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Sulvasutra and Geometry

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2 2.शुल्वसूत्र और रेखागणित (Sulvasutra and Geometry),सुल्वसूत्र (Sulvasutra),सुल्ब सूत्र (Sulba sutras),सुल्बसूत्र‌ (Sulbasutra):

 1.शुल्वसूत्र और रेखागणित का परिचय (Introduction to Sulvasutra and Geometry),शुल्वसूत्र और रेखागणित का आपस में क्या संबंध है?(What is the relation between Sulvasutra and Geometry?):

  • शुल्वसूत्र और रेखागणित (Sulvasutra and Geometry) जानने के लिए हमें भारत में गणित के इतिहास पर दृष्टिपात करना होगा।असल में गणित उतना ही प्राचीन है जितना की मनुष्य।आज से लगभग पांच लाख वर्ष पहले मनुष्य का इस पृथ्वी पर उदय हुआ।मनुष्य ने अपने हाथ में डंडा पकड़ा।इससे उसके हाथ को शक्ति मिली।मनुष्य ने फिर पत्थरों से हथियार बनाए।उसने आग की खोज की।डंडा,पत्थर के हथियार और अग्नि प्राचीन मानव के आविष्कार थे।
  • लाखों वर्ष तक मनुष्य पत्थर के हथियारों का प्रयोग करता रहा।फिर उसने तांबे की खोज की।तांबे के साथ करीब दस प्रतिशत रांगा मिलाने से कांसा बनता है।कांसे या पीतल के हथियार तांबे के हथियारों से अधिक मजबूत होते हैं।तांबे और कांसे की खोज एक बहुत बड़ा आविष्कार था।आज से लगभग पांच हजार साल पहले की भारत की सिन्धु सभ्यता के लोग तांबे और कांसे के ही औजार बनाते थे।उस समय पत्थरों के औजारों का भी प्रयोग होता था।लेकिन उस समय अभी लोहे के औजारों का ज्ञान नहीं हुआ था।
  • फिर भी सिन्धु-सभ्यतावालों ने बहुत उन्नति की थी।उनके मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे बड़े-बड़े नगर थे।इन नगरों की सड़कें चौड़ी और सीधी होती थी।पानी के निकास के लिए नालियां बनी थी।योजना के अनुसार मकान बनते थे।इन सब बातों से पता चलता है कि उस समय के लोगों को अंकगणित और रेखागणित का अच्छा ज्ञान था।वे लोग लिखना भी जानते थे।सिन्धु सभ्यतावालों को आकाश के ग्रह-नक्षत्र,औषधियों आदि का अच्छा ज्ञान रहा होगा।
  • कई विद्वान,आर्य लोगों को मध्य एशिया से अथवा बाहर से आए हुए मानते हैं।परन्तु हमारा विचार है कि आर्य यहीं के निवासी थे तथा जिस तरह बौद्ध और जैन धर्म का भारत में विकास हुआ उसी प्रकार आर्यों का विकास हुआ।
  • बौद्ध धर्म के भारत में पनपने का मूल कारण उस समय प्रचलित वैदिक कर्मकाण्डों के प्रति लोगों का असन्तोष था।उस समय ब्राह्मण धर्म का बोलबाला था जिसमें कर्मकाण्ड,यज्ञ तथा बलि प्रथा की प्रधानता थी।पशु यहां तक कि मनुष्यों की बलि देने में भी किसी प्रकार का संकोच नहीं होता था।हिंसा के इस भयानक वातावरण में अहिंसा पर आधारित बौद्ध धर्म भारत में लोकप्रिय हुआ।
  • उसी प्रकार आर्य लोगों का उदय हुआ हो क्योंकि लोग उस समय इधर-उधर भटकते,खुले आकाश के नीचे रहते थे और अपना जीवनव्यापन करते थे।ऐसे समय में जब मानव में असंतोष,जीवनव्यापन के लिए बहुत श्रम करना पड़ता हो तब शांति और संतोष के लिए सभ्यता,संस्कारों व आध्यात्मिक ज्ञान की आवश्यकता होती है।आर्य लोगों द्वारा इसी आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए उनका प्रादुर्भाव हुआ हो।
  • भारतीय वैदिक संस्कृति संसार की मूल संस्कृति है।आर्य यहां के मूलनिवासी थे।इस देश का नाम आर्यावर्त था।यहां से दर्शन,धर्म,गणित,आयुर्वेद तथा ज्ञान-विज्ञान इत्यादि का प्रसार सारे संसार में हुआ और फिर लौटकर हमारे देश में वापिस आया।इस प्रकार भारतीय वैदिक संस्कृति सर्व समावेशी संस्कृति है।भारतीय संस्कृति बहुत विशाल,व्यापक,उदार है।
  • आर्यो का मुख्य धर्म था यज्ञकर्म।कई प्रकार के यज्ञ होते थे। इनमें देवताओं के लिए आहुतियां दी जाती थी।आर्यलोग यज्ञ करके अपने देवताओं को खुश करने का प्रयत्न करते थे।इसलिए इन यज्ञों का उनके लिए बड़ा महत्त्व था।
  • साढे तीन हजार साल पहले आर्यों के जीवन तथा धर्म-कर्म के बारे में वेदों में जानकारी मिलती है।बाद में इस देश में फैल जाने पर आर्यों ने यज्ञ कर्म के बारे में बहुत सारे नियम बनाए।यज्ञ किस समय करना चाहिए,कैसे करना चाहिए आदि के बारे में उन्होंने पुस्तकें लिखी।इन्हीं पुस्तकों में हमें उस समय के विज्ञान के बारे में जानकारी मिलती है।
  • उस समय के लोग खुले आकाश के नीचे विचरण करते थे। इससे उन्हें सूरज,चांद और सितारों की गतियों का अच्छा ज्ञान हो गया था।इन्हीं गतियों के आधार पर वे समय का हिसाब रखते थे।यज्ञ के लिए समय का बड़ा महत्त्व था। इसलिए उस समय ज्योतिष पर कुछ पुस्तकें लिखी गई।उस समय की लिखी हुई इसी प्रकार की एक पुस्तक है- वेदांग-ज्योतिष।यह पुस्तक महात्मा लगध ने लिखी थी।
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2.शुल्वसूत्र और रेखागणित (Sulvasutra and Geometry),सुल्वसूत्र (Sulvasutra),सुल्ब सूत्र (Sulba sutras),सुल्बसूत्र‌ (Sulbasutra):

