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7 Myths About Mathematics

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1.गणित के बारे में 7 मिथक (7 Myths About Mathematics),गणित मिथक और गलत धारणाएँ (Mathematics Myths and Misconceptions):

  • गणित के बारे में 7 मिथक (7 Myths About Mathematics) के अलावा भी लंबी लिस्ट है। गणित विषय जितना पॉपुलर तथा उपयोगी है उतना इसके साथ मिथक जुड़ गए हैं।पहले मिथक का अर्थ समझते हैं कि आखिर मिथक होता क्या है? मिथक का अर्थ होता है कल्पित कथा,पुराण कथा।गणित के सिद्धांत,नियम,गुणधर्म और खोजें मुख्य रूप से बौद्धिक समीक्षा,तर्क और अनुमान पर आधारित होती है।इसलिए कल्पित घटनाओं या पौराणिक कथाओं की सहायता उसमें नहीं ली जाती है।लेकिन कभी-कभी गणित विषय की विषय-वस्तु को अधिक निम्न स्तर या समझ से परे अथवा असंगत तुलना करने के लिए प्रभावशाली और रोचक तरीके से समझाने के लिए गणित में कल्पित कथाओं का सहारा लिया जाता है।पुस्तकों अथवा लोगों में प्रचलित इन दन्त कथाओं,पुराण कथाओं से गणित के छात्र-छात्राएं,गणित के प्रेमी हतोत्साहित होते हैं।हालांकि यह आवश्यक नहीं है कि मिथक का प्रयोग हतोत्साहित करने के लिए ही किया जाता है।कई बार बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करने से प्रेरणा भी मिलती है।इस आर्टिकल में कुछ ऐसे गणित के बारे में मिथकों का वर्णन किया गया है जिनका कोई तार्किक,युक्तिसंगत एवं प्रामाणिक आधार नहीं है परंतु यदा-कदा लोग उनको व्यवहार में बोलते हैं,काम लेते हैं।इससे छात्र-छात्राओं में भ्रांति पैदा हो जाती है।वे गणित विषय के प्रति बिना विचार किए गलत धारणा विकसित कर लेते हैं।
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(1.)मिथक 1:गणित विषय कठिन विषय है (Mathematics is a Difficult Subject):

  • अक्सर छात्र-छात्राओं में यह मिथक प्रचलित है कि गणित विषय कठिन विषय है।यह मिथक केवल छात्र-छात्राओं में ही नहीं है बल्कि माता-पिता,अभिभावक भी जाने अनजाने में अपने बच्चों को यह कहकर दबाव डालते हैं कि गणित विषय कठिन विषय है उसकी ठीक तरह से तैयारी करो अन्यथा अनुत्तीर्ण हो जाओगे।
  • कोई भी विषय अपने आपमें कठिन या सरल नहीं होता है।हर विषय निष्पक्ष होता है।यह हम पर है कि गणित विषय कठिन लगता है या सरल लगता है। लेकिन हम दोष गणित पर डालते हैं।जैसे अग्नि से चाहे तो रोटी पका सकते हैं अथवा घर जला सकते हैं।सूर्य की रोशनी सभी को समान रुप से मिलती है। जो कमरे के अंदर सोया हुआ है वह लाभ नहीं उठा सकता है।तात्पर्य यह है कि कोई विषय कठिन लगता है या सरल लगता है यह हमारे ऊपर निर्भर है।गणित विषय निर्जीव है उसे सक्रिय,सचेतन करना हमारा काम है।परंतु हम हमारा दोष,निर्णय गणित विषय पर थोपते हैं।जैसे कोई व्यक्ति सिगरेट पीने का आदी है तो अपने दोष को सिगरेट पर थोपता है कि यह सिगरेट छूटती ही नहीं है।जैसे सिगरेट ने उस व्यक्ति को पकड़ रखा हो।
  • इसी प्रकार गणित विषय कठिन लगना या सरल लगना यह हमारे ऊपर निर्भर है।यदि विषय को सही विधि,सही विधा,वैज्ञानिक तरीके तथा मनोवैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग करते हुए हल किया जाए तो यह विषय सरल भी लगेगा।साथ ही इसको हल करने में आनंद का अनुभव होगा।
  • गणित विषय की समस्याओं को जीवन से संबंधित करके पढ़ाया जाए।जैसे छोटे बच्चों को यदि 8 व 9 को जोड़ने के लिए कहा जाए तो वे कठिनाई महसूस करेंगे परंतु यदि उन्हें कहा जाए 8 पुस्तकों और 9 पुस्तकों को मिलाने पर कितनी पुस्तकें होंगी तो बच्चा तत्काल बता देगा।
  • छात्र-छात्राओं को गणित को सरल से कठिन की ओर पढ़ाने की विधि अपनाना चाहिए।किसी गणित की समस्या में ही उसका हल छिपा हुआ होता है। गणित समस्या में क्या तो दिया हुआ है और क्या ज्ञात करना है,यह जानना चाहिए।इसके पश्चात ही सवाल व समस्या को हल करने की विधि के बारे में विचार करें।इस प्रकार हल करने से गणित विषय धीरे-धीरे सरल लगने लग जाएगा।अपना दृष्टिकोण गणित पर थोपने से समाधान नहीं होता हैं।सरल व कठिन लगना हमारे ऊपर निर्भर है,गणित पर नहीं। गणित तो निष्पक्ष होती है।

