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6 Unique Ways for Teachers to Learn from Students

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1.अध्यापक द्वारा छात्र-छात्राओं से सीखने के 6 यूनिक तरीके (6 Unique Ways for Teachers to Learn from Students):

  • शिक्षा द्विमुखी प्रक्रिया है अर्थात् छात्र-छात्राएँ अध्यापक से सीखते हैं तो अध्यापक भी छात्र-छात्राओं से सीखते हैं।जानिए अध्यापक द्वारा छात्र-छात्राओं से सीखने के 6 यूनिक तरीके (6 Unique Ways for Teachers to Learn from Students)।
    अध्यापक अपने गुरुओं से सीखता तो है ही परन्तु इससे अधिक अपने साथी अध्यापकों से सीखता है और सबसे अधिक अपने छात्र-छात्राओं से सीखता है।

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2.शिक्षक द्वारा बाल्यकाल से अंत तक सीखने का संक्षिप्त विवरण (Brief description of learning by the teacher from infancy to end):

  • सच्चा अध्यापक वही है जो मृत्युपर्यन्त सीखता ही रहता है।जब अध्यापक छोटा होता है तो छोटी-छोटी बातें अपने माता-पिता से सीखता है।गिनना,घटाना,जोड़ना आदि।माता-पिता की भाषा बोलता है और उनके आचरण तथा व्यवहार की नकल करता है।कुछ बातें अनुभव से भी सीखता है।जैसे गर्म दूध पीने से जीभ जल जाती है तो फिर वह गर्म दूध नहीं पीता है।
  • इसके बाद वह पाठशाला में शिक्षकों से शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करता है।पुस्तकों से सीखता है।गुरुओं के प्रवचन,कथावाचक,सत्संग से सीखता है।किशोरावस्था में उसे बहुत से सहपाठी तथा साथ खेलने-कूदने वाले मिलते हैं।उसका अधिक समय इन्हीं के साथ व्यतीत होता है,इसलिए इनसे बहुत-सी बातें सीखता है।अच्छी संगति,अच्छी बातें और बुरी संगति से बुरी बातें सीखता है।
  • बाल्यावस्था और किशोरावस्था में हरेक (अध्यापक के लिए भी) द्वारा सीखी हुई बातों का प्रभाव जीवनभर रहता है,क्योंकि इस उम्र में पिछले जन्मों के कर्म-संस्कार सुप्त अवस्था में रहते हैं और जैसा इस आयु में आचरण तथा व्यवहार करता है वैसे ही संस्कार जाग जाते हैं वे (संस्कार जागने के बाद) बहुत मुश्किल से मिटते हैं।
  • साथियों और शिक्षकों के सम्पर्क में अध्यापक शिक्षा पूरी होने तक यानी 15-20 वर्ष ही रहता है।इसके बाद अध्यापक बनने पर आजीवन वह उनके साथ ही रहता है।उनको सीखाता है और स्वयं भी सीखता है।
    जब छात्र-छात्राओं को पढ़ाता है तब उसके सम्पर्क में तरह-तरह के विद्यार्थी आते हैं।भिन्न-भिन्न चरित्र और व्यवहार के छात्र-छात्राओं से अलग-अलग बातें सीखने को मिलती है।
  • इसके अलावा छात्र-छात्राएँ गणित शिक्षक के सामने तरह-तरह के सवाल और समस्याएँ रखते हैं,अध्यापक को उन सभी पर विचार करके समाधान करना पड़ता है। उन सवालों और समस्याओं के उत्तर अध्यापक को खोजने पड़ते हैं।इससे अध्यापक का ज्ञान और अनुभव दोनों बढ़ते हैं
  • इस लेख का शीर्षक गणित अध्यापक छात्र-छात्राओं से सीखने के तरीके (Ways for Teachers to Learn from Students) हैं।अतः अन्य विषयों की गहराई में न जाकर हम लेख के विषय को गणित विषय तक ही केन्द्रित रखने का प्रयास करेंगे।गणित अध्यापक छात्र-छात्राओं से कैसे सीखता है या सीख सकता है इसके बारे में जानने का प्रयास करेंगे।अध्यापक छात्र-छात्राओं से तभी सीख सकता है जबकि वह अपना दिमाग खुला रखता है और छात्र-छात्राओ से सीखने की जिज्ञासा रखता है।बिना जिज्ञासा के ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता है केवल खानापूर्ति की जा सकती है।

