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Congruence and Similarity

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1.सर्वांगसमता तथा समरूपता (Congruence and Similarity),समरूपता तथा सर्वांगसमता ( Similarity and Congruence ):

  • सर्वांगसमता तथा समरूपता (Congruence and Similarity) से संबंधित अनेक आकृतियां दैनिक जीवन में देखने को मिलती है।इन ज्यामितीय आकृतियों की तुलना करने या वर्गीकरण करने की आवश्यकता पड़ती है।जैसे एक आकृति दूसरे जैसी है या एक दूसरे से छोटी है या बड़ी है अथवा एक दूसरे की सर्वसम है या नहीं।यह जानने के लिए ही हम सर्वांगसमता और समरूपता की संकल्पना का उपयोग करते हैं।
  • सर्वांगसमता तथा समरूपता (Congruence and Similarity):ज्यामिति के सभी सिद्धांतों में सर्वांगसमता और समरूपता के सिद्धांत ही सबसे महत्वपूर्ण है।हमारे सभी क्रियाकलापों के वे आधार हैं।
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(1.)सर्वांगसमता (Congruence):

  • स्वयंसिद्ध (Axiom):जो आकृतियां एक दूसरे के संपाती हो जाए वे परस्पर हर प्रकार से बराबर होती हैं।
  • इस स्वयंसिद्ध के अनुसार हम किसी रेखाखंड,कोण अथवा किसी भी आकृति को उसके आकार अथवा विस्तार में बिना कोई परिवर्तन किए दूसरे रेखाखंड,कोण अथवा आकृति पर रखें और यदि एक आकृति दूसरी आकृति को पूर्णरूप से ठीक-ठीक ढक ले तो वे आकृतियां परस्पर बराबर होती हैं।एक आकृति को दूसरी आकृति से संपात कराने की इस क्रिया को अध्यारोपण (Super Position) कहते हैं।ये आकृतियां (अथवा क्षेत्र) सर्वांगसम आकृतियां आपस में हर प्रकार से बराबर होती हैं।सर्वांगसम आकृतियों में जब हम अध्यारोपण करते हैं तो एक की भुजाएं तथा कोण,दूसरे की जिन भुजाओं तथा कोणों के संपाती हो जाते हैं,एक दूसरे के संगत (Corresponding) कहलाते हैं।इन्हें क्रमश: संगत भुजाएं तथा संगत कोण कहते हैं।
  • एक कागज लें और उसे बीच में से मोड़ दें।अब मुडे हुए हिस्से को हाथ से दबा कर कागज से कोई भी आकृति काट लें।आपको दो आकृतियां प्राप्त होती है जो एक-दूसरे के ऊपर रखने पर आपस में पूरी तरह मेल खाती हैं।दो समतल आकृतियों को तब सर्वांगसम कहा जाता है जब एक दूसरे के ऊपर रखने पर वे एक-दूसरे को पूरी तरह ढक लेती हैं। ताश की गड्डी का उदाहरण लें।ताश के सभी पत्ते सर्वांगसम है क्योंकि वे एक दूसरे के ऊपर एकदम ठीक बैठ जाते हैं।लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि किन्हीं दो आकृतियों की सर्वांगसमता ज्ञात करने के लिए उन्हें एक दूसरे के ऊपर रखा जाए।दोनों आकृतियों के तत्वों के बीच एकैकी संगति स्थापित करके और फिर उनके संगत तत्वों के मापन द्वारा भी सर्वांगसमता सिद्ध की जा सकती है।