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Indian International Numerals

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1.भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय अंक (Indian International Numerals),भारतीय दाशमिक अंक पद्धति (Indian Decimal Numeral System):

  • भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय अंक (Indian International Numerals) वे हैं जो पूरे विश्व में वर्तमान में प्रचलित हैं।भारतीय अंतर्राष्ट्रीय अंक से पूर्व विभिन्न देशों की भिन्न-भिन्न अंक पद्धति विकसित हुई।जैसे मिस्र,सीरिया,ग्रीस,सिसली तथा यहाँ तक कि भारत में वर्तमान अंक पद्धति से पूर्व कई अंक पद्धति का प्रचलन रहा।
  • भारतीय अंकों का प्रसार अरब देशों में हुआ।इस अरबी ज्ञान को यहूदियों ने यूरोप में फैलाने में बहुत सहयोग किया।आरंभ में यहूदी विद्वानों के सहयोग से ही अरबी ग्रन्थों के लैटिन में अनुवाद हूए।
  • रब्बी अब्राहम बेन एजरा का जन्म स्पेन के तलेतला नगर में 1095 ईस्वी के आसपास हुआ था और मृत्यु 1167 ईस्वी में।वे एक प्रख्यात यहूदी विद्वान थे।सिफर-ए-मिस्पर (अंकों की पुस्तक) लिखी।बेन एजरा ने इस पुस्तक में भारतीय अंक तथा अंकगणित की विधियों की जानकारी दी है। अपनी पुस्तक में यद्यपि उन्होंने हिब्रू अक्षरांकों का ही इस्तेमाल किया है परंतु वे जानते थे कि गुबार अंकों की उत्पत्ति भारत में हुई है।भारतीय अंकों को गुबार अंक कहा जाता था।बेन एजरा ने शून्य का प्रयोग किया और स्पष्ट लिखा है कि शून्य पर आधारित यह अंक पद्धति भारतीयों की देन है।
  • 12वीं सदी में भारतीय अंक पद्धति के प्रचार में सबसे अधिक योगदान लियोनार्दो ‘फिबोनकी’ (Leonardo Fibonacci) ने किया।वे अपने समय के यूरोप के सबसे बड़े गणितज्ञ थे।
  • लियोनार्दो (Leonardo Fibonacci) का जन्म इटली के पिजान नगर में 1170 ईसवी में हुआ था। उस समय इटली का यह पिजान नगर वेनिस या जेनेवा की तरह ही अपने व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।लियोनार्दो ने मिस्र,सीरिया,ग्रीस आदि देशों की यात्राएं की।उन्हें विभिन्न देशों से व्यापारिक संबंधों से विभिन्न अंक पद्धतियों को जाना।यह भी जाना कि इन सभी अंक-पद्धतियों में अरबों की अंक पद्धति सबसे उत्तम है।उन्हें यह भी ज्ञात हुआ कि यह अंक पद्धति भारतीयों की खोज है।
    1202 ईसवी में लैटिन भाषा में उन्होंने ‘लिबेर एबैकी’ नामक एक पुस्तक लिखी।इस पुस्तक में उन्होंने अंकगणित और प्राथमिक बीजगणित की जानकारी दी।लियोनार्दो ‘फिबोनकी’ ने प्रथम प्रकरण में ही नए भारतीय अंकों की जानकारी दी है।
    लियोनार्दो ‘फिबोनकी’ (Leonardo Fibonacci) एक गणितज्ञ थे।वे अपने समय के ही नहीं बल्कि मध्ययुगीन यूरोप के एक महान गणितज्ञ थे।इसलिए उनके ग्रंथ से भारतीय अंकों का यूरोप के नगरों में तेजी से प्रचार-प्रसार हुआ।यूरोप के गणितज्ञों ने भारतीय अंक पद्धति का स्वागत किया। व्यापारियों के बहीखातों में भी भारतीय अंकों का इस्तेमाल होने लगा।
  • लेकिन यूरोप के सभी लोग भारतीय अंकों एवं अंक पद्धति को अपनाने के लिए तैयार नहीं थे।अपनी अंक पद्धति से मोह एकाएक नहीं छूटता है।यूरोप में यूनानी अक्षरांकों का इस्तेमाल होता था।गणनाएं एबैकस पर होती थी और बहीखाते रोमन अंकों में लिखे जाते थे।इसलिए जब इटली के व्यापारी अपने बहीखाते भारतीयों अंकों में लिखने लगे तो आरंभ में उनका विरोध होना स्वाभाविक बात थी।
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2.भारतीय अंकों का प्रचार प्रसार (Propagation of Indian Numeral System):

