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Remedial teaching for weak children

1.कमजोर बालकों के लिए उपचारात्मक शिक्षण का परिचय ( Introduction to Remedial teaching for weak children):-

कमजोर बालकों के लिए उपचारात्मक शिक्षण(Remedial teaching for weak children) में उपचारात्मक कार्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि अध्यापक छात्रों की त्रुटियों के बारे में कितने विस्तार से जानकारी रखता है। त्रुटियों की सारणी को देखकर व्यक्तिगत एवं सामूहिक त्रुटियों के उपचार की योजना तैयार की जा सकती है। यहां पर यह बता देना आवश्यक है कि त्रुटियों का उपचार तत्परता एवं शीघ्रता से किया जाना चाहिए। छात्रों की त्रुटियों को यदि समय पर दूर नहीं किया जाए तो त्रुटियां स्थायी होने लगती है तथा उपचारात्मक कार्य अधिक कठिन हो जाता है। उपचारात्मक कार्य के लिए छात्रों का वर्गीकरण भी किया जा सकता है। कमजोर एवं मन्दबुद्धि वाले छात्रों के लिए उपचारात्मक कार्य का प्रारूप प्रखर बुद्धि वाले छात्रों से भिन्न होगा। जिस प्रकार समान रोग के होने से प्रत्येक रोगी को एक सी दवा का देना आवश्यक नहीं है इसी प्रकार उपचारात्मक कार्य भिन्न-भिन्न छात्रों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार का हो सकता है। उपचारात्मक कार्य का स्वरूप अध्यापक स्वयं छात्रों की त्रुटियों के अनुसार निश्चित करे किन्तु यह आवश्यक है कि त्रुटियों का उपयुक्त समय पर उपचार हो।गणित में उपचारात्मक अध्यापन करते समय निम्नांकित बातों को ध्यान में रखा जाए-
(1.)कक्षा में गणित की समस्याओं को हल करते समय छात्रों का ध्यान विशेष रूप से उन बेसिक बातों, सिद्धांतों, क्रियाओं की ओर ध्यान खींचा जाए जिनमें छात्र त्रुटियां करते हैं।गणना सम्बन्धी त्रुटियों पर विशेष बल दिया जाए।
(2.) कमजोर छात्रों के लिए चित्रों, आकृतियों,माॅडलों, चार्टों आदि का प्रयोग कर प्रत्ययो को स्पष्ट किया जाए।
(3.) छात्रों की कक्षा में तथा कक्षा के बाद आवश्यकतानुसार व्यक्तिगत परामर्श देकर गणित को सीखने में सहायता दी जानी चाहिए।
(4.) छात्रों के लिखित कार्य का सुधार यथासंभव उनके समक्ष ही हो तथा सुधारी हुई त्रुटियों को छात्र फिर से न दोहराए।
(5.) कमजोर छात्रों को कक्षा में आगे बैठाना चाहिए।
(6.) छात्रों में शुद्ध तथा बड़ा लिखने की आदत डाली जाए जिससे उन्हें गणना करते समय सुविधा रहे।
(7.)कक्षा में दृष्टान्तीय उदाहरणों का चयन विषयवस्तु के विस्तार एवं कठिनाई के स्तर को ध्यान में रखकर किया जाए।
(8.) अंकगणित तथा बीजगणित के आधारभूत उप-विषयों को पढ़ाते समय पूरी सावधानी बरती जाए।दशमलव, अनुपात,ऐकिक नियम, समीकरण,लेखाचित्र आदि गणित के आधारभूत उप-विषय हैं जिनका व्यापक प्रयोग समस्याओं को हल करने में किया जाता है।इन उप-विषयों को अत्यन्त सावधानी से पढ़ाया जाए। समुच्चय भाषा के प्रयोग पर बल दिया जाए।
(9.) श्यामपट्ट पर लिखी हुई सामग्री व्यवस्थित,स्पष्ट और उपयोगी होनी चाहिए।श्यामपट्ट कार्य का विकास छात्रों के सक्रिय सहयोग से किया जाए।
(10.)कक्षा में छात्रों को जागरूक रखने के लिए प्रभावी प्रश्नोत्तर विधि का प्रयोग किया जाए।
(11.) समस्याओं को हल करने के पहले छात्रों को यह स्पष्ट किया जाए कि ‘क्या ज्ञात करना है?’ तथा ‘अभीष्ट उत्तर कैसे ज्ञात किया जाना चाहिए?’ समस्याओं की भाषा स्पष्ट एवं सरल हो। विश्लेषण विधि उपयोगी है।
(12.) छात्रों को कक्षा में सोचने एवं तर्क करने के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए।एक गणित की अच्छी कक्षा में छात्र स्वयं सोचते हैं तथा विभिन्न प्रक्रियाओं की उपयुक्तता की मानसिक एवं लिखित कार्य द्वारा जांच करते हैं।
(13.)प्रत्येक उप-विषय के अभ्यास प्रश्न छात्र स्वयं करें तथा विभिन्न प्रत्ययों, प्रक्रियाओं, सिद्धान्तों आदि का विवेचन करे जिससे उनमें आत्मविश्वास की भावना का विकास हो।प्रश्न जीवन की समस्याओं एवं आवश्यकताओं पर आधारित हो।

