य एवं प्रत्येक वस्तु में सन्देह रखने वाला मनुष्य (साधक) नष्ट हो जाता है (अपने वांछित अर्थ या साधन से च्युत हो जाता है) कारण कि संदिग्धचित्त पुरुष के लिए न मानवलोक है न परलोक ही है और न विषय सुख ही है अर्थात् संशयात्मा मनुष्य यहां,वहां अथवा कहीं भी अपने प्राप्त करने योग्य पदार्थ को नहीं पा सकता है।
  • इन दोनों श्लोकों के अर्थ के अनुसार श्रद्धा रखना और संशय न करना बताया गया है।परंतु श्रद्धा व संशय के इस अर्थ पर विचार करते हुए यह चिंतन-मनन करने की आवश्यकता है कि इसे किस विषय के संदर्भ में कहा गया है? क्योंकि संशय के बिना तो वैज्ञानिक प्रगति किया जाना संभव ही नहीं है? वस्तुतः गणित,विज्ञान तथा भौतिक विषयों के ज्ञान के लिए संशय आवश्यक है और आध्यात्मिक ज्ञान के लिए श्रद्धा आवश्यक है।आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए संशय रखना गलत हो जाएगा और गणित,विज्ञान जैसे विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए श्रद्धा का उपयोग करना गलत हो जाएगा।
  • तात्पर्य यह कि छात्र-छात्राओं को अपना विकास,उत्थान और प्रगति करने के लिए श्रद्धा और संशय दोनों रखना आवश्यक है।यदि आप केवल संशय ही रखेंगे तो भौतिक उन्नति तो हो जाएगी परंतु आध्यात्मिक उन्नति के बिना सुख,शान्ति का अनुभव नहीं करेंगे और जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं को प्राप्त करके भी तनावग्रस्त रहेंगे।
  • इसी प्रकार श्रद्धा के द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करके सुख-शान्ति तो प्राप्त कर लेंगे परन्तु भौतिक सुख-सुविधाओं से वंचित रहेंगे।जीवन में प्रगति के लिए दोनों पक्षों भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति की आवश्यकता है।
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2.सन्देह से क्या तात्पर्य है? (What Do You Mean by Doubt?):

  • सन्देह और श्रद्धा दो विपरीत दिशाएं,विपरीत छोर लगते हैं।आधुनिक युग विज्ञान,तकनीकी और अर्थ प्रधान युग है।शिक्षा संस्थानों में भी गणित,भौतिक विज्ञान,भूगोल इत्यादि विषयों का ही अध्ययन कराया जाता है इसलिए सन्देह (संशय) छात्र-छात्राओं के लिए उपयोगी है क्योंकि गणित,विज्ञान इत्यादि विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए भौतिक पदार्थों,तत्त्वों का विश्लेषण करना होता है और संशय (सन्देह) के बिना खोज,अन्वेषण,आविष्कार नहीं किए जा सकते हैं।
  • गणित और विज्ञान में सही तथ्यों,रहस्यों का पता निरीक्षण,परीक्षण,तुलना इत्यादि के द्वारा ही पता चलता है।जिसे गणितज्ञ और वैज्ञानिक बनना है,भौतिक विषयों का ज्ञान प्राप्त करना है तो उसे संशय (सन्देह) की भावदशा प्राप्त करनी ही होगी तभी वे भौतिक विषयों के क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं।वस्तुतः आधुनिक युग में गणित,विज्ञान और तकनीकी विषयों की प्रमुखता है इसलिए छात्र-छात्राओं और लोगों में संदेह करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है क्योंकि गणित व विज्ञान जैसे विषयों की मान्यता है कि बिना परीक्षण,निरीक्षण,तुलना इत्यादि के कोई भी सिद्धान्त,नियम,प्रमेय को स्वीकार मत करो।
  • पहले किसी नियम,सिद्धांत की खोज करो फिर उसके पक्ष में प्रमाण जुटाओ और आवश्यक हो तो उसे प्रयोगशाला में सत्यापित करो।सत्यापित होने पर उसे स्वीकार करो,यहां तक कि कई बार सत्य सिद्ध होने पर भी उसे परम सत्य नहीं माना जाता है बल्कि उसके प्रति संशय बना रहता है।
  • जैसे पहले तत्त्व का मूल कण अणु,अणु के बाद परमाणु,परमाणु के बाद इलेक्ट्राॅन,प्रोटान,न्यूट्रान और अब तो ओर भी मूल कणों की खोज कर ली गई है।अब यदि अणु की खोज करने के बाद ही इस सिद्धान्त को परम सत्य मान लिया जाता तो आगे खोज नहीं की जा सकती थी।