  • यज्ञों के लिए नाना आकार-प्रकार की वेदियां बनती थी।यज्ञ कई प्रकार के होते थे।उसी प्रकार वेदियां भी कई प्रकार की होती थी।हर यज्ञ के लिए एक खास प्रकार की वेदी बनाई जाती थी।उस समय के लोगों का विश्वास था कि यदि यज्ञ की वेदी नियम के अनुसार न बने तो यज्ञ का फल नहीं मिलता,उलट हानि होती है।वेदियां रेखागणित के नियम के अनुसार बनती थी।इस प्रकार हमारे देश में रेखागणित के अध्ययन की शुरुआत हुई।
  • वेद थोड़े पुराने पड़ गए तो उन्हें समझने के लिए शास्त्रों का निर्माण किया गया।भाषा समझने के लिए व्याकरण की पुस्तक लिखी गई।आकाश के ग्रह-नक्षत्रों की गतियों को समझने के लिए ज्योतिष की पुस्तकें लिखी गई।इसी प्रकार धर्म-कर्म के नियमों को समझाने के लिए भी पुस्तकें लिखी गई।धर्म-कर्म और यज्ञ आदि के नियमों को समझाने के लिए जो पुस्तकें लिखी गई उन्हें कल्पसूत्र कहते हैं।इस प्रकार छह शास्त्रों यानी विषयों पर पुस्तकें लिखी गई।इन छह शास्त्रों को वेदों के अंग या वेदांग कहते हैं।
  • कल्पसूत्रों में धर्म-कर्म के नियम बताए गए हैं।इन कल्पसूत्रों के एक प्रकरण में यज्ञों की वेदियां बनाने के नियम दिए गए हैं।जिन प्रकरणों या पुस्तकों में वेदियों के निर्माण के नियम बताए गए हैं उन्हें शुल्वसूत्र कहते हैं।’शुल्व’ का अर्थ है रस्सी या रस्सी से मापना।वेदियों की लंबाई,चौड़ाई और ऊंचाई को रस्सी या धागों से मापा जाता था इसलिए जिन पुस्तकों में इनके बारे में नियम दिए गए उन्हें शुल्वसूत्रों का नाम मिला। दरअसल इन्हीं शुल्वसूत्रों में हमारे देश का प्राचीन रेखागणित देखने को मिलता है।
  • महावेदी (Mahavedi):
  • वेदियों में महावेदी को विशेष महत्त्व था।यह समद्विबाहु-समलम्ब (चतुर्भुज) के आकार की होती थी (अबकड चतुर्भुज)।इसकी आधार रेखा 30 प्रक्रम (पद या कदम) होती थी;सामने की लम्बाई 24 प्रक्रम और ऊंचाई 36 प्रक्रम।अक भुजा सदैव पूर्व की ओर रहती थी।
  • शुल्व सूत्रकार ने महावेदी के निर्माण के चार तरीके दिए जो शुल्व प्रमेय (पाइथेगोर का प्रमेय)पर आधारित है।आज स्कूल का कोई भी विद्यार्थी इस वेदी को आसानी से बना सकता है।इस महावेदी की रचना से कई प्रकार के वर्गमूल भी प्राप्त किए जा सकते हैं जिन्हें ऊपर की आकृति में दिया गया है।
  • पुराने जमाने में वेदों के अध्ययन की कई शाखाएं थीं।हर शाखा ने अपने-अपने वेदांग-ग्रंथों की रचना की।इस प्रकार पुराने जमाने में कई शुल्वसूत्र लिखे गए थे।पर आज वे सारे शुल्वसूत्र नहीं मिलते।आज केवल 7 शुल्वसूत्र ही मिलते हैं। इनके नाम हैं: बौधायन-शुल्वसूत्र,आपस्तंब-शुल्वसूत्र,कात्यायन-शुल्वसूत्र,मानव-शुल्वसूत्र,मैत्रायणी-शुल्वसूत्र,वराह-शुल्वसूत्र,वाधुल-शुल्वसूत्र और हिरण्यकेशिन-शुल्वसूत्र (आपस्तम्ब शुल्ब सूत्र से मिलता-जुलता)।बौधायन,आपस्तंब,कात्यायन आदि इन शुल्वसूत्रों के लेखकों के नाम है।इस प्रकार बौधायन,आपस्तंब आदि हमारे देश के प्राचीन ज्यामितिकार हैं।इन शुल्वसूत्रों में वेदी बनाने के नियम लगभग एक से ही है।इन सात शुल्वसूत्रों में बौधायन का शुल्वसूत्र संभवतः सबसे प्राचीन है।बौधायन,कात्यायन आदि के जीवन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती।
