How to Develop Mindset of Oneness? Identity and solidarity Benefits
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3.आत्मरति से रहित कैसे हों? (How to be free from narcissism?):
1.एकत्व की मानसिकता का विकास कैसे करें? एकता और सामाजिकता से लाभ (How to Develop Mindset of Oneness? Identity and solidarity Benefits):
- एकत्व की मानसिकता का विकास कैसे करें? (How to Develop Mindset of Oneness?) जिससे हमारा जीवन सुखद और आनन्दमय हो।मानव जीवन और सामाजिक उन्नति के लिए एकत्व की मानसिकता का विकास बेहद जरूरी है।जानिए कैसे एकता (Identity) और सामाजिकता (Solidarity) हमारे विचारों को मजबूत बनाती है।विद्यार्थी काल से ही एकत्व की मानसिकता का विकास कैसे करें?
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2.पृथकत्व का भाव हमारे लिए अभिशाप (The feeling of isolation is a curse for us):
- विज्ञान की दृष्टि के अनुसार हम दो बहुत महत्त्वपूर्ण भ्रमों में रहते हैं:दिशागत भ्रम तथा कालगत भ्रम।इन दोनों भ्रमों के निवारण के लिए क्रमशः अनन्तता (Infinity) और नित्यता (Eternity) की परिकल्पना की गई है।
- दर्शन इसमें एक तीसरा भ्रम जोड़ देता है:पृथकत्व का भ्रम (Illusion of separation)।इस भ्रम के वशीभूत होकर हम अपने को विश्व से सर्वथा एक पृथक व्यक्ति मानते हैं और तदनुसार आचरण करते हैं।
- हमने समस्त संसार को दो भागों में विभक्त कर रखा है: (1.) “मैं” तथा (2.) “मैं नहीं” यह भेद बुद्धि ही हमारे जीवन को भ्रममय बनाए रखती है।शास्त्रकारों ने इस भेद बुद्धि अथवा द्वैतभाव को समाप्त करने के लिए जनमानस को “अद्वैत” का पाठ पढ़ाया।
- अपने को सर्वथा पृथक-सबसे अलग समझने का दुष्परिणाम यह होता है कि हम केवल अपने बारे में सोचते हैं और इस प्रकार सोचते हैं कि हम अन्य सबकी अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ हैं और हमको श्रेष्ठतम बन जाना चाहिए।पृथकत्व का भाव अहंकार एवं स्वार्थ के भावों को उद्दीप्त करता है और हम अपने साथियों को पीछे धकेलकर,उनके हितों पर चोट करके भी,उनका अहित करके भी,आगे बढ़ जाने का प्रयत्न करते हैं।
- हम यहाँ सफलता,पुरस्कार आदि प्राप्त करके अपने अहं को संतुष्ट भी करते हैं तथा अहं को बल भी प्रदान करते हैं।आत्म प्रतिष्ठा एक प्रकार का लोभ है।इसके साथ हम इतने आत्मकेन्द्रित (egocentric) हो जाते हैं कि प्रत्येक अन्य व्यक्ति हमें अपना विरोधी प्रतीत होने लगता है।
- अतएव हम कह सकते हैं कि आत्म के प्रति लगाव हमारे जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप बन जाता है।व्यक्ति जितना अधिक बौद्धिक होता है,वह उतना ही अधिक पृथकत्व द्वारा ग्रसित रहता है।
- पृथकत्व अथवा आत्मरत व्यक्ति को पग-पग पर निराश होना पड़ता है,क्योंकि वांच्छित वस्तु या सफलता से प्रायः हमें वंचित रहना पड़ता है।इसके परिणाम हमारे मुँह में मानो मिट्टी या राख का स्वाद उत्पन्न करने वाले होते हैं।यह शिक्षक हमें शिक्षा देता है कि स्वार्थ-सिद्धि (Realization of selfish) के लिए कार्य करने का अर्थ निराशा की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने के समान होता है।
- मैं आत्मरत नहीं हूँ अथवा नहीं बनूँगा,यह कहना बहुत सरल है,परन्तु यह कहना सरल नहीं है कि मैं हृदय में झाँककर भी यह कह सकता हूँ कि मैं आत्मरत नहीं हूँ।
