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Observe Yourself to Study Mathematics

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1.गणित का अध्ययन करने के लिए स्वयं का निरीक्षण करें (Observe Yourself to Study Mathematics),गणित का अध्ययन करने के लिए छात्र-छात्राएँ स्वयं को पहचानें (Students Identify Themselves to Study Mathematics):

  • गणित का अध्ययन करने के लिए स्वयं का निरीक्षण करें (Observe Yourself to Study Mathematics) अर्थात् स्वयं को पहचानने,स्वयं की आत्मशक्ति को पहचानें तो उतना विकास करते जाएंगे।हम अक्सर दूसरों को जानने,पहचानने में रुचि लेते हैं परंतु स्वयं के बारे में जानने,आत्म-निरीक्षण करने में रुचि नहीं रहती है।
  • यदि हम हमारे बारे में जानते भी हैं तो यही जानते हैं कि हमारा शरीर कैसा है,हमारे पास कितनी धन संपत्ति है,हमारे मकान परिवार में क्या-क्या हैं और कौन-कौन हैं?दूसरों के बारे में जानने और रुचि लेने से अपने बारे में जानने से नजर हटती जाती है।
  • यदि हम दूसरों को जानने से नजर हटा कर खुद को जानने की ओर अपनी नजर लगाएं,दृष्टि की दिशा स्वयं की ओर मोड़ दें तो हमें मालूम पड़ेगा कि हमारी शक्ति क्या है,हमारी कमजोरियां क्या है?
  • महान गणितज्ञ प्रारंभ में हमारे जैसे ही साधारण व्यक्ति थे परंतु जब उन्होंने अपने आपको जानने का प्रयास किया,अपना आत्म-निरीक्षण किया तो उन्होंने अपनी शक्ति और कमजोरी को पहचाना। उन्होंने अपने अंदर मौजूद विकारों काम-क्रोधादि को दूर किया तथा जितना वे विकार रहित होते गए उतना ही आगे बढ़ते गए।
  • जितना हम अपना आत्म-निरीक्षण करते जाते हैं तथा हमारे मौजूद विकारों को दूर करते जाते हैं तो हमारे अध्ययन करने की गति बढ़ती जाती है। छात्र-छात्राओं को गणित और अन्य विषय जटिल इसलिए ही लगते हैं क्योंकि गणित की समस्याओं,कठिनाइयों और सवालों को हल करने में हमारे मन के विकार बाधक बन जाते हैं।
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2.अपनी दृष्टि को अपने अंतस् की ओर मोड़ें (Turn Your Vision Inward):

