Why Are Moral Rules Necessary? The Place and Importance of Living a Righteous Life
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1.नैतिक नियम क्यों जरूरी हैं? नैतिक जीवन जीने का स्थान और महत्त्व (Why Are Moral Rules Necessary? The Place and Importance of Living a Righteous Life):
- नैतिक नियम क्यों जरूरी हैं? (Why Are Moral Rules Necessary?) नैतिक नियम क्या सिर्फ किताबों तक ही सीमित रह गए हैं? क्या आज का समाज नैतिक नियमों की अवहेलना करता है? छात्र-छात्राओं के लिए नैतिक नियम कैसे जरूरी हैं?
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2.नैतिकता के आधारभूत सिद्धान्त (Basic Principles of Ethics):
- मानव जीवन का इतिवृत्त मानव के नैतिक स्वरूप की व्याख्या है।वेदों,उपनिषदों,स्मृतियों,पुराणों में इसका व्यापक एवं विस्तृत उल्लेख मिलता है।नीतिशास्त्र के प्रणेता आर्यों के अनुसार मानव जन्म पूर्व अर्जित सत्कर्मों का फल है।इसकी सफलता का मार्ग प्रशस्त करने के लिए प्रयुक्त साधन को आचार या चरित्र (character) कहा जाता है।आचार मानव जीवन के सर्वांगीण विकास की एक प्रक्रिया है।
- आचारशास्त्र मानव जीवन को संयम,मर्यादा,शिक्षण देकर उसे विकास के पथ पर अग्रसर करता है।यह व्यक्ति और समाज से दुर्विचारों,दुर्भावों और दूषित तत्त्वों को निकालकर उनके स्थान पर सद्गुणों,सद्विचारों,सद्भावों और सत्प्रवृत्तियों को बद्धमूल करता है।
कर्त्तव्य या नीति (Ethics) के आधारभूत सिद्धांत निम्नलिखित हैं: - (1.) परमेश्वर सब प्राणियों का एक ही पिता है।अतः हम सबको परस्पर भ्रातृभाव तथा मित्रता दृष्टि रखना चाहिए।अपने स्वार्थ के लिए किसी को कष्ट देना एवं हिंसा करना (Torture and Violence) अनुचित है।द्वेष एवं वैमनस्य के स्थान पर प्रेमभाव का व्यवहार करना चाहिए।
- (2.)परमेश्वर सर्वव्यापक और सर्वज्ञ हैं।ऐसा भाव हमें अनुचित कार्य करने के लिए रोकता है।इसके उल्लंघन से हमें आपत्तियों एवं विपत्तियों का सामना करना पड़ता है।
- (3.) मनुष्य जीवन का उद्देश्य दिव्यशक्ति,दिव्य शांति (Divine power,divine peace),दिव्य ज्योति,दिव्य आनंद अथवा मोक्ष प्राप्त करना है।इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें सदा निष्काम कर्म करना चाहिए।
- (4.)आत्मा दिव्य,शांतिसंपन्न,अमर है और शरीर,मन एवं बुद्धि का अधिष्ठाता है।हम स्वयं को शरीर मान बैठते हैं,अतः इसकी सुख-सुविधा के लिए पापकर्म करते हैं।
- (5.) कर्म-नियम संसार में कार्य कर रहा है।किए हुए कर्म से कोई नहीं बच सकता है।भगवान कर्म फलदाता है।प्रार्थना,साधना (Prayer,Sadhana),जप आदि का उद्देश्य भावी पाप से स्वयं को मुक्त करना है।
- (6.) प्रत्येक व्यक्ति को सदा अंधकार से प्रकाश,मृत्यु से अमृत और पाप से पुण्यमार्ग की ओर आने का प्रयास करना चाहिए।इसके लिए दृढ़ निश्चय आवश्यक है।
- (7.)शारीरिक,मानसिक और आत्मिक शक्तियों का सर्वांगीण विकास होना चाहिए।इनमें से किसी एक का विकास एकांगी है।सभी का विकास ही उन्नति एवं प्रगति का मूलमंत्र है।
