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The Role of Review in Mathematics

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1.गणित में समीक्षा की भूमिका (The Role of Review in Mathematics),गणित में अध्ययन की समालोचना (Review of Study in Mathematics):

  • गणित में समीक्षा की भूमिका (The Role of Review in Mathematics) तथा महत्त्व को जानने के लिए समीक्षा का अर्थ जानना आवश्यक है।समीक्षा का अर्थ होता है सम्यक परीक्षा,समालोचना,अन्वेषण,मीमांसा आदि।अंग्रेजी में समीक्षा के लिए प्रयोग Review,Criticism का प्रयोग किया जाता है।
  • इस प्रकार समीक्षा का अर्थ है किए गए कार्य अध्ययन,लेख,पाठ्यक्रम इत्यादि की अच्छाई और सीमाएं,कमजोर व सबल पक्ष,गुण और दोषों को जानना।विद्यार्थी को अपने अध्ययन का,लेखक को गणित की पुस्तक का,पाठ्यक्रम निर्माण समिति को गणित के पाठ्यक्रम का,परीक्षक को प्रश्न-पत्रों का, अध्यापक को अध्यापन का तथा शिक्षा संस्थान के संचालक को अपने शिक्षा संस्थान की समीक्षा करते रहने से यह पता चल जाता है कि उसमें सुधार करने की कहां जरूरत है?उसे किस प्रकार सुधारा जा सकता है।
  • छात्र छात्राएं वर्षभर परंपरागत तरीके से अध्ययन करते रहते हैं।कठिन परिश्रम करने पर भी कुछ छात्र-छात्राओं का परिणाम सामान्य रहता है अथवा सामान्य से भी नीचे रह जाता है।विद्यार्थी समझ ही नहीं पाते हैं कि ऐसा क्यों हुआ?क्या परीक्षक ने उत्तर पुस्तिका जांच करने में त्रुटि कर दी?क्या छात्र ने प्रश्न के अनुकूल उत्तर नहीं दिया?छात्र ने सवाल समझने में त्रुटि कर दी।या सवाल का उत्तर जिस तरीके से देना चाहिए क्या उत्तर उस तरीके से नहीं दिया गया है?अध्यापक ने ठीक से नहीं समझाया। आखिर त्रुटि कहां रह गई?इन सभी प्रश्नों का उत्तर समीक्षा करने पर ही मिल सकता है।
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(1.)छात्र-छात्रा अध्ययन की समीक्षा करें (Review Student his Studies):