- श्रीराम के भक्त श्री हनुमान ने अपने हृदय के भाव प्रकट किए तो उसमें परमार्थ रूप केवल श्रीराम जानकी के गुणों की झाँकी दिखाई दी थी,परन्तु हमारे लिए ऐसा करना सम्भव नहीं है।रूसी दार्शनिक महिला मैडम ब्लावैटस्की ने ठीक ही लिखा है कि “आत्मरति से रहित होने की इच्छा सबसे बड़ी आत्मरति है।”
- आत्मरति (self-love) से रहित होना एक बहुत श्रेष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होना है।इस लक्ष्य की ओर ले जाने वाले मार्ग के कई सोपान हैं।
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3.आत्मरति से रहित कैसे हों? (How to be free from narcissism?):
- सर्वप्रथम हमको ज्ञानेन्द्रिय के विषयों को नकारने का प्रयत्न करना चाहिए।एम. कौलिन्स नामक विदुषी ने लिखा है कि इस मार्ग पर अग्रसर होने की क्षमता प्राप्त करने के पहले हमें तीन काम करने चाहिए;हमारी आँखों में आँसू आना बन्द हो जाए इसका अर्थ है यह नहीं है कि संवेदनशील (sensitive) नहीं होना चाहिए,अत्यधिक संवेदनशील होना गलत है।हमारे कान संसार से सम्बन्धित बातें सुनना बन्द कर दें अर्थात् किसी बुराई,चापलूसी पूर्ण बातें,ईर्ष्या-द्वेष के लिए प्रेरित करने वाली बातें सुनना बन्द कर दें।तथा हमारे हृदय में राग-द्वेष (attachment and malevolene) आदि भावों के लिए स्थान न रहें।अपने हृदय और मन में अपवित्र विचारों को प्रश्रय न दें।
- इस प्रकार अपने हृदय के रक्त में अपने पैरों को धोकर हम पवित्र करें और तब इस पथ की ओर उन्मुख हों।भक्त नागरीदास ने साधना के उक्त स्वरूप को इस प्रकार व्यक्त किया है:”शीश काट मुँह पर धरै तापर रक्खै पाँव। इश्क चमन के बीच में ऐसा होउ तौ आउ॥
उन्होंने “प्रेम के बाग” ( इश्क चमन) में प्रवेश करने की आवश्यकताओं को समझाने के लिए गहन,लाक्षणिक भाषा का प्रयोग करते हैं :
आत्मसमर्पण:अपना सिर काटकर उस पर पैर रखना अहंकार और सांसारिक बौद्धिक अभिमान के पूर्ण विनाश का प्रतीक है।
पूर्ण समर्पण: उनका सुझाव है कि केवल वही व्यक्ति सच्चे आध्यात्मिक प्रेम के योग्य है जो अपने आत्म-महत्व की भावना का त्याग करने को तैयार हो। - कार्रवाई का आह्वान:अंतिम पंक्ति एक निमंत्रण है: यदि कोई साधक आत्म-त्याग के इस स्तर के लिए तैयार है, तभी उसे दिव्य प्रेम के मार्ग पर कदम रखना चाहिए।
- यह अंश इस बात पर प्रकाश डालता है कि आध्यात्मिक लक्ष्यों की ओर यात्रा करने के लिए आगे बढ़ने से पहले हृदय और मन को अशुद्ध विचारों और आसक्तियों से शुद्ध करना आवश्यक है।
- इन दोषों का निवारण अथवा अपने पैरों का प्रक्षालन (expiation of sin) मार्ग की ओर ले जाने वाले द्वार की देहरी पर ही कर लेना उचित है,क्योंकि जितने ऊपर जाने पर स्वार्थ का सर्प दंश करेगा,उतने ही ऊँचे से गिरना पड़ेगा और विनाश का स्वरूप भी उतना ही भयावह होगा।
- महाबली एवं परम विद्वान (ultimate scholar) लंकेश रावण का उदाहरण सामने है।वह उच्च कुलोत्पन्न उच्चकोटि का विद्वान था,परन्तु आत्मप्रतिष्ठा की दुर्बलता द्वारा ग्रसित था।परिणाम यह हुआ कि वह राक्षसों की कोटि में गिना गया और परम्परा उसको सर्वथा वध्य मानने लगी।
