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9 Major Defects of Current Exam System & Practical Solutions

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4 4.परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए सम्पूर्ण पाठ्यक्रम पढ़ने की जरूरत नहीं (No need to read the entire syllabus to pass the exam):

1.वर्तमान परीक्षा प्रणाली के 9 प्रमुख दोष और व्यावहारिक समाधान (9 Major Defects of Current Exam System & Practical Solutions):

  • वर्तमान परीक्षा प्रणाली के 9 प्रमुख दोष और व्यावहारिक समाधान (9 Major Defects of Current Exam System & Practical Solutions) के इस आर्टिकल में वर्तमान परीक्षा प्रणाली के प्रमुख दोष और व्यावहारिक समाधान की चर्चा की गई है।जानिए कि ये दोष कौन-कौनसे हैं और उनके व्यावहारिक समाधान क्या-क्या हैं?

Also Available in Hindi:5 Best Tips to Achieve Success in Exam

2.वर्तमान परीक्षा प्रणाली के दोष की भूमिका (The Introduction  to Flaws of the Current Examination System):

  • वर्तमान परीक्षा प्रणाली के दोष (Defects of Current Exam System):
    शिक्षा सम्बन्धी लगभग हर समिति/आयोग ने वर्तमान परीक्षा प्रणाली के अनेक (Many Defects of Current Exam System) दोषों की चर्चा की है और सभी ने इस दोष की आलोचना की है कि इस प्रणाली का पूरा ध्यान किसी जानकारी को दोहरा सकने की योग्यता पर केन्द्रित रहता है।यह प्रणाली बच्चों के सोचने की योग्यता की परीक्षा नहीं लेती,इस कुशलता की भी परीक्षा नहीं लेती कि वे प्राप्त सूचनाओं और संकल्पनाओं के आधार पर नई एवं अपरिचित समस्याएँ सुलझा सकते हैं या नहीं।दसवीं और बारहवीं की सार्वजनिक परीक्षाएँ तो हमारे समाज की बहुत बड़ी घटनाएँ बन चुकी हैं।
  • उनकी अपनी विशिष्ट संस्कृति बन चुकी है जो भटकाव की ओर ले जाती है।कोई बच्चा ज्यों ही विद्यालय जाना शुरू करता है,उसे शीघ्र ही यह सन्देश मिल जाता है यहाँ सिर्फ एक ही चीज का महत्त्व है,और वह है:परीक्षा में प्रथम आना।अध्यापक और अभिभावक दोनों ही विद्यार्थी की प्रगति का एकमात्र इंडेक्स परीक्षा-परिणाम को मानते हैं।इसलिए,परीक्षा के लिए तैयारी पर ही वे जोर देते हैं और परीक्षाओं का भय उत्पन्न करते हैं। अच्छा विद्यार्थी उसी को माना जाता है जो पाठ्यपुस्तक या गाइड से पूरी की पूरी सूचनाओं को कंठस्थ कर ले;और अच्छा विद्यालय उसी को माना जाता है जिसके अधिक से अधिक विद्यार्थी माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं में मेरिट लिस्ट में स्थान पाएँ।
  • सभी समझदार लोग मुदालियर आयोग के इन शब्दों से सहमत हैं कि वर्तमान परीक्षा प्रणाली में “अच्छी परीक्षा का एक भी गुण नहीं,वह न विश्वसनीय है,और न प्रामाणिक।”वैयक्तिकता का तत्त्व उस पर बहुत हावी है। एक ही परीक्षक एक ही कापी को अलग-अलग समय पर तीन बार देखे तो तीनों बार भिन्न अंक देगा।एशवर्न का कहना है कि “40 प्रतिशत विद्यार्थियों का उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण होना इस बात पर निर्भर करता है कि उत्तर पुस्तिकाएँ कौन जाँचता है, और 10 प्रतिशत का परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि उत्तर पुस्तिकाएँ कब जाँची गई।” स्टार्च और इलियट ने एक प्रयोग किया।उन्होंने एक परीक्षार्थी के उत्तरों की कुछ प्रतियाँ तैयार कीं और पृथक् पृथक् परीक्षकों के पास भेज दीं।आपको आश्चर्य होगा कि उनके प्राप्तांक 51 प्रतिशत से 98 प्रतिशत तक थे।