  • छात्र-छात्रा को केवल अध्ययन करते रहना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि किए गए अध्ययन की समीक्षा भी करते रहना चाहिए।समीक्षा के द्वारा गणित में किए गए अध्ययन के कमजोर व मजबूत पक्ष को जान सकता है।समीक्षा करने के लिए कई विधियां हैं परंतु यहां उन व्यावहारिक तरीकों का ही उल्लेख किया जाएगा जिसके आधार पर छात्र-छात्राएं अपनी कमजोरियों को पहचान सकता है।
  • मसलन साप्ताहिक टेस्ट,मासिक टेस्ट,अर्धवार्षिक परीक्षा,प्री बोर्ड एग्जाम के द्वारा छात्र-छात्राएं अपने अध्ययन की सम्यक जांच कर सकता है।कई छात्र-छात्राएं इन टेस्ट व परीक्षाओं को गंभीरता से नहीं लेते हैं।इनका फायदा नहीं उठाते हैं।बाद में परीक्षा परिणाम अनुकूल नहीं रहता है तो पश्चाताप करते हैं।अध्ययन करने का अर्थ केवल पढ़ना ही नहीं होता बल्कि पढ़े हुए के बारे में चिंतन करना,अन्वेषण करना तथा अपने मन में उठने वाली शंकाओं का समाधान प्राप्त करना होता है।यदि छात्र-छात्राएं इन बातों पर गौर करें तो उनकी बुद्धि का शीघ्र तथा ठीक-ठीक विकास हो सकता है।यदि किसी शिक्षा संस्थान में टेस्ट,मासिक टेस्ट इत्यादि नहीं भी होते हैं तो कदम-कदम पर छात्र-छात्राओं को अपनी कमजोरी ज्ञात करने के उपाय हैं।
  • अध्यापक प्रत्येक अध्याय की थ्योरी तथा उदाहरण समझाते हैं।समझाने के बाद छात्र-छात्राएं सवाल हल करते हैं।जब सवाल गलत हो जाता है तो छात्र-छात्रा अपने साथी या अध्यापक से पूछते हैं। इस प्रकार सही हल तथा अपने गलत सवाल की तुलना करके विद्यार्थी जान सकते हैं कि उसने कहाँ त्रुटि कर दी है तथा वह किस प्रकार की त्रुटि करता है?
    यदि सवाल के उत्तर सही भी होते हैं तो भी स्टूडेंट को उन सवालों में से कुछ सवालों को कक्षा के होशियार छात्र के सवालों से अथवा किसी आंसरशीट से उसका मिलान करके देखना चाहिए कि उसने सवाल को ठीक किया है या नहीं।कोई स्टेप में भूल चूक तो नहीं हो गई।
  • अपनी कमजोरी को जानना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि अपनी कमजोरी को पहचान कर उसको दूर करना भी जरूरी होता है।तभी आप गणित में दक्षता,योग्यता प्राप्त कर सकते हैं।गणित में निपुण हो सकते हैं।
    गणित के सवालों को तोते की तरह रट लेना,यंत्रवत हल करते रहना उसी तरह है जैसे हम धार्मिक पुस्तकों को पढ़ते हैं,पूजा करते हैं और उन्हें वापस कपड़े में बांध कर रख देते हैं।रोज-रोज नहीं तो मासिक,त्रैमासिक,अर्द्धवार्षिक तथा प्री बोर्ड के समय यदि छात्र-छात्राएं अपने अध्ययन करने की जांच परख करता रहे और उन कमजोरियों को दूर करें तो गणित में उसका द्रुतगति से विकास हो सकता है।अपनी कमजोरी की पहचान समय रहते ही किया जाए तभी आप उसको दूर कर सकते हैं अथवा दूर करने का प्रयास करेंगे।कहावत भी है कि “का वर्षा जब कृषि सुखाने” अर्थात् कृषि (खेती) सूखने पर वर्षा का क्या फायदा?इसी प्रकार परीक्षाएं नजदीक आ जाएं तभी उसकी समीक्षा करने से क्या फायदा?
  • इस बारे में यह प्रश्न मन में उठता हो कि अध्ययन करने से ही फुर्सत नहीं मिलती है तो अध्ययन करने की समीक्षा के लिए समय कहां है?आजकल के छात्र-छात्राओं को फिल्में देखने,नाच-गान करने तथा पार्टी व जन्मदिन में भाग लेने के लिए समय मिल जाता है परंतु अध्ययन के लिए समय नहीं मिलता है।आज छोटे-छोटे बालकों को फिल्मी सितारों,नायिकाओं के नाम याद है।उनकी फिल्म की पूरी स्टोरी याद रहती है।परंतु पुस्तक का पाठ उस तरह से याद नहीं रहता।
  • कुछ छात्र-छात्राएं तो अनैतिक कार्यों जैसे जुआ खेलना,शराब पीना,फैशनपरस्ती,लड़ाई-झगड़ा करने में मशगूल रहते हैं।बात-बात पर झगड़ा करने पर आमादा हो जाते हैं।ऐसे विद्यार्थी वास्तविक रूप में विद्यार्थी नहीं बल्कि विद्यार्थी के वेश में राक्षस हैं।कुछ छात्र-छात्राएं अय्याश,लंपट भी मिल जाएंगे। ऐसी अवस्था में इस प्रकार के छात्र-छात्राओं को अंधे को दीपक दिखाने के समान है।

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(2.)निष्कर्ष (Conclusion of The Role of Review in Mathematics),गणित में आलोचना की भूमिका का सारांश (The Role of Criticism in Mathematics):