3.गणित व वैज्ञानिक प्रगति के लिए संशय आवश्यक है (Skepticism is Essential for Mathematics and Scientific Progress):

  • आधुनिक युग में छात्र-छात्राओं को विज्ञान और तकनीक (Technology) का ज्ञान प्राप्त करने के लिए बहुत जोर दिया जाता है।अतः छात्र-छात्राएं बचपन से ही संशयग्रस्त और संदेहशील प्रकृति के बनते जा रहे हैं।फलतः श्रद्धा,आस्था से बालक-बालिकाओं का कोई संबंध नहीं रहा है और न श्रद्धा,आस्था रखने पर माता-पिता,अभिभावक,शिक्षक उनको प्रेरित करते हैं।यह ठीक बात है कि गणित और विज्ञान,तकनीकी इत्यादि भौतिक विषयों के ज्ञान के लिए श्रद्धा,आस्था का कोई काम नहीं है।यदि हम गणित और विज्ञान जैसे विषयों में श्रद्धा व आस्था का उपयोग करना चाहेंगे तो यह गलत हो जाएगा क्योंकि श्रद्धा के लिए किसी प्रमाण की,परीक्षण की,प्रयोगशाला में सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती है।
  • वस्तुतः आज छात्र-छात्राएं भौतिक उन्नति करते-करते संदेहशील तो होते जा रहे हैं परन्तु आत्मिक प्रगति के लिए श्रद्धा,आस्था का अभाव दिखाई देता है।इसलिए वे परेशान,चिंतित,उद्विग्न तथा विभिन्न मानसिक विकारों से ग्रस्त दिखाई देते हैं।
  • आज स्टेम (STEM) विज्ञान (Science),तकनीकी (Technology),इंजीनियरिंग (Engineering),गणित (Mathematics) की उपलब्धियों से इतने प्रभावित,आकर्षित और चकाचौंध है कि वे भौतिक सुख-सुविधाओं का अधिक से अधिक भोग करना ही अपने जीवन का लक्ष्य मानते हैं।सच्चाई,ईमानदारी,सुख,शांति,तप,साधना,उपासना,आस्था,श्रद्धा जैसे नैतिक मूल्यों की खिल्ली उड़ाते हैं तथा जो लोग इन गुणों को धारण करते हैं उन्हें पुरातनपंथी,आउट ऑफ डेटेड,दकियानूसी,अंधविश्वासी मानते हैं तथा उन्हें आधुनिक युग के अनुकूल व प्रगतिशील विचारों वाले नहीं स्वीकार करते हैं।
  • जब छात्र-छात्राओं को शिक्षा ही,संदेहशील होने की,संशय करने की दी जा रही है तो इससे उनके भौतिक पक्ष की उन्नति तो हो रही है और होनी भी चाहिए परंतु उनकी आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो रही है।छात्र-छात्राएं तथा लोग आध्यात्मिकता की ओर से मुँह फेरकर भौतिकता की ओर बढ़ते जा रहे हैं।इसलिए हमारी भावदशा श्रद्धा रहित और सन्देहशील होती जा रही है।
  • गणित में एक निष्कर्ष निकाला गया {2^{2}}^{n}+1 एक अविभाज्य संख्या है।यहाँ n एक प्राकृत संख्या है।इस सिद्धांत को सत्य मान लिया गया परंतु कुछ गणितज्ञों को इसके सही होने पर सन्देह बना रहा।काफी समय बाद Leonhard Euler ने यह सिद्ध किया कि {2^{2}}^{5}+1 के लिए यह सिद्धांत सत्य नहीं है।इस विद्वान गणितज्ञ ने सिद्ध किया कि {2^{2}}^{5}+1=4294967297 एक अविभाज्य संख्या नहीं है क्योंकि 4294967297 को 641 से विभाजित किया जा सकता है।इसी प्रकार
    x^{1}-1=x-1
    x^{2}-1=(x-1)(x+1)
    x^{3}-1=(x-1)(x^{2}+x+1)
    x^{4}-1=(x-1)(x+1)(x^{2}+1)
    x^{5}-1=(x-1)(x^{4}+x^{3}+x^{2}+x+1)
    ……………………………………
  • उपर्युक्त उदाहरणों के द्वारा यह निष्कर्ष निकाला गया कि x^{n}-1 (n एक प्राकृतिक संख्या है) को ऐसे गुणनखंडों में प्रकट किया जा सकता है जिसमें प्रत्येक राशि का गुणांक 1 (एक) से अधिक नहीं होगा (निरपेक्ष मान से)।उपर्युक्त गणितीय सिद्धांत सर्वमान्य था किंतु रूस के गणितज्ञ वी. इवानोव ने 1941 ईस्वी में सिद्ध किया कि यदि n=105 हो तो x^{105}-1 के विस्तार में एक राशि का गुणांक एक से अधिक है।
    x^{105}-1\Rightarrow x^{48}+x^{47}+x^{46}-x^{43}-x^{42}-x^{41}-x^{40}-x^{39}+x^{36}+x^{35}+x^{34}+x^{33}+x^{32}+x^{31}-x^{28}-x^{26}-x^{24}-x^{22}+x^{17}+x^{16}+x^{15}+x^{14}+x^{12}-x^{9}-x^{8}-2x^{7}-x^{6}-x^{5}+x^{2}+x+1