3.उत्तरपुस्तिकाओं को जाँचने का बेढब तरीका (Awkward way to check answer sheets):

  • पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न विश्वविद्यालयों में पुनर्मूल्यांकन की सुविधा प्रदान की गई है।इसके जो परिणाम सामने आए हैं,उन्होंने भी इस परीक्षा-पद्धति की विश्वसनीयता पर प्रश्न-चिह्न लगा दिया है।इन्दौर विश्वविद्यालय में सन् 1973 में 584 विद्यार्थियों ने पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया।इनमें से पहले अनुत्तीर्ण घोषित 205 विद्यार्थी तो उत्तीर्ण हो गए,पाँच विद्यार्थी कृपांक (ग्रेस मार्क) के अधिकारी बन गए,यानी 210 विद्यार्थी,जिन्हें पहले अनुत्तीर्ण बताया था,पुनर्मूल्यांकन के फलस्वरूप उत्तीर्ण हो गए। श्रेणी-सुधार के केस भी शामिल कर लें तो कुल 240 यानी 41.1 प्रतिशत विद्यार्थियों का परीक्षा-परिणाम प्रभावित हुआ।
  • हाल ही में मेरठ की एक विकलांग छात्रा का परीक्षा परिणाम आया तो उसके होश ही उड़ गए क्योंकि सभी विषयों में उसके लगभग 80 प्रतिशत अंक थे,पर गणित में केवल 31 अंक थे और उसे दो अंक का ग्रेस देकर उत्तीर्ण बताया गया था।जब उसने पुनर्मूल्यांकन कराया तो उसके 31 के स्थान पर 81 अंक हो गए।’पर ऐसे लोग भी हैं हैं जिन्हें पूनर्मूल्यांकन की सुविधा के बावजूद न्याय पाने के लिए अधिक संघर्ष करना पड़ा है।रामपुर (उ.प्र.) स्थित दयावती मोदी स्कूल के कक्षा 12 के छात्र अखिल गुप्ता को भौतिक विज्ञान में प्रैक्टिकल में 30 में से 30 अंक मिले थे,पर लिखित परीक्षा में 70 में से 13 अंक ही मिले।उसने पुनर्मूल्यांकन के लिए अनुरोध किया,पर केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने “कोई परिवर्तन नहीं” की सूचना दी।अखिल ने महामहिम राष्ट्रपति अबुल कलाम साहब से गुहार की।उनके हस्तक्षेप पर बोर्ड ने कापी दुबारा जंचवाई और 13 की जगह 55 अंक प्रदान किए।’मुम्बई की एक छात्रा को न्याय पाने के लिए हाई कोर्ट की शरण में जाना पड़ा जिसने उत्तरपुस्तिकाएँ दुबारा जाँचने के लिए एक पैनल बनाया।परिणामस्वरूप जिस लड़की को फेल घोषित किया गया था,उसने टॉप किया।हमारी परीक्षा प्रणाली की अविश्वसनीयता की यह बानगी भर है।

4.परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए सम्पूर्ण पाठ्यक्रम पढ़ने की जरूरत नहीं (No need to read the entire syllabus to pass the exam):

  • सब जानते हैं कि इस परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए विद्यार्थियों को सम्पूर्ण विषय के ज्ञान की आवश्यकता नहीं है।परीक्षा का अर्थ हो गया है धोखा दे सकने की कला।पूरी पुस्तक में से थोड़े से प्रश्न करने हैं और उनमें भी 33 प्रतिशत अंक प्राप्त करना पर्याप्त है।इन परीक्षाओं द्वारा बालक की न तो अकेडेमिक और बौद्धिक उपलब्धियों की परीक्षा होती है,न व्यक्तित्व के किसी अन्य पक्ष के परीक्षण का कोई प्रयास किया जाता है।केवल कुछ तथ्यों को रट सकने की क्षमता और परीक्षा में चातुर्यपूर्ण ढंग से प्रयास कर सकने की कला की परीक्षा होती है।
  • दुःख इस बात का है कि यह परीक्षा सारी शैक्षिक प्रक्रिया पर हावी हो गई है।अध्यापक और विद्यार्थी- दोनों के लिए एक मात्र प्रेरक तत्त्व परीक्षा है।अध्यापक को उसी विषय पर ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है जो परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होता है।परिणामतः छात्रों को स्वतन्त्र-चिन्तन के लिए प्रोत्साहन देने के बजाय रटने की सीख के लिए विवश होना पड़ता है क्योंकि परीक्षा उत्तीर्ण करना और उसमें उच्च अंक प्राप्त करना अध्यापक और विद्यार्थी दोनों की ही सफलता की एकमात्र कसौटी है।

