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Development of Number System

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1.संख्या पद्धति का विकास (Development of Number System):

  • संख्या पद्धति का विकास (Development of Number System) होने में एक लंबा समय लगा है।500 ईसवी तक भारत अंकगणित,बीजगणित तथा त्रिकोणमिति के विकास का मुख्य केंद्र बन चुका था।संख्या पद्धति का विकास हो चुका था तथा पूर्णांक एवं विषम संख्याओं पर की जाने वाली संक्रियाओं के नियम स्थापित हो चुके थे।शून्य समेत 1 से 9 तक के अंक,संक्रियाओं के गणितीय चिन्ह तथा गणित की भाषा की विविध शब्दावली आदि पूरी तरह से परिभाषित किए जा चुके थे।यद्यपि गणित के नियमों के रूप में ही इन नियमों को व्यक्त किया गया था तथा इनका व्यापकीकरण नहीं हुआ था तथापि हिंदू गणितज्ञों को इनके बारे में ज्ञान था। इसी समयावधि के दौरान दो ओर तरह की संख्याओं मसलन ऋणात्मक तथा अपरिमेय संख्याओं को लेकर भी उनकी सोच जारी थी।उधार से जुड़े हिसाब-किताब को निपटाने के लिए ही ऋण संख्याओं की उत्पत्ति हुई।कर्जे को ऋण संख्या द्वारा व्यक्त किया गया।लेकिन फिर भी ऋण संख्याओं का इतना खुलकर इस्तेमाल नहीं हुआ जितना कि आजकल हो रहा है।बर्फ का तापमान जिसे शून्य सेल्सियस मान लिया जाता है,को दर्शाने के लिए ऋण संख्याओं का प्रयोग किया जाता है। औसत वर्षा से कम बारिश होने पर उसे ऋण संख्या से व्यक्त किया जाता है।गोल्फ के खिलाड़ी को ऋण पॉइंट दिए जाते हैं जब वह निर्धारित शाटों से कम शाटों में अपनी बारी की समाप्ति कर लेता है।
  • ऐतिहासिक रूप से प्राचीन काल के गणितज्ञों को ऋण संख्याओं से भी पहले √(2) या √(3) जैसी अपरिमेय संख्याओं के विषय में ज्ञान था।इन अपरिमेय संख्याओं का प्रयोग किसी समकोण त्रिभुज की भुजाओं को ज्ञात करने,किसी वर्ग के विकर्ण पर दिए गए क्षेत्रफल वाले वर्ग की रचना करने या फिर किसी वृत्त के बराबर क्षेत्रफल के वर्ग की रचना करने के परिकर्मों के दौरान होता था। उदाहरण के लिए किसी दिए गए वर्ग के दुगने क्षेत्रफल वाले वर्ग की रचना करने के लिए इस वर्ग की भुजा को दिए गए वर्ग के विकर्ण के बराबर लिया जाता है।अब चूँकि विकर्ण की लम्बाई भुजा की लंबाई की √(2) गुना है,विकर्ण पर बने वर्ग का क्षेत्रफल दिए गए वर्ग के क्षेत्रफल का दुगना होगा।