(2.)मिथक 2:गणित नीरस विषय है (Mathematics is a Dull Subject):

  • छात्र-छात्राएं गणित विषय को एक नीरस विषय मानते हैं।यह मन की दुर्बलता है।जब तक गणित को उथले मन से,दुर्बल मन से करते हैं तो यह रसहीन लगता है।संसार में ऐसी कोई चीज नहीं है जो रसहीन या नीरस न हो।यदि किसी व्यक्ति को कलाकंद पसंद है तो वह एक सीमा के बाद कलाकंद खाने से उकता जाएगा।वह रसहीन लगने लगेगा।संसार की कोई भी चीज हो उसका लगातार उपयोग करने से रसहीन या नीरस लगने लग जाएगी।जिस दिन आपको गणित के सवाल और समस्याएं हल करने से बोरियत न हो बल्कि आनंद आने लग जाएगा तो समझ ले कि गणित को पढ़ने की विधा,पढ़ने की विधि मालूम हो गई।गणित गणित को बार-बार हल करने,सवाल करने के बाद भी बोरियत का अनुभव न हो तो गणित को हल करने की कला आ गई,ऐसा समझना चाहिए।
  • गणित विषय को केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने के दृष्टिकोण से पढ़ते हैं तो यह रसहीन लगता है। लेकिन जीवन की कला सीखने में यह विषय उपयोगी है।जीवन जीने के लिए यह विषय परम उपयोगी है ऐसा सोचकर अध्ययन करते हैं तो इससे हमें आनंद की अनुभूति होती है।फिर गणित विषय की पुनरावृत्ति कितनी ही बार करें हमें नीरस नहीं लगेगा।बार-बार पुनरावृत्ति करने से हमें कुछ न कुछ नई चीज़ सीखने को मिलती है।लेकिन उसमें नई चीज,नई बात को खोजना हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।

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(3.)मिथक 3:गणित विषय निष्क्रिय व अरुचिकर है (Mathematics is Passive and Distasteful):