  • सवाल यह है कि ये शुल्वसूत्र कब लिखे गए?आज से करीब साढे तीन हजार साल पहले वेदों की रचना हो चुकी थी।वेदों के चार-पांच सौ साल बाद इन शुल्वसूत्रों की रचना हुई होगी।विद्वानों का अनुमान है कि आज से ढाई-तीन हजार साल पहले ये शुल्वसूत्र लिखे जा चुके थे।जो भी हो इतना निश्चित है कि यूनान के प्रसिद्ध गणितज्ञ पाइथागोरस (ईसा पूर्व छठी सदी) और यूक्लिड (लगभग 300 ईसा पूर्व) के पहले हमारे देश में ये शुल्वसूत्र लिखे जा चुके थे।इन्हीं शुद्धसूत्रों में हमारे देश की प्राचीन ज्यामिति के दर्शन होते हैं।उस काल की इस ज्यामिति को हम शुल्व-विज्ञान कह सकते हैं।
  • आजकल का ज्यामिति शब्द यूनानी शब्द ‘ज्याॅमिट्री’ से बना है।पुराने जमाने में हमारे देश में ज्यामिति को रेखागणित कहते थे।यूनानियों ने मिस्र और बेबीलोनवालों से ज्यामिति तथा ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त किया था।ईसा पूर्व सातवीं-छठी शताब्दी के यूनानी विद्वान थेल और उनके शिष्य पाइथागोरस ने यूनान में ज्यामिति की नींव रखी।बाद में तीन सौ ईसा पूर्व के आसपास यूनानी गणितज्ञ यूक्लिद ने ज्यामिति के बारे में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।आज सारे संसार में जो ज्यामिति पढ़ाई जाती है,वह थोड़े हेरफेर के साथ मूलतः यूक्लिद की ही ज्यामिति है।
  • इसका मतलब यह नहीं है कि पुराने जमाने में हमारे देश में ज्यामिति या रेखागणित का अध्ययन नहीं होता था।सबसे पहले हमें शुल्वसूत्रों के नियम देखने को मिलते हैं।बाद में हमारे देश के आर्यभट,ब्रह्मगुप्त,भास्कराचार्य आदि महान् गणितज्ञों ने रेखागणित के बारे में बहुत-कुछ लिखा।पर हमारे देश में अंग्रेजी शिक्षा चालू हो जाने से यूक्लिद की ज्यामिति पढ़ाई जाने लगी।असल में यूक्लिद की ज्यामिति में कई गुण हैं। उसमें धर्म-कर्म की बातें नहीं है।यूक्लिड ने तर्कशास्त्र के नियमों में बड़े ही सुन्दर ढंग से ज्यामिति को रचा है।इसलिए आज भी सारे संसार में ज्यामिति का अध्ययन उसी ढंग से होता है।
  • पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यूक्लिद से पहले हमारे देश में ज्यामिति का अध्ययन होता था और ज्यामिति के कई नियम खोजे गए थे।उदाहरण के लिए ज्यामिति का एक प्रसिद्ध प्रमेय लो।यह प्रमेय है-किसी भी आयत के विकर्ण पर खींचा गया वर्ग क्षेत्रफल में उन दोनों वर्गों के योग के समान होता है जो दोनों भुजाओं पर खींचे जाएं।यह नियम ‘पाइथागोर का नियम’ के नाम से प्रसिद्ध है।पर ज्यामिति का‌ यह प्रसिद्ध प्रमेय हमारे शुल्वसूत्रों में भी देखने को मिलता है।इसी नियम को बौधायन ने निम्न प्रकार से उस समय की संस्कृत भाषा में यों लिखा है-
  • “दीर्घचतुरस्रस्याक्ष्णयारज्जु: पार्श्वमानी तिर्य्यङ्मानी च यत्पृथकग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति।”
  • अर्थात् दीर्घचतुश्र (आयत) की आक्षण्या रज्जु (कर्ण) पर बना क्षेत्र (वर्ग) पार्श्वगामी (आधार) तथा तिर्यङ्मानी (लम्ब) पर बने क्षेत्र (वर्ग) के योग के बराबर होता है।
  • पाइथेगोर के प्रमेय का एक नतीजा यह निकलता है कि किसी भी समकोण त्रिभुज में इसके कर्ण की लम्बाई का वर्ग इसकी शेष दो भुजाओं की लम्बाइयों के वर्गो के योग के बराबर होता है।जैसे किसी समकोण त्रिभुज की दो भुजाएं क्रमशः 3 और 4 लम्बाई की हैं और कर्ण की लम्बाई 5 है तो इन तीनों लम्बाइयों के बीच का सम्बन्ध-सूत्र होगा: 5^{2}=3^{2}+4^{2}