  • गणित की पाठ्यपुस्तक भी इस प्रकार से लिखी जानी चाहिए जैसे सभी प्रकार के छात्र-छात्राओं के लिए उपयोगी हो।जैसे एक्सरसाइज के अंत में एक एक्सरसाइज ऐसी देनी चाहिए जो मेघावी छात्र तथा जिज्ञासु छात्र हल कर सके।अध्यापक-अध्यापिका को भी कुछ सवाल एक्सरसाइज के बाहर के हल करवाने चाहिए जिससे छात्र-छात्राओं की बुद्धि की परीक्षा हो सके।
  • गणित की पाठ्यपुस्तक से बाहर का ज्ञान देना एक निपुण तथा आदर्श अध्यापक का गुण है।क्योंकि पाठ्यपुस्तक के हल तो कुंजियों,पासबुक्स में भी मिल जाते हैं।बालक उनको देखकर हल कर लेते हैं।इसका नुकसान यह होता है कि उनकी बुद्धि का उचित विकास नहीं होता है।
  • परम्परागत गणित में जो एक्सरसाइज होती है उनको छात्र-छात्राएं रट लेते हैं तथा उनके हल देखकर नोटबुक में उतारने पर भी याद हो जाते हैं। इसलिए गणित के सूक्ष्म अध्ययन के लिए छात्र-छात्रा के स्तर से थोड़ा ऊँचे स्तर के सवाल व समस्याएं दी जानी चाहिए।इसके अलावा पाठ्यपुस्तक में कुछ मॉडल पेपर्स,कुछ बौद्धिक सवाल तथा कुछ विषय सामग्री इस तरह की जोड़नी चाहिए जिससे छात्र-छात्रा स्वयं अपने स्तर पर जांच-परख कर सके।
  • उपयुक्त प्रश्न,अभ्यास कार्य तथा अतिरिक्त गणित की समस्याओं को हल करके छात्र-छात्राएं अपनी कमजोरी तथा सबल पक्ष को जान सकता है। उदाहरणार्थ एनसीईआरटी द्वारा केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के विद्यार्थियों के लिए कक्षा 9 से 12 तक की गणित की पाठ्यपुस्तकों में कुछ प्रश्नावली ऐच्छिक जोड़ी गई हैं जो कि परीक्षा की दृष्टि से नहीं है।इसी प्रकार पाठ्यपुस्तक के बीच-बीच में महान गणितज्ञों के प्रसंग (प्रसंगवश) तथा पाठकों के लिए विशेष पाठ्य सामग्री जोड़ी गई है।इस प्रकार का प्रयास मेधावी तथा जिज्ञासु छात्र-छात्राओं के लिए स्तुत्य है। पाठ्यपुस्तक के अंत में भी ज्ञानवर्धक सामग्री जोड़ी गई है।
  • वस्तुतः एक आदर्श पाठ्यपुस्तक वही है जो सभी प्रकार के छात्र-छात्राओं के लिए उपयोगी हो।उसकी गणितीय शब्दावली छात्र-छात्राओं के समझ में आ सकती हो।पुस्तक में दिए गए उदाहरण छात्र-छात्राओं के स्तर के अनुकूल हो।गणित की भाषा दुरूह और क्लिष्ठ न हो।यदि इस प्रकार के शब्द हों तो उसका अंग्रेजी अनुवाद भी दिया हुआ हो।छात्र-छात्राओं में जिज्ञासा उत्पन्न करती हो।
  • प्रत्येक कक्षा के पाठ्यक्रम का निर्धारण इस प्रकार से होना चाहिए जिससे एक कक्षा का पाठ्यक्रम उत्तरोत्तर कक्षाओं के पाठ्यक्रम से तार्किक संगति रखता हो।अर्थात् पाठ्यक्रम इस प्रकार का रखना चाहिए जिससे पिछली कक्षा का छात्र अगली कक्षा में समझ सके।पाठ्यक्रम इस प्रकार का हो जिससे छात्र-छात्राओं के चिंतन को सही दिशा एवं गति मिलती हो।पाठ्यक्रम में मूल्यांकन विधियों का समावेश हो जिससे छात्र-छात्राएं व्यक्तिगत स्तर पर मूल्यांकन कर सकें।तात्पर्य यह है कि पाठ्यक्रम में लचीलापन हो।
  • व्यावहारिक रूप में इन सब बातों का समावेश इसलिए नहीं होता क्योंकि छात्र-छात्राओं का एक मनोविज्ञान होता है जिसके द्वारा वह किसी चीज को तब तक नहीं अपनाता है जब तक कि उस चीज से कोई चमत्कार नहीं होता है या वह चीज परीक्षा में आनेवाली न हो।यही बात अपने अध्ययन की समीक्षा करने पर लागू होती है।हमारा विचार यह है कि पाठ्यपुस्तक का,पाठ्यक्रम का तथा छात्र-छात्राओं के अध्ययन की समीक्षा होती रहनी चाहिए और उसके आधार पर उन्हें अपने आपमें सुधार करते रहना चाहिए।समीक्षा चाहे व्यक्तिगत स्तर पर अथवा संस्थागत रूप से हो।
  • उपर्युक्त विवरण में गणित में समीक्षा की भूमिका (The Role of Review in Mathematics),गणित में अध्ययन की समालोचना (Review of Study in Mathematics) के बारे में बताया गया है।