  • उसी तरह एक ऐसे वर्ग की रचना करने के लिए जिसका क्षेत्रफल दिए गए वर्ग के क्षेत्रफल का तिगुना हो,एक आयत की रचना करनी होगी जिसकी लंबाई वर्ग के विकर्ण तथा चौड़ाई वर्ग की भुजा के बराबर हो।उस अवस्था में आयत के विकर्ण की लंबाई दिए गए वर्ग की भुजा की √(3) गुना होगी।ऐसे आयत के विकर्ण पर बने वर्ग का क्षेत्रफल दिए गए वर्ग के क्षेत्रफल का 3 गुना होगा। भारत,मिस्र,चीन तथा अन्य देशों के प्राचीन गणितज्ञों को तथाकथित पाइथागोरस प्रमेय की जानकारी यूनानी ज्यामिति के उद्भव से भी कहीं पहले थी।इस तथ्य की जानकारी भी उन्हें थी कि √(2) का विशुद्ध मान ज्ञात नहीं किया जा सकता है।प्रसिद्ध गणितज्ञ भास्कराचार्य दितीय (1150 ईसवी) ने अपनी चर्चित पुस्तक लीलावती में √(2) जैसी अपरिमेय संख्याओं के सन्निकट मान निकालने की विधि प्रस्तुत की थी।
  • संख्या पद्धति जिसका कि आजकल हम इस्तेमाल करते हैं,के संपूर्ण विकास में करीब 500 वर्ष लग गए।आधुनिक पद्धति में संख्याओं का विभिन्न समुच्चयों में वर्गीकरण किया जाता है।संख्याओं का प्रथम समुच्चय उन संख्याओं का समुच्चय है जिन्हें प्राकृतिक संख्याएं कहा जाता है और इस समुच्चय को हम अक्षर N से सूचित करते हैं,N={1,2,3,4,…}।तीन बिंदु इस बात के द्योतक हैं कि प्राकृतिक संख्याओं का समुच्चय अंतहीन है।
  • प्राकृतिक संख्याओं में शून्य को शामिल ही इस विकास यात्रा की अगली सीढ़ी है।इस तरह से प्राप्त नए समुच्चय को पूर्ण संख्याओं का समुच्चय कहते हैं।ऋण संख्याओं,जिन्हें कभी अप्राकृतिक कहकर नकार दिया गया था,का भी अब संख्या पद्धति में समुचित स्थान है।शून्य समेत सभी प्राकृतिक संख्याओं तथा ऋण पूर्णांकों के समुच्चय को पूर्णांकों का समुच्चय कहते हैं और इसे I से व्यक्त करते हैं,I={…-4,-3,-2,-1,0,1,2,3,4,…}।बिंदु इस बात के द्योतक हैं कि धन एवं ऋण पूर्णांकों दोनों की संख्याएं ही अनंत हैं।
  • धन एवं ऋण भिन्नों जैसे कि \frac{4}{5} और \frac{-8}{11} को शामिल करके पूर्णांकों के समुच्चय को ओर भी विस्तृत रुप दिया जा सकता है।इस समुच्चय की किसी भी संख्या को दो पूर्णांकों के अनुपात \frac{p}{q} की तरह से व्यक्त किया जा सकता है,जैसे कि \frac{2}{3},\frac{-3}{5} इत्यादि।पूर्णांकों को भी इसी तरह से व्यक्त किया जा सकता है यथा 3=\frac{6}{2},7=\frac{21}{3} आदि।ऐसे समुच्चय को परिमेय संख्याओं का समुच्चय कहते हैं और इसे निरूपित करते हैं,Q=\left\{...,-2,\frac{-3}{2},-1,0,\frac{1}{2},1,\frac{3}{2},2,...\right\}
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2.संख्या लेखन के नए तरीके (New Ways of Writing Numbers):