- द्वार में प्रवेश करने पर हमारा प्रथम कर्त्तव्य है कि हम पृथकत्व की भावना को समाप्त कर दें:उसका हनन कर दें।हम यह सोचना बन्द कर दें कि हम किसी पापी अथवा मूर्ख व्यक्ति (foolish person) से अलग अथवा दूर खड़े हो सकते हैं।वह न्यूनाधिक रूप में हमारी ही तरह है,पूर्व में हम भी उसी तरह के थे और भविष्य में वह भी हमारी तरह हो जाएगा।उससे दूर-दूर रह कर यदि हम आत्मोन्नति अथवा आत्मविकास की बात सोचते हैं,तो हम मनोविज्ञान की मान्यता के अनुसार उसको अपनाने की सुप्तवासना के वशीभूत होकर कार्य करते हैं।
- अन्ततः हमको यह स्वीकार करना ही होगा कि वह व्यक्ति हमसे अभिन्न है और हम अपने को उससे अलग नहीं रख सकते हैं।इसका अर्थ यह है कि ज्ञान प्राप्ति के पूर्व हमको अपने चारों ओर दिखाई देने वाले व्यक्तियों की भाँति समस्त अच्छे और बुरे अनुभवों (Good and bad experiences) के मध्य होकर गुजरना ही पड़ेगा।हम उनसे जितना परहेज करेंगे,वे उतने ही अधिक हमारे अंग बन जाएंगे।
इस मनोवैज्ञानिक सत्य को एक मनीषी ने इस प्रकार स्पष्ट किया है:”याद रखो जिस गंदे कपड़े को तुम छूना नहीं चाहते हो,वह सम्भवतः कल तुम्हारा था अथवा कल तुम्हारा हो सकता है।तुम्हारे कंधों की ओर जब यह फेंका जाता है,उस समय यदि तुम उसकी ओर से अपना मुँह फेर लेते हो तो याद रखो कि वह तुम्हारी ओर अधिक निकट आकर तुम्हारे कंधे से एकदम चिपक जाएगा।
4.मन के भावों से भी कर्म बन्धन होता है (Karma bondage is also done by the emotions of the mind):
- आध्यात्मिक दृष्टि (spiritual vision) से विचार करने पर यह तथ्य उजागर होता है कि किसी व्यक्त्ति से अलगाव अनुभव करके हम कर्म उत्पन्न करते हैं और वह हमको उस वस्तु के साथ बाँध देता है और तब तक बाँधे रहता है जब तक हम उस व्यक्ति के साथ एकत्व (unity) का अनुभव नहीं करने लग जाते हैं।
धर्मशास्त्र बार-बार कहते हैं कि परमात्मा का प्रकाश प्रत्येक आत्मा को समान रूप में प्राप्त होता है।वह प्रकाश आत्मा (soul) और परमात्मा (God) को एकीकृत कर देता है तथा आत्मा-आत्मा के मध्य भेद को,भेद-बुद्धि जन्य पृथकत्व के भ्रम को समाप्त कर देता है। - हम बुरे व्यक्ति से दूर रहें,परन्तु यह सोचकर कि ऐसा करना सही रास्ते पर चलना है,न कि यह विचार करके कि ऐसा करके हम स्वच्छ एवं पवित्र बने रहेंगे,सम्भवतः विक्टर ह्यूगो विरचित Les Miserables के विशप ने उक्त तथ्य को ही इस प्रकार व्यक्त किया है:”Hate the sin and not the sinner” अर्थात् पाप से घृणा करो,पापी से नहीं।
- हमको उस फूल की भाँति होना चाहिए जो अपनी विकसित दशा के प्रति जागरूक न रहकर भी समस्त वायुमण्डल को मकरन्द लुटाता रहता है।हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमको देश और काल के भ्रम से मुक्त होने के लिए अनन्त और अनित्य की ओर उन्मुख होना पड़ेगा।
पृथकत्व के भ्रम तथा तज्जन्य अभिशाप से मुक्त होने के लिए हमें एकत्व की ओर उन्मुख होना पड़ेगा।किसी कवि ने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह संकल्प (resolution) प्रस्तावित किया है:”यह दीप अकेला इसको पंक्ति दे दो।अपनी सामाजिक अस्मिता को प्रमाणित करने के लिए हमें एकत्व की मानसिकता का विकास करना ही चाहिए।
5.विद्यार्थियों के आजकल के रंगढंग (The current attitude of the students):
- छात्र-छात्राओं के कुछ गुण अकेले रहने पर विकसित होते हैं तो कुछ गुण परस्पर मेलजोल,सामाजिकता आदि दूसरों के साथ रहने से,दूसरों के साथ व्यवहार करने पर विकसित होते हैं।न तो अत्यधिक सामाजिक कार्यों (social works) में भाग लेना उचित है और न एकाकी (Loneliness) रहना अच्छा होता है।
