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What is the correlation of mathematics to other subjects?

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1 1.गणित का अन्य विषयों से क्या सहसंबंध है?(What is correlation of mathematics to other subjects?):
1.2 3.गणित का अन्य विषयों से सहसंबंध(Mathematics correlated with other subjects):

1.गणित का अन्य विषयों से क्या सहसंबंध है?(What is correlation of mathematics to other subjects?):

  • गणित का अन्य विषयों से सह-संबंध (Correlation of mathematics to other subjects) से तात्पर्य है कि अध्ययन करने तथा कराने की सुविधा के लिए समस्त ज्ञान को कई भागों में विभाजित कर दिया है।प्रत्येक भाग को विषय कहते हैं जैसे गणित ,अंग्रेजी ,विज्ञान, भूगोल आदि। पढ़ाते समय भी इन विषयों को एक दूसरे से संबंधित करके पढ़ाया जाता है तो बालक पढ़ने में रुचि लेने लगते हैं और उससे लाभ उठाते हैं ।विभिन्न विषयों के इस प्रकार के पारस्परिक संबंध को सह-संबंध(Correlation) कहते हैं।
  • गणित शिक्षण में भी सह-संबंध आवश्यक है इससे बालक गणित शीघ्रता से समझने लगते हैं।इसका कारण यह है कि मस्तिक भिन्न भिन्न अनुभवों को पारस्परिक संबंध,तुलना और मिश्रण आदि करके ग्रहण करता है और सहसंबंध द्वारा यह सब बातें संभव हो जाती हैं। अतःबालक का मस्तिष्क सहसंबंध द्वारा पढ़ाने से शीघ्रता से ग्रहण कर लेता है।गणित के शिक्षण में सहसंबंध करने से बालक के व्यक्तित्व का भी विकास होता है।इसके अतिरिक्त पाठ्यक्रम में अनेक विषय होने से बालक को कुछ घबराहट होती है और शिक्षक के अध्यापन में कुछ कृत्रिमता आ जाती है परंतु सहसंबंध से यह दोष भी दूर हो जाता है।
  • उपर्युक्त विवरण में गणित का अन्य विषयों से क्या सहसंबंध है?(What is correlation of mathematics to other subjects?) का रिव्यू किया गया है.नीचे विवरण में गणित का अन्य विषयों से क्या सहसंबंध है?(What is correlation of mathematics to other subjects?) के बारे में बताया गया है.

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2.सहसंबंध की किस्में(Kinds of Correlation):

  • सहसंबंध चार प्रकार का होता है-
  • (1.)गणित की विभिन्न शाखाओं में सह-संबंध (Correlation in different branches of mathematics):
    correlation of mathematics to other subjects:गणित-शिक्षण में गणित की विभिन्न शाखाओं-अंकगणित, रेखागणित,बीजगणित में अधिक से अधिक सहसंबंध स्थापित करना परम आवश्यक है।अंकगणित के लाभ-हानि,ब्याज,क्षेत्रफल के कठिन प्रश्नों को बीजगणित की सहायता से बड़ी सरलता से हल किया जा सकता है। बीजगणित के लघुत्तम तथा महत्तम समापवर्तक(L.C.M. and H.C.F),भिन्नों(Fractions), वर्गमूल((Square Root)आदि में अंकगणित के ही कायदे लगते हैं।अंकगणित में क्षेत्रफल व आयतन पढ़ाते समय इनको रेखागणित से संबंधित किया जा सकता है।इसी प्रकार अंकगणित की अनेक क्रियाएं- जोड़ ,बाकी ,वर्गमूल ,ऐकिक नियम आदि के प्रश्न रेखागणित द्वारा भी हल किए जा सकते हैं।बीजगणित के सूत्र रेखागणित द्वारा भी सिद्ध किए जा सकते हैं। बीजगणित की वर्गात्मक समीकरण (Quadratic Equation)को रेखागणित द्वारा भी हल कर सकते हैं।इस प्रकार अंकगणित,रेखागणित द्वारा ग्राफ आदि का आपस में संबंध स्थापित करते हुए गणित का शिक्षण होना चाहिए।
  • (2.)गणित के किसी विषय के विभिन्न पाठों का आपस में सहसंबंध गणित के किसी विषय के विभिन्न पाठों में यथासंभव संबंध जोड़ने का प्रयत्न करना चाहिए जैसे अंकगणित में भिन्नों के जोड़-बाकी का संबंध प्रतिशत से जोड़ा जा सकता है।इसी प्रकार बीजगणित के समीकरण हल में संक्षेप करना(Simplification),भिन्नों का सरल करना खण्ड करना और कोष्ठक तोड़ना आदि क्रियाओं का काम पड़ता है।रेखागणित पढ़ाते समय भी त्रिभुज की रचना में सरल रेखा खींचने का प्रयोग और चतुर्भुज की रचना में त्रिभुज की रचना का प्रयोग होता है।साध्यों (Theorems) के सिद्ध करने में पहले साध्यों की उपपत्ति आगे की साध्यों में प्रयोग होती है।इस प्रकार विभिन्न पाठों में संबंध स्थापित करते हुए पढ़ाने में बालकों को विषय सरल होने के साथ-साथ रोचक भी हो जाता है।