3.छात्र-छात्राओं की सोच और डाउट्स को समझें (Understand the thinking and doubts of the students):

  • छात्र-छात्राओं की अलग-अलग सोच और डाउट्स होते हैं।मसलन आपको सवाल का जो तरीका आता है उससे समझाने पर छात्र-छात्राएं पूछते हैं कि सर इसका कोई अलग तरीका नहीं हो सकता है क्या? तब आपको सोचना और चिन्तन करना पड़‌ता है और सोच-समझकर आप दूसरे तरीके से उन्हें समझाते हैं। कुछ ऐसे भी छात्र-छात्राएँ होते हैं जो कहते हैं कि सर यह सवाल इस तरीके से भी तो हो सकता है।जो तरीका वे बताते हैं वे अपनी सोच के आधार पर बताते है,हालांकि उस तरीके की पूरी व्याख्या वे नहीं कर पाते हैं क्योंकि पूरी व्याख्या करेंगे तो सवाल ही हल हो जाएगा।आप उस विधि को सोच समझकर पूरी व्याख्या करते हैं।एक-दो धुरन्धर छात्र तो दूसरे तरीके से सवाल को हल करने आपके सामने रख देते हैं और आपको एक नया तरीका सीखने को मिलता है।
  • कुछ छात्र-छात्राओं की तर्क करने की आदत होती है और पूछ बैठते हैं कि सर इस तरह से ही यह सवाल हल क्यों हुआ? आपको उस तार्किक प्रश्न से कुछ नई बातें सीखने को मिलती हैं।
  • उदाहरणार्थ दसवीं की त्रिकोणमिति में एक सवाल है: \cos{A}=\\cos{B} तो दिखाएं कि \angle{A}=\angle{B} हमने इसे भुजा-भुजा-भुजा समरूपता नियय के आधार पर (उदाहरण में दिया हुआ था) पर सिद्ध करके बताया तो छात्र ने कहा कि सर यह सवाल RHS समरूपता नियम से भी तो हो सकता है।हमने तत्काल उस पर विचार किया और RHS समरूपता के आधार पर हल करके बताया जो कि बिल्कुल सरल था (RHS नियम)|
  • छात्र-छात्राएँ जो भी डाउट्स प्रस्तुत करते हैं उनमें से कुछ डाउट्स के उत्तर हम पहले से जानते होंगे और कुछ डाउट्स के उत्तर नहीं भी जानते हैं।जिन डाउट्स (Doubts) के उत्तर हम नहीं जानते हैं वे हमें सोचने के लिए मजबूर करते हैं।सोचिए यदि छात्र-छात्राएँ इस तरह डाउट्स हमारे सामने न रखें तो क्या हम कुछ सीख पाएंगे,शायद नहीं।हमें डाउट्स को हल करने पर सोचना पड़ता है और एक नया अनुभव मिलता है।
  • यदि आपमें जिज्ञासा नहीं होगी तो या तो छात्र-छात्रा को आप डँट-डपट (reproof) दोगे या उसका उत्तर नहीं दोगे।तात्पर्य यह है कि भिन्न-भिन्न सोच,तर्क,डाउट्स और समस्याएँ रखने पर हम उनसे सीखते हैं।हमारी चिन्तन और मनन करने की शक्ति बढ़ती है।सवाल को एक ही नहीं अनेक तरीकों से हल करना सीखते हैं।

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4.छात्र-छात्राओं से सवाल पूछें और उनके मेथड का निरीक्षण करें (Ask students questions and observe their method):

