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Preparation Tips for Competition Examination

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1 Preparation Tips for Competition Examination –
1.2 2.नवीनतम जानकारी की तैयारी करें(Prepare latest information) –

Preparation Tips for Competition Examination –

1.नियमित रूप से पढ़ाई करें(Study regularly)[ Preparation Tips for Competition Examination] –

Preparation Tips for Competition Examination -

Preparation Tips for Competition Examination –

प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के टिप्स (Preparation Tips for Competition Examination) के बारे इस आर्टिकल में विस्तृत रूप से बताया गया है।डिग्री व हाईस्कूल की परीक्षा के लिए भी नियमित रूप से तैयारी की आवश्यकता होती है। परन्तु प्रतियोगिता परीक्षाओं में केवल उत्तीर्ण होने का सिस्टम मायने नहीं रखता है।प्रतियोगिता परीक्षाओं में आपकी तैयारी इस प्रकार की होनी चाहिए कि आप अग्रिम पंक्ति में आ सकें। प्रतियोगिता परीक्षा में जाॅब पाने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है इसलिए आप जितना श्रेष्ठ करेंगे उतना ही आपको फायदा होगा। इसके लिए नियमित व सतत अध्ययन की आवश्यकता होती है। यदि आप नियमित अध्ययन नहीं करेंगे तो आपका सिलेबस पूरा नहीं होगा, एकाग्रता भंग होगी और याद करने का क्रम टूट जाएगा।

2.नवीनतम जानकारी की तैयारी करें(Prepare latest information) –

तकनीकी और प्रतिस्पर्धा के इस युग में परीक्षा का पैटर्न व सिलेबस बदलता रहता है। इसलिए माॅडल पेपर पर ही निर्भर रहकर तैयारी न करें बल्कि नवीन पैटर्न व सिलेबस को ध्यान रखते हुए तैयारी करें। माॅडल पैपर व पिछले वर्षों के पेपर से केवल थोड़ी बहुत मदद मिल सकती है। इसलिए केवल उन पर ही निर्भर न रहें। लेटेस्ट एक्जाम पेटर्न व सिलेबस की डिटेल स्टडी करें, सिलेक्टेड तैयारी न करके विस्तृत रूप से तैयारी करें। आजकल प्रश्न बहुत गहराई, जटिल व सरल प्रश्नों को भी घुमा फिराकर पूछा जाता है जिनका उत्तर आप गहराई से और विस्तृत अध्ययन करके ही दे सकते हैं। नवीनतम जानकारी के लिए समाचार पत्र, न्यूज व प्रतियोगिता परीक्षा की नवीनतम जानकारी हेतु प्रकाशित होनेवाली मासिक पत्रिकाएं जैसे प्रतियोगिता दर्पण, क्रानिकल इत्यादि का अध्ययन करें।

3.आनलाईन माॅक टेस्ट की तैयारी(Preparing for online mac test) –

Preparation Tips for Competition Examination -

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आजकल आनलाईन माॅक टैस्ट अर्थात् आभासी टेस्ट आनलाईन उपलब्ध हैं उनको लगातार हल करें। समय का ध्यान रखें और स्पीड बढ़ाए तथा एक्यूरैसी अर्थात् शुद्धता का ध्यान रखें। इसके लिए आपमें एकाग्रता, ध्यान का रोजाना अभ्यास करना चाहिए। प्रात:काल कुछ समय ध्यान व एकाग्रता पर देना चाहिए जिससे माॅक टेस्ट को हल करने में आपकी स्पीड बढ़ सके और एक्यूरेसी के साथ कम समय में हल करने की कोशिश करें। याद रखें कि प्रतियोगिता परीक्षा में अब परम्परागत तरीकों से काम नहीं चलता है, उनसे कुछ सहायता अवश्य मिल सकती है परन्तु ‘प्रतिस्पर्धा’ में आगे बढ़ने के लिए आपमें पैशन का होना जरूरी है।

4.परीक्षा केन्द्रित तैयारी न करके ज्ञान केन्द्रित तैयारी करें(Prepare knowledge-focused preparation rather than exam-centric preparation) –

आजकल परीक्षा का सिलेबस जारी होने के बावजूद केवल सिलेबस के आधार पर स्टडी करके आप आगे नहीं निकल सकते हैं। सिलेबस का विस्तृत और गहराई से अध्ययन करने के लिए आप नाॅलेज केन्द्रित अध्ययन करें, न कि परीक्षा केन्द्रित अध्ययन। परीक्षा में इस प्रकार की विविधता लिए हुए प्रश्न पूछे जाते हैं कि उनका उत्तर आप सिलेबस के आधार पर तैयारी करके नहीं दे सकते हैं बल्कि आप नाॅलेज के लिए पढ़ेंगे तभी उत्तर दे पाएंगें। नाॅलेज के लिए पढ़ने हेतु हर कान्सेप्ट क्लीयर होना चाहिए, केवल रटकर पास नहीं हो सकते हैं। इसलिए डीप स्टडी पर फोकस करें। रोजाना नई-नई बातों की जानकारी जुटाएं इसके लिए आप समाचार पत्र, पत्रिकाएं, टी. वी. और आनलाईन स्टडी करके तैयारी कर सकते हैं।