आधुनिक युग में सोशल मीडिया,इंटरनेट पर सर्फिग आदि ऐसे माध्यम हो गए हैं जिसमें छात्र-छात्राओं का किसी से मिलना-जुलना,बड़े-बुजुर्गों के साथ बैठना-उठना बन्द सा हो गया है। - यदि हम दूसरो के साथ उठते-बैठते हैं,साथ-रहते है,साथ रहकर अध्ययन करते हैं तो हमें दूसरों से ऊँच-नीच,छोटी-बड़ी,कड़नी-मीठी बातें सुननी भी पड़ती है और इससे हमारे व्यक्तित्व का निर्माण (Personality) होता है।तकनीकी विकास से जितना हमें लाभ हुआ है उतना ही नुकसान हुआ है।आज भाई-बहन आपस में बात नहीं करते हैं।इस तरह से रहते हैं जैसे बिल्कुल अनजान हों।रिश्तों,सामाजिकता और आपसी मेलजोल से ही हमें महसूस होता है कि हम अकेले कुछ भी नहीं है।
- अकेले-अकेले रहने से हमारे अन्दर अहंकार जन्म ले लेता है और अहंकार आते ही अन्य दुर्गुण बिन बुलाए मेहमान की तरह आकर घुस जाते हैं और जड़ जमा लेते हैं।दुर्गुणों का आपस में चोली दामन का साथ है।एक दुर्गुण आया कि अन्य दुर्गुण भी धीरे-धीरे प्रवेश कर जाते हैं,हमें इसकी खबर भी नहीं रहती है।हमें सावधान (Alert) किए बिना चुपके से आ जाते है।
- एकत्व,सामाजिकता,मिलकर कार्य करना,टीम की तरह कार्य करने के लिए हमें विनम्रता,धैर्य,ईमानदारी आदि को धारण करना होता है।लेकिन ये सद्गुण अपने आप ही विकसित नहीं हो जाते हैं।पहले विकारों,दुर्गुणों (vice) को भगाना पड़ता है।
- पहले छात्र-छात्राएँ ऑफलाइन कक्षा (स्कूल) में पढ़ते थे,एक-दूसरे के सम्पर्क में आते थे जिससे सहज ही मेलजोल,मिलकर काम करना,टीम भावना,सामाजिकता,सहकारिता आदि गुणों का विकास होता था।परन्तु आजकल के छात्र-छात्राएँ ऑफलाईन कक्षा में जाना जरूरी ही नहीं समझते हैं।अब ऑनलाईन क्लास लेकर अपने कोर्स की पढ़ाई कर लेते हैं।कैसे एकत्व की अनुभूति होगी,कैसे सामाजिक गुणों का विकास होगा,कैसे मानवीय गुण धारण करेंगे।
- भौतिक सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की चकाचौध में छात्र-छात्रा और व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है।उसे सुख-समृद्धि,भौतिक सुख-सुविधाओं को जुटाना ही अपने जीवन का उद्देश्य लगने लगता है।आप कितनी ही सुख-सुविधाओं और भोग विलास के साधन जुटा लो परन्तु आपको अपने अन्दर रिक्तता और खालीपन महसूस होगा क्यों ? क्योंकि हमने आनन्द की अनुभूति,एकत्व की अनुभूति के लिए कुछ प्रयास किया ही नहीं।हमारी नजर संसार के ऐश्वर्य की तरफ रहती है,हमारी नजर अन्दर की ओर मुड़ती ही नहीं है और न हम ऐसा प्रयास करते है कि हमारी नजर अन्दर की ओर मुड़े।जितने भी भोग-विलास के साधन जुटाते जाते हैं हमारी अतृप्ति बढ़ती जाती है।आत्मसन्तुष्टि जब तक नहीं मिलती है जब तक हमारी नजर बाहर की तरफ रहेगी।
- इसका तात्पर्य यह नहीं है कि संसार के भोगों का भोग न करें।हमारे जीवन निर्वाह के लिए जितना आवश्यक है उतना ही भोग करें और त्याग की भावना के साथ करे,सुख-सुविधाओं का भोग आसक्ति रखकर न करें। आसक्ति हमें अति की ओर ले जाती है और अति का कोई अन्त नहीं है।कितने ही साधन,भौतिक सुख,भोग-विलास के साधन जुटा लो फिर भी उनका अन्त नहीं हैं।भौतिक सुख-साधनों को जुटाते-जुटाते हमारे जीवन का अन्त ही हो जाता है परन्तु भौतिक सुख-साधनों का अन्त नहीं होता है।
6.विद्यार्थी एकत्व की अनुभूति करें (Students should feel oneness):