  • ईसा की 10वीं सदी में दक्षिणी यूरोप के लोगों को भारतीय अंकों की जानकारी मिल गई थी।पश्चिमी एशिया के देशों में अपनाए गए और गुबार अंकों के नाम से प्रसिद्ध अंक संकेत ही स्पेन और इटली में पहुंचे थे।ये गुबार-अंक भारतीय उत्पत्ति के अंक थे। इनका विकास भारत के ब्राह्मी अंक-संकेतों से हुआ था।इनका मूल पश्चिमी महाराष्ट्र के गुफालेखों में पाए जानेवाले ब्राह्मी अंक-संकेतों में आसानी से खोजा जा सकता है।
  • ईसा की बारहवीं सदी से यूरोप की अनेकानेक हस्तलिपियों में हमें ये भारतीय अंक संकेत देखने को मिलते हैं।ईसा की 15वीं सदी में यूरोप में छापाखाने स्थापित हुए,पुस्तके छपने लगी।अंक संकेतों के टाइप बने तो उनके आकारों में स्थिरता आ गई।मुद्रण-प्रणाली के बाद डिजाइन की दृष्टि से ही अंक संकेतों में थोड़ा परिवर्तन हुआ।इसी कारण ईसा की 15वीं सदी में 4 और 5 के कुछ नए रूप अस्तित्व में आए।
  • भारतीय अंक संकेत जब यूरोप पहुंचे तो ईसा की 15वीं सदी तक उनके आकार-प्रकार में परिवर्तन होता गया।
    यूरोप में भारतीय अंक-पद्धति का प्रवेश हो जाने पर भी वहां सदियों तक रोमन और यूनानी अंक-पद्धतियाँ जीवित रही।रोमन अंकों से जोड़ या घटाने में कोई विशेष दिक्कत नहीं होती थी बल्कि कुछ आसान ही थी।परंतु गुणन और भाग की क्रियाओं में बड़ी कठिनाई थी।यूनानी अंक पद्धति एक अक्षरांक पद्धति थी।इसलिए उसमें भी बड़ी कठिनाई थी।गणितज्ञ ही इन कठिनाइयों को समझ सकते थे।अतः यूरोप के गणितज्ञों ने सबसे पहले भारतीय अंक-पद्धति और उसके साथ-साथ भारतीय अंक-संकेतों को अपनाया।
  • रोमन अंकों के पक्ष में अनेक तरह के तर्क पेश किए गए।यूरोप की स्कूलों और बैंकों में 1600 ईस्वी तक रोमन अंकों का इस्तेमाल होता रहा।यूनानी अक्षरांकों का भी व्यवहार होता रहा। उच्च गणित में आज भी यूनानी अक्षरों का अंकों के रूप में प्रयोग होता है और थोड़ी मात्रा में आज भी रोमन अंकों का इस्तेमाल होता है।
  • मध्ययुगीन यूरोप में कागज आसानी से नहीं मिलता था।अतः किसी मेज पर रेखाएं खींचकर और उन पर छोटी-छोटी चकतियाँ रखकर हिसाब किया जाता था।इन्हें काउंटर कहते थे।यूरोप के अनेक देशों में इस प्रकार के काउंटरों का सदियों तक प्रयोग होता रहा।परंतु भारतीय अंक-पद्धति का प्रचार प्रसार हो जाने के बाद यूरोप के देशों में इन काउंटरों का व्यवहार घटता गया।
    भारतीय अंक-पद्धति तथा अंको को सबसे पहले स्पेन और इटली में अपनाया गया था।उसके बाद में अंक संकेत धीरे-धीरे यूरोप के अन्य देशों में फैले। 15वीं सदी के बाद यूरोप के साम्राज्यवादियो ने अमेरिका,अफ्रीका,एशिया और ऑस्ट्रेलिया में अपने उपनिवेश स्थापित करने शुरू कर दिए।उनके साथ उनकी लिपि इन प्रदेशों में पहुंची।लिपि के साथ नए अंक-संकेत भी इन प्रदेशों में पहुंचे।ये नए अंक संकेत भारतीय उत्पत्ति के थे।
  • यूरोप के लोगों को यह अंक-संकेत अरबों से मिले हैं इसलिये वे अक्सर इन्हें ‘अरेबिक’ कहते हैं। कभी-कभी उदारता से इन्हें ‘इंडो-अरेबिक’ अंक भी कहा जाता है।परंतु यूरोप के विद्वान भली-भांति जानते हैं कि ये भारतीय उत्पत्ति के संकेत हैं और यूरोप के गणितज्ञों ने भारतीय अंक पद्धति की प्रशंसा की है।
  • आज संसार में प्राय सभी देशों में भारतीय उत्पत्ति के इन्हीं संकेतों का प्रयोग होता है।अंक पद्धति भारतीय है ही।भारतीय अंक-पद्धति के सर्वश्रेष्ठ होने के कारण ही उसके साथ सर्वत्र भारतीय अंक-संकेतों का स्वागत हुआ है।भारतीय अंक संकेत अब अंतरराष्ट्रीय अंक-संकेत बन गए हैं।

