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How is Praise Useful for Students?

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1.छात्र-छात्राओं के लिए प्रशंसा उपयोगी कैसे हैं? (How is Praise Useful for Students?),गणित के छात्र-छात्राओं के लिए प्रशंसा उपयोगी कैसे है? (How is Praise Useful for Maths Students?):

  • छात्र-छात्राओं के लिए प्रशंसा उपयोगी कैसे हैं? (How is Praise Useful for Students?) उपयोगी इस रूप में है की प्रशंसा छात्र-छात्राओं को अध्ययन के लिए प्रोत्साहन प्रदान करता है।प्रशंसा एक ऐसा भाव है जो दिल की गहराइयों पर पहुंचता है।प्रशंसा से मन प्रसन्न हो उठता है,उत्साह-उमंग से भर उठता है।विद्यार्थी ओर अधिक अध्ययन और गणित के सवालों को हल करने लगता है।प्रशंसा के माध्यम से सकारात्मकता बढ़ती है और विद्यार्थी सही दिशा की ओर अग्रसर होता है जिससे वह लक्ष्य तक शीघ्रता से पहुँचने में कामयाब होता है।
  • प्रशंसा के माध्यम से विद्यार्थी की अध्ययन करने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है और मिलने वाले प्रोत्साहन से मन प्रफुल्लित हो उठता है।इसलिए सच्ची प्रशंसा करने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए और प्रशंसा करने का सही अवसर भी चूकना नहीं चाहिए।
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2.झूठी प्रशंसा से बचें (Avoid False Praise):