  • गणित विषय क्या बल्कि संसार की हर वस्तु निष्क्रिय है परंतु उसको सक्रिय व सजीव करना हमारे हाथ में होता है।जिस प्रकार कुएं में पानी होता है लेकिन हमें प्यास लगती है तो कुआं आकर आपसे नहीं कहेगा कि लो जल पी लो।हमें खुद ही कुएं के पास जाकर और अपनी प्यास बुझानी होगी।इसी प्रकार गणित के सवालों,समस्याओं को हल करने की प्यास होगी तथा गणित के पास जाएंगे और हल करने का प्रयास करेंगे तभी हमारी ज्ञान रूपी प्यास बुझेगी।
  • अध्ययन कार्य में रुचि न होना हमारे मन की दुर्बलता अवरोधक होती है।यदि हम पूर्ण मनोयोग से तथा गणित विषय का डूबकर अध्ययन करते हैं तो निश्चित रूप से रुचि जागृत होती है।पूर्ण मनोयोग तथा डूबकर जब हम गणित के सवालों व समस्याओं को हल करते हैं तो धीरे-धीरे गणित में पकड़ मजबूत होती जाती है।ज्यों-ज्यों हम सवालों को हल करते हैं और उसमें सफल होते जाते हैं तो हमारी रुचि बढ़ने लगती है।अरुचि होना तब होता है जब हम गणित के सवालों को हल नहीं कर पाते हैं। गणित विषय को हल करने के लिए समय नहीं देते हैं।प्रारंभिक स्तर पर हमारा उच्चाटन होता है।परंतु धैर्यपूर्वक अनवरत रूप से हम अभ्यास करते हैं तो देर से सबेर सफलता अवश्य मिलती है।

(4.)मिथक 4:गणित विषय में कम अंक आते हैं (There are Fewer Marks in Mathematics Subject):

  • गणित विषय के बारे में यह भी एक गलत मिथक है।गणित विषय में आपकी जितनी तैयारी है तथा जितना प्रयास करते हैं उतने ही अंक अर्जित होते हैं।गणित विषय में सवाल या तो सही होता है या गलत होता है।बीच की गुंजाइश नहीं होती है।गणित विषय के सवालों को केवल अनुमान के आधार पर हल नहीं कर सकते हैं।न ही उसमें इधर-उधर की बातें लिखी जा सकती हैं।इसलिए यदि सत्रारंभ के समय से ही आपने गणित विषय को ठीक से पढ़ा है तो कोई कारण नहीं है कि उसमें सवाल गलत होंगे।कई छात्र-छात्राएं परीक्षा के एक-दो माह पूर्व गणित विषय की तैयारी प्रारंभ करते हैं।ऐसी स्थिति में अच्छे अंक अर्जित नहीं किए जा सकते हैं।
  • केवल कठिन परिश्रम से भी अधिक अंक अर्जित नहीं किए जा सकते हैं बल्कि योजनाबद्ध,स्मार्ट तैयारी के साथ गणित की तैयारी करेंगे तो अच्छे अंक अर्जित किए जा सकते हैं।गणित की तैयारी करते समय बीच-बीच में समीक्षा करते रहें तथा जिस टॉपिक में कमजोरी दिखाई दे उसे पुनः तैयार करें।इस प्रकार ठोस रणनीति से गणित में अच्छे अंक अर्जित किए जा सकते हैं।याद रखें गणित ऐसा विषय है जिसमें आप शत-प्रतिशत अंक प्राप्त कर सकते हैं और 0 अंक भी अर्जित कर सकते हैं। यानि आप हीरो बन सकते हैं और जीरो भी बन सकते हैं।

(5.)मिथक 5:पुरुष महिलाओं की तुलना में गणित में बेहतर है (Men are Better at Math Than Women):

  • यह मिथक भी गलत धारणा के कारण बना हुआ है।ऐसा माना जाता है कि गणित विषय में महिलाएं बेहतरीन तरीके से प्रदर्शन नहीं कर सकती है। सदियों से महिलाओं के दिमाग में तथा चारों ओर यह प्रचार किया जाता है कि महिलाओं के वश में केवल रसोईघर है।अब यदि महिलाओं को अवसर ही प्रदान नहीं किया जाएगा,महिलाओं के अधिकारों को कुचला जाएगा तो वह बेहतरीन कैसे हो सकती हैं?प्राचीन काल में हाईपेटिया महिला गणितज्ञ हुई थी।वह गणित में इतनी पारंगत थी कि उसके आसपास बहुत से प्रखर बुद्धि वाले छात्र-छात्राओं का जमाव हो गया था।लेकिन अलेक्जेंड्रिया के बिशप थियोफिलस की आज्ञा से इस महिला गणितज्ञ को जिंदा ही जला दिया गया। आधुनिक युग में नारियों को समान अधिकार प्राप्त हुए हैं तो उन्होंने हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।आज महिलाएं खेलों,राजनीति,व्यवसाय,गणित के क्षेत्र में हर कहीं बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रही हैं।
  • जब तक महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता रहा तब तक इन क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी नगण्य थी।परंतु आज वे पुरुष से किसी भी क्षेत्र में कम नहीं है।
    चाणक्य नीति में कहा है कि
  • “स्त्रीणां द्विगुण आहारो बुद्धिस्तासां चतुर्गुणा।
    साहसं षड्गुणं चैव कामोअष्टगुणा उच्चयते।।”
  • अर्थात् पुरुषों से स्त्रियों का आहार दुगुना,बुद्धि चौगुनी,साहस छ: गुना और काम आठ गुना कहा गया है।श्रीमती इंदिरागांधी,विजयलक्ष्मी पंडित,सरोजिनी नायडू इत्यादि महिलाओं की कार्यप्रणाली से ही सिद्ध है कि उनमें बुद्धि किसी भी दृष्टिकोण से कम नहीं थी।