5.स्वयं के नोट्स बनाएं(Make your own notes) –

परीक्षा तैयारी करने हेतु स्वयं के नोट्स बनाएं। बाजार में तथा कोचिंग सेन्टर्स पर बने बनाएं नोट्स भी मिलते हैं। परन्तु स्वयं के बनाए हुए नोट्स अधिक प्रभावी व स्थायी होते हैं। प्रथम कारण तो यह है कि आप नोट्स बनाएंगे तो किसी भी टाॅपिक के लिए एक से अधिक पुस्तकों की सहायता लेंगे जिससे आपकी नाॅलेज बढ़ेगी। दूसरा कारण है कि आपको नोट्स बनाने का तरीका मालूम हो जाएगा जिससे निबन्धात्मक प्रश्नों के उत्तर देने में आसानी रहेगी। तीसरा कारण है कि स्वयं के बनाएं हुए नोट्स से आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा जिससे प्रश्न-पत्र को हल करने में मदद मिलेगी।

6.परीक्षा की तैयारी हेतु योजना बनाएं(Plan for exam preparation) –

केन्द्रीय तथा राज्य सेवाओं में कार्यरत कर्मचारी केन्द्रीय तथा राज्य की नीति, क्रियाकलापों के निर्धारण और क्रियान्विति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जैसे अजित डोवल को कौन नहीं जानता है कि उनकी कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका है जबकि मुख्य-मुख्य केन्द्रीय मंत्रियों को छोड़ दें तो हम केन्द्रीय व राज्य मंत्रियों को भी नहीं जानते होंगे। वास्तव में आईएएस, आईएफएस, आरएएस इत्यादि सेवाएं इतनी, ‘ग्लैमरस ‘और’ चुनौतीपूर्ण सेवाएं हैं कि युवाओं में चयन परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए एक जुनून-सा देखा जाता है। इन सेवाओं में उत्तीर्ण अभ्यर्थी विभिन्न मंत्रालयों के प्रमुख पद नियुक्त किए जाते हैं जहाँ उनको अपनी सम्पूर्ण मानसिक व शारीरिक क्षमताओं का सदुपयोग करने का अवसर प्राप्त होता है। साथ ही अच्छा वेतनमान व अधिकार भी मिलते हैं। उनको ऐसे कार्य करने होते हैं जिनको करने हेतु अपने विवेक के आधार पर निर्णय लेने के आधार पर सफलता व असफलता निर्भर करती है। केंद्रीय व राज्य सेवाओं के बढ़ते क्रेज के कारण इनकी चयन प्रक्रिया भी बहुत कठिन और जटिल होती है। इन परीक्षाओं में भाग लेने वाले अभ्यर्थी इस आशंका से त्रस्त रहते हैं कि उनका चयन होगा या नहीं। पदों की तुलना में परीक्षाओं में भाग लेने वाले अभ्यर्थियों की संख्या बहुत अधिक होती है। आज एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद हेतु ही इतनी मारा-मारी होती है कि यह देख, सुनकर हमारी हालत पतली हो जाती है। परन्तु यह सोचकर ही हमें हथियार नहीं डाल देना चाहिए कि इन परीक्षाओं में चयन की सम्भावना बहुत कम है।
इन परीक्षाओं के लिए पहला मंत्र तो यही है कि उनको कभी भी निराश नहीं होना चाहिए भले ही रिक्तियों की संख्या कुछ भी हो क्योंकि उन्हें सिर्फ और सिर्फ एक पद की जरूरत होती है, यह सोचकर ही परीक्षा में एपियर होना चाहिए। इसके लिए आपको सार्थक और परिणामजनक प्रयास की आवश्यकता है। दूसरा मंत्र है आप अपने ऊपर विश्वास रखें। कैसी भी स्थिति हो, कितनी जटिल स्थिति हो और कितनी ही चयन प्रक्रिया कठिन हो, अपने आत्म-विश्वास को डिगने न दें। गीता के इस कथन को याद रखें –
अपना कर्म निष्काम भाव से अर्थात् फल में इच्छा न रखते हुए केवल कर्त्तव्य समझकर करें। वास्तविकता भी यही है कि मनुष्य के हाथ में कर्म करना है, उसके फल पर उसका नियंत्रण नहीं है। कर्मफल पर नियंत्रण अन्य शक्ति का है जिसे हम परमात्मा, वाहेगुरु, अल्लाह, गोड किसी भी नाम से पुकार सकते हैं। अंग्रेजी में कहावत है कि ‘set the target and hit the target’ अर्थात् अपना लक्ष्य निर्धारित करें और वैध डालें। अतः अभ्यर्थी को सर्वप्रथम यह तय कर लेना चाहिए कि उसे अपना कैरियर किस क्षेत्र में बनाना है और एक बार तय हो जाने के बाद उसी के लिए जी-जान से लग जाना चाहिए। वस्तुतः ढुलमुल नीति वाले कुछ भी हासिल नहीं कर पाते हैं। रोज अपना विचार बदलने वाले कहीं के नहीं रहते हैं। एक ही उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपना सारा ध्यान केन्द्रित कर देना ही सफलता की कुंजी है।
एक बार लक्ष्य तय करने के बाद अगला कदम है कि उस परीक्षा के बारे में जानकारी प्राप्त करना। अर्थात् परीक्षा कब होती है, कितने चरणों में परीक्षा होती है, कौनसी पद्धति से होती है, किस प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं क्योंकि अपूर्ण जानकारी अभ्यर्थी के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। परीक्षाएं दो, तीन चरणों का रखने का मकसद है कि उम्मीदवारों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि होना तथा अयोग्य अभ्यर्थियों की छँटनी करना। अधिकतर प्रथम चरण में वस्तुनिष्ठ परीक्षा आयोजित की जाती है जिनमें प्रश्नों के उत्तर सटीक होते हैं अर्थात् परीक्षण में परीक्षक की त्रुटियाँ न के बराबर होती है। अभ्यर्थी के उत्तर का मूल्यांकन एक जैसा ही होगा चाहे उसका मूल्यांकन कोई भी परीक्षक करे।
वस्तुनिष्ठ परीक्षा मात्र तथ्यात्मक ज्ञान, सूचना या जानकारी तक ही सीमित नहीं है बल्कि अपेक्षाकृत उच्च बौद्धिक क्षमता के मापन के लिए किया जाता है। वस्तुतः इस परीक्षाओं का उद्देश्य है कि मानसिक योग्यता के क्षैत्रों में अभ्यर्थी की उपलब्धियों एवं पाठ्यक्रम में उसकी पकड़ का मूल्यांकन किया जा सके। अधिकतर परीक्षाओं में प्रथम चरण में उत्तीर्ण होने वाले अभ्यर्थियों को ही द्वितीय चरण में प्रवेश दिया जाता है इस प्रकार प्रारम्भिक चरण में ही बहुत बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों की छँटनी हो जाती है।