3.गणित का अन्य विषयों से सहसंबंध(Mathematics correlated with other subjects):

  • प्रासंगिक सहसंबंधों में दैनिक शिक्षण को अधिक रोचक और व्यापक बनाने के लिए आवश्यकतानुसार अन्य विषयों में पढ़ी हुई बातों का प्रयोग किया जाता है जिससे पाठ समझने में बड़ी सहायता मिलती है।इस प्रकार के सहसंबंध के लिए शिक्षक कोई पूर्व-व्यवस्था नहीं करता वरन् पढ़ाते समय किसी भी बात को अधिक व्यापक दृष्टि से सरल बनाने के लिए दूसरे विषयों में गणित सामग्री का प्रयोग कर लेता है।
  • व्यवस्थित सहसंबंध में विभिन्न विषयों की सामग्री को ऐसे क्रम में चुनते हैं कि एक विषय के शिक्षण से अन्य विषयों का निकट का संबंध रहा हो जो सामग्री एक विषय में पाई जाती है उसी का थोड़ा या बहुत अन्य विषयों में प्रयोग हो। इसके लिए शिक्षक पहले से व्यवस्था करता है।

(1.)गणित और भौतिकशास्त्र में सहसंबंध(Mathematics and Physics correlation)[correlation of mathematics to other subjects]:

  • इस कथन में तनिक सन्देह नहीं कि भौतिक विज्ञान के विकास के कारण ही आज समाज में लोगों का जीवन स्तर ऊंचा हुआ है।वर्तमान युग में विज्ञान उन्नति के इस शिखर पर नहीं पहुंचता यदि उसे गणित का योगदान प्राप्त नहीं होता।गणित की सहायता से वैज्ञानिकों ने अणु का भार ज्ञात किया।वर्तमान युग में अणुशक्ति के प्रयोग से विज्ञान में एक उथल-पुथल मच गई है तथा एक नए प्रकार की ऊर्जा का जीवन के विभिन्न पक्षों में उपयोग संभव हुआ है।यदि गणित की सहायता से अणु का भार एवं मात्रा का ज्ञान न हुआ होता तो संभवतः आज अणुशक्ति का प्रयोग संभव नहीं होता।संसार के शक्तिशाली राष्ट्र आज अणुशक्ति के सफल प्रयोग पर ही अपने देश को शक्तिशाली एवं समृद्ध बनाने में सफल हुए हैं।यह सब गणित का ही चमत्कार है।गणित के कारण इस विषय में सही एवं सफल मापन एवं मूल्यांकन संभव हुआ है।
  • जब एक वैज्ञानिक किसी प्रयोगशाला में काम करता है तो विभिन्न भौतिक तथ्यों का अध्ययन गणित की सहायता से ही करता है तथा गणित के सूत्रों द्वारा नये सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है।न्यूटन एवं आइंस्टीन जिन्होंने पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के विभिन्न सिद्धांतों को गणित के सूत्रों में अभिव्यक्त किया ,स्वयं दोनों महान् गणितज्ञ थे।आज भी भौतिकशास्त्र के क्षेत्र में जो नई खोजें हो रही हैं तथा उनका सूक्ष्म रूप से प्रतिपादन गणित के द्वारा किया जाता है जिसे सारे संसार के संबंधित वैज्ञानिक समझ लेते हैं।गणित के कारण ही भौतिक तथ्यों के विभिन्न संबंधों को सूक्ष्म रुप से प्रदर्शित किया जा सकता है।
  • भौतिकशास्त्र का पाठ्यक्रम दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-(1.)प्रायोगिक कार्य (2.) सैद्धांतिक पक्ष। जहां तक प्रायोगिक कार्य का संबंध है ,यह कहना युक्तिसंगत होगा कि बिना गणित के अच्छे ज्ञान के प्रायोगिक कार्य सफलतापूर्वक किया जाना संभव नहीं है‌।किसी प्रयोग के प्रमुख तीन अंग होते हैं-(1.)प्रेक्षण (2.) गणना (3.)परिणाम
    प्रेक्षण के अंतर्गत दूरी का माप, परिणाम का माप,सही स्थिति को वर्नियर,आप्टिकल बैंच आदि पर पढ़ना सम्मिलित किए जाते हैं,गणना के सूत्र का चयन करना,सही मूल्य का प्रतिस्थापन करना आदि क्रियाएं करनी पड़ती हैं। इसी प्रकार परिणाम में प्रतिशत ज्ञात करना पड़ता है,औसत ज्ञात करना पड़ता है,इकाइयों में परिवर्तित करना पड़ता है आदि।
  • अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि गणित का अच्छा ज्ञान प्रायोगिक कार्य की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है।भौतिक विज्ञान में सैद्धांतिक पक्ष का एक महत्त्वपूर्ण भाग है संख्यात्मक पक्ष। संख्यात्मक पक्ष में गणित का अधिकाधिक प्रयोग होता है। दशमलव का ज्ञान,घातांक नियम,विलोम तथा प्रतिलोम का ज्ञान, समय-अंतराल का ज्ञान,इकाई परिवर्तन का ज्ञान आदि संख्यात्मक पक्ष के लिए अत्यंत आवश्यक है।विविध सिद्धांतों,संबंधों, निष्कर्षों आदि को लेकर लेखाचित्र द्वारा प्रभावी ढंग से समझाया जा सकता है।अंतराण्विक बल का स्वभाव,सरल रेखीय गति,गति के समीकरण आदि लेखाचित्र द्वारा भली-भांति समझाएं जा सकते हैं।आकार का सही अनुमान लगाने में त्रिभुज तथा चतुर्भुज से संबंधित अनेक प्रमेयों का उपयोग किया जाता है।बलों के त्रिभुज एवं समान्तर चतुर्भुज के नियम भौतिकशास्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं।
  • त्रिकोणमिति के अनुपातों के नियम भौतिकशास्त्र में प्रचुरता से उपयोग में लाए जाते हैं। किरणों की दिशाएं, प्रतिबिंब का अनन्त आदि भी वस्तुत: गणितीय संकल्पनाएं हैं।
  • इस प्रकार हम देखते हैं कि भौतिकशास्त्र के सभी क्षेत्रों में अंकगणित,बीजगणित,रेखागणित,त्रिकोणमिति, सांख्यिकी,मेन्सुरेशन का उपयोग होता है।गणित के कारण ही भौतिकशास्त्र वर्तमान स्वरूप में उपयोगी हो सका है। भौतिकशास्त्र में प्रयोगों के परिणामों का शुद्ध होना आवश्यक है।गणित की सहायता से हम जान सकते हैं कि प्रयोगों के परिणाम किस सीमा तक शुद्ध हैं तथा अशुद्धता किन विधियों द्वारा कम की जा सकती है।गणित के सूत्र,सिद्धांत,संबंध आदि हमें इस दिशा में महत्त्वपूर्ण सहायता प्रदान करते हैं।भौतिकशास्त्र के महत्त्वपूर्ण उप-विषयों जैसे घनत्व, ताप,विद्युत धारा ्आपेक्षिक ताप,दबाव,चुम्बकत्व,ध्वनि आदि में गणित के माध्यम से सूत्रीकरण,सामान्यीकरण एवं प्रस्तुतीकरण संभव हो सका है।इन क्षेत्रों में निरंतर प्रगति गणित की सहायता से ही संभव है।

(2.)गणित एवं रसायनशास्त्र में सहसंबंध(Mathematics and chemistry correlation)[correlation of mathematics to other subjects]:

