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How to Be Well Deserving:7 Specific Tactics for Being Worthy

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1.सुपात्र कैसे हों? सुपात्र होने के 7 विशिष्ट उपाय (How to Be Well Deserving:7 Specific Tactics for Being Worthy):

  • सुपात्र कैसे हों? (How to Be Well Deserving) के बारे में जानिए कि सुपात्रता क्या है और सुपात्र होने की क्या-क्या युक्तियाँ हो सकती हैं।किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए सुपात्रता कैसे उपयोगी और जरूरी है।
  • पद,पुरस्कार,अच्छे अंक,प्रवेश परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए उचित तरीके ही अपनाना चाहिए।खोटे और निकृष्ट तरीके अपनाने का दण्ड हमें ही भुगतना पड़ता है।हमने “How Do Students Get Eligibility?” लेख में विस्तार से बताया है।उसे पढ़कर आप पात्रता विकसित कर सकते हैं।कुछ और विषय-सामग्री प्रस्तुत है।

2.सुपात्र दूसरों का अनुकरण करता है,नकल नहीं (The worthy imulation others,not imitates):

  • प्रकृति में पात्रता का सिद्धांत चलता है।पात्र कभी वंचित नहीं होते और कुपात्रों (Undeserving) को कभी कुछ नहीं मिलता।प्रकृति में कहीं भी जोर-जबरन,छीना-झपटी का खेल नहीं होता।कोई यदि सोचे कि जोर-जबरदस्ती से किसी की उपलब्धि को छीन लेगा तो वह नासमझ है।
  • विद्यार्थी को मान-सम्मान,संपदा आदि मिलते हैं।वह सुपात्र (well deserving) है,इसलिए उसे मिला। कुपात्र संपदा चुरा सकता है,नोट्स चुरा सकता है,पुस्तक चुरा सकता है,विद्यार्थी की विद्या नहीं।विद्या कैसे झपट सकता है।उसके लिए उसे अपने पात्र को बड़ा और चौड़ा करना पड़ेगा और ऐसा करके ही उसके अनुरूप वह सब कुछ मिल जाएगा,जिसे वह छीनना चाहता था।
  • छोटे एवं क्षुद्र पात्र में बड़ी चीजें नहीं आ सकतीं।गागर में सागर नहीं समा सकता है।हाँ,सागर में असंख्य और अनगिनत गागर अवश्य समा जाएँगे।गागर में तो बस उतना ही जल आ सकता है,जितना बड़ा उसका आकार है।ज्यादा भरने के फेर में मात्रा से अधिक जल छलक कर गिर सकता है,परंतु विडंबना ही कहें कि इंसान बहुत कुछ पाना तो चाहता है,पर अपनी पात्रता को विकसित किए बगैर वह यों ही पाना चाहता है।
  • हमारी आदतें उस सर्प के समान हैं,जो अपने लिए बिल नहीं खोदता,न ही बनाता,लेकिन चूहों के बिल में घुसकर चूहों को खाकर वहीं पसर जाना चाहता है।यह नियति के विरुद्ध है और ऐसा संभव नहीं है।किसी से कुछ छीनकर हम बलात् ले भी लें तो क्या होगा।वह हमारा नहीं हो सकता,उसके लिए हमारी पात्रता जो नहीं है।
  • कुपात्र के पास शिकायतों का जखीरा होता है।वह अपनी अक्षमता को इसी रूप में प्रदर्शित करता है।वह अपनी अक्षमता (incompetence) का बखान नहीं करता,बल्कि वह यह कहता है कि वह कितना योग्य है और इसके बावजूद उसे वंचित किया जाता है।उसे अपनी सारी ऊर्जा एवं सामर्थ्य और भी नीचे गिराती है। वह इस निषेधात्मक मानसिकता एवं कार्य से पूरी तरह से घिरा रहता है।
  • अतः उसे अपने छोटे एवं क्षुद्र पात्र का एहसास तो होता नहीं,पर दूसरों की श्रेष्ठ सामर्थ्य एवं उपलब्धियों (attainments) से घोर ईर्ष्या होती है।ईर्ष्या की आग में कुढ़ता उसका मन उसके पात्र को और भी निम्न एवं हेय स्तर का बना देता है।
  • कुपात्र निन्दा करता है एवं कटाक्ष व कटुतापूर्ण बर्ताव करता है।उसके अंदर की क्षुद्रता उसे बेचैन किए रहती है और यही बेचैनी उसे ऐसा व्यवहार एवं बरताव करने के लिए मजबूर करती है।ऐसे लोगों का कोई साथ नहीं देता एवं ये सदैव अपने व्यवहार के अनुरूप सभी जगह तिरस्कृत एवं अपमानित (censured and insulted) होते हैं।सत्पात्र सम्मानित होते हैं,प्रतिष्ठित होते हैं।प्रकृति उसे देने की व्यवस्था जुटा देती है।जैसे-जैसे वह अपनी पात्रता विकसित करता जाता है,वैसे-वैसे वह उन उपलब्धियों का अधिकारी होता जाता है।
  • एम०ए० या एम०एस-सी० करने के पश्चात छात्र स्वतः ही पी-एच०डी० शोध हेतु योग्य हो जाता है।उसके लिए उसे मशक्कत नहीं करनी पड़ती।किसी प्रतियोगिता में सफल होने के पश्चात एवं साक्षात्कार (interview) में अव्वल दरजा पाने के बाद उस क्षेत्र में वह आसानी से पहुँच जाता है।उसे फिर और कुछ करने की जरूरत नहीं होती है;क्योंकि उसने डिग्री के रूप में अपनी पात्रता अर्जित कर ली है।अब वह उस स्तर के सभी कार्यों के लिए योग्य हो गया है।