अगर संगत भुजाओं एवं संगत कोणों की माप बराबर हैं तो ऐसी अवस्था में दोनों त्रिभुजों को सर्वांगसम करार दिया जाता है।अतः दो त्रिभुजों को तब सर्वांगसम कहा जाता है जब उनके शीर्षों को दी गई संगति के लिए उनकी संगत भुजाओं और संगत कोण सर्वांगसम होते हैं।भुजाओं और कोणों की सर्वांगसमता इन परिभाषाओं द्वारा सिद्ध की जाती है कि रेखाखंड तब सर्वांगसम होंगे जब उनकी लंबाई बराबर होगी तथा कोण तब सर्वांगसम होंगे जब दोनों एक समान माप के होंगे।
  • यह एक रोचक तथ्य है कि दो त्रिभुजों की सर्वांगसमता सिद्ध करने के लिए छह की जगह त्रिभुजों के बस तीन विशिष्ट संगत तत्वों की सर्वांगसमता स्थापित करना ही काफी है।लेकिन इसके लिए दो शर्तें या प्रतिबंध भी हैं।एक तो यह कि तीनों तत्वों में कम-से-कम एक भुजा जरूर समाविष्ट होनी चाहिए और दूसरे अगर उन तत्वों में केवल एक ही कोण हो तो वह दो भुजाओं के बीच वाला कोण होना चाहिए।किसी चतुर्भुज के लिए संगत तत्वों के लिए पांच (2×4-3) शर्तों तथा पंचभुज के लिए सात (2×5-3) शर्तों का पालन होना जरूरी है।व्यापक रूप से,n भुजाओं वाले किसी भी बहुभुज के लिए कुल प्रतिबंधों की संख्या 2n-3 होगी।दो वृत्त तब सर्वांगसम कहे जाएंगे जब उनके अर्धव्यास बराबर होंगे।उसी तरह बराबर भुजाओं वाले वर्ग सर्वांगसम होंगे।
  • अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि ‘क्या सर्वांगसमता की वास्तविक जीवन में कोई सार्थकता है?’ इसका उत्तर है ‘हां’।दरअसल हमारा जीवन वस्तुओं की सर्वांगसमता के बारे में हमारे ठोस हालांकि अन्त:प्रज्ञा प्रेरित विश्वास पर ही टिका हुआ है।हमारे रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजें:कार,रेडियो,दूरदर्शन सेट,घड़ियां,खिलौने आदि का निर्माण सर्वांगसमता पर ही निर्भर करता है।मसलन किसी घड़ी के निर्माण में पहले उसके विभिन्न हिस्सों के ‘डाई’ बनते हैं।डाई द्वारा बना कोई भी हिस्सा उसी किस्म के दूसरे हिस्सों से हर मायने में हूबहू मेल खाता है। किसी मशीन के एक पुर्जे या हिस्से को दूसरे पुर्जे या हिस्से से बदला जा सकता है क्योंकि हम जानते हैं कि दोनों हिस्से या पुर्जे एक जैसे ही यानी सर्वांगसम हैं।किसी पुस्तक के पन्ने सर्वांगसम होते हैं अतः इन्हें इकट्ठा कर पुस्तक पर आसानी से जिल्द चढ़ाई जा सकती है।अगर हम लंबाई मापना चाहते हैं तो हम किसी भी पैमाने का जो उपलब्ध हो प्रयोग कर सकते हैं क्योंकि हमें मालूम है कि सभी पैमाने एक दूसरे के सर्वांगसम बनाए जाते हैं।
  • इस प्रकार सर्वांगसम का अर्थ है ‘सभी प्रकार से बराबर’ अर्थात् वे आकृतियां जिनके समान आकार और समान माप हैं।