7.परीक्षा की कार्यनीति(Exam strategy) –

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केन्द्रीय व राज्य सेवाओं में पूछे जाने वाले, विशेष रूप से प्रथम चरण में इतने विस्तृत क्षेत्र को सम्मिलित किया जाता है कि इसकी तैयारी बिना सुनिश्चित योजना और कार्यनीति बनाए सफलतापूर्वक की ही नहीं जा सकती। योजना, समय और अध्ययन सामग्री दोनों को लेकर ही बनाना आवश्यक है। जहाँ तक समय की बात है तो इन परीक्षाओं को केवल एक दो वर्ष में तैयारी करके पास करना मुश्किल है। इसलिए डिग्री क्लासेज में पढ़ते समय इनकी तैयारी के लिए थोड़ा समय निर्धारित कर लेना चाहिए। सामान्य जानकारी तथा जनरल नाॅलेज के लिए समाचार पत्र, मासिक पत्रिकाएं तथा आनलाईन कोर्सेज से तैयारी की जा सकती है। ज्यों ही डिग्री क्लासेज समाप्त हो तो अपने लक्ष्य को निर्धारित करके उसकी तैयारी में जुट जाना चाहिए अर्थात् अपने समय को व्यर्थ में नष्ट न करें। यदि समय पर्याप्त है तो आपको विस्तृत व गहराई से तैयारी करनी चाहिए। यानि आपको अपने समय के अनुसार परीक्षा की तैयारी करनी चाहिए। वास्तविकता यह है कि कहने को ये वस्तुनिष्ठ प्रश्न होते हैं परन्तु उन्हें हल करने के लिए अभ्यर्थी को अपनी सम्पूर्ण बौद्धिक क्षमता व तार्किक क्षमता को लगाना पड़ता है। अभ्यर्थी को यह जान लेना चाहिए कि कोई भी परीक्षा आसान नहीं है और किसी में भी शार्टकट मार्ग से सफलता नहीं प्राप्त की जा सकती है। हां यह अवश्य है कि किसी परीक्षा में तार्किक प्रश्नों को महत्त्व दिया जाता है तथा किसी में तथ्यात्मक प्रश्नों को। तथ्यात्मक प्रश्नों की तैयारी करने में भ्रम की सम्भावना बहुत कम होती है। इस दृष्टि से गणित, विज्ञान जैसे विषयों की तैयारी अधिक लाभप्रद होती है अतः गणित व विज्ञान विषयों वाले अभ्यर्थी लाभ की स्थिति में होते हैं। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि कला विषयों वाले अभ्यर्थियों का चयन नहीं हो सकता है। अभ्यर्थियों को यह ठीक से जान लेना चाहिए कि वे अभ्यर्थी ही सिलेक्ट होते हैं जो परीक्षा हेतु कठोर परिश्रम तथा अध्यवसायी होते हैं, चाहे वे अभ्यर्थी किसी विषय से सम्बंधित हो।