  • ज्यामिति में यह सूत्र बड़े उपयोग का है।आज हमें बताया जाता है कि इस सूत्र की खोज पाइथेगोर ने की थी।पर हम देखते हैं कि आज से ढ़ाई हजार साल पहले हमारे शुल्वसूत्रकार इस सूत्र की खोज कर चुके थे।शुल्वसूत्रों में निम्न प्रकार के अनेक सम्बन्ध-सूत्र देखने को मिलते हैं: 9^{2}+12^{2}=15^{2} \quad ,12^{2}+16^{2}=20^{2} इत्यादि।
  • पाइथेगोर को विश्वास था कि संसार की सारी वस्तुओं को संख्याओं में व्यक्त किया जा सकता है।इसीलिए उन्होंने कहा था कि यह संसार संख्यामय है।वे तथा उनके शिष्य संख्याओं के भक्त थे।उनका विचार था कि सभी लम्बाइयों को ठीक-ठीक मापा जा सकता है।पर बाद में पता चला कि उनका यह ख्याल सही नहीं है।इस बात को समझने के लिए ऐसा त्रिभुज लो जिसकी दो भुजाएं एक-एक लम्बाई की हों।तब स्वयं पाइथेगोर के नियम के अनुसार इस त्रिभुज के कर्ण की लम्बाई होगी
  • 1^{2}+1^{2}=2 का वर्गमूल।
  • पर दो का वर्गमूल जानना संभव नहीं है।’वर्गमूल 2′ को आज हम \sqrt{2} के रूप में लिखते हैं।गणितज्ञों ने ऐसी संख्याओं को अपरिमेय संख्याओं का नाम दिया।
  • कहते हैं कि पाइथेगोर को जब इन अपरिमेय संख्याओं का पता चला तो उसने इनकी जानकारी को गुप्त रखा था।इनकी खोज होने पर उसने एक बैल की बलि भी दी थी।इन संख्याओं के बारे में यदि लोगों को पता चलता तो वे पाइथेगोर के सिद्धान्त का मजाक जो उड़ाते।
  • पर हमारे शुल्वसूत्रकारों को इन अपरिमेय संख्याओं का अच्छा ज्ञान था।वे वर्गमूल के लिए ‘करणी’ शब्द इस्तेमाल करते थे और \sqrt{2} को ‘करणी 2’ के रूप में लिखते थे।शुल्वसूत्र में ‘करणी 2’ के लिए मान मिलता है:
  • \sqrt{2}=1+\frac{1}{3}+\frac{1}{3 \times 4}-\frac{1}{3 \times 4 \times 34}
  • \sqrt{2}=1.41421356
  • आधुनिक गणना के अनुसार: \sqrt{2}=1.41421356
  • इसलिए प्रकार हम देखते हैं कि उस जमाने में हमारे देश के शुल्वसूत्रकारों को यूक्लिद की ज्यामिति के कई नियम ज्ञात थे।तरह-तरह के आकारों की वेदियां बनानी पड़ती थी।खास अवसरों के लिए खास प्रकार के यज्ञ करने के नियम थे। वेदियों के आकार निश्चित कर दिए गए थे।जैसे गार्हपत्य यज्ञ के लिए वेदी का आकार वर्गाकार होता था।आहवनीय यज्ञ के लिए वेदी का आकार वृत्ताकार होता था।दक्षिण-यज्ञ के लिए वेदी अर्धवृत्ताकार होती थी।
  • कभी-कभी एक प्रकार आकार की वेदी को दूसरे आकार की वेदी में बदलना पड़ता था,पर क्षेत्रफल ज्यों का त्यों बनाए रखना पड़ता था।जैसे वर्गाकार वेदी को वृत्ताकार वेदी में बदलना।इस प्रकार वेदियों के निर्माण के लिए शुल्वसूत्रों में दर्जनों नियम दिए गए हैं।यहां एक बात हमें जान लेनी चाहिए कि शुल्वसूत्रकारों ने वेदियों की रचना के तरीके तो बतलाएं हैं किन्तु रचना के इन तरीकों के बारे में हमें पता नहीं चलता कि उन्होंने इन तरीकों को कैसे खोज निकाला।
  • लेकिन यूक्लिद की ज्यामिति तार्किक नियमों पर आधारित है।यूक्लिद की ज्यामिति शुद्ध ज्यामिति है।यही कारण है कि आज भी यूक्लिद की ज्यामिति संसार भर के स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई जाती है।पर हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि यूक्लिद के पहले हमारे देश में ज्यामिति के कई महत्त्वपूर्ण नियम खोजे जा चुके थे और उस समय हमारे देश में ज्यामिति शुल्व-विज्ञान के रूप में जानी जाती थी।
  • उपर्युक्त विवरण में शुल्वसूत्र और रेखागणित (Sulvasutra and Geometry) के बारे में बताया गया है।