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(2.)समरूपता (Similarity):

  • दो समरूप आकृतियों के आकार समान होते हैं परंतु इनके आमाप (Size) समान होने आवश्यक नहीं है।अतः सभी वृत्त समरूप होते हैं।सभी वृत्तों की तरह सभी वर्ग तथा सभी समबाहु त्रिभुज आपस में समरूप हैं।
  • इसका अर्थ हुआ कि सभी सर्वांगसम आकृतियाँ समरूप होती है परंतु सभी समरूप आकृतियों का सर्वांगसम होना आवश्यक नहीं है।इसी प्रकार ताजमहल के मॉडल भिन्न-भिन्न आमापों (Sizes) के हैं तो वे सभी समरूप है।
  • जब कोई फोटोग्राफर एक ही नेगेटिव से विभिन्न मापों के फोटो प्रिंट निकालती है तो वे फोटो स्टैंप साइज,पासपोर्ट साइज एवं पोस्टकार्ड साइज फोटो (या चित्रों) की होती हैं।वे सभी सामान्य रूप से एक छोटे आमाप (साइज) की फिल्म मान लीजिए जो 35 mm आमाप वाली फिल्म हैं,पर फोटो खींचती हैं और फिर उसे एक बड़े आमाप जैसे 45 mm (या 55mm) आमाप वाली फोटो के रूप में आवर्धित करती है।ये सभी समरुप होती है।
  • यदि आप विभिन्न आमापों के दो चित्रों में संगत रेखाखंडों के किसी भी युग्म के बीच बने झुकावों (अथवा कोणों) को लें तो आप देखेंगे कि ये जो झुकाव (या कोण) सदैव बराबर होंगे।यही दो आकृतियों तथा विशेषकर दो बहुभुजों की समरूपता का सार है।अतः भुजाओं की समान संख्या वाले दो बहुभुज समरूप होते हैं यदि (i)उनके संगत कोण बराबर हो तथा (ii)इनकी संगत भुजाएं एक ही अनुपात में (अर्थात् समानुपाती) हों।
  • ऐसी समान आकृतियां प्रकृति में बहुतायत में देखने को मिलती है।इसका सबसे अच्छा दृष्टांत तो प्रकृति में पाए जाने वाले क्रिस्टलों द्वारा मिलता है।किसी भी क्रिस्टलीय पदार्थ के सभी क्रिस्टल स्वरूप में एक जैसे ही होते हैं हालांकि उनके आकार में भिन्नता होती है।जब कोई क्रिस्टल छोटे-छोटे क्रिस्टल में टूटता है तो वे सभी टुकड़े एक समान ही होते हैं।भिन्न आकार के साबुन के बुलबुले;एक ही प्रकार के छोटे और बड़े पुष्प,मधुमक्खी के छत्तों के षटकोणीय खाने,तितलियों के पंखों के खूबसूरत डिजाइन आदि प्रकृति में पाए जाने वाले समान आकृतियों के सामान्य दृष्टांत हैं।
  • साबुन के बुलबुले हमेशा गोलाकार आकृति के क्यों होते हैं?पानी की बूंदे हमेशा गोलाकार क्यों होती है?ज्यामिति से क्या इसका कोई सरोकार है?हां,यकीनन।प्रकृति न्यूनतम पृष्ठ क्षेत्रफल को ही हर अवस्था में ग्रहण करना चाहती है ताकि न्यूनतम पृष्ठ ऊर्जा की अवस्था प्राप्त हो सके।गोला एक ऐसी ठोस आकृति का द्योतक है जिसका पृष्ठ क्षेत्रफल उसी आयतन की ही किसी ओर ठोस आकृति की अपेक्षा सबसे कम होता है।अतः साबुन के बुलबुले या जल की बूंदे हमेशा गोलाकार आकृति को ही प्राप्त होती है।इसी वजह के चलते ग्रह भी गोलाकार होते हैं।

(3.)सर्वांगसमता तथा समरूपता का निष्कर्ष (Conclusion of Congruence and Similarity):

  • गणित मानव मस्तिष्क की उपज है जिसका उपयोग करने से हमारा जीवन सुखद,सहज तथा सरल होता है।गणित विषय को अमूर्त विषय समझा जाता है।परंतु गणित मानव मस्तिष्क के मूल में पैठ कर ही मुखर रूप से उनकी अभिव्यक्ति करता है। वास्तविक संसार अवधारणाओं की दुनिया में बदल जाता है और गणित वास्तविक जगत को नियमित करने वाली मूर्त धारणाओं के पीछे काम करने वाले नियमों का अध्ययन करता है।ज्यादातर दैनिक जीवन का गणित इन मूल धारणाओं का ही सार है और इसलिए इसे आसानी से समझा-बूझा जा सकता है।हालांकि अधिकांश धारणाएं अन्त:प्रज्ञा द्वारा ही हम पर प्रगट होती हैं फिर भी शुद्ध एवं संक्षेप रूप में उन धारणाओं को व्यक्त करने के लिए उचित शब्दावली एवं कुछ नियमों और प्रतीकों की आवश्यकता पड़ती है।अतः गणित की अपनी अलग ही भाषा एवं लिपि होती है जिसे पहले जानना-समझना जरूरी होता है।
  • शायद यही कारण है कि दैनिक जीवन से असंबंधित मानकर इसे समझने की दृष्टि से कठिन माना जाता है जबकि हकीकत में यह वास्तविक जीवन के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ ही नहीं है बल्कि उसी से इसकी उत्पत्ति भी हुई है।यह विडंबना ही है कि ज्यादातर लोग गणित के प्रति विमुखता दिखाकर उससे दूर भागते हैं जबकि वस्तुस्थिति यह है कि जीवन तथा ज्ञान के हर क्षेत्र में इसकी उपयोगिता है।यह केवल संयोग नहीं है कि आर्किमिडीज,न्यूटन,गाउस और लैगरांज जैसे महान् वैज्ञानिकों ने विज्ञान के साथ-साथ गणित में भी अपना महान् योगदान दिया है।
  • उपर्युक्त विवरण में सर्वांगसमता तथा समरूपता (Congruence and Similarity)सर्वांगसमता तथा समरूपता (Congruence and Similarity),समरूपता तथा सर्वांगसमता ( Similarity and Congruence ) के बारे में बताया गया है।