  • गणित शिक्षक थ्योरी,सूत्र समझाने के बाद छात्र-छात्राओं से सवाल पूछें या पूछता है और छात्र-छात्रा कक्षा में उसे हल करते हैं।अब यह जरूरी तो नहीं कि प्रत्येक छात्र-छात्रा शिक्षक द्वारा बताए गए मेथड से ही सवाल करेगा।क्यों नहीं करता है।हर छात्रा-छात्रा की प्रकृति और ज्ञान,अनुभव अलग-अलग होता है।वह शिक्षक द्वारा बताए गए तरीके को समझता जरूर है परन्तु सवाल को अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर हल करता है।अगर आपमें निरीक्षण करने की वृत्ति है तो आप पाएंगे कि कुछ छात्र-छात्राएँ शिक्षक द्वारा बताए गए पैटर्न (Patterns Explained by the Teacher) के अनुसार सवाल को हल करते है तो कुछ बिल्कुल अलग मेथड से हल करते हैं जबकि कुछ अजीब तरीके से हल करते है।
  • जो छात्र-छात्राएँ बिल्कुल गलत मेथड से हल करते हैं उनसे आप सीखते हैं कि छात्र-छात्राओं को कौनसी बात बताने से रह गयी है जिससे वे गलत मेथड से हल कर रहे हैं।आगे या उस समय उसको अपनी थ्योरी में शामिल करते हैं और अधिक स्पष्ट तरीके से बताते है।
  • हर अध्यापक अपने ज्ञान और अनुभव (Teachers with their knowledge and experience) से अपनी एक खास कला विकसित करता है।इसीलिए तो एक ही डिग्री और शिक्षा प्राप्त किए हुए गणित के शिक्षक के बारे में छात्र-छात्राएँ टिप्पणी करते हैं कि अमुक शिक्षक ने अच्छी तरह पढ़ाया है और फलां शिक्षक अच्छा नहीं पढ़ाता है या उसका पढ़ाया हुआ समझ में नहीं आता है।
  • कुछ गणित शिक्षकों की आदत होती है कि वे थ्योरी,सूत्र और सवाल हल करके समझा देते हैं परन्तु उन्हें छात्र-छात्राओं से सवाल हल नहीं करवाते हैं फलतः उन्हें मालूम ही नहीं पड़ता है कि छात्र-छात्राएँ कहाँ पर अटक जाते हैं और न वे स्वयं कुछ सीख पाते हैं।
  • एक छात्रा ने हमसे कहा कि सर यह एक्सरसाइज हल करवा दें।हमने उन्हें थ्योरी व सवाल द्वारा समझा दिया। उसने कहा कि मुझे समझ में आ गयी (एक्सरसाइज)।हमने उसे कहा कि हमारे द्वारा समझाने पर ही आपने कैसे मान लिया।जब तक आप स्वयं सवाल हल करके नहीं बताओगी या हल नहीं करोगी तब तक यह बात (समझ में आना) कैसे समझी जा सकती है? (How can it be understood?) उसने ज्योंही हमें सवाल हल करने के लिए दिया तो वह हल नहीं कर पायी।इससे हमने यह सीखा कि जब तक छात्र-छात्राओं से कुछ सवाल अध्यापक हल नहीं करवायेगा तब तक न तो वह कुछ सीख पाएगा और छात्र-छात्रा की कमजोरी भी नहीं पकड़ पाएगा।अतः सवाल पूछना और उनके मेथड को समझना जरूरी है।इससे एक शिक्षक बहुत हुत सीखता है।

5.छात्र-छात्राओं के नजरिए और सीखने का तरीका जानें (Get to know the attitudes and learning of the students):