- (8.)व्यक्ति,समाज तथा राष्ट्र में लगभग एक जैसे अटल नियम,व्यापक नियम कार्य कर रहे हैं।व्यक्ति और समाज का अविच्छिन्न संबंध समझते हुए व्यक्ति को अपनी शक्तियाँ समाज सेवा में लगा देना चाहिए,क्योंकि समाज के उत्थान में ही व्यक्ति का विकास सन्निहित है।
- (9.)बाह्य और आंतरिक स्वाधीनता (External and Internal Independence) की उपलब्धि ही सुख का कारण है।स्वतंत्रता में आनंद और परतंत्रता दुःख का कारण है।अतः स्वतंत्रता का संरक्षण करना प्रत्येक व्यक्ति एवं समाज का मुख्य कार्य है।
- (10.)कर्त्तव्य का निर्णय भगवदीय ज्ञान,वेद तथा पवित्र अंतःकरण की साक्षी से ही हो सकता है।सदाचार का यही मूलमंत्र है।
- (11.)सत्य एवं सदाचार ही हैं,जिनके कारण इस पृथ्वी का धारण हो रहा है।सत्य और सदाचार की रक्षा के लिए हमें अपना सर्वस्व अर्पित कर देना चाहिए।
- (12.)परमेश्वर को सदा अपना समझते हुए प्रत्येक व्यक्ति को अपने अंदर पूर्णरूप से निर्भय हो जाना चाहिए।
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3.आचारशास्त्र का मुख्य आधार (The mainstay of ethics):
- इस प्रकार वेद में उपलब्ध आचारशास्त्र मानव एवं समाज के समग्र विकास की ओर संकेत करता है।वेदों के मंत्रों में सन्निहित आचारशास्त्र की विशद विवेचना उपनिषदों में मिलती है।उपनिषदों में शुभ-अशुभ (Good and bad in the Upanishads)
,उचित-अनुचित,कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य आदि नैतिक नियमों का उल्लेख हुआ है।उपनिषदों का मत है कि जीवात्मा अविद्या आदि को छोड़कर अपना विकास कर सकता है। - उपनिषद् मानव जीवन की स्वतंत्रता (Human freedom) का पक्षधर दीखता है।बृहदारण्यक उपनिषद् में आया है कि मानव कामना,संकल्प और कर्म का समीकरण है।जैसी उसकी कामना होगी,वैसे ही उसके संकल्प होंगे और संकल्प के आधार पर कर्म किए जाएँगे।संकल्प कामना से प्रेरित होता है तथा कर्म संकल्प से।यह आचारशास्त्र का मुख्य आधार (Basic principle of Ethics) है।अतः कामना को श्रेष्ठ रखने का उपदेश किया जाता है।
केनोपनिषद् में भी आचारशास्त्र का उल्लेख मिलता है। नचिकेता ने श्रेय और प्रेय मार्ग की पूर्ण स्वतंत्रता में श्रेय मार्ग का अवलंबन किया।इसी प्रकार ईशावास्य उपनिषद् में विद्या एवं अविद्या,संभूति और असंभूति इन सभी विकल्पों में से अपनी पसंद की चीज को चुनने की पूरी स्वतंत्रता प्रदान की गई है।उपनिषद् की इस व्याख्या के बारे में ऋषियों ने कहा हैं कि यह स्वतंत्रता आत्मदर्शन के पश्चात ही प्राप्त होती है,परंतु ऋषि दयानंद कहते हैं कि जीव संकल्प या कर्म करने में पूरी तरह से स्वतंत्र है।