3.शुल्वसूत्र और रेखागणित का निष्कर्ष (Conclusion of Sulvasutra and Geometry):

  • शुल्वसूत्र ने वेदियों की रचना के तरीकों अर्थात् तार्किक नियमों का हमें पता नहीं चलता है।हमारे देश में आर्यभट के समय से गणित के सही अध्ययन का प्रारम्भ हो गया था।इसी क्रम में भास्कराचार्य प्राचीन भारत के अन्तिम महान् गणितज्ञ हुए थे।
  • इसके पश्चात् लगभग सात सौ साल तक कोई उच्च कोटि का गणितज्ञ पैदा नहीं हुआ है।इसके दौरान जो विद्वान पैदा हुए उन्होंने वेद,ब्राह्मण,स्मृति आदि पुराने ग्रन्थों को अन्तिम सत्य मान लिया।इस प्रकार की सोच से ज्ञान-विज्ञान की उन्नति रूक गई।इसी प्रकार की सोच को अन्धविश्वास,रूढ़िवादिता कहते हैं।
  • विद्वानों ने जो ग्रन्थ लिखे वे सामान्य जनता की भाषा में नहीं लिखे गए।ज्ञान-विज्ञान की भाषा अर्थात् संस्कृत भाषा जनसामान्य की भाषा न होने के कारण ज्ञान-विज्ञान का प्रसार नहीं हो सका।नए-नए विद्वान तैयार नहीं हो सके।उच्च वर्ग के लोग ही ज्ञान-विज्ञान के मठाधीश बन बैठे।खंडन-मंडन की परम्परा का अन्त हो गया।खण्डन-मण्डन से गणित-विज्ञान का विकास हो सकता था।आज इसी कारण पाश्चात्य देशों में आधुनिक गणित का विकास बहुत हो सका है।आज केवल पुरातन ज्ञान पर निर्भर रहकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता है।
  • हमारे देश में अन्धविश्वास और रूढ़िवादिता ने जोर पकड़ लिया तो विद्वानों का उसे विरोध नहीं बन पड़ा।दरअसल प्राचीन काल में विद्वान राज्याश्रय पाकर अपनी जीविका चलाते थे।आर्यभट और भास्कराचार्य जैसे स्वतन्त्र विचारों के गणितज्ञ बहुत कम होते थे।राज्याश्रय पाए हुए ब्राह्मण विद्वान स्वतन्त्र विचारों के विद्वानों को पनपने नहीं देते थे।राज्याश्रय पाए हुए विद्वान् राजा-महाराजाओं की प्रशंसा में लिखते थे और सोचते थे।भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था।भारतीय राजा-महाराजा आपस में लड़ाईयां करते-रहते थे।इसी आपसी कलह,फूट तथा जांत-पांत के कारण आपसी कलह और भेदभाव का लाभ उठाकर तुर्कों और अफगान शासकों ने भारत के काफी हिस्से पर अधिकार जमा लिया।
  • विदेशी आक्रांताओं ने यहां की बौद्धिक संपदा तक्षशिला व नालन्दा विश्वविद्यालयों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।फलस्वरूप हमारा विपुल साहित्य नष्ट-भ्रष्ट हो गया।आज हम प्राचीन साहित्य से वंचित इसीलिए हैं।नींव के आधार पर ही भवन खड़ा होता है।जब नींव अर्थात् हमारा प्राचीन साहित्य ही नष्ट-भ्रष्ट हो गया तो भवन अर्थात् आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का साहित्य कैसे रचा जा सकता है।
  • भारत में आध्यात्मिक क्षेत्र में विकास करते-करते भौतिक क्षेत्र को भुला बैठे।भौतिक क्षेत्र को खाली छोड़ दिया। जबकि अध्यात्म और भौतिकवाद दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।पूरे के पूरे अध्यात्म को पाखंडवाद ने जकड़ लिया।अध्यात्म खो गया।धर्म के स्थान पर धन के पीछे भागने लगे।इसलिए भौतिक क्षेत्र में ज्ञान-विज्ञान की उन्नति से वंचित होते गए।फलस्वरूप विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण का सामना करने में भारत सक्षम नहीं रहा।विदेशी आक्रान्ता भौतिक ज्ञान के बल पर तोपखाने तथा आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों से लड़ रहे थे जबकि भारतीय राजा-महाराजा अपने पुरुषार्थ के बल पर लड़ रहे थे।भारतीय शासक मरना तो जानते थे परन्तु विदेशी शासकों की तरह लड़ना नहीं जानते थे।इसका खामियाजा देश व देश के नागरिकों को भुगतना पड़ा जिसके फलस्वरूप भारत अनेक शताब्दियों तक गुलाम रहा।फलस्वरूप भारत गणित के ज्ञान (ज्ञान-विज्ञान) में पिछड़ गया।इसी कारण भारत को आज कई मूलभूत चीजों के लिए विदेशों का सहयोग लेना पड़ता है।
  • उपर्युक्त विवरण में शुल्वसूत्र और रेखागणित में संबंध (Relation between Sulvasutra and Geometry)‌ की समीक्षा की गई है।