  • कुछ छात्र-छात्राएं अध्ययन के दौरान घटित होने वाली घटनाओं के प्रति उदासीन और निरपेक्ष भाव रखते हैं।अध्ययन में कठिनाई क्यों आती है?अध्ययन करने का उद्देश्य क्या है?उनके जीवन से अध्ययन का क्या संबंध है? संबंध है या नहीं है।इन सब घटनाओं के प्रति उदासीन रहते हैं।फलतः अध्ययन में उनका विकास नहीं होता है।
  • परंतु कुछ छात्र-छात्राएं प्रत्येक घटना को बारीकी से देखते हैं,वे उसके कारण को जानने की कोशिश करते हैं।वे अपने आपको पहचानने के लिए ज्यादा से ज्यादा जागरूक होते हैं।ऐसे छात्र-छात्राएं गणित में उच्च कोटि पर पहुंच जाते हैं।ऐसे छात्र-छात्राएं आगे जाकर गणित में नई-नई खोजें,अनुसंधान को अंजाम देते हैं।वे हर घटना को बारीक नजर से देखते हैं,जिज्ञासा का भाव रखते हैं।प्रत्येक घटना से प्रेरणा लेते हैं और कर्त्तव्य को बखूबी निभाते हैं।
  • वस्तुतः हर छात्र-छात्रा के व्यक्तित्व को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।एक भाग हैं बाहरी जिसमें शरीर,मन,इंद्रियां आदि शामिल है।दूसरा भाग है अंतकरण,चेतन शक्ति,आत्मशक्ति इत्यादि।शरीर के रूप,रंग,कद,काठी इत्यादि की जानकारी तो होती है।परंतु मनःशक्ति,अन्तःकरण,चेतन व आत्म-शक्ति के बारे में बहुत कम जानकारी रखते हैं।मनःशक्ति और आत्म-शक्ति में अनेक रहस्य समेटे हुए हैं।मन और आत्म-शक्ति में अनेक मौलिक विशेषताएं हैं।
  • विद्यार्थियों को अपने आपको पहचानने से तात्पर्य है कि वे अपनी विशेषताओं,शक्तियों,गुणों और कमजोरियों,दुर्बलताओं को पहचानें।हम जितना इनके बारे में जानते जाते हैं तो अपनी शक्तियों के बल पर कमजोरियों,दुर्बलताओं को दूर करते जाते हैं।गणित तथा अध्ययन में आने वाली कठिनाइयों का समाधान करने की तैयारी कर सकेंगे।
  • प्रत्येक छात्र-छात्रा में पृथक-पृथक शक्तियाँ अदृश्य रूप से छिपी हुई रहती है जिसे अगर पहचानकर निखारने,तराशने व उभारने का कार्य कर सकें तो वह यशस्वी और महान् बनता है।

3.आत्म चिंतन करें (Think About Yourself):

  • छात्र-छात्राओं को आत्म चिंतन करते रहना चाहिए। अपने आपका अध्ययन करना कठिन अवश्य है परंतु असंभव नहीं है।आत्म-शक्ति में अनन्त और अपार रहस्य भरे पड़े हैं।परंतु आत्मचिंतन के बिना उनके बारे में नहीं जाना जा सकता है।हमारे शरीर का संचालक आत्म-शक्ति ही है वरना आत्म-शक्ति के बिना शरीर निर्जीव व मुर्दा है जिससे कुछ भी कार्य नहीं कराया जा सकता है।इस शरीर का संचालक आत्म-शक्ति है जिससे अनेक असंभव लगने वाले कार्यों को संपन्न किया जाता है।
  • इस संपूर्ण विवरण को देने का यह मतलब नहीं है कि हम सांसारिक कर्तव्यों,जीवन की समस्याओं व कठिनाइयों से मुँह मोड़ना चाहते हैं।यह विवरण देने का हमारा उद्देश्य यह है कि हम अपनी आदतों,संस्कारों,प्रवृत्तियों का अध्ययन करें और ऐसी योजना बनाएं जिससे जीवन में,गणित के क्षेत्र में,अध्ययन के क्षेत्र में,जॉब के क्षेत्र में उन्नति कर सकें।
  • अपने आपको पहचानने,अपने अंतस् को पहचानने के लिए आत्मनिरीक्षण,आत्मचिंतन करना आवश्यक है।आत्म-चिंतन से तात्पर्य है कि छात्र-छात्राएं यह सोचे कि चिंतन-मनन कैसे किया जाता है,किस क्षेत्र में उसकी लगन और रुचि है,किन समस्याओं का सामना वह साहसपूर्वक कर सकता है,उसमें गणितज्ञ बनने की योग्यता है अथवा खिलाड़ी,वैज्ञानिक या अन्य किसी क्षेत्र में योग्यता है।इससे परिचित होने के बाद उसी दिशा में प्रगति और विकास किया जा सकता है।छात्र-छात्राओं को निराशावादी,आलसी,अकर्मण्यता निरुत्साहित इत्यादि आदतों से छुटकारा पाकर विकास में सहायक प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन दिया जाना है और इस प्रकार छात्र-छात्राएं आत्मचिंतन,आत्म-निरीक्षण करके,अपने को पहचान कर अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकते हैं।