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3.भारतीय अंतरराष्ट्रीय अंक का विकास (Development of Indian International Numerals):

  • आज सारे संसार में भारतीय अंक पद्धति का ही प्रयोग होता है।प्रायः सभी पुरानी अंक पद्धतियां समाप्त हो गई है और उनका स्थान भारतीय अंक पद्धति ने ले लिया है।गणित तथा विज्ञान के क्षेत्र में अंक पद्धति ही विश्व को सबसे बड़ी देन है।
  • शून्य पर आधारित दाशमिक स्थानमान अंक-पद्धति का आविष्कार वर्णमालात्मक लिपियों के अस्तित्व में आने के बाद हुआ।मुख्यतः पिछले 1500 वर्षों में ही भारत में आविष्कृत नई  स्थानमान अंक पद्धति का संसार के विभिन्न देशों में प्रचार-प्रसार हुआ है।
  • नई भारतीय अंक पद्धति का आविष्कार ईसा की आरंभिक सदियों में हुआ।ईसा की छठी सदी से इसका अभिलेखों में प्रयोग होने लगा।ईसा की दसवीं तक भारत में एक साथ नई-पुरानी पद्धतियों का प्रयोग होता रहा।
  • नई पद्धति में शून्य के संकेत के अलावा नौ अंकों या संख्याको की जरूरत पड़ती है।अतः अब किसी भी संख्या को केवल 10 अंक संकेतों से लिखा जा सकता है।नई दाशमिक स्थानमान अंक-पद्धति का आविष्कार होने के पहले दस से कहीं अधिक संख्याकों की जरूरत पड़ती थी।परंतु नई अंक-पद्धति का आविष्कार हुआ तो एक से नौ तक की संख्याओं के जो पुराने अंक संकेत थे, उन्हें यथावत रहने दिया गया।बाकी संख्यांक छोड़ दिए गए।बाद में केवल 1 से 9 तक के संख्याकों का ही विकास हुआ।
  • मूल अंक-संकेत ब्राह्मी के अक्षरों के साथ-साथ इसके अंको का भी विकास होता गया।ब्राह्मी लिपि मूलतः संस्कृत या प्राकृत भाषा को लिपिबद्ध करने के लिए अस्तित्व में आई थी।लेकिन बाद में इस लिपि को अन्य भाषा परिवारों की भाषाओं के लिए भी अपनाया गया।दक्षिण भारत की द्रविड़ परिवार की तमिल,तेलुगु,कन्नड़ और मलयालम भाषाओं के लिए भी ब्राह्मी लिपि को अपनाया गया।आज जिन लिपियों में यह भाषाएं लिखी जाती है वे ब्राह्मी से विकसित हुई है।दरअसल उर्दू भाषा की अरबी-फारसी के अलावा वर्तमान भारत की सभी लिपियाँ ब्राह्मी लिपि से निकली है।
  • भारतीय अंक-पद्धति के साथ भारतीय अंक संकेत भी पश्चिम एशिया के देशों में पहुंच गए थे।भारतीय उत्पत्ति के ब्राह्मी अंक-संकेतों को वहाँ गुबार अंकों का नाम दिया गया।ईसा की 9वीं-10वीं सदी में ये गुबार अंक-संकेत यूरोप के स्पेन, इटली आदि देशों में पहुंचे।आगे की चार-पाँच सदियों में यूरोप के देशों में इन अंक-संकेतों का प्रचार-प्रसार और कुछ विकास हुआ।15वीं सदी में मुद्रण की शुरुआत के बाद अंक-संकेतों के स्वरूपों में स्थायित्व आ गया यह।अब ये अंक संकेत हैं:0,1,2,3,4,5,6,7,8,9।
  • इन अंक संकेतों को अंग्रेजी भाषा की लिपि के साथ प्रयुक्त होते देखा तो आरम्भ में भारतवासियों ने समझा कि ये अंग्रेजी अंक-संकेत है।परन्तु आज हम जानते हैं कि अंग्रेजी लिपि या अंग्रेजी अंक जैसी कोई चीज नहीं है।अंग्रेजी भाषा जिस लिपि में लिखी जाती है वह रोमन (लैटिन) लिपि हैं।अंक संकेत ब्राह्मी अंक संकेतों से विकसित हुए हैं इसलिए इन्हें भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय अंक कहते हैं।

4.निष्कर्ष (Conclusion Of Indian International Numerals):