(6.)मिथक 6:गणित में सफलता के लिए उच्च बौद्धिक क्षमता की जरूरत है (High Intellectual Ability is Needed for Success in Mathematics):

  • अक्सर छात्र-छात्राएं यह कहते हुए मिल जाते हैं कि गणित जैसा विषय प्रखर व जीनियस छात्र-छात्राओं के अध्ययन करने के वश की बात है।साधारण छात्र-छात्राओं के वश की बात नहीं है।महान् गणितज्ञ अल्बर्ट आइंस्टीन,वैज्ञानिक जेम्स वाट,महान गणितज्ञ आर्किमिडीज,महान् गणितज्ञ सर आइजक न्यूटन,गणितज्ञ पाइथागोरस बचपन से ही उच्चकोटि की बुद्धि से सम्पन्न नहीं थे।सर आइज़क न्यूटन की माता ने बचपन में ही दादी के संरक्षण में छोड़कर पुनर्विवाह कर लिया था।न्यूटन का जीवन असफलताओं में ही गुजरा।1665 में महामारी के कारण ट्रिनिटी कॉलेज बंद हो गया।परंतु न्यूटन हताश नहीं हुआ तथा घर पर ही अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते रहे और अंत में सफल हुए।उन्होंने गुरुत्वाकर्षण बल की खोज की।गणितज्ञ पाइथागोरस ज्ञान प्राप्त करने के लिए मिस्र,इराक,ईरान और भारत की यात्रा की।लगभग 30-35 ज्ञान प्राप्ति के लिए भ्रमण करते रहे।60 वर्ष की आयु में क्रोटोना में आकर घर बसाया।इस प्रकार बहुत से गणितज्ञ को उच्च कोटि की बुद्धि एकाएक हासिल नहीं हुई।धीरे-धीरे अध्यवसाय,सत्संगति,स्वाध्याय,मनन-चिंतन,पूर्व अनुभव तथा प्रशिक्षण से उनमें बुद्धि का विकास हुआ है।
  • प्रारंभ में सभी साधारण बुद्धि के छात्र थे। बुद्धि को हम जिस तरफ लगाते हैं हमारी बुद्धि वैसी ही होती जाती है।ज्ञान,विद्या,धर्म,नीति,सदाचार,एकाग्रता,ध्यान इत्यादि का अभ्यास करने में लगाएंगे तो बुद्धि उच्चकोटि की होती जाएगी।बुद्धि को फैशनपरस्ती,अय्याशी,गपशप करने,मटरगश्ती तथा मौजमजा इत्यादि करने में लगाएंगे तो बुद्धि तामसिक वृत्ति की होकर निम्नकोटि की हो जाएगी।

(7.)मिथक 7:आप दूसरों की तुलना में गणित में कमजोर है (You are Weaker in Math Than Others):