8.प्रथम चरण में सफलता या असफलता का प्रभाव(Effect of success or failure in the first phase) –

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प्रथम चरण में जो अभ्यर्थी असफल हो जाते हैं वे निराश हो जाते हैं और अपने आपको उस पद के योग्य नहीं समझते हैं। अभ्यर्थी को चाहिए कि वह अपने प्रथम चरण की तैयारी के दौरान ही अपनी तैयारी को विस्तृत स्वरूप प्रदान करे और विषय को अधिक गहराई से पढ़े। इसका लाभ उसे द्वितीय चरण में होता है। यदि वह अपने प्रथम प्रयास में ही प्रथम चरण में सफल हो जाता है तो अगले चरण की तैयारी में विशेष कठिनाई नहीं होती है और यदि वह उसमें असफल हो जाता है तो अगले प्रयास के लिए उसे विशेष परिश्रम नहीं करना पड़ता है। वैसे भी प्रथम प्रयास में असफल होने पर दुबारा संभलने में कुछ समय लग जाता है और अगले प्रयास के लिए समय भी कम बचता है। अतः अपने प्रथम प्रयास में ही उसे जी जान लगा देना चाहिए।
प्रश्न उठता है कि कि तैयारी के लिए कितना प्रयास करे? यह अभ्यर्थी की बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है। कुछ अभ्यर्थी विषय को शीघ्र समझने और स्मरण कर लेने में सक्षम होते हैं और कुछ अभ्यर्थी मंदगति से। अतः प्रत्येक अभ्यर्थी अपनी क्षमता के अनुसार परिश्रम करें परन्तु यह बात तो तय है कि वे जितना अधिक परिश्रम करेंगे उतना ही अधिक उन्हें लाभ होगा।
अत: अभ्यर्थी को अपने अध्ययन का दायरा विस्तृत बनाना होता है। तैयारी के लिए केवल पुस्तकों पर ही निर्भर नहीं रहें बल्कि समाचार पत्रों, मासिक पत्रिकाओं, प्रतियोगिता से संबंधित मासिक पत्रिकाओं, सरकारी रिपोर्टों, आनलाईन नोट्स, वीडियो, गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा जारी रिपोर्टो से जानकारियां एकत्रित करनी चाहिए। एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि साधारण से प्रश्न भी इतना घुमा फिराकर पूछे जाते हैं कि अभ्यर्थी धोखा खा जाते हैं।

9.सामान्य अध्ययन की तैयारी(Preparation of General Knowledge)-

सामान्य अध्ययन की तैयारी यो तों विद्यार्थी काल से ही प्रारम्भ कर देनी चाहिए जिससे अन्य विषयों की तैयारी करने हेतु अभ्यर्थी को पर्याप्त समय मिल जाता है तथा गणित व विज्ञान पृष्ठभूमि वाले अभ्यर्थी को कठिनाई का सामना न करना पड़े।
सामान्य अध्ययन के लिए एन. सी. ई. आर. टी. (NCERT) एवं एन. बी. टी. (NBT) की पुस्तकें विशेषरूप से सहायक हो सकती है क्योंकि एक तो ये पुस्तकें विषय की सटीक एवं गूढ़ जानकारियां सरल रूप में प्रस्तुत करती है और प्राय:विषय के जानकार विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों द्वारा लिखी हुई होती है। इसके अलावा यूनीक सामान्य अध्ययन (इलाहाबाद पब्लिकेशन), समाचार पत्रों में राष्ट्रीय समाचार पत्र – नवभारत टाईम्स व राज्य स्तर पर दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका मुख्य है अंग्रेजी में द टाइम्स ऑफ इंडिया उल्लेखनीय है। कुछ समाचार पत्रिकाएं’इंडिया टुडे’ योजना” कुरुक्षेत्र ” विज्ञान प्रगति ‘आदि विविधतापूर्ण जानकारियों से भरे होते हैं।
यहां पुस्तकों की सूचना देना का हमारा यह तात्पर्य नहीं है कि किताबी कीड़ा बन जाएं। इससे बचने का तरीका है कि आनलाईन न्यूज सुन सकते हैं, टीवी चैनल पर न्यूज देख सकते हैं। अर्थात् इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जानकारियां जुटा सकते हैं।
टीवी पर डिबेट प्रतियोगिता होती है परन्तु वे कार्यक्रम ही देखें जो गुणवत्तापूर्ण हैं। कुछ न्यूज चैनल ही रोचक व जानकारी से परिपूर्ण होते हैं। इनकी सहायता से एक ओर मनोरंजन तो होगा ही, जानकारी भी प्राप्त होगी और अभ्यर्थी को दिमाग पर जोर डाले बिना ही जानका प्राप्त हो जाएगी।