3.पात्रता हासिल करने की शर्तें (Eligibility Conditions):

  • डार्विन भी यही कहता है कि श्रेष्ठता का वरण हो।जो योग्य,अनुकूल एवं सत्पात्र है,उसे ही उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं।उपलब्धियाँ,मान-सम्मान,प्रतिष्ठा आदि वैभव तो परिणाम हैं;अर्थात इन्हें प्राप्त करने के लिए एक लंबी यात्रा से गुजरना पड़ता है।इस कष्टसाध्य पड़ाव को जो सकुशल पार कर लेता है,उसके पास अनुभव (Experience) की पूँजी होती है और यह पूँजी ही उसकी योग्यता एवं दक्षता का प्रतीक है,परंतु जो इस चुनौतीपूर्ण समय को यों ही व्यर्थ में,आलस्य में,प्रमाद में,भोग-विलास में गुजारता है,उसके हाथ कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता।
  • आलसी और निकम्मा विद्यार्थी ही कुपात्र होता है।उसके अंदर की प्रेरक शक्ति चुक गई होती है।वह चुनौतियों से भागता,घबराता है।जिसके अन्दर जितनी मजबूत प्रेरणा शक्ति (स्ट्रांग मोटीवेशनल फोर्स) होगी,वह उतनी ही बड़ी चुनौतियों को स्वीकारेगा और उन्हें पूरा करने में अपना सर्वस्व निछावर कर देगा।
  • खतरों के खिलाड़ी किसी खतरे से नहीं डरते।साहसी,शूरमा किसी बाधा से नहीं घबराते और न भागते हैं।विपरीतताओं में,प्रतिकूलताओं (Adversities) में उनमें और भी निखार होता है।भट्ठी में गले-पिघले बगैर कच्चा लोहा फौलादी इस्पात नहीं बन सकता है।
    सुपात्र,सत्पात्र को अपनी पात्रता अर्जन करने में इन्हीं डगर से होकर गुजरना पड़ता है।उन्हें कभी भी अपने अंदर की प्रेरणा शक्ति (motive force) को कमजोर नहीं होने देना चाहिए।सदैव आग की भट्ठी के समान इसे प्रखर बनाए रखना चाहिए।जो ऐसा कर सकता है,वही सत्पात्र है और सत्पात्र को कहीं नहीं जाना पड़ता,वैभव और संपदा उसके पास चलकर आते हैं।
  • सुपात्र को अपनी उपलब्धियों के संग ठहर नहीं जाना चाहिए।जहाँ वह ठहरा,उसके आगे का मार्ग उसके लिए बंद हो जाएगा।
    एक विद्यार्थी को एक संत ने आशीर्वाद दिया और कहा कि जब भी कोर्स की पुस्तकें पढ़ों तो कोर्स की पुस्तकें पढ़ने तक ही मत रूको आगे से आगे पढ़ते रहो,बढ़ते रहो,दिन-प्रतिदिन आगे बढ़ते रहो।ठहरना मत।रूकना मत।
  • विद्यार्थी अपने कोर्स की पुस्तकें पढ़ता था उसके साथ व्यावहारिक ज्ञान की,स्वास्थ्य की पुस्तकें पढ़ने लगा।थोड़े समय बाद ही उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था कि जिस पढ़ाई से उसमें कोई बदलाव नहीं हुआ था,वहीं ज्ञानवर्धक तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी पुस्तकें पढ़ने से बहुत बदलाव हुआ।कुछ समय बाद ही वह सक्सेस मंत्र (Success Mantra),पर्सनैलिटी डवलपमेंट (pessonality development) की पुस्तकें पढ़ने से उसे और आनन्द आया।परन्तु वह ठहरा नहीं और संत की प्रेरणा से निरंतर आगे बढ़ता गया।वह क्रमशः व्यावहारिक ज्ञान,करियर,व्यक्तित्व विकास एवं अंत में आध्यात्मिक ज्ञान से सम्पन्न हो गया।वह आगे बढ़ता गया और पाता गया।रुक जाता तो शायद उसे इतनी अपार संपदा से वंचित होना पड़ता।