  • गणित का अध्ययन करते समय या अध्ययन कार्य करते समय हमें खुद की तुलना दूसरों से नहीं करनी चाहिए।यदि तुलना करनी ही हो तो सद्बुद्धिपूर्वक की जानी चाहिए।यदि तुलना सद्बुद्धिपूर्वक की जाए तो यह तुलना उत्थान,विकास,उन्नति की ओर ले जाती है और यदि तुलना को कुबुद्धिपूर्वक (दुर्बुद्धिपूर्वक) की जाए तो यह तुलना हमें पतन, अवनति,रसातल की ओर ले जाती है।
  • प्रतियोगिता दो प्रकार से की जाती है:दूसरे के साथ प्रतियोगिता तथा स्वयं अपने साथ प्रतियोगिता।स्वयं के साथ प्रतियोगिता का अर्थ है कि पिछले समय में अथवा पिछली कक्षा में आप द्वारा किया गया कार्य से अगली कक्षा में श्रेष्ठ कार्य करना,श्रेष्ठ (उच्च) प्राप्तांक प्राप्त करना।यह प्रतियोगिता दूसरे के साथ की गई प्रतियोगिता की अपेक्षा उच्चकोटि की होती है।दूसरों के साथ प्रतियोगिता करने में ईर्ष्या की भावना पैदा हो सकती है।ईर्ष्या से हम दूसरों से आगे बढ़ने के बजाय दूसरों को गिराकर,टांग खींच कर आगे बढ़ना चाहते हैं। माता-पिता,अभिभावक तथा शिक्षक भी दूसरे बच्चों की अपेक्षा अधिक अच्छा करने की प्रेरणा देते हैं।
  • हर बालक की योग्यता,क्षमता,बुद्धि और परिस्थिति अलग-अलग होती है।इसलिए दूसरों से अधिक करने की प्रेरणा देना अनुचित,असंगत है।जैसे एक 60% अंक प्राप्त करने वाला 90% अंक प्राप्त करने वाले बालक के साथ प्रतियोगिता करना उचित नहीं है।बालक को स्वयं से ही प्रतियोगिता करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।यदि उसने पिछली कक्षा में 60% अंक प्राप्त किए हैं तो आगामी कक्षा में 60 से अधिक 65%-70% अंक लाने की कोशिश करनी चाहिए।कोई बालक गणित में 90 से 100 अंक तक लाता है तो आवश्यक नहीं है कि आप भी वैसा ही करें।यदि तुलना दूसरों से करनी है तो सद्बुद्धिपूर्वक की जाए।अर्थात् जीनियस व प्रखर बुद्धवाले बालक से यह सीखना चाहिए कि किस तकनीक व रणनीति से वह अधिक अंक प्राप्त करता है।
  • माता-पिता,अभिभावक,शिक्षक जाने-अनजाने दूसरों से प्रतियोगिता करवाकर बच्चों में गणित चिंता को बढ़ाने का काम कर रहे हैं।बच्चों में गणित चिंता संक्रामक रोग की तरह फैलती है।
  • इस तरह गणित के कुछ ओर भी मिथक हैं।परन्तु हम उन सभी का वर्णन न करके कुछ मिथक के बारे में बता रहे हैं।गणित के इन मिथक से जो आपको हतोत्साहित करते हैं,दूर रहे।किसी भी बात को तर्क,युक्ति तथा प्रमाण व अपने विवेक से व मनन करके फिर निर्णय लें।बिना विचारे तथा हर किसी के कहने से हमारे अंदर कुण्ठा पैदा होती हैं।हम सोचने लगते हैं कि गणित विषय का अध्ययन हमारे बस की बात नहीं है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में गणित के बारे में 7 मिथक (7 Myths About Mathematics),गणित मिथक और गलत धारणाएँ (Mathematics Myths and Misconceptions) के बारे में बताया गया है।

डिग्रीधारी बेरोजगार युवक (हास्य-व्यंग्य) (Unemployed Youth with Qualified) (Homur-Sattire):