10.वैकल्पिक विषय की तैयारी(Optional subject preparation) –

वैकल्पिक विषय की तैयारी कुछ भिन्न प्रकार की होती है। यद्यपि अधिकांश वैकल्पिक विषयों पर बाजार में अंग्रेजी व हिन्दी में स्तरीय पुस्तकें उपलब्ध है परन्तु कुछ टाॅपिक नहीं मिले तो आनलाईन कुछ स्तरीय साइट्स व यूट्यूब चैनल से इस प्रकार की सामग्री के अभाव को दूर किया जा सकता है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अंधाधुंध पुस्तकें खरीदकर सभी को पढ़ना किसी भी दृष्टि से लाभदायक नहीं होता। अभ्यर्थी को स्तरीय पुस्तकों का चयन करके उनका गहन अध्ययन करना चाहिए। अधिक पुस्तकें पढ़ने से भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। प्रत्येक पुस्तक को सर्वप्रथम कम से कम दो बार अवश्य पढ़ना चाहिए। हो सकता है कि पहली बार पढ़ते समय पुस्तक की अनेक बातें समझ में न आएं। इसकी चिन्ता न करते हुए आगे पढ़ना जारी रखना चाहिए जब दुबारा उस पुस्तक को अभ्यर्थी पढ़ता है तो वह उसे आसानी से समझने में सफल हो जाएगा। इसके बावजूद कुछ बातें स्पष्ट न होती हो तो उस अध्याय विशेष को पुनः पढ़ना चाहिए या किसी योग्य अभ्यर्थी अथवा कोचिंग की सहायता लेनी चाहिए। दूसरी बार पढ़ते समय पुस्तक की मुख्य बातों को नोटबुक में नोट भी करते जाना चाहिए। जब इस प्रकार की पुस्तकें पढ़ ली जाए तथा आनलाईन साइट्स से सामग्री तैयार कर ली जाए तो अभ्यर्थी को चाहिए कि पिछले वर्षों के प्रश्न-पत्र को हल करना चाहिए अथवा आनलाईन माॅकटेस्ट का अभ्यास करना चाहिए।
ध्यान रहे कि इन परीक्षाओं में रटन्त विद्या काम में नहीं आती है बल्कि विषय की समझ उत्पन्न करके याद करना अधिक लाभदायक होता है। वस्तुतः इन परीक्षाओं के द्वारा आपकी जानकारी के साथ-साथ आपकी तर्कक्षमता और प्रत्युत्पन्नमति की जांच भी करते हैं अतः विषय पर पकड़ अच्छी होनी चाहिए और एक ही विषयवस्तु को विभिन्न कोणों से अध्ययन करना चाहिए।

11.अध्ययन हेतु समय अवधि (Time period for study) —

उपर्युक्त विश्लेषण से एक बात तो स्पष्ट है कि इन सेवाओं में चयनित होने के लिए इसकी तैयारी में बहुत अधिक समय खपाना पड़ता है। अतः हर एक अभ्यर्थी सोचता है कि उसे कितने घंटे रोज पढ़ना चाहिए? इस प्रश्न का  सटीक उत्तर देना तो सम्भव नहीं है, फिर भी इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि परीक्षा की तैयारी के दौरान किसी प्रकार भी समय की थोड़ी – सी बर्बादी नहीं होनी चाहिए। अभ्यर्थी यदि मनोरंजन के मूड में भी हो तो उस समय भी उसे कुछ न कुछ ग्रहण करने का इच्छुक होना चाहिए। अर्थात् सदैव खोजी प्रवृत्ति का बना रहना चाहिए। उदाहरणार्थ यदि वह फिल्म देख रहा हो सिर्फ फिल्म की कहानी या अभिनय पर ही ध्यान न दे बल्कि फिल्म निर्माता, निर्देशक, संगीत निर्देशक आदि के विषय में भी जानने की कोशिश करे और यदि वह फिल्म पुरस्कृत हो, तो इन बातों पर और अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
जहाँ तक पढ़ने के लिए समय अवधि के निर्धारण का प्रश्न है तो यह अभ्यर्थी की निजी क्षमता पर भी काफी हद तक निर्भर करता है। यदि देखा जाए तो कम से कम 10 से 12 घंटे तो नियमित रूप से पढ़ना चाहिए तभी उसकी तैयारी पूर्ण हो पाएगी। इसके बावजूद भी अनेक चीजें छूटी रह जाती है जिन्हें यथा संभव खाली समय में देखने की कोशिश करनी चाहिए।