4.आंतरिक और बाह्य उन्नति के लिए पात्रता जरूरी (Eligibility is essential for internal and external advancement):

  • ठीक इसी प्रकार जीवन अनंत है और अनंत है उसकी खोज।जो जितना अपने आंतरिक जीवन में डुबकी लगाएगा,उतने ही प्रतिभा (talent) की खान का अधिकारी होगा।जो साधक योग-साधना के एक-एक अंग का पालन करते हुए आगे बढ़ता है,शिखर तक पहुँच पाता है,सत्पात्र वही है।जिनके कदम निरंतर आगे बढ़ते जाते हैं,थमते ठहरते कभी नहीं,वे अपने अंदर की प्रेरणा शक्ति को कुंद नहीं होने देते और नित-नूतन नई-नई उपलब्धियों के अधिकारी होते चले जाते हैं।
    अपनी पात्रता के अनुकूल एवं अनुरूप चीजों से कभी भी वंचित एवं रीते नहीं होते हैं।इसलिए बाह्य जगत की उपलब्धियाँ पाना हों,चाहे आंतरिक जगत का वैभव,दोनों के लिए सुपात्र होने की जरूरत है।अतः हमें सदा अपने पात्र को निरंतर बढ़ाते रहना चाहिए।जिससे हम प्रकृति के अनमोल उपहार (pricless gift) से कभी वंचित न हों।

5.पहले पात्रता प्राप्त करें तब कामना करें (Get the eligibility first then wish):