5.पढ़ना और पढ़ाना केवल परीक्षा केन्द्रित (Reading and teaching are exam centric only):

  • पाठ्यक्रम,पुस्तकें,शिक्षण-विधियाँ-सभी परीक्षा केन्द्रित हैं।इसका परिणाम विद्यार्थियों के विकास पर बुरा पड़ता है।परिश्रम करने का मौसम आता है और तब विद्यार्थियों का खाना-पीना सब बन्द।रतजगा शुरू।पाठ्यपुस्तक का ही नहीं,नोट्स और वन-डे-सीरीज का अखण्ड पाठ आरम्भ।स्वास्थ्य की पूर्णतया उपेक्षा कर दी जाती है।जो ये सब नहीं करना चाहते वे प्रायः अनैतिक हथकंडे अपनाते हैं,जैसे परीक्षा भवन में नकल करना,अध्यापक को धमकाना,मार डालना,परीक्षकों के पास पहुँच कर उन्हें धमकाना और अब तो पूरे परीक्षा कक्ष में या पूरे परीक्षा केन्द्र में नकल कराने के ठेके दिए जाने लगे हैं।
  • इस प्रकार अनुशासनहीनता का एक बहुत बड़ा कारण वर्तमान परीक्षा-पद्धति ही है।किसी विद्यार्थी की वर्ष भर की प्रगति और उपलब्धि का मूल्यांकन और परीक्षण करने में उस अध्यापक का कोई हाथ नहीं,जिसने उसे वर्षभर पढ़ाया है। (“आंतरिक मूल्यांकन” की व्यवस्था से यह दोष एक सीमा तक दूर हुआ है।) जिस विद्यार्थी ने वर्षभर न केवल यह कि कुछ नहीं पढ़ा बल्कि असामाजिक कार्य किए,वह यदि परीक्षा में येनकेन-प्रकारेण ठीक उत्तर लिख आया तो अच्छे अंक प्राप्त कर ही लेगा और उसका उदाहरण स्वयं उसे तो भविष्य में असामाजिक कार्यों के लिए प्रोत्साहित करेगा ही,दूसरों को भी वही रास्ता अपनाने के लिए प्रेरित करेगा।किसी बालक का भविष्य उसकी मानसिक योग्यता पर नहीं,परीक्षाफल पर निर्भर है।
  • शिक्षा आयोग ने विभिन्न बोर्ड परीक्षा के विगत पाँच वर्षों के परिणामों का विश्लेषण किया’ तो पता चला कि हाईस्कूल में लगभग 55 प्रतिशत तथा हायर सैकण्डरी में 40 प्रतिशत विद्यार्थी प्रतिवर्ष असफल रहते हैं।प्राईवेट परीक्षार्थी तो 70 प्रतिशत से भी अधिक अनुत्तीर्ण होते हैं।इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों का अनुत्तीर्ण होना,विशेष रूप से तब जब वे प्रतिवर्ष विद्यालयी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते रहे हैं,हमारी शिक्षा-पद्धति और परीक्षा-पद्धति की असफलता के प्रमाण हैं।राधाकृष्णन कमीशन (1948) ने तो यहाँ तक कहा कि यदि शिक्षा में केवल एक ही सुधार करना हो तो परीक्षा पद्धति में किया जाना चाहिए।स्पष्ट है कि परीक्षा प्रणाली में अत्यन्त सुधार की आवश्यकता है।

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6.परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए सुझाव (Suggestions for Improving the Examination System):