  • अब हमें कतिपय संख्याओं को व्यक्त करने की दो नवीनतम प्रणालियों के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।इनमें से प्रथम प्रणाली भिन्न संख्याओं को लेकर है।ऐसी संख्याओं को व्यक्त करने के लिए नए तरीके को दशमलव संकेत प्रणाली कहते हैं।यह स्थान-मान प्रणाली का ही भिन्नों के लिए सरल विस्तारित रूप है।निम्नलिखित स्थान-मानों पर गौर करें:
    ...10,000\quad1000\quad100\quad10\\ \quad\frac{1}{10}\quad\frac{1}{100}\quad\frac{1}{1000}\quad\frac{1}{10000}
  • ऊपर संख्या 1 के दाहिनी तरफ के स्थान-मान \frac{1}{10},\frac{1}{100} आदि हैं। \frac{1}{10},\frac{1}{100} को 10^{-1} और 100^{-1} के रूप में लिखा जा सकता है)।जिस तरह से पूर्णांक संख्याओं के अंकों का अनेक स्थान मानों के साथ गुणनफल लेकर उन्हें फिर जोड़ा जाता है,ठीक उसी तरह दशमलव भिन्न के इकाई के अंत के एक के दाहिनी तरफ आने वाले अंकों को उनके संबंद्ध स्थानों के मानों के साथ गुणा करके तथा उन्हें जोड़कर ही भिन्न को व्यक्त करने वाला भाग आता है।इकाई के अंक के दाहिनी तरफ एक बिंदु,जिसे कि दशमलव बिंदु कहते हैं,ही संख्या के भिन्न वाले हिस्से को सूचित करता है।इस प्रकार भिन्न 234.567 को इस तरह से लिखा जा सकता है:
  • 10^2\quad10^1\quad10^0\quad10^{-1}\quad10^{-2}\\ 10^{-3}
  • 2\quad\quad3\quad\quad4\quad\quad5\quad\quad6\\ 7
    अर्थात् 2×100+3×10+4×1+5×\frac{1}{10}+6×\frac{1}{100}+7×\frac{1}{1000} भिन्नों को व्यक्त करने के आम संकेत में इसे यूं लिखा जाएगा:234\frac{567}{1000}
    संख्याओं को दशमलव प्रणाली में लिखने में बड़ी सुविधा रहती है।जोड़ या घटा के लिए हमें संख्याओं को उनके क्रमिक स्थानों के अनुसार एक के नीचे एक लिखना होता है तथा फिर उन्हें पूर्णांक संख्याओं की तरह से ही जोड़ना या घटाना होता है। गुणन क्रिया को दो पूर्णांक संख्याओं को गुणा करने की विधि से ही किया जाता है और फिर दशमलव बिंदु को उसके सही स्थान पर जो दोनों संख्याओं के दशमलव स्थानों को जोड़कर निकलता है,लगाया जाता है।भाग की क्रिया को भी दो पूर्णांक संख्याओं की तरह ही किया जाता है और दशमलव बिंदु को दोनों संख्याओं के दशमलव स्थानों को घटाकर निकाले गए स्थान पर लगाया जाता है।
  • किसी भिन्न को सांत (टर्मिनेटिंग) या आवर्त (रिकरिंग) दशमलव में परिवर्तित किया जा सकता है।सभी में 2 या 5 की घात वाले भिन्न टर्मिनेटिंग होते हैं जैसे कि \frac{1}{4}=0.25,\frac{1}{2}=0.51 भिन्न संख्याएँ जैसे कि \frac{2}{3},\frac{2}{9} आदि रिकरिंग होती हैं उदाहरण के लिए \frac{2}{3}=0.666...,\frac{2}{9}=0.222...।संख्याएं जैसे कि √(2),√(3) आदि को भी दशमलव भिन्न के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।लेकिन ये दशमलव आवर्त और सांत भिन्नों की श्रेणी में नहीं आते हैं। दशमलव भिन्न को अधिक से अधिक स्थान तक व्यक्त करने पर ऐसी संख्या के शुद्ध से शुद्धतर मान हमें प्राप्त होते हैं।
  • \frac{3}{8},\frac{1}{4},\frac{1}{2} वाले उदाहरण हम देखते हैं कि कुछ चरणों के बाद शेष शून्य हो जाता है।\frac{3}{8} का दशमलव प्रसार 0.375 है,इन सभी स्थितियों में परिमित चरणों के बाद दशमलव प्रसार समाप्त हो जाता है।ऐसी संख्याओं के दशमलव प्रसार को सांत (Terminating) कहते हैं।