  • अंग्रेजी में एक रहावत है: First deserve than desire यानी पहले पात्रता प्राप्त करें फिर कामना करें लेकिन ज्यादातर होता इसरे विपरीत ही है,हम जो कुछ पाना चाहते हैं उसे पाने की योग्यता (Eligibility) अपने में पैदा करते नहीं लेकिन पाने की कामना जरूर करते हैं।सिर्फ कामला ही नहीं करते बल्कि कामना की पूर्ति के लिए बैचेन रहते हैं,तड़‌पते हैं और तरह-तरह की तिकड़में करते हैं, जुगाड़ भिड़ातें हैं,एप्रोच लगवाते हैं,अपनी पहुँच का इस्तेमाल करते हैं।कोई उचित ‘सोर्स’ (source) की तलाश करते है कि जैसे भी हो वह इच्छा पूरी हो सके।
  • यह सब उठा-पटक करना ही यह साबित करता है कि हमें योग्यता प्राप्त नहीं है,हम उस चीज को पाने की पात्रता नहीं रखते वरना इतने पापड बेलने की जरूरत न पड़ती।और अयोग्य यानी कुपात्र होते हुए भी,यदि किसी भी कारण से या तिकड़‌मबाजी से उस चीज को प्राप्त कर भी लें तो भी हम उस वस्तु का न तो उचित उपयोग ही कर पाएंगे और न ही उपभोग ही कर पाएंगे।
  • जैसे सिखाए पूत कचहरी में सफल नहीं होते और नकली फूलों से सुगन्ध नहीं होती वैसे ही अयोग्य व्यक्ति उपलब्ध वस्तु का सही उपयोग (Geniune use) नहीं कर सकता इसलिए जरूरी बात यह है कि हम अपने आपको योग्य बनाएं,पात्र बनाएं ताकि जो पाना चाहते हैं उसे पा कर उसका सही उपयोग भी कर सकें।यदि सही उपयोग न कर सकें तो इतनी मगजमारी करके उस वस्तु को प्राप्त करने से भी क्या होगा ?
  • परन्तु अक्सर हम येन केन प्रकारेण उचित-अनुचित साधनों का प्रयोग करके सफलता पाना चाहते है। नीट-यूजी परीक्षा में पेपर घोटाला भी इसी तरह तो संकेत करता है कि छोटे रास्ते से,खोटे तरीको से प्रवेश परीक्षा या जाॅब वगैरह प्राप्त कर लिया जाए।परन्तु सोचने वाली बात यह है कि खोटे कर्मों के परिणाम खोटे ही होते हैं और उनका परिणाम भी हमें ही भुगतना पड़ेगा अन्य व्यक्ति उसका परिणाम भुगतने के लिए हमारी एवज में नहीं आएगा।

6.छात्र-छात्राएँ सुपात्र कैसे हों? (How do students become eligible?):