  • सुधार के सुझाव
  • माध्यमिक शिक्षा आयोग ने इसमें सुधार के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:
  • (1.) परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्नों के रूप में परिवर्तन की आवश्यकता है।निबन्धात्मक प्रश्नों की व्यक्तिनिष्ठता कम करने के लिए वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को स्थान दिया जाए।
  • (2.)बाह्य परीक्षाओं की संख्या में एवं उनके महत्त्व में कमी की जाए।
  • (3.) माध्यमिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों की समाप्ति पर ही एक सार्वजनिक परीक्षा हो।
  • (4.) छात्रों की आन्तरिक प्रगति का लेख (रिकार्ड) रखा जाए और विद्यार्थी के अन्तिम मूल्यांकन में इसे समुचित महत्त्व दिया जाए।
    शिक्षा आयोग ने परीक्षा को समग्र शिक्षा पद्धति का अभिन्न अंग मानकर उसे शैक्षिक उद्देश्यों से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध माना है।वर्तमान परीक्षा-प्रणाली को सुधारने के लिए उसने निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:
  • (1.) लिखित परीक्षाओं को सुधारा जाए,ताकि वे शैक्षिक उपलब्धियों के मापन के लिए वैध एवं विश्वसनीय बन जाएँ।
  • (2.)जिन योग्यताओं का मापन लिखित परीक्षाओं द्वारा नहीं हो सकता,उनको मापने की विधियों का आविष्कार किया जाए।
  • (3.) बाह्य परीक्षाओं के प्रश्नों को अधिकाधिक वस्तुनिष्ठ बनाया जाए।
  • (4.) आन्तरिक जाँच के लिए अध्यापक द्वारा निर्मित परीक्षाओं,प्रयोगात्मक परीक्षाओं,मनोवृत्तियों तथा रुचियों को जाँचने आदि के लिए विभिन्न मानकीकृत (स्टैन्डर्डाइज्ड) परीक्षाओं का उपयोग किया जाए।
  • (5.) बोर्ड जो प्रमाण-पत्र देता है उसका रूप बदलना चाहिए।प्रमाण-पत्र में केवल उन विषयों में विद्यार्थी की प्रगति का उल्लेख मात्र होना चाहिए जिनमें उसने परीक्षा दी।कुल परीक्षा में उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण न लिखा जाये।
  • (6.) यदि कोई विद्यार्थी अपनी श्रेणी सुधारने के लिए पूरी शिक्षा या आंशिक परीक्षा पुनः देना चाहे तो उसे ऐसी सुविधा देनी चाहिए।
  • (7.) विद्यार्थी को अपने विद्यालय से भी एक प्रमाण-पत्र मिलना चाहिए जिसमें उसके संचयी-प्रगति पत्र (क्युमुलेटिव रिकार्ड) के आधार पर आंतरिक मूल्यांकन का अंकन हो।
  • इनमें से कुछ सुझाव अब लागू हो चुके हैं।जैसे,प्रश्नपत्र में वस्तुनिष्ठ,लघु-उत्तर वाले प्रश्नों का समावेश,आंतरिक मूल्यांकन की व्यवस्था आदि।

7.मूल्यांकन परीक्षा से बेहतर तरीका (A better way than an evaluation exam):