  • दूसरी स्थिति के शेष कभी भी शून्य नहीं होता परंतु हमें भागफल में अंको का एक पुनरावृति खंड प्राप्त होता है।उदाहरण के लिए \frac{8}{9}=0.88888... और \frac{6}{7}=0.857142857142... हैं।यह दशमलव प्रसार असांत आवर्ती या अनवसानी आवर्ती (Non-Terminating Recurring) है।\frac{8}{9} के भागफल में 8 की पुनरावृत्ति होती है हम इसे 0.\overline{8} के रूप में लिखते हैं।इसी प्रकार \frac{6}{7} में 857142 की पुनरावृत्ति होती है इसलिए हम \frac{6}{7} को 0.\overline{857142} के रूप में लिखते हैं। जहां अंकों के ऊपर लगाया गया दंड अंकों के उस खंड को प्रकट करता है जिसकी पुनरावृत्ति होती है। साथ ही 2.67474… को 2.\overline{674} के रूप में लिखा जा सकता है।इन सभी उदाहरणों से अनवसानी आवर्ती (पुनरावृति) दशमलव प्रसार प्राप्त होते हैं।इनको परिमेय संख्याएं कहते हैं।अतः अनवसानी आवर्ती दशमलव प्रसार वाली प्रत्येक संख्या को \frac{p}{q}(q\neq{0}) के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। एक परिमेय संख्या का दशमलव प्रसार या तो सांत होता है या अनवसानी आवर्ती होता है।साथ ही वह संख्या जिसका दशमलव प्रसार सांत या अनवसानी आवर्ती है एक परिमेय संख्या होती है।
  • अब हम x=0.150150015000150000…जैसी संख्या को हम किसी भी प्रकार से \frac{p}{q} (जहां p व q पूर्णांक हैं तथा q\neq{0}) रूप में परिवर्तित नहीं कर सकते हैं,अतः इस प्रकार की संख्या को इस विशेष गुण के कारण इन्हें हम अपरिमेय संख्या कहते हैं।अतः जिन संख्याओं का दशमलव प्रसार अनवसानी अनावर्ती (Non-Terminating Non-Recuring) होता है उन्हें अपरिमेय संख्या कहते हैं जैसे √(2)=1.41421356237…,√(3)=1.73205080756…आदि।
  • संख्याओं को लिखने की दूसरी प्रणाली वह प्रणाली है जिसे संसार के वैज्ञानिकों ने विभिन्न राशियों जैसे कि लंबाई,समय,बल आदि को निरूपित करने के लिए एक मानक विधि के रूप में स्वीकारा है।इस प्रणाली में दशमलव भिन्न के केवल उतने स्थानों तक ही संख्या को लिखा जाता है जो कि मापी जाने वाली राशि के मान को व्यक्त करने के लिए सार्थक हो।उदाहरणार्थ अगर लम्बाई का माप-जोख एक किलोमीटर के दसवें हिस्से से किया जाए तो किसी खण्ड की लम्बाई को हम 27.15 सेमी की तरह लिख सकते हैं।इसे यूं भी लिखा जा सकता है 2.715×10।अतः जब कोई संख्या दशमलव रूप में होती है तब उस संख्या का पूर्णांक वाला हिस्सा केवल इकाई वाला स्थान ही होता है।शेष भिन्न के रूप में होता है और पूरी संख्या को 10 के सम्मत घात से गुणा करके लिखा जाता है।जैसे कि पृथ्वी का अर्धव्यास 6700 किमी है।अंतरराष्ट्रीय मानक (एसआई) इकाई में इसे हम यू लिखेंगे 6.7×10^6 मीटर।उसी तरह ब्रोमीन के परमाणु का अर्धव्यास 1.14 आर्मस्ट्रांग A^0 है।अब चूँकि एक आर्मस्ट्रांग इकाई=10^{-10} मीटर इसलिए यह 1.14×10^{-10} मीटर के बराबर होगा।संख्याओं को लिखने की यह विधि दो राशियों की तुलना करने के लिए बहुत ही सुविधाजनक है।उक्त उदाहरण में यह आसानी से देखा जा सकता है कि पृथ्वी का अर्धव्यास की तुलना में 10^{16} गुना अधिक है।यह संख्या इतनी विशाल है कि 6.7 और 1.14 का अनुपात घटनाओं के लिए महत्व नहीं रखता और उसे आसानी से नकारा जा सकता है।इस तरह की तुलना को परिमाण कोटि (आर्डर आफ मेग्नीट्यूड) कहते हैं तथा विज्ञान में इसका बड़ा महत्त्व है।
  • उपर्युक्त विवरण में संख्या पद्धति का विकास (Development of Number System) के बारे में बताया गया है।