  • झूठी प्रशंसा चापलूसों द्वारा की जाती है जिसके सहारे श्रद्धास्पद सम्मान नहीं मिल सकता है।विद्यार्थी के अंतराल में एक चेतन चिंगारी है जो अपना सम्मान चाहती है।परंतु इस तड़पन में कौनसा उपाय सही है इसी निर्णय में चूक हो जाती है।इस आतुरता में वह प्रपंच-पाखण्ड का,अनीति-अपराध का मार्ग अपनाती है।
  • अपने को सजाने-संवारने,ठाठ-बाट से रहने और सस्ते प्रदर्शनों से,छिटपुट उपहारों से लोगों को इसके लिए उकसाती रहती है कि उन्हें प्रशंसा प्रदान करें।भले ही वह उथली,अवास्तविक या अनावश्यक ही क्यों न हो!अधिकांश लोगों में यह प्रवृत्ति न्यूनाधिक मात्रा में पाई जाती है।
  • आत्मज्ञानी और विवेकवान विद्यार्थी और लोगों की बात दूसरी है जो प्रशंसा व मान-सम्मान से बचने का प्रयास करते हैं।वे प्रशंसा के भूखे नहीं होते हैं।चापलूसी वाहवाही किसी प्रकार बटोरने की अपेक्षा वे यह उचित समझते हैं कि ऐसा कर्त्तव्य (अध्ययन तथा अन्य कार्य) अपनाया जाए,जिसे सुनने,देखने और जाँचने पर हर व्यक्ति प्रभावित होता रहे और वाणी से न सही,अन्त:श्रद्धा के स्तर पर भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।
  • कर्त्तव्य के बदले प्रतिष्ठा प्राप्त करना ही वह उपचार है जिसके आधार पर तृप्ति देने वाली प्रतिष्ठा उपलब्ध होती है।प्रयत्न उसी के लिए होना चाहिए।इस भावना व मनोविज्ञान को समझने वाले दूसरों को अनुकूल एवं अनुरूप बनाने के लिए अपनी वाणी को इस कला-कौशल से अभ्यस्त करते हैं कि मधुर वचन बोले और दूसरों को अपना मित्र-सहयोगी बनाएं।
  • मधुर वाणी का तात्पर्य कंठ का मिठास अथवा भाषा में शब्दों का लोच नहीं है।ऐसे तो वे छात्र-छात्राएं करते हैं जो अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए ऊपर से मीठा-मीठा बोलते हैं और ज्योंही स्वार्थ सिद्ध होता है तो अपनी असलियत दिखा देते हैं।हालांकि असलियत पता लगने में थोड़ा समय लग जाय पर देर-सबेर सच्चाई सामने आ ही जाती है।ऐसी झूठी प्रशंसा व मिठास को दूर से त्याग देना चाहिए।इसके बजाय तो वह कड़वा बोलने वाला सही है जो हृदय से हमारा भला और हित चाहता है।
  • सस्ती लोकप्रियता के प्रलोभन से छात्र-छात्राओं को बचना चाहिए क्योंकि एक बार इसका चस्का पड़ जाता है तो छुड़ाए नहीं छूटती है।कटु अथवा मधुर बोल रहा है उस पर विवेकपूर्वक विचार करना चाहिए कि वह किस उद्देश्य से ऐसा बोल रहा है?गहराई से सोच-विचार करने वाले छात्र-छात्राएं वाग्जाल में नहीं फँसते हैं और यथार्थता से लाभ उठाते हैं।
  • वाणी की मधुरता का उपयोग सम्पर्क में आने वाले की प्रसन्नता की वृद्धि के साथ-साथ हित कामना के लिए भी किया जा सकता है।किसी को भी अच्छा परामर्श देने से पहले उसको अपने अनुकूल करना आवश्यक है।प्रतिकूलता की स्थिति में कितना ही हितकारी परामर्श दें एवं सहयोग लेने की कोशिश की जाए परंतु वह आनाकानी ही करता है।
  • जैसे किसी छात्र को सवाल पूछना है और सहयोग लेना है तो प्रतिकूल विचारधारा वाला विद्यार्थी उसको सहायता-सहयोग नहीं देगा।
  • प्रतिकूल छात्र-छात्रा को अनुकूल बनाने के लिए उसके गुणों की प्रशंसा की जाए।इस प्रकार की कथनी मित्र वर्ग में ही होती है।स्वजन-शुभेच्छु ही प्रशंसा करते हैं।जिनके मन में कटुता एवं द्वेष भावना होती है,वे प्रायः निन्दा करते ही देखे गए हैं।मोटी बुद्धि वाले अपने-पराए का,मित्र-शत्रु का अनुमान,की गई प्रशंसा या निंदा के आधार पर ही लगा पाते हैं।
  • वस्तुतः संसार में गुणहीन कोई भी नहीं है।तलाश करने पर बुरा दीखने वाले व्यक्ति में भी कुछ गुण मिल सकते हैं।
  • बिना झूठी प्रशंसा किए,पिछले समय में उससे जो अच्छे कार्य बन पड़े हैं,उनकी चर्चा करने से व्यक्ति अनुकूल भी बनता है।नरम पड़ने पर,अपनी ओर झुकने पर उन परामर्शों को भी दिया और स्वीकार कराया जा सकता है जो उसके लिए उपयोगी एवं आवश्यक हैं।साथ ही अपना उद्देश्य भी पूरा होता है।
  • प्रशंसा के माध्यम से प्रोत्साहन-मार्गदर्शन के आधार पर किसी को आगे बढ़ाना,ऊँचा उठाना जितना सरल है,उतना ओर किसी प्रकार नहीं।प्रशंसा के उपरांत यह परामर्श भी दिया जा सकता है कि उसमें जो थोड़े-बहुत दोष-दुर्गुण है,उन्हें किस प्रकार छोड़े,अधिक प्रतिभावान बनें।यह कार्य उस दशा में नहीं हो सकता,जिसमें निंदा को प्राथमिकता दी जाए।उसे बढ़ा-चढ़ाकर कटु शब्दों में कहा जाए।इससे चिढ़ एवं दुर्भावना पैदा होती है।निन्दा से खीझा हुआ मनुष्य उस कथन को अपना अपमान मानता है और जो अनुचित करता रहा है,उसी को करते रहने में अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेता है।इस प्रकार निंदा उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करती,जिसका उद्देश्य बुराई को छुड़ा लेना था।

3.सच्ची प्रशंसा करें (Give True Praise):