  • मूल्यांकन
  • मूल्यांकन शिक्षा-प्रक्रिया का अभिन्न अंग है।जिस प्रकार डाक्टर अपनी सफलता का मूल्यांकन रोगी को स्वास्थ्य की ओर ले जाने वाले परिवर्तनों से करता है,उसी प्रकार अध्यापक अपने शिक्षण का मूल्यांकन विद्यार्थी में अपेक्षित व्यवहार-परिवर्तनों के आधार पर करता है। इस मूल्यांकन-प्रक्रिया में केवल विद्यार्थी की ही जाँच नहीं होती,बल्कि शिक्षक,शिक्षण-पद्धति,पाठ्यपुस्तकों तथा अन्य शैक्षणिक साम्रगी की उपयोगिता की भी जाँच होती है।यह निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।आवश्यक है कि मूल्यांकन की विधियाँ प्रामाणिक हों,विश्वसनीय हों,वस्तुपरक हों, और व्यावहारिक हों।’
    शिक्षा में मूल्यांकन-प्रक्रिया के तीन सोपान हैं:
  • (1.) शिक्षण-उद्देश्यों का निर्धारण तथा उनका स्पष्टीकरण-शिक्षण-उद्देश्यों का निर्धारण करते समय बालक की प्रकृति,समाज,विषय-वस्तु,शिक्षा-मनोविज्ञान तथा शिक्षा के स्तर पर ध्यान देना आवश्यक है।
  • (2.) उक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विद्यालय में ऐसी शैक्षणिक क्रियाएँ आयोजित की जानी चाहिए जो विद्यार्थी को उपयुक्त अनुभव प्रदान करें।
  • (3.) इन अनुभवों के आधार पर विद्यार्थी के व्यवहार के ज्ञानात्मक,भावात्मक तथा क्रियात्मक पक्षों में जो परिवर्तन होते हैं,उनका मूल्यांकन करने वाले साधनों का उपयोग किया जाना चाहिए।
  • इस प्रकार मूल्यांकन का क्षेत्र आधुनिक परीक्षा के क्षेत्र से कहीं अधिक व्यापक है।परीक्षा के सुधार के लिए इधर जितने प्रयास किए गए हैं,उनके द्वारा मूल्यांकन के अनेक तत्त्व परीक्षा कार्यक्रम में आते जा रहे हैं।
  • मूल्यांकन के नवीन सम्प्रत्यय को,तथा मूल्यांकन तकनीकों को लोकप्रिय बनाने के लिए केन्द्रीय परीक्षा-यूनिट ने एक बहुमुखी अभियान चलाया।इसने परीक्षा-गोष्ठियों,कार्यशालाओं आदि में माध्यमिक विद्यालय के हजारों अध्यापकों के साथ कार्य किया,प्रशिक्षण महाविद्यालयों के सैकड़ों प्राध्यापकों को नवीन प्रविधियों से परिचित कराया,परीक्षण-उपकरणों का विशाल निकाय स्थापित किया,माध्यमिक शिक्षा के विभिन्न बोडौँ से सम्बद्ध प्रश्न-पत्र बनाने वालों को प्रशिक्षण दिया,मूल्यांकन-सम्बन्धी अच्छे साहित्य का प्रकाशन किया,और परीक्षाओं की विभिन्न व्यावहारिक समस्याओं पर अध्ययन और अन्वेषण कार्य का सम्पादन अथवा प्रवर्तन किया।तीसरी पंचवर्षीय योजना में विभिन्न राज्यों में मूल्यांकन एकक की स्थापना की गई।
  • राजस्थान में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को समुचित दिशा प्रदान करने की दृष्टि से आन्तरिक मूल्यांकन योजना को एक और ही रूप दिया है।इस योजना के अन्तर्गत संचालित प्रवृत्तियों का सशक्त एवं प्रभावी क्रियान्वयन करने के उद्देश्य से बोर्ड हिन्दी में रचनात्मक लेखन,भाषण-कला,कविता-पाठ एवं चित्रकला प्रवृत्तियों का आयोजन जिला स्तर पर करवा कर प्रथम एवं द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाले छात्रों को प्रमाण-पत्र प्रदान करता है।इसके बाद,प्रत्येक जिले से प्रथम रहे छात्रों को राज्य-स्तरीय प्रतियोगिता में सम्मिलित किया जाता है और विभिन्न प्रवृत्तियों में प्रथम एवं द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को क्रमशः रजत एवं कांस्य पदक दिया जाता है।
  • विभिन्न बोर्डों द्वारा किए गए प्रयत्नों के बावजूद अभी परीक्षा के प्रमुख दोषों में कोई बड़ा गुणात्मक अन्तर नहीं आया है।विद्यालय परीक्षा का स्वरूप अधिकतर बाह्य परीक्षा के आधार पर निर्धारित किया जाता है। कम से कम माध्यमिक कक्षाओं में तो अभी भी ऐसा ही है।प्राथमिक कक्षाओं में परीक्षाओं के सुधार की ओर अभी भी गंभीर ध्यान नहीं दिया गया है और विश्वविद्यालय स्तर पर भी इस दिशा में अभी नगण्य ही काम हुआ है।
  • जो कुछ कार्य इस दिशा में हुआ है उसके परिणाम बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहे हैं।राजस्थान में आन्तरिक मूल्यांकन का कार्यक्रम माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के आदेश से प्रारम्भ किया गया।कार्यक्रम का सफल संचालन हो सके,इसके लिए प्रशिक्षण महाविद्यालयों के कार्यक्रम में आवश्यक परिवर्तन किए गए।पर योजना की जिस रूप में क्रियान्विति हमारे विद्यालयों में हुई,उससे निराशा ही होती है।विद्यालय में विभिन्न प्रवृत्तियों का आयोजन यथासमय होना चाहिए और सम्बन्धित अध्यापक को सम्बन्धित विद्यार्थियों की योग्यता का मूल्यांकन उसी समय करना चाहिए,पर देखने में यह आया कि अध्यापक महोदय वर्ष में एक दिन बैठ कर सारी पूर्तियाँ कर डालते हैं,और इस तथ्य का उल्लेख अपनी “विशेष योग्यता” के रूप में संगी-साथियों में करते हैं।
  • विद्यार्थियों के लिखित उत्तरों की जाँच अधिक वस्तुपरक बनाने के लिए बोर्ड निर्देश देता है कि निबंधात्मक प्रश्नों के उत्तरों की जाँच निर्दिष्ट खण्डों में की जाए।उत्तर के जिस-जिस भाग के लिए अंक निर्धारित किए गए हैं उस-उस पर पृथक् अंक दिए जाएँ।पर अध्यापक महोदय इकट्ठे अंक देकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं।और अब तो उत्तर को बिना पढ़े ही अंक दे देने का रिवाज चल गया है।अतः जब तक अध्यापकगण इस विषय में अपने उत्तरदायित्व का गंभीरता से निर्वाह नहीं करते तब तक योजना की सफलता की आशा करना ही व्यर्थ है।