12.परीक्षा के दिन के लिए निर्देश(Instructions for exam day) –

परीक्षा के दिन अभ्यर्थी के लिए काफी तनावपूर्ण होता है। ऐसे में थोड़ी सी भी लापरवाही उनकी समस्याओं और तनाव को कई गुना बढ़ा सकती है। अभ्यर्थी को परीक्षा अधिक हल्के ‘मूड’ में देनी चाहिए।

(1.)परीक्षा के समय से पूर्व पहुँचे(Arrive before exam time) –

अभ्यर्थी को परीक्षा केन्द्र पर निश्चित समय से काफी पहले पहुंच जाना चाहिए। परीक्षा स्थल पर पहुँचने की तैयारी करते समय परीक्षा केन्द्र ढूँढने की परेशानी, यातायात अवरोध से विलम्ब, सवारी ढूँढने की परेशानी आदि का ध्यान रखना चाहिए। प्रत्येक अभ्यर्थी यह सोचकर प्रस्थान करे कि परीक्षा शुरू होने से 30 मिनट पहले परीक्षा भवन में पहुंच जाए।

(2.)अभ्यर्थी को साथ क्या ले जाना है?(What does the candidate have to take along?) –

अभ्यर्थी को परीक्षा भवन में प्रवेश पत्र, पैन, पेन्सिल, शार्पनर, रबड़ (बेकार के निशान मिटाने के लिए) तथा घड़ी साथ ले जानी है। अन्य कोई भी वस्तु अपने साथ न ले जाए। आप अपने साथ कोई पुस्तक, शब्द कोष, पैमाना, उपकरण, कैलकुलेटर, मोबाइल फोन,कागज का टुकड़ा साथ नहीं ले जाना है क्योंकि उनको साथ ले जाने की सामान्यतः कोई अनुमति नहीं होती है। प्रश्न पत्र में कोई अंश या प्रश्न त्रुटिपूर्ण लगे तो उनके बारे में उस परीक्षा को आयोजित करने वाले विभाग के सचिव को लिखना चाहिए। सामान्यतः परीक्षाएं राज्य लोक सेवा आयोग या संघ लोक सेवा आयोग द्वारा ली जाती है अतः उनके अध्यक्ष को पत्र लिखना चाहिए। अच्छा हो कि निरीक्षक या पर्यवेक्षक को ही परीक्षा भवन में लिखकर दे दें अन्यथा परीक्षा समाप्ति के बाद भी ऐसा कर सकते हैं। समय सीमा का ध्यान रखें। निर्धारित समय में अपना प्रश्न-पत्र हल करके दे दें।

13.परीक्षा भवन में रखी  जानेवाली सावधानियां(Precautions to be kept in the examination hall )-

परीक्षा भवन में प्रवेश से पूर्व अनेक अभ्यर्थियों के हाथ-पांव फूल जाते हैं और कई तो अपना संतुलन भी खो बैठते। इस प्रवृत्ति से यथासंभव बचना चाहिए क्योंकि यह घबराहट अभ्यर्थी को सारी पिछली तैयारियों को बेकार कर सकती है। अतः अभ्यर्थी को एकाग्रचित होकर अपनी पूर्व की तैयारियों पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। साथ ही अंतिम क्षणों में किसी विषय को जल्दबाजी में देखने की प्रवृत्ति से भी बचना चाहिए क्योंकि यह अनावश्यक भ्रम उत्पन्न करता है। अभ्यर्थी को परीक्षा प्रारम्भ होने के 15-20 मिनट पूर्व परीक्षा भवन में प्रवेश करके अपना स्थान ग्रहण कर लेना चाहिए और अपनी कलम, पेंसिल, रबड़ और प्रवेश पत्र आदि की जाँच कर लेनी चाहिए। उत्तर-पत्रक मिल जाने पर उस पर निर्दिष्ट स्थान पर अपना अनुक्रमांक, विषय क्रमांक आदि भर लेना चाहिए।
प्रश्न-पत्र मिलने के पश्चात सरसरी तौर से प्रश्नों के प्रकार पर दो-तीन मिनट में एक दृष्टि डाल लेना लाभदायक होगा। परन्तु ध्यान रहे कि प्रथम चरण परीक्षा के प्रश्नों के उत्तर की तरह द्वितीय चरण परीक्षा के प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए जा सकते, जिसमें सर्वप्रथम सभी प्रश्नों को एक बार ध्यान से पढ़ा जाता है और फिर सबसे अच्छी तरह ज्ञात प्रश्न के उत्तर सर्वप्रथम लिखे जाते हैं। प्रथम चरण की परीक्षा में तो समय इतना कम होता है कि कभी-कभी तो प्रश्नों के दुबारा देखने की भी फुर्सत नहीं मिल पाती है। उत्तर देने के लिए सबसे पहले प्रत्येक प्रश्न को ध्यान से पढ़ें और उसका सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर उसी समय उत्तर पत्रक पर अंकित कर दें। यदि उस प्रश्न का सही-सही उत्तर न आता हो तो अभ्यर्थियों को चाहिए कि वे प्रश्न के चारों विकल्पों में सर्वोपयुक्त प्रतीत होने वाले विकल्प को चुनकर उत्तर-पत्रक में निशान लगा दे तथा अपने प्रश्न-पत्र के सामने एक लघु निशान बना दें और सभी प्रश्न हल कर लेने के पश्चात अन्त में शेष समय में उस पर पुनर्विचार कर लें। ऐसा करने से प्रश्नों के छूटने का भय नहीं होता। उल्लेखनीय है कि उत्तर पत्रक पर निशान पेन्सिल से लगाए जाते हैं, अतः बाद में अपने उत्तर को बदलने के लिए उसे रबड़ से मिटाकर सही उत्तर पर निशान लगाने में अभ्यर्थी को कोई विशेष कठिनाई भी नहीं होती है।