  • प्रशंसा सभी की उपस्थिति में,सबके सामने करना चाहिए ताकि प्रशंसा के माध्यम से सकारात्मकता का प्रसार अधिक से अधिक हो परंतु यह ध्यान भी रखना चाहिए कि प्रशंसा से उस व्यक्ति में अहंकार नहीं आना चाहिए।खुले दिल से,मीठे शब्दों का प्रयोग करते हुए अच्छे कार्यों (अध्ययन में अव्वल आना,परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना इत्यादि) की सराहना करनी चाहिए।
  • हर किसी की प्रशंसा भी नहीं करनी चाहिए बल्कि जिसका दिल शुद्ध व सरल हो उसी की प्रशंसा करनी चाहिए।
  • प्रशंसा करने वाला यदि कपटपूर्ण हृदय से प्रशंसा के मीठे बोल बोलता है तो इसका सकारात्मक प्रभाव प्रशंसा करने वाले पर नहीं पड़ता बल्कि उसके भविष्य के लिए अत्यंत नुकसानदेह होता है।
  • वस्तुतः सच्ची प्रशंसा करने और सुनने वाले दोनों ही दुर्लभ हैं।प्रशंसा से अंतःकरण को जो शांति एवं प्रसन्नता मिलती है वह बहुमूल्य होती है।लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हमेशा अपनी प्रशंसा सुनी जाए और स्वयं को सराहा जाए क्योंकि इससे मात्र अहंकार ही बढ़ता है और व्यक्तित्त्व का कोई विकास नहीं होता है।
  • यदि प्रशंसा से अहंकार बढ़ता है तो हमारी प्रगति के द्वार बंद होने लगते हैं।व्यक्ति जिस समय यह महसूस करने लगता है कि वह सर्वश्रेष्ठ,सर्वगुणसंपन्न,बहुत बुद्धिमान,अत्यंत कार्यकुशल व हर तरह के कार्य करने में सफल है,उसी क्षण से वह अपने विकास के मार्ग से विचलित होने लगता है।
  • मनुष्य को अपने हर प्रयास में मंजिल तक पहुंचने के लिए नीचे से ही सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है,न कि ऊपर से और इस प्रयास में वह सफल हो भी सकता है और नहीं भी।उसे सहायता मिल भी सकती है और नहीं भी।इस संघर्षपूर्ण जीवन में उसे केवल एक ही चीज प्राप्त होती है जिसे वह यदि सहेज कर रखे,स्मरण रखे तो उसकी कार्यकुशलता निखर सकती है और वह समझदार बन सकता है और वह है-उसका जीवन अनुभव।यही उसकी एकमात्र धरोहर है,जो परमात्मा उसे देता है।इस जीवन-अनुभव के साथ-साथ वह अपनी आन्तरिक क्षमताओं को भी जागृत कर सकता है।
  • अपनी इस यात्रा में व्यक्ति को यदि अपने किए हुए कार्यों की थोड़ी सच्ची प्रशंसा मिले तो उसका उत्साह बढ़ जाता है और वह दुगनी तेजी से कार्य करने लगता है।प्रशंसा एक ऐसा पुष्प है,जिसकी खुशबू दूर से ही आती है।
  • इसके लिए जरूरी नहीं कि अमुक व्यक्ति की प्रशंसा उससे ही की जाए।यदि दूसरों से भी किसी व्यक्ति की प्रशंसा की जाती है तो उस तक पहुंच जाती है लेकिन व्यक्ति को प्रशंसा को कभी भी अहंकार बढ़ाने के लिए नहीं करना चाहिए बल्कि इसके द्वारा प्रोत्साहन बढ़ाना चाहिए और पहले की तुलना में अधिक अच्छा कार्य करना चाहिए।

4.प्रशंसा करने के लिए ध्यान रखने योग्य बातें (Things to Keep in Mind to Admire):