  • एक डिग्रीधारी युवा नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गया।
    इंटरव्यूअर (Interviewer):(बेरोजगार युवक से) तुम्हारी क्वालिफिकेशन क्या है?
    युवक:ट्रिपल एमएससी।
  • इंटरव्यूअर:आजकल क्या कर रहे हो।
    युवक:पीएचडी करने की सोच रहा हूँ।
    इंटरव्यूअर:कोई काम धंधा क्यों नहीं कर रहे हो।
    युवक:मेरे लायक कोई काम ही नहीं मिल रहा है।
    इंटरव्यूअर:इन डिग्रियों का क्या करोगे।
  • युवक:डिग्री के बगैर कोई पूछता तो नहीं।ये तो परिवार में,समाज में शान से रहने का स्टेटस सिम्बल बन चुका है।अब आपको ही देख लीजिए न,सबसे पहले आपने मेरी डिग्री के बारे में ही पूछा है।
    इंटरव्यूअर:आपको यदि नौकरी पर रख लिया जाए तो कितने वेतन की अपेक्षा रखते हो।
    युवक:यही कोई सालाना छ: लाख और भत्ते (Allowances) अलग से।
  • इंटरव्यूअर:नौसिखिए को इतना वेतन नहीं दिया जा सकता है।सोच-समझकर बताओ।
    युवक:मैंने डिग्री ली है उसके लिए ऋण लिया हुआ है।इस वेतन में से आधा पैसा तो उसका ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाएगा।
    ऐसा करो आपको आपका हिस्सा मिल जाएगा।वेतन कम कराओगे तो आपको कौनसा फायदा होगा?फायदा नुकसान कम्पनी को होगा।
  • इंटरव्यूअर:अच्छा ये बताओ अगर तुम्हें वेतन बढ़ाकर दे दिया जाए और अन्य भत्ते, आने-जाने के लिए गाड़ी, रहनेवाले के लिए क्वार्टर इत्यादि सभी सुविधा दे दी जाए तो।
    युवक:कहीं आप मजाक तो नहीं कर रहे हो।
    इंटरव्यूअर:हां,पर मजाक की शुरुआत तो तुमने की है।
  • शिक्षा:यह हाल है,आज के युवाओं का।योग्यता है नहीं और मंसूबे ऊँची नौकरी तथा बढ़िया वेतनमान प्राप्त करने का रखते हैं।छोटा-मोटा धंधा शुरु करने में स्टेट्स सिम्बल का सवाल है।नौकरी पर जाने से पहले ही भ्रष्टाचार करने की मानसिकता तथा योजना बना रखी है।इन तौर तरीकों से न तो खुद का भला हो सकता है और न देश और समाज का भला हो सकता है।
  • केवल डिग्री प्राप्त करके कोई कलाकार या हुनरमंद नहीं बन सकता है।प्रैक्टिकल ट्रेनिंग से ही कोई युवा सच्चे मायने में योग्य हो सकता है।डिग्री प्राप्त वैसे ही है जैसे गणित का सवाल पढ़ लेने से गणित के सवाल को हल नहीं किया जा सकता है।सवाल को हल करने के लिए उसका अभ्यास करना आवश्यक है।स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए स्वास्थ्य रक्षक पुस्तकें पढ़ने से स्वास्थ्य की रक्षा नहीं की जा सकती है।स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए प्रैक्टिकली योगासन,व्यायाम करना होगा।कहा भी गया है कि:
  • “पुस्तकस्था तु या विद्या पर हस्ते गतं धनम्।
    कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम्”।।
  • अर्थात् पुस्तकों में पड़ी हुई विद्या और दूसरे के हाथ में गया हुआ धन ये दोनों जरूरत के वक्त काम नहीं आते।
    यहाँ पड़ी से अर्थ यह लिया जाए कि पढ़ी हुई विद्या (केवल डिग्री प्राप्त कर लेना) परन्तु जिसका चिन्तन-मनन न हो,व्यावहारिक प्रयोग न किया गया हो।

2.गणित के बारे में 7 मिथक (7 Myths About Mathematics),गणित मिथक और गलत धारणाएँ (Mathematics Myths and Misconceptions) के सम्बन्ध में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.गणित के बारे में मिथक क्या-क्या हैं? (What is Myths About Mathematics?):