- उपनिषदों में तप को पुरुषार्थ का पर्याय माना गया है। केनोपनिषद् कहता है:तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा (4/8)।अर्थात ज्ञान की समस्त प्रतिष्ठा तप,दम और कर्म (Suppression and Karma) पर आधारित है।शारीरिक नियंत्रण को तप एवं मानसिक नियंत्रण को दम कहा गया है।इन दोनों का क्रियात्मक रूप ही कर्म है।उपनिषद् में सदा नियम एवं विधानपूर्वक कर्म करने की प्रेरणा दी गई है।उपनिषद् का ऋषि कहता है कि जीव को सदा निष्काम कर्म (Anything done for its own sake without concern for the result) करना चाहिए।इसी से ज्ञान प्राप्त होता है।उपनिषदों का नैतिक जीवन तर्कसंगत,युक्तियुक्त एवं विचारणीय है।
- नैतिक जीवन (Moral life) केवल विषय भोग भोगने के लिए नहीं है।उपनिषद् कहता है:आत्मा को शरीररूपी रथ का स्वामी जानो तथा इंद्रियों को इस रथ के घोड़े,जिन पर मन को लगाम लगानी पड़ती है।यदि मन का नियंत्रण हट जाए तो इंद्रियरूपी घोड़े अनियंत्रित एवं उच्छृंखल हो जाते हैं।कभी व्यक्ति एवं समाज में ऐसी पूरी व्यवस्था थी कि मन की लगाम लगी रहे और मनुष्य नीति,नियम,विधान,संयम,सदाचारपूर्वक कर्म करता रहे। जब से इस व्यवस्था में ढिलाई बरती गई,समस्त समस्याएँ पनपने लगीं।इस नियम के आधार पर श्रेष्ठ कर्म पुण्य बनता है और विपरीत कर्म पाप।कर्मफल की इसी गति के आधार पर जीवात्मा उच्च एवं निम्न योनियों को प्राप्त करता है:पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्।-प्रश्नोपनिषद् (3/7)
4.मुख्य नैतिक नियम (Main ethical rules):
- तैत्तिरीय उपनिषद् में अनेक नीतियों का उल्लेख सद्गुणों के रूप में किया गया है।यहाँ पर सदाचरण करना,तप,संयम और शांति की साधना,अतिथि सत्कार करने तथा मनुष्यता का पालन (Adherence to Humanity) करने के लिए बल दिया गया है।इस उपनिषद् में आचार्य शिष्य को कहता है:”देव और पितृकार्यों से विमुख नहीं होना चाहिए तथा माता-पिता,गुरु और अतिथि को देवतुल्य मानना चाहिए।जो ज्ञानी हैं,विद्वान हैं,उनका सदा सम्मान करना चाहिए।किसी भी अवस्था में अपनी शालीनता एवं विनम्रता नहीं छोड़नी चाहिए।सदा श्रेष्ठ कर्म में निरत रहना चाहिए।लेने की अपेक्षा देने की वृत्ति में भरोसा रखना चाहिए।”
छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार मनुष्य के प्रधान गुण हैं:तप,दान,ऋजुता,अहिंसा और सत्य।इसमें पाँच महापातकों का उल्लेख कर कहा गया है कि सदा इनसे दूर रहना चाहिए।ये हैं:चोरी (theft),मद्यपान (drinking),व्यभिचार (fornication),ब्रह्मघात और उनके सहकारी।बृहदारण्यक उपनिषद् में भी सद्गुणों का प्रतिपादन हुआ है:दमन,दान और दया ये तीन प्रकार की मनोवृत्ति मनुष्य में अवश्य होनी चाहिए।दान की वृत्ति से समाज समृद्ध एवं समुन्नत बनता है। - उपनिषदों में आचारशास्त्र की सुंदर व्याख्या मिलती है। इस संदर्भ में शोपेनहावर का कहना है कि उपनिषद् की नीतियों को अपनाकर व्यक्ति भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में विकास कर सकता है,क्योंकि उसमें इन दोनों क्षेत्रों का परामर्श दिया गया है।उपनिषद् सर्वश्रेष्ठ नीतिशास्त्र है।उपनिषद् नैतिक जीवन का सार है,सदा सत्कर्म करते रहें।यूकन के अनुसार व्यक्ति को श्रेष्ठ कर्म अनासक्त भाव (Detached Emotions) से करना चाहिए,क्योंकि आसक्ति अनेक प्रकार की भ्रांतियों एवं समस्याओं को पैदा करती है।गफ की मान्यता है कि उपनिषद् पवित्र भावनाओं (Sacred Feelings) एवं श्रेष्ठ विचारों का आधार हैं,परंतु इन्हें क्रियान्वित किए बिना इनकी महत्ता नहीं रहती है।अतः व्यावहारिक जीवन में इनको कर्मों में उतारा एवं अनुभव किया जा सकता है।इस प्रकार उपनिषद् नीति एवं आचार का आगार एवं पथप्रदर्शक है।