  • कभी भी अपने मुंह से अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिए और न ही दूसरों से अपनी प्रशंसा सुनने के लिए आतुर रहना चाहिए बल्कि प्रशंसा पानी है तो प्रशंसा के योग्य कार्य (अध्ययन,परीक्षा की तैयारी,जाॅब को बेहतरीन तरीके से करने इत्यादि) करना चाहिए।ऐसा भी नहीं करना चाहिए कि प्रशंसा पाने के लिए कार्य किया जाए,क्योंकि इससे किसी का भी भला नहीं होगा।यदि अच्छे कर्म हैं तो स्वतः ही उनकी प्रशंसा होगी।
  • यदि प्रशंसा न भी हो और व्यक्ति के कर्म अच्छे हों तो अपने कर्मों और उसके परिणामों को ध्यान से देखना चाहिए।यदि उससे किसी का भला हो रहा है तो इससे मिलने वाला सुख ही व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी प्रशंसा और प्रोत्साहन होता है।
  • यदि जीवन में निराशा के बादल छाए हैं तो अपने जीवन की उपलब्धियों के बारे में सोचना चाहिए।अपने जीवन में यदा-कदा आने वाले अँधियारों को दूर करने के लिए अपनी प्रशंसा से करनी चाहिए क्योंकि स्वयं से अपनी प्रशंसा करने का मतलब है- नकारात्मकता के छाए हुए बादलों के बीच सकारात्मकता के सूर्य का निकलना जीवन में कभी-कभी बहुत जरूरी हो जाता है।
  • इसके लिए हम अपना मूल्यांकन स्वयं करें और अपनी उपलब्धियों की सूची देखें कि हम क्या कर सकते थे,क्या-क्या हमने अपने जीवन में किया है और अब क्या कर रहे हैं और क्या कर सकते हैं? या अपने जीवन को सही दिशा देने के लिए किसी समझदार-विवेकशील व्यक्ति के पास जाएं,जो हमें सही दिशा दिखा सके।
  • प्रशंसा उस सीढ़ी की तरह है,जो हमें ऊपर चढ़ा सकती है और नीचे गिरा भी सकती है।जैसे यदि हम निराश हैं,हताश हैं और हमारे पहले किए हुए कार्यों की प्रशंसा की जाए,तो इससे हमें भरपूर प्रोत्साहन मिलता है और हम मन में फिर से उत्साह-उमंग से भरकर कार्य करने लगते हैं और यदि प्रशंसा झूठी है तो वास्तविकता का सामना करने पर हमारा नीचे गिर पड़ना स्वाभाविक ही है।
  • सच्ची प्रशंसा हमेशा अच्छी होती है लेकिन कभी-कभी निराशा में डूबे हुए व्यक्तियों को प्रोत्साहित करने के लिए सकारात्मक सुझाव दे देने चाहिए जिससे उन्हें अपनेपन व आत्मीयता का भाव मिल सके।प्रशंसा एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा प्रशंसा पाने एवं करने वाले,दोनों के व्यक्तित्त्व का समुचित विकास होता है परंतु इसका दुरुपयोग मात्र द्वंद्व एवं अहंकार को जन्म देता है।इसलिए प्रशंसा रूपी मिठास का सही समय पर,सही तरीके से उपयोग करना चाहिए और प्रशंसा करने का अवसर चूकना नहीं चाहिए।

5.प्रशंसा का दृष्टान्त (A Parable of Praise):

  • एक विद्यार्थी गणित की पासबुक,शिक्षकों के बताए हुए नोट्स और पुस्तकों में गणित के सवालों को देख करके अपने आपको बहुत मेधावी समझने लगा।एक दिन दूसरे नगर से गणित के विद्यार्थियों का समूह शैक्षिक भ्रमण के लिए आया हुआ था।उन शैक्षिक भ्रमण पर आए हुए विद्यार्थियों को संकेत करते हुए गणित शिक्षक ने अपने उस विद्यार्थी को कहा कि तुम उन विद्यार्थियों से श्रेष्ठ हो क्या?
  • वह विद्यार्थी मूर्खतावश होकर तथा पासबुक,गाइडों,पुस्तकों से देख-देखकर हल करने वाला उन विद्यार्थियों को ललकारने लगा।
  • उनमें से एक विद्यार्थी का चुनाव करके उससे कहा कि चलो हम गणित के सवाल में प्रतियोगिता करें।दूसरे नगर से आने वाले गणित के विद्यार्थियों ने हंसकर कहा हम अपने विवेक,बुद्धि तथा चिंतन-मनन के आधार पर गणित के सवालों को हल करते हैं।तुम इतने मेधावी छात्र को ललकार रहे हो,तुम्हारी बुद्धि खोटी तो नहीं है।
  • तब वह विद्यार्थी शैक्षिक भ्रमण पर आने वाले विद्यार्थियों से बोला मैं गणित के सवालों को कई विधियों से हल कर सकता हूं,सिद्ध कर सकता हूं।उनमें से कुछ है:सरल विधि,रोचक विधि,कठिन विधि,आगमन विधि,विरोधाभास विधि आदि।शैक्षिक भ्रमण पर आए विद्यार्थी ने कहा कि तुम अवश्य ही अनेक विधियों के ज्ञाता होंगे परंतु मैं तो एक ही विधि जानता हूं जिससे सभी विद्यार्थी हल करते हैं।उसके ऐसा कहने पर शैक्षिक भ्रमण वाले विद्यार्थी की उस नगर के विद्यार्थी एवं अन्य साथी हँसी उड़ाने लगे।तब दोनों को गणित का एक प्रश्नपत्र बनाकर हल करने को दे दिया गया।
  • शुरू-शुरू में सरल सवाल थे अतः उस विद्यार्थी ने तत्काल हल कर दिए जिससे शैक्षिक भ्रमण वाला विद्यार्थी पिछड़ गया तो उस नगर के विद्यार्थी,शैक्षिक भ्रमण वाले विद्यार्थी की मजाक उड़ाने लगे।
  • परंतु आधा प्रश्न-पत्र हल करने के बाद उस विद्यार्थी की हालत खराब हो गई,उससे एक भी सवाल हल नहीं हो रहा था।उसके पसीने आ गए।जबकि शैक्षिक भ्रमण वाले विद्यार्थी ने लगभग प्रश्न-पत्र हल कर दिया।वह विद्यार्थी जो अपनी प्रशंसा कर रहा था तथा बड़ी-बड़ी डींगें हाँक रहा था बड़ा लज्जित हुआ और शैक्षिक भ्रमण वाले विद्यार्थी से क्षमा याचना की।शैक्षिक भ्रमण वाले विद्यार्थी ने कहा कि अब बता कौनसी विधि से गणित के सवाल हल कर रहा है,इस विधि का तो तूने नाम ही नहीं बताया था।
  • तब उस विद्यार्थी ने कहा कि अब से मैं किसी भी विद्यार्थी का अपमान नहीं करूंगा और इस प्रतियोगिता को यहीं समाप्त करके मुझे क्षमा कर दो।शैक्षिक भ्रमण वाले विद्यार्थी ने उसे क्षमा कर दिया तथा वे अपने नगर लौट गए।इसलिए अपनी झूठी प्रशंसा या सच्ची प्रशंसा कभी भी अपने मुंह से नहीं करनी चाहिए।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में छात्र-छात्राओं के लिए प्रशंसा उपयोगी कैसे हैं? (How is Praise Useful for Students?),गणित के छात्र-छात्राओं के लिए प्रशंसा उपयोगी कैसे है? (How is Praise Useful for Maths Students?) के बारे में बताया गया है।