उत्तर:नौ गणित मिथकों (9 Mathematics Myths)
पुरुष महिलाओं की तुलना में गणित में बेहतर हैं (MEN ARE BETTER IN MATH THAN WOMEN)।
गणित को तर्क की आवश्यकता होती है,अंतर्ज्ञान की नहीं (MATH REQUIRES LOGIC,NOT INTUITION)।
गणित रचनात्मक नहीं है (MATH IS NOT CREATIVE)।
आपको हमेशा पता होना चाहिए कि आपको जवाब कैसे मिला (YOU MUST ALWAYS KNOW HOW YOU GOT THE ANSWER)।
गणित की समस्याओं को करने का एक सबसे अच्छा तरीका है (THERE IS A BEST WAY TO DO MATH PROBLEMS)।
जवाब को बिल्कुल सही तरीके से प्राप्त करना हमेशा महत्वपूर्ण होता है (IT’S ALWAYS IMPORTANT TO GET THE ANSWER EXACTLY RIGHT)।
अपनी उंगलियों पर गिनना बुरा है (IT’S BAD TO COUNT ON YOUR FINGERS)।
गणित के बारे में मिथकों को दूर करना (Dispelling Myths about Mathematics)
मिथक है कि केवल शानदार लोग गणित में अच्छे हैं और विविधता के लिए इसके निहितार्थ
गणित के बारे में एक आम गलत धारणा यह है कि इसे कच्चे

प्रश्न:2.क्या गणित सत्य है? (Are mathematics true?):

उत्तर:गणितीय यथार्थवाद-विरोधी (anti-realism) आम तौर पर मानता है कि गणितीय बयानों में सत्य-मूल्य होते हैं,लेकिन वे अभौतिक (immaterial) या गैर-अनुभवजन्य (non-empirical entities) संस्थाओं के एक विशेष दायरे के अनुरूप ऐसा नहीं करते हैं। गणितीय यथार्थवाद-विरोधी के प्रमुख रूपों में औपचारिकता (formalism) और काल्पनिकता (fictionalism) शामिल हैं।

प्रश्न:3.क्या गणित संस्कृति से मुक्त है? (Is math free of culture?):

उत्तर:इस प्रकार हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जबकि गणित का अध्ययन इसके विकास के लिए अनुप्रयोगों पर निर्भर नहीं है और इसलिए “संस्कृति-मुक्त (Culture-free)” है,आगे के गणितीय विचारों के विकास को बढ़ावा देने के रूप में अनुप्रयोगों का समर्थन करने के लिए सबूत हैं।

प्रश्न:4.कुछ दिलचस्प गणितीय कहानियां क्या हैं? (What are some interesting mathematical stories?):

उत्तर:गणित की कहानियां आपका बच्चा वास्तव में आनंद लेगा (Math Stories your child will actually enjoy)
लालची त्रिभुज।मर्लिन बर्न्स द्वारा,गॉर्डन सिल्वरिया द्वारा सचित्र (The Greedy Triangle. by Marilyn Burns, illustrated by Gordon Silveria)।
सभी के लिए स्पेगेटी और मीटबॉल्स!मर्लिन बर्न्स द्वारा,डेबी टिली और गॉर्डन सिल्वरिया द्वारा सचित्र (Spaghetti and Meatballs for All! by Marilyn Burns, illustrated by Debbie Tilley and Gordon Silveria)।
दरवाजे की घंटी बजी। Pat Hutchins द्वारा (The Doorbell Rang. by Pat Hutchins)
एक लाख डॉट्स (A Million Dots)।
चावल का एक दाना (One Grain of Rice)।

उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा गणित के बारे में 7 मिथक (7 Myths About Mathematics),गणित मिथक और गलत धारणाएँ (Mathematics Myths and Misconceptions) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

7 Myths About Mathematics

गणित के बारे में 7 मिथक
(7 Myths About Mathematics)

7 Myths About Mathematics

गणित के बारे में 7 मिथक (7 Myths About Mathematics) के अलावा भी लंबी लिस्ट है।
गणित विषय जितना पॉपुलर तथा उपयोगी है उतना इसके साथ मिथक जुड़ गए हैं।
पहले मिथक का अर्थ समझते हैं कि आखिर मिथक होता क्या है?

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