- उपनिषदों का आचारशास्त्र स्मृतियों एवं पुराणों में और भी सरल व सामयिक ढंग से प्रस्तुत किया गया।वेदों में नीति ज्ञान का अपार संकलन मिलता है,परंतु स्मृतियों और पुराणों में धर्माचरण किए हुए कथानकों का प्रतिपादन मिलता है।मानव समाज के अनगिनत प्रतिबिंब उसकी रीति-नीति,विधि-विधान में झलकते हैं। पुराणों में इन नीतियों को व्यक्ति और समाज के हितों की रक्षा एवं उनके विकास के लिए ही प्रयुक्त किया गया।मनु का नीतिशास्त्र भी बड़ा ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
- साम,दाम,दंड भेद (Conciliation,price,punishment,Dicrimination) इन चार उपायों से घनिष्ठ संबंध रखने वाली नीतियों को मनुष्य षाड्गुण्य मंत्र के नाम से संबोधित करते हैं।मनु इस मंत्र के छह गुण मानते हैं:संधि,विग्रह,यान,आसन,द्वैधीभाव और संश्रय।भीष्म एवं चाणक्य की नीतियाँ भी समाज को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
5.युवा पीढ़ी नैतिक कैसे बनें? (How to make the younger generation ethical?):
- समाज परिवर्तनशील है।वैज्ञानिक उपलब्धियों की वृद्धि के साथ ही नवीन परिस्थितियाँ उत्पन्न होने लगती हैं।नई परिस्थितियों से निपटने के लिए नई रीति-नीति की आवश्यकता होती है।नीतियाँ भी बदलती हैं और नीति के साथ विधि भी बदलती है।समाज की ये रीतियाँ ही भिन्न-भिन्न संहिताओं में संग्रहीत हैं।
- इसलिए जब समय बदला,युग बदला और नई समस्याएँ खड़ी हुईं तो इनसे जूझने के लिए नए परिप्रेक्ष्य में नई रीतियाँ बनीं,जो विधि का अंग हुईं।विधि-विधान (Legislation) भी इसी प्रकार बदले।समय-समय पर रीति-नीति को,विधि-विधानों को प्रासंगिक एवं समयानुकूल बनाया गया और हमारी सामाजिक व्यवस्था में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान होने के कारण ही यह सार्वकालिक एवं कालजयी बन सका है।आज भी समाज में फिर से ऐसे ही परिवर्तन की आवश्यकता है।
- आज युवापीढ़ी की माँग है:सभ्य समाज का निर्माण।आज समाज में अगणित दुष्प्रवृत्तियाँ संव्याप्त हैं।असंख्य उलझी हुई समस्याएँ सामने हैं।कपट,कलह और शोक-संताप (Grief) के असीम कारण विद्यमान हैं।सद्भावनाओं का स्थान दुर्भावों ने,सत्प्रवृत्ति का स्थान दुष्प्रवृत्ति ने पकड़ लिया है।इसके निदान एवं समाधान के लिए समाज में संगठनात्मक,प्रचारात्मक,रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्यक्रमों के अंतर्गत सुव्यवस्थित क्रिया-प्रक्रिया प्रस्तुत करना है।विचार-विस्तार जैसे व्यापक और महान प्रयोजन,संगठित संस्थान ही कर सकते हैं।