  • नई अंक पद्धति अर्थात दाशमिक पद्धति का आविष्कार भारत में हुआ।बावजूद इसके इसका लाभ भारतीय गणितज्ञों ने नहीं उठाया।यदि भारतीय गणितज्ञ नई दाशमिक पद्धति का महत्त्व समझते तो भारत की गणित और विज्ञान में दशा और दिशा बहुत उच्चकोटि की होती। नई दाशमिक पद्धति का लाभ उठाया यूरोप के गणितज्ञों ने। आधुनिक गणित का अधिकांश भाग का आविष्कार यूरोप में ही हुआ है।आज यूरोपीय गणितज्ञ भी स्वीकार करते हैं कि गणित के वर्तमान स्वरूप में नई दाशमिक पद्धति का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है।
  • अंक-संकेत उतने महत्त्वपूर्ण नहीं है,महत्त्वपूर्ण है अंक-पद्धति,दाशमिक अंक-पद्धति।इसमें दस अंकों के आधार पर बड़ी से बड़ी संख्या को लिखा जा सकता है।
  • भारतीय शासन ने 0,1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 अंक-संकेतों को भारतीय अंतरराष्ट्रीय अंको का नाम देकर स्वीकृत कर लिया है।यह एक सही कदम है।भारत में एक ही लिपि व अंक संकेतों को अपना लिया जाए तो मुद्रण सम्बन्धी कठिनाइयाँ दूर हो जाएगी साथ ही खर्च में भी कमी आएगी।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय अंक (Indian International Numerals),भारतीय दाशमिक अंक पद्धति (Indian Decimal Numeral System) के बारे में बताया गया है।

5.गणित और धन (हास्य-व्यंग्य) (Mathematics and Money) (Humour-Satire):

  • गणित अध्यापक (छात्र से):यदि एक तरफ गणित और दूसरी तरफ धन हो तो किसका चुनाव करोगे।
    छात्र (गणित अध्यापक से):धन का।
  • गणित अध्यापक (छात्र से):गलत, अगर मैं होता तो गणित का चुनाव करता।
  • छात्र:सर (Sir), हम तो गणित को पढ़ते इसलिए है ताकि गणित के ज्ञान से धन कमाया जा सके वरना गणित को हल करना दीवार से टकराने के बराबर है।दीवार में से बाहर निकलने के समान है।ऐसी स्थिति में इतनी बड़ी आफत को कौन चुनाव करेगा?

6.भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय अंक (Indian International Numerals),भारतीय दाशमिक अंक पद्धति (Indian Decimal Numeral System) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.भारतीय पद्धति का आविष्कार किसने किया? (Who Invented the Indian Decimal Numeral System?):

उत्तर:नई दाशमिक पद्धति का आविष्कार वैदिक ऋषियों तथा उपनिषद के रचयिताओं ने नहीं किया। यह किसी स्वतंत्र गणितज्ञ के दिमाग की उपज लगती है।दरअसल प्राचीन भारतीय स्वतंत्र विचारकों के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है क्योंकि उनको राज्याश्रय प्राप्त नहीं था।

प्रश्न:2.नई दाशमिक पद्धति की प्रमुख विशेषता क्या है? (What is the Main Feature of the New Decimal Numeral System?):

उत्तर:नई पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता है शून्य तथा उसको अंक संकेत का देना उच्च कोटि के गणितीय मस्तिष्क की ही देन है।इससे पता चलता है कि उस समय भारतीय गणितज्ञों का चिन्तन-मनन कितनी उच्च कोटि का रहा था।

प्रश्न:3.शून्य का उल्लेख सर्वप्रथम कहां मिलता है? (When is Zero First Mentioned?):

उत्तर:राघोली (बालाघाट जिला मध्यप्रदेश) से प्राप्त शैलवंशी राजा जयवर्धन (द्वितीय) के एक दान पत्र (8 वीं सदी के) में पहली बार शून्य का संकेत देखने को मिलता है।इसमें शून्य के लिए आजकल के जैसा लघुवृत्त है। नई अंक पद्धतियों में लिखी गई संख्या 30 में लघुवृत्त देखने को मिलता है।प्रतिहार राजा भोजमिहिर (840-881 ईस्वी) की 870 ईस्वी के आसपास की ग्वालियर से प्राप्त प्रशस्ति में भी शून्य के लिए लघुवृत्त का इस्तेमाल हुआ है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय अंक (Indian International Numerals),भारतीय दाशमिक अंक पद्धति (Indian Decimal Numeral System) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

Indian International Numerals

भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय अंक
(Indian International Numerals)

Indian International Numerals

भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय अंक (Indian International Numerals) वे हैं जो पूरे विश्व में
वर्तमान में प्रचलित हैं।भारतीय अंतर्राष्ट्रीय अंक से पूर्व विभिन्न देशों की भिन्न-भिन्न अंक पद्धति विकसित हुई।

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