  • रसायनशास्त्र में रासायनिक क्रियाओं के परिणामों का मान गणित की सहायता से ज्ञात किया जाता है।यौगिक,मिश्रण,रासायनिक समीकरण आदि वस्तुतः गणितीय संकल्पनाएं हैं जिनमें परिणाम का पक्ष महत्वपूर्ण है।रासायनिक संयोग आदि को व्यक्त करने के लिए अनुपात का ज्ञान आवश्यक है।रासायनिक क्रियाओं द्वारा बनने वाले पदार्थों की मात्रा ज्ञात करने के लिए प्रतिशत, भिन्न और अनुपात का उपयोग किया जाता है।रसायनशास्त्र के विभिन्न उप-विषयों को समझने के लिए गणित का ज्ञान आवश्यक है अन्यथा इसमें परिणामों से संबंधित पक्षों को समझने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।यदि पानी बनाना है तो हमें यह जानना होगा कि हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन की कितनी मात्रा लेनी होगी और यह सब गणित के ज्ञान पर निर्भर करता है।कार्बनिक यौगिकों का सूत्र ज्ञात करने के लिए गणित के बिना काम नहीं चल सकता।वायुमंडल में तत्वों की रचना का ज्ञान,विभिन्न गैसों का वायुमंडल में अनुपात, परमाणुभार,अणुभार,तुल्यांकीभार आदि गणित के सिद्धांतों पर आधारित है।पीरियोडिक टेबल के विकास में गणित का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।एबोग्रेड्रो संख्या,इलेक्ट्रॉन,प्रोटॉन,न्यूट्रॉन आदि के भारों को ज्ञात करने और याद करने में बीजगणित के घातांकों(Indices) का ज्ञान आवश्यक है। गैसों के आयतन,भार, घनत्व आदि की गणना में वर्ग,वर्गमूल,घन,घनमूल आदि से संबंधित क्रियाओं की जानकारी अनिवार्य है।गैसों के नियम पूरी तरह समीकरण पर आधारित हैं।गैसों के नियम,भाप का दबाव,घुलनशीलता आदि को समझने में लेखाचित्रों की जानकारी सहायक सिद्ध होती है।
  • रसायनशास्त्र में तत्वों के संबंधों को समझने के लिए सामान्यीकरण, सूत्रीकरण आदि गणितीय प्रक्रियाओं का प्रचुरता से उपयोग होता है।यदि विद्यार्थी बीजगणित के आधारभूत सिद्धांतों तथा दक्षताओं में पारंगत नहीं हो तो उन्हें रसायनशास्त्र के प्रमुख एवं आधारभूत पक्षों को समझने में कठिनाई होगी।परमाणुभार निकालना,अणुभार निकालना,तुल्यांकीभार निकालना,यौगिकों में तत्वों की प्रतिशत मात्रा ज्ञात करना आदि को समझने के लिए समीकरण,प्रतिशत,अनुपात लेखाचित्र,प्रतिस्थापन,चर तथा अचर राशियां, औसत आदि का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। गणित के इन प्रमुख विषयों के ज्ञान के बिना रसायनशास्त्र के सिद्धांतों को नहीं समझा जा सकता।
    यहां पर यह बताना भी आवश्यक है कि रसायनशास्त्र की अधिकांश भाषा भी गणितीय है‌।उदाहरणार्थ बॉयल का नियम कहता है कि ताप के स्थिर रहने पर किसी गैस की निश्चित मात्रा का आयतन उसके दबाव का प्रतिलोमानुपाती है तथा चार्ल्स के नियमानुसार दबाव स्थिर रहने पर गैस की निश्चित मात्रा का आयतन उसके ताप का समानुपाती होता है।इसी प्रकार रसायनशास्त्र के प्रत्येक क्षेत्र में सूत्र,समीकरण,संकेत तथा मान-प्रतिस्थापन का उपयोग होता है।गणित के ज्ञान के बिना दर्शनशास्त्र के नियमों और क्रियाओं को सांकेतिक भाषा में लिखना तथा समझना कठिन होगा।

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(3.)गणित एवं प्राणी तथा वनस्पति विज्ञान(Mathematics and Zoology and Botany)[correlation of mathematics to other subjects]:

  • प्राणी विज्ञान तथा वनस्पति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए भी गणित का ज्ञान आवश्यक है।गणित के ज्ञान के बिना विद्यार्थियों को इन विचारों के अध्ययन में कठिनाई होगी। किसी जीव की हड्डियों, नाड़ियों आदि की संख्या, हड्डियों की लंबाई, हड्डियों का परस्पर अनुपात,हड्डियों का भार आदि ज्ञात करने के लिए अंकगणित का ज्ञान आवश्यक है‌। कोशिकाओं का अध्ययन करते समय विद्यार्थियों के लिए वर्ग, वृत्त,बहुभुजीय क्षेत्र आदि का ज्ञान होना आवश्यक है। इस संदर्भ में ज्यामिति का अध्ययन सहायक सिद्ध होता है। कोशिकाओं में कार्बनहाइड्रोजन,नाइट्रोजन आदि की मात्रा ज्ञात करने के लिए प्रतिशत का ज्ञान होना भी वांछनीय है।मैंडल के सिद्धांत को समझने के लिए गणित की सहायता लेना जरूरी होता है।
  • इसी प्रकार वनस्पति शास्त्र में भी गणित के आधारभूत सिद्धांतों का ज्ञान सहायक होता है। पुष्प,पत्ती, जड़ आदि के अध्ययन में गणित की अनेक क्रियाओं का प्रयोग किया जाता है।मिट्टी,अंकुरण,बीज,पौधा,पुष्प,फल आदि में परस्पर गणितीय संबंध स्थापित करने की आवश्यकता पड़ती है तथा इन संबंधों को अनेकों प्रयोगों द्वारा विस्थापित किया जाता है।वनस्पतिशास्त्र में घनत्व,वितरण, आवृत्ति,क्षेत्रफल का प्रयोग भी होता है। लेखाचित्र का प्रयोग वनस्पतिशास्त्र के प्रत्येक क्षेत्र में किया जाता है जिससे स्थिति के अवयवों में परस्पर संबंध समझने में सहायता मिलती है‌।
    प्राणी विज्ञान तथा वनस्पति विज्ञान के क्षेत्रों में नवीन ज्ञान को प्राप्त करने में गणित का अभूतपूर्व योगदान रहा है। नवीन खोजों एवं अनुसंधानों में गणित एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है तथा निष्कर्षों के तुल्यात्मक अध्ययन में यह सहायक होता है।