- लोक-मानस में अवांछनीयता के प्रति विरोध,असहयोग एवं विद्रोह की भावना जगाई जानी चाहिए।जाग्रत लोक-मानस ही इस कार्य में सहयोगी हो सकता है,जिससे कि समाज का पुनर्निर्माण संभव हो सकेगा। श्रेष्ठ नीतियाँ ही सभ्य समाज का निर्माण कर सकेंगी,जहाँ पर श्रेष्ठ मानव महापुरुषों का आविर्भाव हो सकेगा,जिससे कि समाज का पुननिर्माण संभव हो सकेगा।श्रेष्ठ नीतियाँ ही सभ्य समाज का निर्माण कर सकेंगी,जहाँ पर श्रेष्ठ मानव-महापुरुषों का आविर्भाव हो सकेगा,जो समाज निर्माण में महान भूमिका निवर्हन कर सकेंगे।
6.छात्र-छात्राओं के लिए नैतिक नियम क्यों जरूरी है? (Why is it important for students to have ethical rules?):
- नैतिक नियम केवल किताबी बातें नहीं हैं,ये हमारे निर्णय को सही दिशा देते हैं।जैसे अनुशासन,टाइम मैनेजमेन्ट और ईमानदारी का पालन करने से हमारी दिनचर्या और जीवनशैली व्यवस्थित होती है।छात्र-छात्राएँ अध्ययन के प्रति जागरूक होते हैं,समय को बर्बाद नहीं करते हैं और नियमितरूप से अध्ययन करने पर उनके जीवन में एक अनुशासन कायम होता है।अनुशासन से जीवन सरल और उज्ज्वल बनता है।परीक्षा में ईमानदारी का पालन करने से आपको अपनी वास्तविक स्थिति का पता चलता है।नियमित स्टडी करके दिनचर्या का पालन करते हैं।
- शैक्षणिक और करियर पर प्रभाव (Academic & career Impact):छात्र-छात्राएँ नैतिक नियमों को अपनाने से उनका चरित्र मजबूत बनता है,जो आगे चलकर एक सफल प्रोफेशनल और नेतृत्व प्रदान करता है।
- अतः छात्र-छात्राओं को नैतिक नियमों को अपनाना चाहिए।वैसे उपदेश और पढ़ने से नैतिक नियमों की महत्ता समझ में नहीं आती है।जब हम नैतिक निययों को जीते हैं,जीवन में धारण करते है तभी हमें इनका असली महत्त्व समझ में आता है।सैद्धान्तिक रूप से नैतिकता,धर्म,अध्यात्म का अध्ययन कर लेने से न तो इसका महत्त्व और उपयोगिता समझ में आती है और न इनका आनन्द महसूस किया जाता है।नैतिकता की उपयोगिता और आनन्द इनको जीने,आचरण में धारण करने पर ही मालूम पड़ती,समझ में आती है।
- उपर्युक्त आर्टिकल में नैतिक नियम क्यों जरूरी हैं? नैतिक जीवन जीने का स्थान और महत्त्व (Why Are Moral Rules Necessary? The Place and Importance of Living a Righteous Life) के बारे में गहराई और विस्तार से बताया गया है।
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7.पढ़ने का शार्टकट (गुरुजी का गजब इताज) (हास्य-व्यंग्य) [Shortcut way of reading (Guruji’s amazing treatment)] (Humour-Satire):
- छात्र (गुरुजी से):मेरा ध्यान पढ़ाई में नहीं लगता है,शिक्षक कुछ भी समझाते हैं तो समझ में नहीं आता है।
- गुरुजी:आप जीवन में नैतिक नियमों का पालन करो।ये हमारे अन्दर अनुशासन,ईमानदारी,समय प्रबन्धन,चरित्र निर्माण को सही दिशा देते हैं।
- छात्र:गुरुजी,”कोई सरल सा उपाय बताओ।यों भी होशियार छात्र-छात्राएँ कौनसे नैतिक नियमों का पालन हैं।
- गुरुजी:तो फिर ऐसा करो अपनी पुस्तकों को पानी में घोलकर पी जाओ,आपकी सारी समस्याएँ समाप्त हो जाएंगी।
छात्र की आँखे फटी की फटी रह गई।