4.संदेहशील होने के बारे में विमर्श (Discussion About Being Suspicious):

  • गीता के उपर्युक्त श्लोक में कहा गया है कि संशय से ग्रस्त व्यक्ति नष्ट हो जाता है।यह सही भी है कि श्रद्धा के बिना केवल संशय से भौतिक उन्नति करके व्यक्ति विनाश को प्राप्त होता है।प्राचीन काल में लोगों ने अध्यात्मवाद को इतना पकड़ा की इसकी पराकाष्ठा तक (अद्वैत वेदांत) तक पहुंच गए और भौतिक उन्नति,राष्ट्र की सुरक्षा के लिए शक्ति के संचय की बिल्कुल उपेक्षा कर दी फलतः देश को सदियों तक गुलाम रहना पड़ा और जाहिर सी बात है की गुलामी में रहकर अच्छे कर्म नहीं किए जा सकते हैं अब वह गुलामी मन की हो या अन्य किसी की।
  • इसी प्रकार आधुनिक युग में अधिकांश छात्र-छात्राएं अच्छा सा अच्छा जाॅब प्राप्त करने,धन-कमाने,सुख-सुविधाएं जुटाने,गणित और विज्ञान जैसे विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं,भागदौड़ कर रहे हैं परंतु आध्यात्मिक प्रगति की ओर उनका कोई ध्यान नहीं है।अतः लोगों और अधिकांश छात्र-छात्राओं का नैतिक पतन होता जा रहा है जैसे कामुक साहित्य पढ़ना,अय्याशी करना,मदिरा और नशीली दवाओं का सेवन करना,विद्यार्थी जीवन में भी सैक्स का भरपूर आनन्द लेना इत्यादि।
  • यानि आधुनिक अर्थात् विज्ञान के इस युग में प्राचीन काल (गुलामी काल) से स्थिति विपरीत हो गई है।छात्र-छात्राओं को कोई (माता-पिता,शिक्षक इत्यादि) यह बताने वाला ही नहीं है कि कहां संशय करना चाहिए और किस मामले में श्रद्धा रखनी चाहिए? कहाँ संशय का उपयोग किया जाए और कहाँ श्रद्धा का उपयोग किया जाए? जाहिर सी बात है कि जब उन्हें यह बात पता ही नहीं है तो पालन भी कैसे किया जाएगा? या तो गणित और विज्ञान जैसे विषयों में श्रद्धा रखेंगे और आत्मा-परमात्मा जैसे विषय में संशय रखेंगे तो गलत हो जाएगा।भौतिक विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए शंकाओं (doubts) को स्पष्ट करना आवश्यक है अतः श्रद्धा रखना गलत होगा।इसी प्रकार आत्मा-परमात्मा जैसे आध्यात्मिक विषयों में तथ्य,प्रमाण मांगे जाएं अर्थात् संशय किया जाए,श्रद्धा नही रखी जाए तो गलत होगा।श्रद्धा के बारे में पढ़ने के लिए आगामी लेख पढ़े।