(4.)गणित एवं अर्थशास्त्र(Mathematics and Economics)[correlation of mathematics to other subjects]:

  • आज का युग अर्थशास्त्र का युग है तथा प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। ज्यों-ज्यों तकनीकी प्रगति होती जा रही है उतना ही अधिक अर्थशास्त्र का उपयोग बढ़ता जा रहा है‌।अर्थशास्त्र के नियमों में गणित के द्वारा ही निश्चितता लाना संभव हो सका है।अब तो यह स्थिति आ गई है कि अर्थशास्त्र के विद्यार्थी के लिए गणित का समुचित ज्ञान आवश्यक हो गया है।’इकोनोमेट्रिक्स’ एक अर्थशास्त्र की महत्त्वपूर्ण शाखा है जिसमें गणित एवं सांख्यिकी का उपयोग होता है।अर्थशास्त्र में अनेक विषय हैं जिनका गणित के उपयोग बिना उचित स्पष्टीकरण नहीं हो सकता है।उदाहरण के लिए उपयोगिता,मांग एवं पूर्ति,राष्ट्रीय आय,मूल्य निर्धारण,पारिवारिक
  • बजट,सूचकांक,विदेशी व्यापार,आर्थिक नियोजन,मुद्रास्फीति,मुद्रा अवमूल्यन,विदेशी विनिमय दर,निवेश विश्लेषण,कर निर्धारण,सार्वजनिक ऋण, जनसंख्या आदि आर्थिक विषयों का विवेचन,स्पष्टीकरण एवं शुद्धता के लिए गणित का उपयोग आवश्यक है‌।गणित के क्षेत्र में से प्रतिशत, औसत,समीकरण,सूत्र निर्धारण, वृत्ताकार एवं विभिन्न प्रकार के लेखाचित्र आदि के प्रयोग द्वारा अर्थशास्त्र की विषयसामग्री को वैज्ञानिक विधि से प्रतिपादित किया जाता है।गणित की सहायता से आधुनिक अर्थशास्त्र की अनेक बातें विद्यार्थी आसानी से समझ सकता है।मूल्य निर्धारण,मांग एवं पूर्ति,मुद्रा नियोजन आदि क्षेत्रों में बीजगणितीय सूत्रों का प्रचुर मात्रा में उपयोग होता है।राष्ट्रीय आय ,जनसंख्या, विदेशी व्यापार ,उत्पादन ,पारिवारिक बजट आदि को ग्राफ की सहायता से भली प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है तथा चित्रों द्वारा संकल्पनाओं का स्पष्टीकरण किया जा सकता है। नियोजन के प्रारुपों का निर्माण गणित की सहायता से ही संभव हो सका है।संसार के जितने भी प्रगतिशील देश हैं उन्होंने नियोजन के द्वारा ही आर्थिक प्रगति की है तथा भारत में गत पंचवर्षीय योजनाओं की व्याख्या गणित की सहायता से ही की जा सकी है।
  • नियोजन में आंकड़ों की आवश्यकता पड़ती है तथा उनके औसत और प्रतिशत तुलनात्मक अध्ययन एवं मूल्यांकन के लिए ज्ञात किए जाते हैं। आधुनिक युग में प्रत्येक देश की समृद्धि अधिक निर्यात पर निर्भर करती है और प्रत्येक देश विदेशी मुद्रा कमाने का प्रयत्न करता है ताकि इस मुद्रा का उपयोग आधुनिकतम तकनीकी सामान-सज्जा प्राप्त करने में किया जा सके।
  • अधिक भुगतान संतुलन देश के पक्ष में हो।इसके लिए निर्यात का आयात से अधिक होना आवश्यक है और यह सब जानकारी तभी व्यावहारिक हो सकती है जब इसके लिए गणित का उपयोग किया जाए।भुगतान संतुलन के पक्ष में करने के लिए राष्ट्रों को कई बार मुद्रा के अवमूल्यन का सहारा लेना पड़ता है।इस अवमूल्यन की सही मात्रा का फलन गणित के बिना असंभव है।इसलिए हम देखते हैं कि आर्थिक संस्थानों में अर्थशास्त्रियों को अच्छे स्तर की गणित की जानकारी आवश्यक हो गई है।आज प्रत्येक नागरिक मूल्यों में लगातार वृद्धि से परेशान हैं।मुद्रा की मात्रा में वृद्धि का मूल्य स्तर पर जो प्रभाव पड़ता है,उसे गणित की सहायता से आंका जा सकता है।महंगाई भत्ता आदि निर्धारित करने के लिए जीवन-लागत सूचकांक का प्रयोग किया जाता है जिसमें गणित के सिद्धांतों एवं दक्षताओं का प्रचुर मात्रा में उपयोग होता है।आधुनिक युग में जनसंख्या में वृद्धि एक विकट समस्या बन गई है क्योंकि उत्पादन एवं उपभोग में जनसंख्या की वृद्धि से असंतुलन हो जाता है तथा गरीबी में वृद्धि होती है।जन्मदर,मृत्युदर,उत्तरजीवी दर आदि के द्वारा जनसंख्या में परिमाणात्मक परिवर्तनों को गणित की सहायता से ज्ञात किया जाता है तथा रोजगार एवं मूल्यों पर इनके प्रभाव को आंका जाता है।संसार के जनसंख्या विशेषज्ञ विद्यालयों में ‘जनसंख्या गणित’ के अध्यापन की सिफारिश कर रहे हैं।