2.गणित में समीक्षा की भूमिका (The Role of Review in Mathematics),गणित में अध्ययन की समालोचना (Review of Study in Mathematics) के सम्बन्ध में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.गणित में समीक्षा महत्वपूर्ण क्यों है? (Why is review important in math?):

उत्तर:समीक्षा निरंतरता को बढ़ावा देती है और छात्रों को शामिल गणितीय विषयों का अधिक व्यापक दृश्य प्राप्त करने में मदद करती है।यह उन्हें मुख्य विचारों को संक्षेप में प्रस्तुत करने,सामान्यीकरण विकसित करने और टुकड़ों में सीख रहे लोगों के समग्र दृष्टिकोण को प्राप्त करने में मदद करता है।

प्रश्न:2.आप गणित के लिए एक समीक्षा पत्र कैसे लिखते हैं? (How do you write a review paper for math?):

उत्तर:ऐसे संसाधन हैं जो गणित शोध पत्र लिखने और प्रकाशित करने के लिए निम्नलिखित वर्गों से संबंधित बहुत विशिष्ट दिशानिर्देश प्रदान करते हैं।
गणित के पेपर की अवधारणा।
शीर्षक,पावती और लेखकों की सूची।
सारांश (Abstract)।
परिचय।
काम का शरीर (Body of the work)।
निष्कर्ष,परिशिष्ट और संदर्भ (Conclusion, appendix, and references)।
गणित के पेपर का प्रकाशन।

प्रश्न:3.आप एक मजेदार तरीके से गणित की समीक्षा कैसे करते हैं? (How do you review math in a fun way?):

उत्तर:20 पूरी तरह से मजेदार तरीके गणित तथ्यों का अभ्यास करने के लिए
पासा युद्ध में बंद चेहरा।पासा खेल कक्षा में शानदार हैं!
Assemble math facts grab bags।
बॉक्स बंद करो (Play Shut the Box)।
गणित तथ्यों युद्ध खेलते हैं (Play math facts war)।
एक अंडे के कार्टन को समस्या जनरेटर में बदल दें (Turn an egg carton into a problem generator)।
एक डोमिनोज पहेली को इकट्ठा करें (Assemble a domino puzzle)।
एक नंबर खोज में सर्कल गणित तथ्य (Circle math facts in a Number Search)।
एक पंक्ति में पंद्रह खेलने के लिए फ़्लैशकार्ड का उपयोग करें (Use flashcards to play Fifteen in a Row)।

उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा गणित में समीक्षा की भूमिका (The Role of Review in Mathematics),गणित में अध्ययन की समालोचना (Review of Study in Mathematics) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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गणित में समीक्षा की भूमिका (The Role of Review in Mathematics) तथा महत्त्व को जानने के लिए समीक्षा का अर्थ जानना आवश्यक है।
समीक्षा का अर्थ होता है सम्यक परीक्षा,समालोचना,अन्वेषण,मीमांसा आदि।अंग्रेजी में समीक्षा के लिए प्रयोग Review,Criticism का प्रयोग किया जाता है।

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