5.संशयशील का दृष्टान्त (Parable of Skepticism):

  • एक अभिभावक अपने बच्चे को गणित के ट्यूशन कराने हेतु कोचिंग सेंटर गए।शिक्षक के पास जाकर बोले कि गणित पढ़ाने की फीस कितनी लोगे?शिक्षक ने कहा कि पूरे कोर्स की फीस तीन हजार है।अभिभावक बोले फीस एक साथ लोगे या किश्तों में।गणित शिक्षक ने कहा कि एक बार में ही देनी है।अभिभावक बोले अगर दो किश्तों में दे दें तो।शिक्षक बोले दो किश्तों में दे देना।
  • तभी छात्र बोला गणित ठीक ढंग से पढ़ा दोगे।शिक्षक ने कहा कि अच्छी तरह पढ़ाएंगे।तब छात्र बोला कि सवाल समझ में नहीं आया तो।शिक्षक ने कहा कि दुबारा बता देंगे अथवा दूसरे तरीके से बता देंगे।छात्र बोला कि दुबारा बताने पर भी सवाल समझ में नहीं आया तो।शिक्षक ने कहा कि जो-जो सवाल समझ में आ जाए उन्हें हल कर लेना।
  • गणित की पुनरावृत्ति करने पर कठिन सवालों को पूर्ण एकाग्रता के साथ हल करना।छात्र बोला गुरूजी मुझसे एकाग्रता तो सधती ही नहीं है फिर गणित को हल कैसे कर पाऊंगा? गणित अध्यापक बोले पुनरावृत्ति करने के साथ-साथ घर पर भी गणित का अभ्यास करना।अभ्यास करते-करते एकाग्रता सधने लगेगी।
  • छात्र बोला घर पर किस समय पढ़ना ठीक रहेगा?छात्र गणित शिक्षक की हर बात पर तर्क-वितर्क,बहस करता रहा,सन्देह करता रहा।तब गणित शिक्षक ने समझाया कि केवल शुष्क तर्क-वितर्क करने,बहस करने,हर बात पर संशय करके आप मेरा और अपना समय बर्बाद कर रहे हो।
  • तर्क-वितर्कयुक्त बुद्धि,संशयशील बुद्धि की जड़ में श्रद्धा,विश्वास भी होना चाहिए।श्रद्धाहीन बुद्धि के बल पर तुम गणित और विज्ञान का ज्ञान भले ही प्राप्त कर लो तथा श्रद्धा के बिना कितनी तरक्की,पद,प्रतिष्ठा,सम्मान प्राप्त कर लो परंतु सुख-सन्तोष और शांति प्राप्त नहीं कर सकते हो।यह कहकर गणित शिक्षक उन संशयग्रस्त अभिभावक व छात्र से वाद-विवाद न करके वहां से हटकर अंदर चले गए।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में सन्देह और श्रद्धा का उपयोग कहां करें? (Where to Use Doubt and Devotion?),गणित के छात्र-छात्राएं सन्देह और श्रद्धा का उपयोग कैसे करें? (How Do Mathematics Students Use Doubt and Reverence?) के बारे में बताया गया है।

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6.सवाल के बारे में भविष्यवाणी (हास्य-व्यंग्य) (Preduction About Question) (Humour-Satire):