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6.सवाल न बताने पर नोच लिया (हास्य-व्यंग्य) (Scratched for Not Telling Question) (Humour-Satire):

  • मोनू:मम्मी!नेहा ने मुझे सवाल न बताने पर नोच लिया।
  • मम्मी:अच्छा कोई बात नहीं मैं इसके नाखून काट दूंगी।
  • मोनू:मम्मी ये काटती भी है,इसके दांत तोड़ दीजिए।

7.छात्र-छात्राओं के लिए प्रशंसा उपयोगी कैसे हैं? (Frequently Asked Questions Related to How is Praise Useful for Students?),गणित के छात्र-छात्राओं के लिए प्रशंसा उपयोगी कैसे है? (How is Praise Useful for Maths Students?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.प्रशंसा क्यों करनी चाहिए? (Why Should We Be Praised?):

उत्तर:प्रशंसा करने का अवसर जब भी मिले,उसे व्यक्त करने का अवसर चूकना नहीं चाहिए।इससे अपनी प्रतिष्ठा बढ़ती है।इसके अतिरिक्त इस आधार पर मार्गदर्शन एवं दोष निराकरण भी संभव हो सकता है।

प्रश्न:2.चाटुकारिता क्या तात्पर्य है? (What Do You Mean by Flattery?):

उत्तर:चाटुकार शब्दों का मायाजाल रच लेते हैं जो धूर्तों की संगत में रहकर शीघ्र ही सीख लेते हैं।वे मधुर वचन बोलने की कला-कौशल में पारंगत होने पर कोयल जैसी मधुर वचन बोलते हैं और जो हाथ लगता है,उसी पर हाथ साफ कर लेते हैं।पर देर-सबेर ऐसे लोगों की पोल खुल जाती है।

प्रश्न:3.प्रशंसा किस प्रकार करनी चाहिए? (How Should One Be Praised?):

उत्तर:प्रशंसा करना एक कला है,जो दिल की गहराइयों से निकलनी चाहिए,तभी इसकी पहुँच लोगों के दिलों तक होती है।किसी को भी प्रशंसा करने के लिए आडम्बर का सहारा नहीं लेना चाहिए।खुले दिल से,मीठे शब्दों का प्रयोग करते हुए अच्छे कार्यों की प्रशंसा करनी चाहिए।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा छात्र-छात्राओं के लिए प्रशंसा उपयोगी कैसे हैं? (How is Praise Useful for Students?),गणित के छात्र-छात्राओं के लिए प्रशंसा उपयोगी कैसे है? (How is Praise Useful for Maths Students?) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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