4.आत्म-शक्ति का दृष्टांत (Parable of Self-Power):

  • स्वयं को पहचानने में हमें जितनी सफलता प्राप्त होगी उतना ही हमारा विकास होता जाएगा।शारीरिक शक्ति को पहचानने से केवल भौतिक क्षेत्र में ही विकास किया जा सकता है लेकिन जीवन की समस्या फिर भी हल नहीं हो सकती है।परंतु अपने अंतस को पहचानने,अपनी आदतों को पहचानने,अपने अंतःकरण को पहचानने,अपनी आत्मशक्ति को पहचानने से हम जीवन की समस्याओं को बखूबी हल कर सकते हैं।साथ ही हमारी आध्यात्मिक यात्रा में भी आत्मशक्ति सहायक है।आत्म-शक्ति का उपयोग दोनों क्षेत्रों में किया जा सकता है।हमारे अंदर कौनसी अच्छी आदतें हैं जिनको विकसित करना है,हमारे अंदर कौन सी बुरी आदतें और दुर्बलताएँ हैं जिन्हें दूर करना है इन सबको आत्म-शक्ति द्वारा पहचानने और उपयोग करने पर ही सफलता प्राप्त हो सकती है।वस्तुतः जब तक छात्र-छात्राएं अपनी शक्ति,आदतों इत्यादि को नहीं पहचानते हैं तब तक वे यह जान ही नहीं सकते हैं कि विकास और प्रगति किस दिशा में करें?
  • रविंद्र अपनी कक्षा में इतना कुशाग्र बुद्धि का था कि गणित का कोई भी सवाल तत्काल हल कर देता था।गणित में उसकी प्रतिभा को देखकर गणित शिक्षक भी दंग रह जाते थे।रविंद्र पढ़-लिखकर व्यवसाय करने लग गया।उसकी शादी हो गई और दो बच्चे हो गए।दोनों बच्चे सुधांशु और शुभम ज्योंही बड़े हुए तो गणित की समस्याएं,गणित के सवालों को हल करने में परेशानी महसूस करने लग गए।दोनों की गणित में रुचि तो थी परंतु गणित के जटिल सवालों को हल करने में उन्हें एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता था।
  • उन्होंने अपने पिताजी रविंद्र को यह समस्या बताई तो रविंद्र अपने दोनों बच्चों को लेकर उन्हीं गणित शिक्षक के पास गया।तब गणित के शिक्षक ने कहा कि रविंद्र तुम स्वयं अपने बच्चों सुधांशु और शुभम की समस्या को हल कर सकते हो।तुम अपने छात्र जीवन की घटना को याद करो,जब तुम तत्काल गणित के सवालों और समस्याओं को हल कर देते थे।तुम अपनी आत्मशक्ति को स्मरण करो।छात्र जीवन में गणित के सवालों को चुटकियों में हल कर देते थे।अपनी गणितीय प्रतिभा को स्मरण करो और सुधांशु और शुभम की घर बैठे ही सहायता कर सकते हो।
  • रवीन्द्र को अपनी गणितीय ज्ञान शक्ति याद आ गई। उसे छात्र जीवन का वह समय याद आया जिसमें गणित के सवालों को हल करने पर सभी छात्र-छात्राएं वाह-वाह कर उठते थे।व्यवसाय में लग जाने के कारण उसकी गणित की प्रतिभा सो गई थी।वह दुनियादारी,पारिवारिक कर्त्तव्यों,जॉब करने तथा जीवन की समस्याओं को सुलझाने के प्रपंच में इतना उलझ गया था कि गणितीय प्रतिभा दम तोड़ने लग गई थी।
  • रविंद्र ने पुनः प्रयास किया और धीरे-धीरे सुधांशु व शुभम को पढ़ाने तथा स्वयं अध्ययन करने पर गणित में उच्च कोटि का विद्वान बन गया।सुधांशु व शुभम के साथ-साथ वह अन्य छात्र-छात्राओं को मदद करने लगा।उसे अपने असली स्वरूप का ज्ञान जो हो गया था।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में गणित का अध्ययन करने के लिए स्वयं का निरीक्षण करें (Observe Yourself to Study Mathematics),गणित का अध्ययन करने के लिए छात्र-छात्राएँ स्वयं को पहचानें (Students Identify Themselves to Study Mathematics) के बारे में बताया गया है।