  • सवालःगणित विषय के बारे में वह कौन सी बात है जो पहले भी विद्यार्थी कहते थे,आज भी कहते हैं और भविष्य में भी कहते रहेंगे।
  • जवाबःबस यह एक सवाल ओर बता दो फिर प्रश्नावली के शेष सवालों को मैं स्वयं ही हल कर लूंगा।

7.सन्देह और श्रद्धा का उपयोग कहां करें? (Frequently Asked Questions Related to Where to Use Doubt and Devotion?),गणित के छात्र-छात्राएं सन्देह और श्रद्धा का उपयोग कैसे करें? (How Do Mathematics Students Use Doubt and Reverence?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.सन्देह की सीमाएं क्या हैं? (What are the Limits of Doubt?):

उत्तर:बात-बात पर,हर चीज पर संदेह करना घातक है।जैसे यदि मार्ग में पड़ने वाली दीवार,मोटरसाइकिल,वाहन,हाथी,घोड़ा इत्यादि के होने पर संदेह करेंगे और उनके अस्तित्व को नकारेंगे तो उनसे टकराएंगे।इसी प्रकार आत्मा-परमात्मा इत्यादि के होने पर संदेह करने पर हमारी स्थिति हास्यास्पद हो जाएगी क्योंकि तब हम किसी भी गलत व सही कार्य के लिए किसी को जिम्मेदार ठहरा ही नहीं सकते हैं।यदि मनुष्य की संकल्पशक्ति को नकारेंगे तो उसके द्वारा किए गए पापों और अपराधों के लिए उसे उत्तरदायी ठहराया ही नहीं जा सकता है।आत्मा-परमात्मा को तर्क,तथ्यों तथा प्रमाणों के द्वारा सिद्ध किया ही नहीं जा सकता है वे तो अनुभूति के विषय हैं।

प्रश्न:2,संदेह की पुष्टि के लिए गणित गणितीय पद्धति को किसने अपनाया? (Who Adopted the Mathematical Method to Confirm Doubts?):

उत्तर:गणित बुद्धि का खेल है अतः गणितज्ञ रेने देकार्त ने जो गणित को अत्यधिक पसंद करते थे,अपनी दार्शनिक पद्धति का सहारा लेते हैं और अनुभव की उपेक्षा करते हैं।गणित के निष्कर्षों में एक विशेषता होती है कि तर्क-पूर्ण,सन्देह-रहित,सर्वमान्य और सर्वकालिक सत्य होते हैं जैसे 7+5 =12 ऐसा ही सत्य है।ठीक इसी प्रकार के अकाट्य सत्य दर्शनशास्त्र में उपलब्ध कराने के लिए देकार्त अपनी सन्देह की पुष्टि (दार्शनिक प्रणाली) के लिए गणित का सहारा लेते हैं।

प्रश्न:3.गणित तथा विज्ञान में संशय के द्वारा कैसे ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं? (How Can One Acquire Knowledge Through Doubt in Mathematics and Science?):

उत्तर:अहंकाररहित होकर यदि गणित और विज्ञान जैसे विषयों में सन्देह के द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जाए तो छात्र-छात्राएं एवं व्यक्ति शीघ्र ही सत्य का ज्ञान प्राप्त कर सकता है।अतः हमें आचरण में ईमानदारी,सदाचार,विवेक,सद्बुद्धि,प्रज्ञा,विनम्रता,सरलता,धैर्य,साहस,शांति,संतोष,श्रद्धा,आस्था,धर्म इत्यादि को धारण करना चाहिए।विज्ञान तथा गणित की चकाचौंध में इन गुणों को नहीं भूलना चाहिए।भौतिक उन्नति के साथ-साथ आत्मिक उन्नति के प्रयास करना चाहिए तभी हम सही मायने में सुख-शांति पूर्वक जीवन जी सकते हैं।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा सन्देह और श्रद्धा का उपयोग कहां करें? (Where to Use Doubt and Devotion?),गणित के छात्र-छात्राएं सन्देह और श्रद्धा का उपयोग कैसे करें? (How Do Mathematics Students Use Doubt and Reverence?) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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