  • कुछ छात्र-छात्रा सवाल को शार्टकट्स और कुछ छात्र-छात्रा डिटेल तरीके (हर स्टेप को लिखना) से हल करते हैं।छात्र-छात्रा के दोनों ही नजरिए को समझें क्योंकि दोनों नजरिए का महत्व है।कैसे? छोटे सवालों को शार्टकट्स (shortcuts) तरीके से हल करना होता है और बड़े सवालों को डिटेल में हर स्टेप को लिखना जरूरी होता है।दोनो तरह के नजरिए वाले छात्रों से आपको शार्टकट्स और स्टेप-बाई-स्टेप तरीका (डिटेल) दोनों सीरवने को मिलता है,आगे आप बताते हैं कि कहाँ शार्टकट्स तरीकों का इस्तेमाल करना है और कहाँ स्टेप-बाइ-स्टेप का इस्तेमाल करना है? हर छात्र-छात्रा की लर्निंग स्टाइल (Student’s Learning Style) और गणित में रुचि (interest in maths) अलग-अलग होती है।कोई गणित में गहन रुचि से हल करता है और कोई फटाफट और उत्तीर्ण होने के तरीके जानना चाहता है।
  • आपको हर छात्र-छात्रा को साथ लेकर चलना होता है और उसी के अनुसार आपको आगे बढ़ना होता है।ऐसा नहीं हो सकता है कि सभी को एक ही लाठी से आप हॉकने लग जाएं (Don’t drive with the same stick)।किसी भी विषय को विशेष रूप से गणित में नवीनता,परिवर्तनशीला और प्रग‌तिशीलता (Innovation,Changebility and Progressiveness) को अपनाते है तो गणित शिक्षा जीवन्त हो उठती है।और ये चीजें केवल आपको आपके मनन और चिन्तन से ही नहीं मिलती है बल्कि छात्र-छाजाओं के सत्संग से भी मिलती है।बिनु सत्संग विवेक न होई।भगवत्कृपा बिनु सुलभ न सोई।अर्थात् बिना सत्संग के गणित (ज्ञान,विवेक) रुपी नेत्र नहीं खुलते हैं और सत्संग भी भगवत्कृपा के बिना नहीं मिलता है।
  • छात्र-छात्राओं की मानसिकता,उनके नजरिए पर पैनी नजर रखेंगे तो आप खुद भी सीखते जाएंगे।आपके ज्ञान में भी वृद्धि होगी और छात्र-छात्राओं के स्तर को भी ऊँचा उठा पाएँगे।

6.छात्र-छात्राओं से मिलकर और फीडबैक लें (Meet students and get feedback):

  • आधुनिक तकनीकी युग में छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के बीच कनेक्टिवीटी समाप्त होती जा रही है क्योंकि पढ़ाने के तरीके केवल प्रोफेशनल हो गए हैं।बिना एक-दूसरे से जुड़ाव और मेलमिलाप (Engagement and Reconciliation) और फीडबैक (Feedback) के गणित शिक्षक को यह पता ही नहीं चलता है कि छात्र-छात्रा को क्या समझ में आ रहा है? न खुद गणित अध्यापक को यह पता चलता है कि उसके पढ़ाने के तरीके में कहाँ त्रुटि रह गयी है या कमी रह रही है।
  • अतः गणित शिक्षक को छात्र-छात्राओं से मिलकर सवालों को हल करना चाहिए।जहाँ कहीं वे गणित के सवाल में कठिनाई महसूस करते हैं,जिस स्टेप को लिख नहीं पा रहे हैं,उसे बताएं।इसके बाद छात्र-छात्राओं से अपने पढ़ाने के तरीके का फीडबैक लें।
  • छात्र-छात्राएँ आपको अपने मेथड में कैसे और क्या बदलाव करने चाहिए,इसके बारे में बताएँगे।उनके द्वारा बताएँ गए सुझावों पर गम्भीरतापूर्वक विचार और चिन्तन करें और जहाँ आवश्यक लगे,वहाँ यथोचित बदलाव करें।गणित के पाठ्‌यक्रम (syllabus) को पूरा कराने की धुन में ही न लगे रहें।ऐसे सिलेबस को पूरा करने का क्या औचित्य है जिससे न तो आप और न ही छात्र-छात्रा कुछ सीख सकते हैं।सिलेबस पूरा करने से ज्यादा यह जरूरी है कि आपने क्या सीखा है और छात्र-छात्राओं को कितना समझ में आया है? इसका पता कब चलेगा,जब आप छात्र-छात्राओं के सम्पर्क में रहेंगे।

7.छात्र-छात्राओं की भ्रान्तियों और गलतियों से सबक लें (Learn from the misconceptions and mistakes of students):

  • What can a teacher learn from a child?