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2.कमजोर बालकों के लिए उपचारात्मक शिक्षण(Remedial teaching for weak children):-

कक्षा के वर्ग बनाते समय कमजोर बालकों को एक ही वर्ग में रखा जाए तो अध्यापक उनकी प्रगति में सहायक हो सकता है।कक्षा में कमजोर बालकों की संख्या 20 या 25 से अधिक नहीं होनी चाहिए। कमजोर छात्रों में व्यक्तिगत परामर्श द्वारा अध्ययन सम्बन्धी वांछनीय बातों का विकास किया जा सकता है। गणित में सफलता के लिए नियमित अभ्यास का कार्यक्रम आवश्यक है। कमजोर बालकों के अध्यापन को प्रभावी बनाने के लिए निम्नांकित उपाय किए जाने चाहिए-

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(1.) गणित शिक्षण में अभ्यास,स्मरण, ज्ञानोपार्जन एवं प्रयोग पर बल देना चाहिए। गणित सीखना एक सतत संक्रिया है।
(2.) दृश्य-श्रव्य उपकरणों का पर्याप्त मात्रा में प्रयोग होना चाहिए।सिद्धान्तों,सम्बन्धों एवं प्रत्ययों को मूर्तरूप देकर समझाये जाने पर इनका सफल उपचार सम्भव है सही चित्र खींचकर गूढ़ तथ्यों को बताया जाए।
(3.) समस्याओं में व्यावहारिकता का पुट देकर उन्हें जीवन की परिस्थितियों से सम्बद्ध करना आवश्यक है। कमजोर बालकों की कल्पना शक्ति कमजोर होती है तथा उन्हें अमूर्त विचारों को समझने में उनके वातावरण से सम्बन्धित तथ्यों का प्रयोग करना चाहिए। समुच्चय भाषा का प्रयोग आवश्यक है।
(4.) गणित में प्रायोगिक कार्य को कराने से कमजोर छात्रों की इस विषय में रुचि बनी रहती है। जीवन से सम्बंधित तथ्यों को महत्त्व दिया जाय।
(5.) कमजोर छात्रों को मौखिक तथा मानसिक गणित का पर्याप्त अभ्यास कक्षा में देना चाहिए।कम्प्यूटर का कक्षा में प्रयोग उपयोगी माना जाए।
(6.) खेलों तथा मनोरंजन को गणित शिक्षण का साधन बनाकर कमजोर छात्रों को गणित सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
(7.) श्यामपट्ट पर आदर्श हलों को लिखकर कमजोर छात्रों को हल करने की विधियों को सिखाया जाना चाहिए।
(8.) मन्दबुद्धि छात्रों को हतोत्साहित नहीं करना चाहिए। उन्हें छोटे-छोटे प्रश्नों को कराकर क्रियाशील बनाए रखना चाहिए।
(9.) लिखित कार्य की मात्रा अधिक कराने से कमजोर छात्रों के चिन्तन में स्पष्टता आती है।प्रत्येक समस्या को अनेक बार हल करना गणित अध्ययन में लाभकारी है।
उपर्युक्त बातों पर अमल करके कमजोर बालकों के लिए उपचारात्मक शिक्षण(Remedial teaching for weak children) कराया जा सकता है।इन बातों को धीरे-धीरे पालन करके कमजोर बालकों के लिए उपचारात्मक शिक्षण(Remedial teaching for weak children) प्रभावी रूप से किया जा सकता है।

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