टीवी पर डिबेट प्रतियोगिता होती है परन्तु वे कार्यक्रम ही देखें जो गुणवत्तापूर्ण हैं। कुछ न्यूज चैनल ही रोचक व जानकारी से परिपूर्ण होते हैं। इनकी सहायता से एक ओर मनोरंजन तो होगा ही, जानकारी भी प्राप्त होगी और अभ्यर्थी को दिमाग पर जोर डाले बिना ही जानकारी  प्राप्त हो जाएगी।

14. प्रश्नों के उत्तर देते समय सावधानियां(Precautions while answering questions ) –

(1.)प्रश्नों को ध्यान से पढ़ना चाहिए।
(2.)प्रश्नों की भाषा पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि उसका गलत अर्थ निकालने पर उत्तर भी गलत हो जाते हैं।
(3.)यदि प्रश्न समझ में न आए तो उसे एक या दो बार ओर पढ़ना चाहिए यदि इसके बावजूद प्रश्न समझ में न आए तो उससे अधिक समय तक झूझते नहीं रहना चाहिए बल्कि जो उत्तर सर्वाधिक उपयुक्त लगे, उस पर निशान लगाकर अगले प्रश्न पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
(4.)प्रायः कई प्रश्न ऐसे होते हैं जिनके उत्तर एक ही बार में दिमाग में उभरकर आ जाते हैं परन्तु बाद में ओर अधिक सोचने-विचारने पर अन्य विकल्प भी सही लगने लगते हैं। ऐसे प्रश्नों के विषय में अनुभव यही कहता है कि दिमाग में प्रथम दृष्टया उभरने वाला उत्तर ही अधिक सही होता है।
(5.)विकल्प को देखते ही उत्तर-पत्रक पर निशान नहीं लगा देना चाहिए बल्कि अन्य विकल्पों पर भी दृष्टि कर लेना चाहिए क्योंकि अक्सर ऐसा होता है कि प्रश्न के अन्य उत्तर भी सही होते हैं और उनमें से सर्वाधिक सही उत्तर का चयन करना होता है।
(6.)प्रश्न-पत्र में कभी-कभी ऐसा भी होता है कि शुरू के प्रश्नों को अभ्यर्थी हल करने में असमर्थ होता है। ऐसी स्थिति में उसे निराश नहीं होना चाहिए। हो सकता है कि आगे के प्रश्नों के उत्तर वह जानता हो।
(7.)किसी भी प्रश्न पर अधिक समय व्यय करना घातक होता है। समय सीमा को ध्यान में रखकर ही चलना चाहिए। होना तो यह चाहिए कि अभ्यर्थी द्वारा प्रति प्रश्न उपलब्ध समयावधि से कम समय में प्रत्येक प्रश्न को हल कर लिया जाए ताकि अन्त में उनमें से कुछ को दोहराया जा सके।
(8.)अभ्यर्थी जिन प्रश्नों के उत्तर बिल्कुल नहीं जानता, उनका उत्तर देने के लिए उसे अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए और जो भी विकल्प अच्छा लगे, उस पर निशान लगा देना चाहिए क्योंकि इससे आपको अंक न भी मिले तो कोई विशेष हानि नहीं होगी। ध्यान रहे कि ऋणात्मक अंक का प्रावधान नहीं देने का कोई प्रावधान हो उसी में यह युक्ति लाभदायक है।
(9.)अन्त में किसी भी प्रश्न का उत्तर खाली नहीं छोड़ना चाहिए बल्कि कुछ न कुछ अंदाज से उत्तर दे देने चाहिए क्योंकि कभी-कभी तुक्के से भी सही उत्तर पर निशान लग जाता है और अभ्यर्थी को अंक मिल जाता है। यह तरीका ऋणात्मक अंक न देने वाले Examination में ही उपयुक्त है।