(5.)गणित एवं वाणिज्य(Mathematics and Commerce)[correlation of mathematics to other subjects]:

  • सामाजिक जीवन में वाणिज्य एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है और आज के जनजीवन पर प्रत्येक पल वाणिज्य का महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।उत्पादन,लागत निर्धारण,विज्ञापन,भावी मांग का निर्धारण और तदनुसार उत्पादन की मात्रा का निर्धारण,लाभ-अनुपात,लागत विधियां तथा लागत विश्लेषण,गत वर्षों के उत्पादन ,वर्तमान उत्पादन, लागत तथा लाभों की तुलना तथा इनका हिसाब-किताब रखना,व्यापार में सहायक यंत्रों जैसे-यातायात,संवाद,वाहन के साधन,बैंक और बीमा आदि की प्रगति का लेखा-जोखा रखना -सब वाणिज्य के अंतर्गत आते हैं।वाणिज्य की इन सब महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में प्रबंध का महत्व बढ़ता जा रहा है और उसके लिए गणितीय ज्ञान नितांत आवश्यक है।बीजगणित के सूत्रों, प्रतीकों, लेखाचित्रों एवं समीकरणों के द्वारा वाणिज्यि की गतिविधियों को संक्षेप में व्यक्त किया जाता है। हिसाब-किताब रखना जिसे वाणिज्य भाषा में लेखा-कर्म कहते हैं, पूर्णतया अंकगणित का क्षेत्र है।इन लेखों का विश्लेषण करना जिसे अकाउंटेंसी कहते हैं,पूर्णतया गणित के ज्ञान पर निर्भर करता है।लाभ ज्ञात करना,चर राशियों का विश्लेषण करना,लागत एवं इसके विभिन्न अंशों को ज्ञात करना एवं उनकी तुलना करना है शुद्ध गणितीय प्रक्रिया है।
  • वर्तमान वाणिज्य युग में प्रबन्ध का महत्त्व इतना बढ़ गया है। अमेरिका ने इस क्षेत्र में बहुत प्रगति की है और जितने भी प्रबंध संबंधित साहित्य उपलब्ध हैं उनमें विभिन्न संकल्पनाओं के लिए गणित का अनिवार्यतः प्रचुर मात्रा में उपयोग किया गया है।उत्पादन की मात्रा निर्धारित करने के लिए मांग का पूर्व अनुमान लगाना नितांत आवश्यक है जो गणित के समुचित उपयोग बिना असंभव है।इसी प्रकार वस्तु का मूल्य निर्धारित करने के लिए उसकी लागत ज्ञात करना आवश्यक होता है-यह भी गणित के समीकरणों द्वारा ही संभव है।कच्चा माल,उत्पादन और बिक्री का समुचित लेखा रखना भी आवश्यक होता है और इसके लिए गणित का उपयोग अनिवार्य है।
  • वाणिज्य एवं व्यापार पर यातायात के साधनों का बीमा कंपनियों और बैंकिंग प्रणाली का अधिक प्रभाव पड़ता है। यातायात के साधनों का,बीमा कंपनियों और बैंकिंग प्रणाली का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।यातायात के भाड़ों, दरों आदि का फलन गणित की सहायता से ही किया जाता है ।इसी प्रकार बीमें की दरें Acturial Science के आधार पर निकाली गई मृत्यु दरों पर निर्भर करती है जिसमें उच्च स्तरीय गणित का प्रयोग किया जाता है।बैंकों का संपूर्ण व्यापार अंकगणित के सिद्धांतों पर निर्भर करता है।विदेशी विनिमय दर, मुद्रा का मूल्य आदि विचारों को गणितीय भाषा में सरलता पूर्वक प्रकट किया जा सकता है.
  • उपर्युक्त विवरण में गणित का अन्य विषयों से क्या सहसंबंध है?(What is correlation of mathematics to other subjects?) के बारे में बताया गया है.