2.सर्वांगसमता तथा समरूपता (Congruence and Similarity),समरूपता तथा सर्वांगसमता ( Similarity and Congruence ) के सम्बन्ध में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.सर्वांगसमता और समरूपता क्या है? (What is Congruence and Similarity?):

उत्तर:सर्वांगसमता (Congruence) का अनिवार्य रूप से मतलब है कि दो आकृतियां या वस्तुएं एक ही आकार (Shape) और माप (Size) के हैं।
समरूपता (Similarity) का मतलब है कि दो आंकड़े या वस्तुएं एक ही आकार (Shape) की होती हैं, हालांकि आमतौर पर एक ही माप (Size) की नहीं होती हैं।उदाहरण के लिए,दो सर्कल हमेशा समरूप (Similar) होंगे,क्योंकि परिभाषा के अनुसार उनके पास एक ही आकार (shape) है।

प्रश्न:2.सर्वांगसमता और समरूपता में क्या अंतर है? (What is difference between congruence and similarity?):

उत्तर:त्रिभुज की सर्वांगसमता (Congruence) और समरूपता (Similarity) के बीच अंतर यह है कि समान आकार (Shape) एक ही आकार के संस्करणों को आकार दिया जा सकता है जबकि सर्वांगसम आकृतियों में सर्वसम लंबाई (Identical Lengths) होती है।

प्रश्न:3.समरूपताओं और अन्तरों में क्या अंतर है? (What is the difference between similarities and differences?):

उत्तर:एक समरूपता (similarity) एक समानता या एकाकीपन है (sameness or alikeness)। जब आप दो चीजों की तुलना कर रहे हैं:भौतिक वस्तुएं,विचार या अनुभव – आप अक्सर उनकी समरूपताओं (similarities) और उनके अन्तरों (differences) को देखते हैं।अंतर समरूपता के विपरीत है।दोनों वर्गों और आयतों की चार भुजाएँ हैं,जो उनके बीच एक समरूपता (similarity) है।

प्रश्न:4.समवर्ती और समरूप बीच क्या अंतर है? (What is the difference between concurrent and similar?):

उत्तर:समरूपता (Similarity) का मतलब है बारीकी से एक दूसरे के समान है लेकिन काफी हद तक एक ही नहीं ।गणितीय रूप से एक आकार (Shape) इसके मूल आकार (Basic Shape) में समरूप (Similar) हो सकता है,उदाहरण के लिए एक सर्कल,लेकिन माप (Size) में अलग अर्थात् अलग-अलग त्रिज्याओं के वृत्त समरूप होते हैं।माप (Size) पहलू में अंतर का मतलब है कि एक समरूप आकार (Similar Shape) कभी सर्वांगसम (Congruent) नहीं हो सकता है।

प्रश्न:5 सर्वांगसम और बराबर के बीच क्या अंतर है? (What’s the difference between congruent and equal?):

उत्तर:दो आकृतियों को सर्वांगसम (Congruent) कहा जाता है यदि एक को दूसरे पर बिल्कुल आरोपित (Superimposed) किया जा सकता है । “समरूपता (Congruence) आकार (उर्फ वस्तुओं) के साथ व्यवहार,जबकि समानता (equality) संख्या के साथ व्यवहार होना है।आप यह नहीं कहते कि दो आकृतियां बराबर (equal) हैं या दो संख्या समरूप (congruent) हैं ।

प्रश्न:6.सर्वांगसम और समवर्ती के बीच क्या अंतर है? (What is difference between congruent and concurrent?):

उत्तर:विशेषण के रूप में सर्वांगसम (congruent) और समवर्ती (concurrent) के बीच अंतर।यह है कि समरूप (congruent) चरित्र (Character) के संगत है,जबकि समवर्ती (concurrent) एक ही समय में हो रहा है; समकालिक (Simultaneous)।

उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा सर्वांगसमता तथा समरूपता (Congruence and Similarity),समरूपता तथा सर्वांगसमता ( Similarity and Congruence ) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

Congruence and Similarity

सर्वांगसमता तथा समरूपता (Congruence and Similarity)

Congruence and Similarity

सर्वांगसमता तथा समरूपता (Congruence and Similarity) से संबंधित अनेक आकृतियां दैनिक जीवन में देखने को मिलती है।इन ज्यामितीय आकृतियों की तुलना करने या वर्गीकरण करने की आवश्यकता पड़ती है।जैसे एक आकृति दूसरे जैसी है या एक दूसरे से छोटी है या बड़ी है अथवा एक दूसरे की सर्वसम है या नहीं।

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