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4.भारतीय गणितज्ञ,भारतीय गणित के ग्रन्थ और भारतीय गणित के केन्द्र (Indian Mathematicians,Texts of Indian Mathematics and Center of Indian Mathematics):

भारतीय गणितज्ञ (Indian Mathematician):

(1.)प्राचीन भारतीय गणितज्ञ (Ancient Indian Mathematician):

  • आपस्तम्ब · बौधायन · वररुचि कात्यायन · मानव · पाणिनि · पिंगल · याज्ञवल्क्य,आर्यभट्ट प्रथम · आर्यभट्ट द्वितीय · भास्कर प्रथम · भास्कर द्वितीय · मेल्पत्तूर नारायण भट्टतिरि · ब्रह्मदेव · ब्रह्मगुप्त · वृहद्देशी · हलायुध · ज्येष्ठदेव · 

(2.)क्लासिकी‌ भारतीय गणितज्ञ (Classical Indian Mathematician):

  • संगमग्राम के माधव · महावीराचार्य · हेमचन्द्राचार्य · महेन्द्र सूरी · मुनीश्वर · नारायण पण्डित · परमेश्वर · अच्युत पिषारटि · जगन्नाथ सम्राट · नीलकण्ठ सोमयाजि · श्रीपति · श्रीधराचार्य · गंगेश उपाध्याय · वाराहमिहिर · शंकर वरियार · वीरसेन · लगध · कृपाराम · बकुल कायस्थ
  • रामचन्द्र लाल · श्रीराम शंकर अभयंकर · ए ए कृष्णस्वामी अयंगर · राज चन्द्र बोस · सत्येन्द्र नाथ बोस · हरीशचन्द्र · सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर · राधानाथ सिकदर · डी के रायचौधुरी · सर्वदमन चावला · नरेन्द्र करमरकर · प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस · शंकर बालकृष्ण दीक्षित · अमीय चरण बैनर्जी .

(3.)आधुनिक भारतीय गणितज्ञ (Modern Indian Mathematician):

  • विजय कुमार पटौदी · श्रीनिवास रामानुजन् · कालिमपुडी राधाकृष्ण राव · ऍस ऍन राय · ऍस ऍस श्रीखण्डे · नवीन ऍम सिंघी · मतुकुमल्ली वी सुब्बाराव · ऍस आर श्रीनिवास वर्धन · शकुन्तला देवी · प्रभु लाल भटनागर · गणेश प्रसाद · स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ · सुधाकर द्विवेदी · जयन्त नार्लीकर · कमलाकर · कनकनहल्ली रामचन्द्र·चन्द्रकान्त राजू ·मंजुल भार्गव  ·अन्य

भारतीय गणित के ग्रन्थ (Texts of Indian Mathematics):

(1.)प्राचीन भारतीय गणित के ग्रन्थ (Texts of Ancient Indian Mathematics):

  • ललितविस्तर सूत्र · आर्यभटीय · आर्यभट्ट सिद्धांत · लीलावती  · बख्शाली पाण्डुलिपि · ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त · पाटीगणित · करणपद्धति · महासिद्धान्त · पौलिष सिद्धांत · पितामह सिद्धान्त · सिद्धान्त शिरोमणि · सद्रत्नमाला · सूर्य सिद्धान्त · लोकविभाग · तन्त्रसंग्रह · वशिष्ठ सिद्धान्त · वेण्वारोह · युक्तिभाषा · यवनजातक · दशगीतिका · गणित कौमुदी · वैदिक गणित (पुस्तक)