8.परीक्षा सुधार का कार्यक्रम (Examination Reform Program):

  • परीक्षा-सुधार का कार्यक्रम
    केन्द्रीय शिक्षा मन्त्रालय ने माध्यमिक स्तर पर परीक्षा-सुधार के लिए विदेशी विशेषज्ञों की सहायता से (जिनमें शिकागो विश्वविद्यालय,अमेरिका के डॉ. ब्लूम का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है) परीक्षा-सुधार का एक नवीन कार्यक्रम तैयार किया।इसके प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित थे:
  • (1.) परीक्षा-पद्धति शिक्षण के उद्देश्यों पर आधारित होनी चाहिए न कि केवल स्मृति-शक्ति के परीक्षण पर। उचित मूल्यांकन के लिए आवश्यक है कि परीक्षा का मूलाधार समस्त मानसिक योग्यताएँ,कुशलताएँ,रुचियाँ और अभिवृत्तियाँ हों।
  • (2.) प्रश्नपत्रों में निबन्धात्मक प्रश्नों की संख्या कम करनी चाहिए और यथासम्भव वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की संख्या में वृद्धि करनी चाहिए।
  • (3.)प्रश्न-पत्र बनाते समय निम्नलिखित बिन्दुओं को ध्यान में रखना चाहिए:
  • यथासम्भव सम्पूर्ण पाठ्यक्रम में से प्रश्न पूछे जाएँ। उद्देश्यों के अनुरूप ही समस्त प्रश्नों का स्वरूप निर्धारित किया जाए।
    समस्त प्रश्नों के उत्तर निश्चित एवं विवादरहित हों।
    प्रश्न-पत्र में सरलता और कठिनाई को समुचित स्थान दिया जाए।
  • (4.)परीक्षा-पद्धति में आन्तरिक एवं बाह्य मूल्यांकन को समाविष्ट किया जाए,जिससे विद्यार्थी का समग्र मूल्यांकन सम्भव हो सके।
    परीक्षा सुधार के जितने भी कार्यक्रम बनाए गए,उनमें इन सिद्धान्तों का समर्थन किया गया।इस समय देश में परीक्षा-सुधार का काम इन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर किया जा रहा है।