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3.संख्या पद्धति का विकास (Development of Number System) के सम्बन्ध में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

Development of Number System Development of Number System[/caption

प्रश्न:1.नंबर सिस्टम का विकास कैसे होता है? (How is Development of Number System?):

उत्तर:मुख्य अंक प्रणाली।भारतीय गणितज्ञों को पूर्णांक संस्करण,हिंदू-अरबी अंक प्रणाली (Hindu-Arabic numeral system) विकसित करने का श्रेय दिया जाता है।कुसुमपुरा के आर्यभट (Aryabhata of Kusumapura) ने 5वीं शताब्दी में स्थान-मूल्य अंकन (place-value notation) विकसित किया और एक शताब्दी बाद ब्रह्मगुप्त (Brahmagupta) ने शून्य के लिए प्रतीक की शुरुआत की।

प्रश्न:2.नंबर सिस्टम कैसे विकसित हुआ? (How did the number system develop?):

उत्तर:मिस्रियों (Egyptians) ने पहली सिफर अंक प्रणाली (ciphered numeral system) का आविष्कार किया और यूनानियों (Greeks) ने आयनियन और डोरिक वर्णमाला (Ionian and Doric alphabets) पर अपनी गिनती की संख्या का मानचित्रण किया।
प्रणाली की प्रभावशीलता की कुंजी शून्य के लिए प्रतीक थी, जिसे प्राचीन भारतीय गणितज्ञों द्वारा 500 AD के आसपास विकसित किया गया था।

प्रश्न:3.नंबर सिस्टम किसने विकसित किया? (Who developed the number system?):

उत्तर:बेबीलोनियन्स (Babylonians) के लोगों को सुमेरियों (Sumerians) से अपना नंबर सिस्टम मिला,जो दुनिया के पहले लोग हैं,जो गिनती की पद्धति विकसित करते हैं।4,000 से 5,000 साल पहले विकसित,सुमेरियन (Sunerian) प्रणाली स्थितीय थी (positional)-एक प्रतीक का मान (value of a symbol) अन्य प्रतीकों के इसकी सापेक्ष स्थिति (its position relative) पर निर्भर करता था।

प्रश्न:4.संख्या प्रणाली का विकास क्या है? (What is evolution of number system?):

उत्तर:अंक या प्रतीकों (digits or symbols) के साथ संख्या (numbers) लिखने के दौरान उपयोग किए जाने वाले अंकों (numerals) को दो प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है जिन्हें अंकगणितीय अंक (arithmetic numerals) 0,1,2,3,4, 5,6,7,8,9 और ज्यामितीय अंक (geometric numerals) 1,10,1000,10000 कहा जा सकता है।

प्रश्न:5 नंबर सिस्टम का पिता कौन है? (Who is the father of number system?):

उत्तर:आर्यभट (Aryabhatta)
आर्यभट नंबर सिस्टम के जनक हैं।

प्रश्न:6.संख्या का आविष्कार या खोज रहे हैं? (Are numbers invented or discovered?):

उदाहरण के लिए,अरबी अंक प्रणाली (Arabic numeral system) हम सब आज से परिचित है आमतौर पर प्राचीन भारत से दो गणितज्ञों को श्रेय दिया जाता है: 6 वीं सदी बी से ब्रह्मगुप्त (Brahmagupta) 6 शताब्दी पूर्व और आर्यभट्ट.(Aryabhat) 5वीं शताब्दी पूर्व अंततः, केवल चीजों की गिनती से अधिक के लिए संख्या आवश्यक थी।

प्रश्न:7.अंक प्रणाली कब शुरू हुई? (When did numeral system start?):

उत्तर:वे (संख्याएं) 6 वीं या 7 वीं शताब्दी में भारत में उत्पन्न हुए थे और 12 वीं शताब्दी के लगभग में मध्य पूर्वी गणितज्ञों, विशेष रूप से अल-ख्वारीज़्मी (al-Khwarizmi) और अल-किंडी (al-Kindi) के लेखन के माध्यम से यूरोप में पेश किए गए थे।

उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा संख्या पद्धति का विकास (Development of Number System) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

Development of Number System

संख्या पद्धति का विकास (Development of Number System)

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संख्या पद्धति का विकास (Development of Number System) होने में एक लंबा समय लगा है।500 ईसवी तक भारत अंकगणित,बीजगणित तथा त्रिकोणमिति के विकास का मुख्य केंद्र बन चुका था।संख्या पद्धति का विकास हो चुका था तथा पूर्णांक एवं विषम संख्याओं पर की जाने वाली संक्रियाओं के नियम स्थापित हो चुके थे।

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