2.गणित का अन्य विषयों से क्या सहसंबंध है?(What is correlation of mathematics to other subjects?) से सम्बन्ध में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.गणितीय सहसंबंध क्या है? (What is mathematical correlation?)[correlation of mathematics to other subjects]:

उत्तर:सहसंबंध दो चर के बीच पत्राचार (correspondence) या संबंध (relationship) की डिग्री को संदर्भित करता है।उदाहरण के लिए,यदि चर X स्कूल में उपस्थिति है और चर Y एक उपलब्धि परीक्षण (achievement test) का स्कोर है, तो हम X और Y के बीच नकारात्मक सहसंबंध की उम्मीद कर सकते है.

प्रश्न:2.विषयों में सहसंबंध क्या है? (What is correlation in subjects?):

उत्तर:लेकिन,शिक्षण में सहसंबंध एक ऐसी तकनीक को इंगित करता है जो ज्ञान को ठोस (concrete) और स्थायी (permanent) बनाने के लिए पाठ्यक्रम के विभिन्न विषयों के बीच पारस्परिक संबंध को दर्शाता है।<br />यह विभिन्न विषयों को पढ़ाने वाले शिक्षकों द्वारा समानता या निर्भरता दिखाने के लिए एक विषय का अन्य विषयों पर किया गया सचेत प्रयास है।

प्रश्न:3.सहसंबंध के सिद्धांत के आधार पर गणित के सहसंबंध कितने प्रकार के होते हैं? (How many types of correlation of mathematics are there based on the principle of correlation?)correlation of mathematics to other subjects]:

उत्तर:5 प्रकार (5 types)
इसलिए,हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि सहसंबंध के सिद्धांत के आधार पर गणित के 5 प्रकार के सहसंबंध हैं।

प्रश्न:4.हम दैनिक जीवन में गणित का उपयोग कैसे करते हैं? (How do we use math in everyday life?):

उत्तर:7 तरीके हम प्रतिदिन गणित का उपयोग करते हैं
सेल फोन पर चैटिंग (Chatting on the cell phone)।सेल फोन पर चैट करना आजकल ज्यादातर लोगों के लिए संवाद करने का तरीका है।
रसोई घर में (In the kitchen)।बेकिंग और खाना पकाने के लिए कुछ गणितीय कौशल की भी आवश्यकता होती है।
बागवानी (Gardening)।
कला (Arts)।
डायरी रखना (Keeping a diary)।
आउटिंग की योजना बना रहे हैं (Planning an outing)।
बैंकिंग (Banking)।

प्रश्न:5.क्या हमें जीवन में वास्तव में गणित की आवश्यकता है? (Do we really need math in life?):

उत्तर:गणित हमारे जीवन में अविश्वसनीय रूप से महत्वपूर्ण है और इसे साकार किए बिना,हम गणितीय अवधारणाओं का उपयोग करते हैं,साथ ही उन कौशलों का भी उपयोग करते हैं जो हम हर दिन गणित की समस्याओं को करने से सीखते हैं।गणित के नियम हमारे चारों ओर सब कुछ नियंत्रित करते हैं और उनकी अच्छी समझ के बिना,जीवन में महत्वपूर्ण कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

प्रश्न:6.गणित इतना थकाऊ क्यों है? (Why is math so tedious?):

उत्तर:गणित तेजी से उबाऊ हो सकता है क्योंकि यह अक्सर बहुत सारगर्भित (abstract) होता है और बच्चे के वर्तमान दैनिक अनुभव से संबंधित नहीं होता है।हर किसी के हित होते हैं – वे चीजें जिनके बारे में वे भावुक (passionate) महसूस करते हैं।

प्रश्न:7.शिक्षा में सहसंबंध क्या है? (What is correlation in education?):

उत्तर:परीक्षण स्कोर और प्रदर्शन के अन्य उपायों के बीच संबंध के एक उपाय के रूप में मनोविज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में सहसंबंध बहुत महत्वपूर्ण है।
किसी व्यक्ति के दो गुणों या विभिन्न गुणों के बीच संबंध खोजने के बाद,उसका व्यावसायिक मार्गदर्शन प्रदान करना भी संभव है।