    छात्र-छात्राओं में गणित के प्रति क्या-क्या भ्रान्तियाँ हैं,इसे जानें।जैसे गणित विषय बहुत कठिन विषय है,गणित विषय को हल करना हमारे वश की बात नहीं है।गणित रुचिकर विषय नहीं है आदि।आपको छात्र-छात्राओं में जो भी भ्रान्तियाँ हैं उन्हें समझना है और उसका समाधान करना है।आप छात्र-छात्राओं को गणित के सवालों का बार-बार अभ्यास करायेंगे हो उन्हें यह विषय कठिन नहीं रोचक लगेगा।गणित विषय में बीच-बीच में गणित की पहेली (Riddles of math),ब्रेन ट्रेजर,गूढ़ समस्याएँ (Enigmas),गणित का जादुई वर्ग (Magic Squares of Math),कूटप्रश्न (Puzzles of math) आदि दें जिससे गणित में रोचकता पैदा हों।

  • छात्र-छात्राओं की गलतियों से आप भी सीखें।सामान्य गुना,भाग,जोड़,बाकी आदि में वे (छात्र-छात्रा) गलतियाँ करते हैं।अक्सर शिक्षक इस तरफ सजग नहीं होते हैं तो वे भी वही गलतियाँ कर बैठते हैं।आपको उनसे सीख लेकर ऐसी त्रुटियाँ नहीं करनी चाहिए।यदि आप भी ऐसी गलतियाँ करेंगे तो छात्र-छात्रा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।आपको उनसे सीख लेनी चाहिए।
  • शिक्षक छात्र-छात्राओं से ऊपर दिए गए तरीकों के अलावा अन्य तरीकों से भी सीख सकता है।आपमें सीखने की ललक और जिज्ञासा होनी चाहिए।छात्र-छात्राओं से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।
    उपर्युक्त आर्टिकल में अध्यापक द्वारा छात्र-छात्राओं से सीखने के 6 यूनिक तरीके (6 Unique Ways for Teachers to Learn from Students) के बारे में विस्तार से गहराई से समझाया गया है।
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8.मैडम का गणित ज्ञान छूमंतर हुआ (हास्य-व्यंग्य) (Madam’s knowledge of mathematics vanished) (Humour-Satire):

  • एक छात्र गणित के सवाल समझ में न आने पर शैतानी करने लगा।
  • मैडम ने उसे अनुशासित करने के लिए एक जटिल सवाल पूछा।मैडम (दुर्गेश):बताओ गणित का जन्म कहाँ हुआ?
  • दुर्गेशःमैडम पहले आप बताएं कि गणित का प्रारम्भ कहाँ से होता है और अंत कहाँ होता है?
  • मैडम के दिमाग के फ्यूज उड़ गए,वह घूरकर बोली तुम मुझसे जबान लड़ाते हो?
  • दुर्गेशःमैडम,यह तो मेरे प्रश्न का जवाब नहीं है।
  • मैडम का अहंकार कार्फूर हो गया।उसके चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगी।

9.अध्यापक द्वारा छात्र-छात्राओं से सीखने के 6 यूनिक तरीके (Frequently Asked Questions Related to 6 Unique Ways for Teachers to Learn from Students) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.छात्र कैसे सीखते हैं? (How students learn):

उत्तर:छात्र-छात्राओं में रचनात्मकता और जिज्ञासा होती है।वे हर सवाल,हर स्टेप की वजह जानना चाहते हैं।यह जिज्ञासा ही उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करती है।

प्रश्न:2.अध्यापक छात्रों से क्यों नहीं सीख पाते हैं? (Why can’t teachers learn from students?):

उत्तर:जब अध्यापक ये समझते हैं कि ये बच्चे हैं,छोटे हैं,इनके पास ज्ञान कहाँ है? यदि ज्ञान होता तो हमारे पास सीखने क्यों आते,ऐसा अहंकार ही शिक्षकों के सीखने में बाधक बन जाता है।

प्रश्न:3.अध्यापक छोटे से बालक से क्या सीख सकता है? (What can a teacher learn from a child?):

उत्तर:जो बच्चा शिक्षा में प्रवेश लेता है और उसको गणित का कुछ भी ज्ञान नहीं है,उससे सीख सकता है।छोटे से बच्चे में सरलता होती है।राग-द्वेष आदि विकारों से मुक्त होता है।अध्यापक भी उनसे सरलता,राग-द्वेष आदि से मुक्त होना सीख सकता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा अध्यापक द्वारा छात्र-छात्राओं से सीखने के 6 यूनिक तरीके (6 Unique Ways for Teachers to Learn from Students) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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