9.वर्तमान परीक्षा प्रणाली के 9 प्रमुख दोष और व्यावहारिक समाधान का सारांश (Summary of 9 Major Defects of Current Exam System & Practical Solutions):

  • (A)परीक्षा से सम्बन्धित छात्र-छात्राओं को जगाने वाले प्रश्न (Questions related to the exam from Students):
    (1.) क्या वर्तमान परीक्षा प्रणाली आपके विचार से उचित है? (Is the present examination system fair in your opinion?)
    (2.) क्या आप वर्तमान में केवल परीक्षा केन्द्रित ही अध्ययन करते हैं या आचरण में भी अपनाते हैं,अमल करते हैं? (Do you currently study only exam-centered, or do you also adopt and practice it?)
    (3.)आप परीक्षा की तैयारी किस तरह करते हैं? (How do you prepare for the exam?)
    (4.)वर्तमान परीक्षा प्रणाली में आपके अनुसार क्या बदलाव होना चाहिए? (What changes do you think should be made in the current examination system?)
    (5.) क्या चारित्रिक मूल्यों का भी मूल्यांकन करना चाहिए? (Should character values also be evaluated?)
    (6.) यह तुम कैसे जानते हो कि परीक्षा प्रणाली में बदलाव होना चाहिए? (How do you know that there should be a change in the examination system?)
    (7.) क्या आप परीक्षा प्रणाली में बदलाव के लिए सक्षम व्यक्तियों/अधिकारियों से बात करोगे? (Will you talk to competent persons/officials for changes in the examination system?)
    (8.) परीक्षा प्रणाली में बदलाव के पक्ष और विपक्ष में आप क्या तर्क दे सकते हैं? (What arguments can you make for and against changes to the examination system?)
    (9.) आपके अनुसार परीक्षा प्रणाली में बदलाव से क्या परिणाम निकल सकते हैं? (What are the results of the change in the examination system according to you?)
    (10.) यदि आप शिक्षा मंत्री होते तो क्या करते ? क्या आप सदैव भारतीय संस्कृति के अनुरूप परीक्षा प्रणाली में संशोधन करते ? हाँ/नहीं तो क्यों? (What would you do if you were the Education Minister? Would you always amend the examination system according to Indian culture? Yes/No then why?)
  • (B)वर्तमान परीक्षा प्रणाली के दोष के महत्त्वपूर्ण पाइंट्स (Important Points of the Flaws of the Current Examination System)
    (1.)वर्तमान परीक्षा प्रणाली के दोषों की भूमिका (The Introduction to Flaws of the Current Examination System)
    (2.)उत्तरपुस्तिकाओं को जाँचने का बेढब तरीका (Awkward way to check answer sheets)
    (3.)परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए सम्पूर्ण पाठ्यक्रम पढ़ने की जरूरत नहीं (No need to read the entire syllabus to pass the exam)
    (4.) पढ़ना और पढ़ाना केवल परीक्षा केन्द्रित (Reading and teaching are exam centric only)
    (5.)परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए सुझाव (Suggestions for Improving the Examination System)
    (6.) मूल्यांकन परीक्षा से बेहतर तरीका (A better way than an evaluation exam)
    (7.)परीक्षा सुधार का कार्यक्रम (Examination Reform Program)
    उपर्युक्त आर्टिकल में वर्तमान परीक्षा प्रणाली के 9 प्रमुख दोष और व्यावहारिक समाधान (9 Major Defects of Current Exam System & Practical Solutions) के बारे में विस्तार और गहराई से समझाया गया है।
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10.टीचर ने स्वच्छता का पाठ पढ़ाया (हास्य-व्यंग्य) (Teacher taught a lesson on cleanliness) (humor-satire):