प्राचीन भारतीय गणित के सिद्धान्त एवं संकल्पनाएँ (Principles and Concepts of Ancient Indian Mathematics):

  • शून्य · अनन्त · बौधायन प्रमेय · कटपयादि · भूतसंख्या · शुल्ब सूत्र · बौधायन का शुल्बसूत्र · हेमचन्द्र श्रेणी · आदर्श जादुई वर्ग · भटनागर-ग्रॉस-क्रुक ऑपरेटर · कुट्टक · चक्रवाल विधि · ज्या · आर्यभट की ज्या सारणी · भास्कर प्रमेयिका · माधव श्रेणी · मेरु प्रस्तार · म्लेच्छित विकल्प · ब्रह्मगुप्त प्रमेय · ब्रह्मगुप्त सर्वसमिका

गणित के इतिहासकार  (Historian of Mathematics):

  • टी ए सरस्वती अम्मा · ए॰ ए॰ कृष्णस्वामि अय्यंगार · सुधाकर द्विवेदी · राधा चरण गुप्त · के वी शर्म · बापूदेव शास्त्री · प्रबोध चन्द्र सेनगुप्त

भारतीय गणित के केन्द्र (Indian Mathematics Center):

(1.)प्राचीन भारतीय गणित के केन्द्र (Center of Ancient Indian Mathematics):

  • केरलीय गणित सम्प्रदाय · जन्तर मन्तर (जयपुर) · जंतर मंतर, उज्जैन · जंतर मंतर, मथुरा · जंतर मंतर, दिल्ली

(2.)आधुनिक भारतीय गणित संस्थान (Modern Indian Institute of Mathematics):

  • भारतीय सांख्यिकी संस्थान · चेन्नई गणितीय संस्थान · गणितीय विज्ञान संस्थान, चेन्नै · भारतीय विज्ञान संस्थान · हरीशचंद्र अनुसंधान संस्थान · भास्कराचार्य प्रतिष्ठान · रामानुजन प्रगत गणित अध्ययन संस्थान · टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान · होमी भाभा विज्ञान शिक्षा केन्द्र

5.शुल्वसूत्र और रेखागणित (Sulvasutra and Geometry) के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.सुल्बसूत्र का क्या अर्थ है? (What is the meaning of Sulbasutras?):

उत्तर:सुलबासूत्र वेदों के परिशिष्ट हैं जो वेदियों के निर्माण के नियम देते हैं।यदि अनुष्ठान बलिदान को सफल होना था तो वेदी को बहुत सटीक माप के अनुरूप होना था।

प्रश्न:2.सुल्बसूत्र का उद्देश्य और उत्पत्ति क्या थी? (What were the purpose and origin of Sulbasutra?):

उत्तर:उद्देश्य और उत्पत्ति।शुलबा सूत्र श्रौत सूत्र नामक ग्रंथों के बड़े संग्रह का हिस्सा हैं, जिन्हें वेदों का परिशिष्ट माना जाता है।वे वैदिक काल से भारतीय गणित के ज्ञान के एकमात्र स्रोत हैं।अद्वितीय अग्नि-वेदी आकृतियाँ देवताओं के अनूठे उपहारों से जुड़ी थीं।

प्रश्न:3.सुल्वसूत्र किसने लिखा था? (Who wrote Sulvasutra?):

उत्तर:बौधायन
चार प्रमुख सुलवा सूत्र, जो गणितीय रूप से सबसे महत्वपूर्ण हैं,वे बौधायन,मानव,आपस्तंब और कात्यायन द्वारा रचित हैं।उनमें से सबसे पुराना बौधायन का है और 600 ईसा पूर्व का है।वे पाइथागोरस प्रमेय और पाइथागोरस त्रिक के मामलों पर चर्चा करते हैं।
प्रश्न:4.बौधायन प्रमेय क्या है? (What is the Baudhayana Theorem?):
उत्तर:बौधायन सुल्व सूत्र (1000 ईसा पूर्व) को आज पाइथोगोरस प्रमेय के रूप में जाना जाता है, जिसमें कहा गया है कि एक समकोण त्रिभुज में, कर्ण का वर्ग अन्य दो भुजाओं के वर्गों के योग के बराबर होता है।

प्रश्न:4.वैदिक गणित में कितने सूत्र हैं? (How many sutras are there in Vedic Maths?):

सोलह सूत्र
उत्तर:पुस्तक में सोलह सूत्र और तेरह उप-सूत्रों के रूप में रूपक सूत्र हैं, जो कृष्ण तीर्थ ने महत्वपूर्ण गणितीय उपकरणों के लिए संकेत देने का दावा किया था।

प्रश्न:5.भारत में ज्यामिति का आविष्कार किसने किया? (Who invented geometry in India?):