- अतः विद्यार्थियों को अपने कोर्स की पुस्तकें पढ़ने के साथ-साथ एकत्व की अनुभूति के लिए भी अध्ययन करें,प्रयास करें।ताकि आप अपने जीवन में खालीयन और रिक्तता का अनुभव न करें।असंतोष से दूसरों के प्रति ईर्ष्या-द्वेष उत्पन्न होता है।हमारा अहंकार बढ़ता है। जितनी सुख-सुविधाएँ बढ़ती हैं उतना ही असंतोष बढ़ता जाता है।
- अतः यह नियम बनालें कि कुछ समय स्वाध्याय करेंगे,सत्संग करेंगे,सत्साहित्य का अध्ययन करेंगे।
एकता और एकजुटता ( Solidarity) से हमें अनेक लाभ होते हैं।विद्यार्थी जीवन से लेकर सामाजिक,गृहस्थी जीवन (householder lite) तक हमें कदम-कदम पर एक-दूसरे के सहयोग की आवश्यकता होती है। असहयोग हमारे जीवन में,रास्ते में चट्टान की तरह रास्ता रोककर खड़ा हो जाता है।विद्यार्थी जीवन में भी हम एक दूसरे की मदद-सहायता करके ही उन्नति करते हैं और हमारे विकास का पथ प्रशस्त होता है।इसलिए अपने अन्दर एकत्व की मानसिकता का विकास करने के लिए प्रयास करें। - उपर्युक्त आर्टिकल में एकत्व की मानसिकता का विकास कैसे करें? एकता और सामाजिकता से लाभ (How to Develop Mindset of Oneness? Identity and solidarity Benefits) के बारे में बताया गया है।
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7.एकत्व की मानसिकता क्या काम आती है? (हास्य-व्यंग्य) (What does the oneness mentality serve?) (Humour-Satire):
- छात्र के पिता (टीचर से):यहाँ कोचिंग कराने का क्या फायदा? न तो सामाजिक गुणों का विकास होता है और न ही इंसानियत के गुण विकसित होते हैं।
- टीचरःहमारे कोचिंग के संचालक को सामाजिक गुणों और इंसानियत से सख्त नफरत है।आप दुकान पर पुस्तकें खरीदो पैसा चाहिए।आप कपड़े,बाजार का सामान या कुछ भी खरीदो तो पैसा दो।बिना पैसे के कुछ भी नहीं होता है।ये गुण कहने-सुनने में ही अच्छे लगते हैं।
8.एकत्व की मानसिकता का विकास कैसे करें? एकता और सामाजिकता से लाभ (Frequently Asked Questions Related to How to Develop Mindset of Oneness? Identity and solidarity Benefits) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्नः1.एकत्व की मानसिकता क्या? (Ekatva ki mansikata (sense of oneness) kya hai?):
उत्तरःएकत्व की मानसिकता का अर्थ है आपसी भेदभाब को भूलकर एकता,समानता और एकजुटता (solidarity) की भावना के साथ जीना।ये समाज को जोड़ने का काम करती है।
प्रश्न:2.हम अपने अन्दर एकत्व और एकजुटता का विकास कैसे कर सकते हैं? (Hum apne andar ekatva aur solidarity ka vikas kaise kar sakte hai?):
उत्तर:दूसरों के प्रति सहानुभूति (empathy) रखकर,भेदभाव से दूर रहकर और सामाजिक कल्याण के कार्यों में भाग लेकर हम इस मानसिकता को मजबूत कर सकते हैं।
प्रश्न:3.एकत्व की मानसिकता का शिक्षा में क्या महत्त्व है? (Ekatva ki Mansikta ka Shikha Mein kya Mahatva hai?):
उत्तर:शिक्षा हमें विद्यार्थियों को एक-दूसरे का सम्मान करना,मिलकर सीखना (Collaborative learning) और एक अच्छे समाज का निर्माण करना सीखाती है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा एकत्व की मानसिकता का विकास कैसे करें? एकता और सामाजिकता से लाभ (How to Develop Mindset of Oneness? Identity and solidarity Benefits) एकत्व की प्राइमरी टर्म्स के बारे में बताया गया है।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*