  • अक्सर विश्वविद्यालयीय या तकनीकी विश्वविधालय डिग्री प्राप्त करके हम अपने आपको बहुत योग्य और बड़ा आदमी समझने लगते हैं।जहाँ तक जाॅब प्राप्त करने की बात है वहाँ तक यह शिक्षा आपको जाॅब भी नहीं दिला सकती है।इस शिक्षा को,डिग्री को प्राप्त करके आपको यह नहीं समझ लेना चाहिए कि आप पात्र है। पात्रता का बहुत गहरा और व्यापक अर्थ है।पात्रता के लिए संक्षिप्त में कहें तो सांसारिक,पारिवारिक,प्रोफेशनल तौर-तरीकों और व्यवहार की कला को कहा जाना चाहिए।
  • परन्तु आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में बहुत कम छात्र-छात्राएँ ऐसे होते हैं जो शिक्षा अर्जित करने के साथ-साथ पात्रता अर्जित करने के लिए सत्प्रयास करते हैं।जीवन जीने की कला का नाम पात्रता है।और जीवन को सही ढंग से जीना विरलों को ही आता है।ज्यादातर व्यक्ति जीवन जीते नहीं है बल्कि ढोते हैं,जीवन उन्हें बोझ के समान लगता है।
  • हम इस लेख के माध्यम से आपको सचेत करना चाहते हैं।हमने गणित के विद्यार्थी योग्य कैसे बनें इसके लिए बताया है कि गणित पढ़ने के लिए इस विषय के प्रति दीवान‌गी होनी चाहिए।अपनी इच्छाओं पर लगाम लगाना चाहिए और अपनी इच्छाओं को गणित विषय में योग्य बनने में लगा देना चाहिए।गणित विषय केवल संख्याओं का खेल नहीं है।गणित में पात्रता हासिल करने के लिए आपको साधक बनना पड़ेगा।हमने “To Develop Eligibility for Mathematics” में विस्तार से पात्रता के बारे में बताया।आपको गणित में पात्रता हासिल करने के लिए इस लेख को पढ़ना चाहिए।
    साधना,तप और समर्पण के बल पर ही आप सच्ची पात्रता हासिल कर सकते हैं।पात्रता के बिना कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है।किसी भी विषय के शिखर पर पहुंचने के लिए आपको पात्र (deserving) होना पड़ेगा।केवल सैद्धान्तिक ज्ञान ही नहीं बल्कि व्यावहारिक ज्ञान भी अर्जित करना होगा।केवल कोर्स की पुस्तकें ही नहीं ज्ञानवर्धक पुस्तकें (informative books) भी पढ़नी होगी।केवल साक्षर (Qualified) ही नहीं शिक्षित (Educated) भी बनना होगा।केवल सांसारिक ज्ञान (worldly wisdom) ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान (Spiritual Knowledge) भी अर्जित करना होगा।जिस प्रकार बिना नमक के रोटी फीकी और अधिक नमक से रोटी खारी लगती है।उसी प्रकार बिना आध्यात्मिक ज्ञान के जीवन में रस समाप्त हो जाता है।जीवन में रस हो इसके लिए थोड़ा आध्यात्मिक ज्ञान भी अर्जित करना ही चाहिए।
  • छात्र-छात्राओं को ये सब बातें कड़वी जरूर लगेंगी पर क्या करें जो हकीकत है उसे बयां करना ही चाहिए।एक सच्चा शिक्षक वही होता है जो छात्र-छात्राओं को उसकी सही मंजिल दिखाता है,सही मंजिल तक पहुंचाने में सहायक होता है।आज चारों तरफ असन्तोष,अशांति,आन्दोलन (agitation),एक-दूसरे के प्रति अविश्वास क्यों है।कारण स्पष्ट है कि हमने पात्रता अर्जित नहीं की।अपात्र व्यक्ति के ये ही लक्षण हैं कि वह पद,प्रतिष्ठा,मान-सम्मान,जाॅब,नौकरी,सत्ता आदि को तिकड़बाजी,भ्रष्टाचार और अपनी पहुँच का इस्तेमाल करके प्राप्त करना चाहता है।
  • अन्दर ही अन्दर इन अपात्र व्यक्तियों के अन्दर ज्वालामुखी धधक रहा है जो कभी भी फट सकता है और उस विस्फोट में पात्र विद्यार्थी,पात्र व्यक्ति भी चपेट में आ जाते हैं।हालाँकि उनकी रक्षा उनकी पात्रता,उनका भगवान अवश्य करता है परन्तु कष्ट,तकलीफ तो उन्हें उठानी ही पड़ती है।अतः छात्र-छात्राओं उठो,जागो और पात्र बनों।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में सुपात्र कैसे हों? सुपात्र होने के 7 विशिष्ट उपाय (How to Be Well Deserving:7 Specific Tactics for Being Worthy) के बारे में बताया गया है।
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7.क्या सहपाठी पात्र है? (हास्य-व्यंग्य) (Is classmate eligible?):

  • व्यक्ति : क्या आपका सहपाठी पात्र है? फिर आप अपने बैग,नोट्स को अपने कंधे पर ले जाते हुए लट्ठ क्यों ले जा रहें हैं?
    छात्र:इसलिए कि अपनी अपात्रता का डंक मुझे न चुभो दें,मेरे नोट्स और पुस्तकें न चुरा लें।

8.सुपात्र कैसे हों? सुपात्र होने के 7 विशिष्ट उपाय (Frequently Asked Questions Related to How to Be Well Deserving:7 Specific Tactics for Being Worthy) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न: 1. क्या पूजा-पाठ से पात्र बना जा सकता है? (Can a worthy be made by worship?):

उतर:केवल सफेद बाल और सिकुडी हुई खाल और पोपला मुँह या झुकी हुई कमर किसी को आदर का पात्र नहीं बना देती।न जनेऊ या तिलक या पंडित की उपाधि ही पात्र बनाती है।

प्रश्न:2.पात्रता को छिपाने के लिए क्या करें? (What to do to hide eligibility?):

उत्तर:पात्रता को छिपाने के लिए उससे भी अधिक पात्रता की जरूरत होती है।

प्रश्न:3.विपत्ति में कौन पार पाता है? (Who overcomes adversity?):

उत्तर:पात्र व्यक्ति ही विपत्ति,संकट और मुसीबतों से पार पाता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा सुपात्र कैसे हों? सुपात्र होने के 7 विशिष्ट उपाय (How to Be Well Deserving:7 Specific Tactics for Being Worthy) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जान सकते हैं।
  • *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*
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