प्रश्न:8.शिक्षण में सहसंबंध विधि क्या है? (What is correlation method in teaching?):

उत्तर:एक दूसरे से संबंधित दो व्यवहारों की संभावना को मापने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक।इस आकलन को करने के एक साधन में सहसंबंधों का उपयोग करना शामिल है।
कभी-कभी दो माप जुड़े होते हैं ताकि जब एक का मान बढ़े,तो दूसरा भी-एक धनात्मक सहसंबंध।

प्रश्न:9.सहसंबंध और प्रतिगमन क्यों महत्वपूर्ण है? (Why is correlation and regression important?):

उत्तर:रिग्रेशन (Regression) का उपयोग मुख्य रूप से प्रेडिक्टर (X) वेरिएबल्स के एक सेट से एक प्रमुख प्रतिक्रिया,Y की भविष्यवाणी करने के लिए मॉडल/समीकरण बनाने के लिए किया जाता है।सहसंबंध (Correlation) मुख्य रूप से 2 या अधिक संख्यात्मक चर के एक सेट के बीच संबंधों की दिशा और ताकत को संक्षेप में और संक्षिप्त रूप से सारांशित करने के लिए उपयोग किया जाता है।

प्रश्न:10.ऋणात्मक सहसंबंध का उदाहरण क्या है? (What is an example of negative correlation?):

उत्तर:एक नकारात्मक सहसंबंध दो चरों के बीच का संबंध है जिसमें एक चर में वृद्धि दूसरे में कमी के साथ जुड़ी होती है।नकारात्मक सहसंबंध का एक उदाहरण समुद्र तल से ऊंचाई और तापमान होगा।जैसे ही आप पहाड़ पर चढ़ते हैं (ऊंचाई में वृद्धि (increase in height)) यह ठंडा हो जाता है (तापमान में कमी (decrease in temperature))।

प्रश्न:11.निर्धारण में सहसंबंध क्यों महत्वपूर्ण है? (Why is correlation important in assessment?):

उत्तर:सीखने के दृष्टिकोण और मूल्यांकन प्राथमिकताओं के बीच संबंध का आकलन करने के लिए एक अध्ययन करने से शिक्षकों और शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण डेटा उपलब्ध होगा।
यह एक सहसंबंध अनुसंधान है।इस प्रकार के शोध का उद्देश्य बिना किसी हस्तक्षेप (intervention) के दो या दो से अधिक चरों के बीच संबंध का पता लगाना है।

प्रश्न:12.एक अच्छा सहसंबंध क्या है? (What is a good correlation?):

उत्तर:सहसंबंध गुणांक (correlation coefficient) दो चर के सापेक्ष आंदोलनों (relative movements) के बीच संबंध की ताकत का एक सांख्यिकीय उपाय है।मान -1.0 और 1.0 के बीच होते हैं।
-1.0 का सहसंबंध एक पूर्ण नकारात्मक सहसंबंध दर्शाता है, जबकि 1.0 का सहसंबंध एक पूर्ण धनात्मक सहसंबंध दर्शाता है।

प्रश्न:13.आप सहसंबंध निष्कर्ष कैसे लिखते हैं? (How do you write a correlation conclusion?):

उत्तर:हम निष्कर्ष निकालते हैं कि सहसंबंध सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण है।या सरल शब्दों में “हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि α स्तर पर जनसंख्या में x और y के बीच एक रैखिक संबंध है” यदि P-मान महत्व स्तर (α = 0.05) से बड़ा है, तो हम शून्य परिकल्पना (hypothesis) को अस्वीकार करने में विफल रहते हैं।

प्रश्न:14.सहसम्बन्ध का क्या लाभ है? (What is the benefit of correlation?):

उत्तर:यह छात्र की समस्या समाधान (problem solving),तार्किक तर्क (logical reasoning), कल्पना (imagination) और विश्लेषणात्मक शक्ति (analytical power) जैसी मानसिक क्षमताओं को बढ़ाता (enhances) है,क्योंकि ये अर्जित ज्ञान को अन्य विषयों के साथ आसानी से सहसंबंधित कर सकते हैं।यह व्यावहारिक विषय के कौशल,जटिलता को मजबूत करता है और व्यावहारिक विषय पर महारत हासिल करता है।
उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा गणित का अन्य विषयों से क्या सहसंबंध है?(What is correlation of mathematics to other subjects?) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।correlation of mathematics to other subjects

उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा गणित का अन्य विषयों से क्या सहसंबंध है?(What is correlation of mathematics to other subjects?) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।What is correlation of mathematics to other subjects?

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