8.नैतिक नियम क्यों जरूरी हैं? नैतिक जीवन जीने का स्थान और महत्त्व (Frequently Asked Questions Related to Why Are Moral Rules Necessary? The Place and Importance of Living a Righteous Life) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.प्रमुख नैतिक मूल्य कौनसे हैं? (What are the key moral values?):
उत्तर:सत्य,शान्ति,धार्मिकता,ईमानदारी,सच्चरित्रता,सहयोग,समन्वय,सहिष्णुता,पवित्रता,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि प्रमुख नैतिक मूल्य हैं।
प्रश्न:2.नैतिक मूल्यों का ह्रास कहाँ-कहाँ हो रहा है? (Where are the moral values declining?):
उत्तर:देश के सभी व्यवसायों में,सार्वजनिक तथा वैयक्तिक जीवन में नैतिक मूल्य शिथिल हो रहे हैं।घर,बाजार,कार्यालय,मित्र-मण्डली,सम्मेलन,शिक्षा-संस्थान,संसद,विधान-परिषद,विधान सभा,राज्यसभा,नगरपालिका,पंचायत,यात्रा व चर्चा आदि में नैतिक गिरावट की कोई न कोई बात अवश्य दिखाई देती है।
प्रश्न:3.नैतिक मूल्यों में गिरावट क्यों हो रही है? (Why are moral values declining?):
उत्तर:क्योंकि नैतिक मूल्यों का उल्लंघन करने वाले तथा समाज द्वारा अनैतिक आचरण के दोषी माने जाने वाले व्यक्ति समाज में सम्मान पाते हैं तथा सुख-सुविधाओं से पूर्ण जीवन जी रहे हैं।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा नैतिक नियम क्यों जरूरी हैं? नैतिक जीवन जीने का स्थान और महत्त्व (Why Are Moral Rules Necessary? The Place and Importance of Living a Righteous Life) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
- *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*
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Sir Aapne Dynamics or Real Analysis ke hindi medium ke articles kyo band kar diye, please aap continue daliye usse bahut help hoti hai & Thank you very much for your efforts.
Dear Ansu
Hamane Dynamics ki Syllabus ke anusar puri exercise post kar di the.Hamane Dynamics ke ye topic cover kar diye hai:Basic Concepts,kinematics and Kinetics,Rectilinear Motion,Rectilinear Motion in a Resisting Medium,work,power,Energy and Impulse,Constrained Motions,Central Forces,Moment of Intertia and Product of Intertia etc.Projectile ke topic bhee lagabhag post kar Diya keval VI (c) aur VI (e) exercise baki thi.projectile ka topic pahale syllabus mein nahi tha ye hum isaliye post kar rahe the taki competition exams aur other universities wale students bhee labha Uta sake.Real analysis ka half syllabus hi cover huaa tha.parantu hame beech mein hee band karana pada kyonki English medium wale students ke liye ek bhee topic nahi tha.ab aapane kaha hai to hum beech-beech mein hindi medium ke topic bhee dalate rahenge.Aapake yah valuable comments kabile tareeph hai.Hum aise comments ka intjar karate hai taki hame feedback mil sake.
Aapaka shubhachintak
Satyam