उत्तर:गणितज्ञ भास्कर
लेकिन भारतीय गणितज्ञ भास्कर ने 500 साल पहले ही लाइबनिज के कई विचारों की खोज कर ली थी।भास्कर ने बीजगणित,अंकगणित,ज्यामिति और त्रिकोणमिति में भी प्रमुख योगदान दिया।

प्रश्न:6.16 सूत्र क्या हैं? (What are the 16 sutras?),वैदिक गणित में सुल्ब सूत्र (Sulba sutras in vedic maths):

उत्तर:वैदिक गणित के सोलह सूत्र एवं उनके अर्थ
The 16 Sutras of Vedic Math
(1.)एकाधिकेन पूर्वेण (Ekadhikina Purvena)-पहले से एक अधिक द्वारा (By one more than the previous one)
(2.)निखिलं नवतश्चरमं दशत:(Nikhilam Navatashcaramam Dashatah-(सभी नौ में से परन्तु अन्तिम दस में से(All from nine and last from ten)
(3.)उर्ध्वतिर्यग्भ्याम् (Urdhva-Tiryagbyham)-सीधे (खड़े) और तिरछे दोनों ‌प्रकार से (Vertically and Crosswise)
(4.)परावर्त्य योजयेत (Paraavartya Yojayet)-पक्षातरण का उपयोग करके (Transpose and Apply)
(5.)शून्यं साम्यसमुच्चये (Shunyam Saamyasamuccaye)-समुच्चय समान होने पर शून्य होता है (When the Samuchaya’s are the same,that ‘Samuchaya’ is zero)
(6.)आनुरूप्ये शून्यमन्यत् [(Anurupye) Shunyamanyat]-अनुरूपता होने पर दूसरा शून्य होता है (If one is in ratio,the other one is zero)
(7.)संकलनव्यकलनाभ्याम् (Sankalana-vyavakalanabhyam)-जोड़कर और घटाकर (By addition and subtraction)
(8.)पूरणापूरणाभ्याम् (Puranapuranabyham)-अपूर्ण को पूर्ण करके (By completing)
(9.)चलनकलनाभ्याम् (chalanakalanaabhyaam)-चलन-कलन के द्वारा (By Calculus)
(10.)यावदूनम (yaavadoonam)-जितना कम है अर्थात् विचलन(The deficiency)
(11.)व्यष्टिसमष्टि (vyashtisamashti)-एक को पूर्ण तथा पूर्ण को एक मानते हुए (Whole as one and one as whole)
(12.)शेषाण्यकेन चरमेण (sheshaanyaken charamen)-अंतिम अंक से अवशेष (Remainder by the last digit)
(13.)सोपान्त्यद्वयमन्त्यम् (sopaantyadvayamantyam)-अंतिम और अंतिम का दुगुना (Ultimate and twice the penultimate)
(14.)एकन्यून पूर्वेण (ekanyoon poorven)-पहले से एक कम के द्वारा (By one than the previous one)
(15.)गुणित समुच्चय (gunit samuchchay)-गुणितों का समुच्चय (The whole product)
(16.)गुणक समुच्चय (gunak samuchchay)-गुणकों का समुच्चय (Set of multipliers)

प्रश्न:7.जीवा के सुलबासूत्र नियम (sulbasutras rules of chord):

उत्तर:एक वृत्त की जीवाओं के गुणों में निम्नलिखित हैं:जीवाएँ केंद्र से समान दूरी पर होती हैं यदि और केवल यदि उनकी लंबाई समान हो।

प्रश्न:8.सूत्र और उपसूत्र कितने हैं? (How many sutras and Upasutras are there?):

उत्तर:वैदिक गणित का निर्माण 16 सूत्रों (sutras) और 14 उपसूत्रों (up-sutras) का उपयोग करके किया गया था। वैदिक गणित को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि गणना मानसिक रूप से की जाती है।  वैदिक गणित के बारे में मुख्य तथ्य यह था कि किसी भी कठिन समस्या के उत्तर की गणना एक पंक्ति में की जानी चाहिए।

प्रश्न:9.इसे वैदिक गणित क्यों कहा जाता है? (Why is it called Vedic Maths?):

उत्तर:भारती कृष्ण तीर्थ (Bharati Krishna Tirtha) का जन्म मार्च 1884 में भारत के एक राज्य उड़ीसा के पुरी गांव में हुआ था।कृष्ण तीर्थ के अनुसार,उन्होंने अथर्ववेद और ऋग्वेद जैसे वेदों से सूत्र सीखे।इसलिए शब्द ‘वैदिक गणित’ उन्होंने 1957 में शुरुआती 16 सूत्र लिखे।

उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा शुल्वसूत्र और रेखागणित (Sulvasutra and Geometry),शुल्वसूत्र और रेखागणित का आपस में क्या संबंध है?(What is the relation between Sulvasutra and Geometry?) को समझ सकते हैं।

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