  • छात्र (टीचर से): सर,परीक्षा की तैयारी करवा दीजिए।मैंने पूरे साल कुछ पढ़ाई नहीं की।यदि आपने तैयारी नहीं करवाई तो मैं फेल हो जाऊँगा।
  • टीचर ने छात्र को पढ़ाने के लिए पास बुलाया और ज्योंही पास बैठाया तो जोरदार संडाध आयी।टीचर ने उसके शरीर को सूँघा तो शरीर में से बुरी तरह बदबू आ रही थी।
  • टीचर ने पूछा:आप कितने दिन से नहीं नहाये और कपड़े-लत्ते नहीं धोये।
  • छात्रःसर,कच्ची बस्ती मैं रहता हूँ और वहाँ पानी नसीब नहीं होता है।
  • टीचरः तो सार्वजनिक टंकी या नल से स्नान कर लेते।नहाना-धोना तो जरूरी है न?
  • छात्रः श्रीमन ! परीक्षा साफ-सफाई या नहाने धोने की तो होती नहीं।आप तो परीक्षा की तैयारी करवा दो।
  • टीचरः परीक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान की ही नहीं होती है।आप साफ-सुथरे रहे बिना परीक्षा की तैयारी कैसे कर सकते हैं। परीक्षा शिक्षा अर्जित करने की होती है।और शिक्षा का पहला पाठ है,अपने अन्दर साफ-सुथरे और व्यवस्थित होने के संस्कार डालो।भगवान ने आपको यह शरीर दिया है,इसकी कद्र करना सीखो ।
  • टीचर (पुनः):आप देख रहे हो इस कोचिंग में कितनी साफ सफाई है।कितनी मधुर गंध आ रही है।कितना सुहाना वातावरण है।
  • छात्रः मुझे तो कोई भीनी-भीनी सुगन्ध नहीं आ रही है।
  • टीचरःवो इसलिए कि आपने शरीर पर गन्दगी लपेट रखी है।जाओ और नहा-धोकर आओ।

11.वर्तमान परीक्षा प्रणाली के 9 प्रमुख दोष और व्यावहारिक समाधान (Frequently Asked Questions Related to 9 Major Defects of Current Exam System & Practical Solutions) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.अध्यापन प्रणालियों की वर्तमान में क्या स्थिति है? (What is the current state of teaching systems?):

उत्तर:पाठ्यक्रम को जितना गम्भीर बनाया जाए बनाया जाएगा,अध्यापन प्रणालियों के भी उतने ही प्रभावशाली सुधार की आवश्यकता होगी।हमारी प्रणालियां रूढ़ हो गई हैं,इनमें नए प्रयोग की आवश्यकता है।अतः विद्यालयों की व्यवस्था लचीली और परिवर्तन के अनुकूल होनी चाहिए ताकि नए प्रयोग करने के लिए उत्साही अध्यापक को प्रशासनिक अधिकारियों से सहायता मिले,सुधार का सामान्य वातावरण मिले,विद्यालय के अध्यक्ष से प्रोत्साहन मिले और शिक्षा-सामग्री उपलब्ध हो सके।

प्रश्न:2.शिक्षण सामग्री के महत्त्वपूर्ण अंग कौन-कौनसे हैं? (What are the important parts of teaching material?):

उत्तर:शिक्षण-सामग्री का एक महत्त्वपूर्ण अंग है,अध्यापक-निदेशिका,जिसकी ओर अभी बहुत कम ध्यान दिया गया है।टी.वी कार्यक्रमों,इंटरनेट का भी समुचित प्रयोग तथा स्थानीय स्रोतों का उपयोग हमारी अध्यापन-प्रणाली का अंग होना चाहिए।

प्रश्न:3.परीक्षा से क्या आशय है? (What do you mean by exam?):

उत्तर:परीक्षा का शाब्दिक अर्थ है,”चारों ओर अच्छी तरह देखना।”इस अर्थ में परीक्षा,शिक्षण का अनिवार्य भाग है क्योंकि शिक्षक को शिक्षण प्रारम्भ करने से पहले भी,शिक्षण के दौरान भी और शिक्षण समाप्त होने पर भी परीक्षा का सहारा लेना पड़ता है।परीक्षा के बिना यह मालूम ही नहीं हो सकता है कि शिक्षण का प्रारम्भ कहाँ से किया जाए,प्रारम्भ किया हुआ शिक्षण ठीक दिशा में चल रहा है या नहीं और शिक्षण सफल हुआ या नहीं।

उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा वर्तमान परीक्षा प्रणाली के 9 प्रमुख दोष और व्यावहारिक समाधान (9 Major Defects of Current Exam System & Practical Solutions) की प्राइमरी टर्म्स के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
*”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*

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