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5.गणित को खराब होने से बचाना (हास्य-व्यंग्य) (Protecting Math from Getting Worse) (Humour-Satire):

  • गणित अध्यापक (कक्षा में):बताओ गणित और गणितीय प्रतिभा को खराब होने से बचाने के लिए क्या करना चाहिए?
  • मिंकू:सर,उसे डिब्बे में पैक करके फ्रीज में रख देना चाहिए,फिर वह कभी खराब नहीं होगी।

6.गणित का अध्ययन करने के लिए स्वयं का निरीक्षण करें,गणित का अध्ययन करने के लिए छात्र-छात्राएँ स्वयं को पहचानें से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions Related to Observe Yourself to Study Mathematics,Students Identify Themselves to Study Mathematics):

प्रश्न:1.क्या छात्र-छात्राएं अपनी संपूर्ण आंतरिक शक्तियों को पहचान सकते हैं? (Can Students Recognize Their Full Inner Strengths?):

उत्तर:छात्र-छात्राओं में कुछ जन्मजात व पैतृक प्रवृतियां दिखाई दे जाती हैं।उनको जानकर वे अपने कार्य क्षेत्र को चुनते हैं और उनमें विकास कर सकते हैं।कुछ प्रवृतियां प्रशिक्षण से विकसित होती है।परंतु कई ऐसे उदाहरण देखने में आते हैं की इनसे परे भी कई लोगों ने उन्नति की है जिसका उन्हें पता ही नहीं था।उनके व्यक्तित्व का विकास उपर्युक्त प्रवृत्तियों से परे अन्य रहस्यमय प्रवृत्तियों के आधार पर हुआ।

प्रश्न:2.क्या अपनी क्षमताओं को पहचानना पर्याप्त है? (Is It Enough to Recognize Your Strengths?):

उत्तर:नहीं।अपनी क्षमताओं,प्रवृत्तियों,शक्तियों को पहचानने के बाद लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। लक्ष्य का निर्धारण करने से उसे प्राप्त करने का उत्साह जागृत होता है।वह लक्ष्य प्राप्ति में जुट जाता है।लक्ष्य निर्धारण से जीवन में अनुशासन,संयम,साधना का समावेश होने से कष्टों को सहने की शक्ति मिलती है।

प्रश्न:3.अपने आप को न पहचानने से हानि क्या है? (What’s the Harm of Not Recognizing Yourself?):

उत्तर:जो व्यक्ति अपना अध्ययन नहीं करता है,अपनी प्रवृत्तियों,आदतों,अपने संस्कारों से अपरिचित रहता है,अपने गुणों का अध्ययन नहीं करता है वह किसी क्षेत्र में उन्नति नहीं कर सकता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा गणित का अध्ययन करने के लिए स्वयं का निरीक्षण करें (Observe Yourself to Study Mathematics),गणित का अध्ययन करने के लिए छात्र-छात्राएँ स्वयं को पहचानें (Students Identify Themselves to Study Mathematics) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

Observe Yourself to Study Mathematics

गणित का अध्ययन करने के लिए स्वयं का निरीक्षण करें
(Observe Yourself to Study Mathematics)

Observe Yourself to Study Mathematics

गणित का अध्ययन करने के लिए स्वयं का निरीक्षण करें (Observe Yourself to Study Mathematics)
अर्थात् स्वयं को पहचानने,स्वयं की आत्मशक्ति को पहचानें तो
उतना विकास करते जाएंगे।हम अक्सर दूसरों को जानने,पहचानने

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