15.वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को हल करने की विधि (Method of solving objective type questions)-

यद्यपि अभ्यर्थी अपनी सुविधा के अनुसार अपने-अपने तरीके से प्रश्नों को हल करते हैं परन्तु कुछ कठिन प्रश्नों पर सभी को परेशानी हो जाती है। ऐसे कठिन प्रश्नों को हल करने के कुछ तरीकों का यहाँ उल्लेख किया जा रहा है।
जिन प्रश्नों के चारों उत्तर सही लग रहे हों, उनके उत्तर ढूँढने के लिए ऋणात्मक विधि अपनानी चाहिए अर्थात् सबसे पहले उस विकल्प को ढूँढे जो किसी भी दृष्टि से उस प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकता है। तत्पश्चात् क्रमशः कम गलत विकल्पों को ढूँढते जाएं। अन्त में जो विकल्प शेष बचे, उसे ही प्रश्न का सही उत्तर समझें।
उदाहरण – स्थानान्तरी कृषि का सबसे अधिक प्रचलन कहाँ है?
(क) वनों में (ख) घास क्षेत्रों में (ग) रेगिस्तान में (घ) मैदानी क्षेत्रों में
उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर आसानी से नहीं सूझ रहा हो तो ऋणात्मक विधि से इसे हल करना अधिक आसान होगा। चारों विकल्पों को बारी-बारी से देखने पर प्रतीत होता है कि घास क्षेत्र सर्वाधिक गलत उत्तर है क्योंकि घास क्षेत्र विश्व के सर्वोत्तम कृषि क्षेत्रों में से एक है अतः वहां स्थान परिवर्तन करके खेती करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा। इसके बाद मैदानी क्षेत्र पर नजर डालें तो वह भी एक गलत उत्तर होगा क्योंकि लगभग सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र उपजाऊ होता है। तत्पश्चात् मरुस्थल क्षेत्र पर दृष्टिपात करें तो वहाँ कृषि कार्य सम्भव ही नहीं है, अतः वह विकल्प भी गलत होगा। अन्त में वन क्षेत्र शेष बचता है जहाँ स्थानांतरित कृषि संभव दिखाई देती है क्योंकि कृषक वनों को काटकर खेती करता है और भूमि की उर्वरता समाप्त हो जाने पर किसी अन्य स्थान के वनों की सफाई कर डालता है। इस प्रकार इस प्रश्न का उत्तर (क) है।
सुमेलित करने वाले प्रश्नों को हल करने की विधि कुछ विशिष्ट प्रकार की है। यदि अभ्यर्थी प्रश्न के किसी भी एक तथ्य का उत्तर जानता हो तो उसके अनुसार अन्य तथ्यों के सही युग्म ढूँढे जा सकते हैं। इसके लिए ज्ञात युग्म को पहले मिला लें और फिर उत्तर के चार विकल्पों में प्रत्येक का बारी-बारी से परीक्षण करे। ऐसा करने से सम्भव है कि अन्य तथ्यों के भी सही युग्म प्राप्त हो जाए।
कथन-कारण पद्धति पर आधारित प्रश्नों का उत्तर ढूँढने के लिए तर्कक्षमता की आवश्यकता होती है। ऐसे प्रश्नों में सर्वप्रथम कथन तथा कारण की बारी-बारी से सत्यता की जाँच करनी चाहिए। यदि वह कारण और प्रश्न में दिया हुआ कारण – दोनों समान हों तो उत्तर (क) होगा अर्थात् कारण – कथन की सही-सही व्याख्या करता है और यदि दोनों में विभिन्नता हो तो उत्तर (ख) होगा अर्थात् कारण कथन की सही-सही व्याख्या नहीं करता है।
इसी प्रकार अन्य प्रकार के प्रश्नों को हल करने में भी ऐसी विधियों का सहारा लिया जा सकता है।
उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह तो नहीं कहा जा सकता कि अभ्यर्थी निश्चित रूप से सफल हो ही जाएगा क्योंकि सफलता अन्य कई बातों के सम्मिलित प्रभाव से ही मिलती है परन्तु इतना तो सत्य है कि अभ्यर्थी इन मार्गदर्शी बिन्दुओं का अनुसरण करके सरकारी व गैरसरकारी सेवाओं तक जानेवाले मार्ग की बाधाओं को काफी सीमा तक पार कर लेगा और उसे कम परिश्रम में अधिक हासिल हो जाएगा।
अंत में एक महत्त्वपूर्ण सुझाव! अभ्यर्थी को प्रथम चरण देने के उपरान्त आराम न करने लगे बल्कि उन्हें द्वितीय चरण की कार्यनीति तैयार करके उसकी तैयारी में लग जाना चाहिए क्योंकि प्रथम चरण का परिणाम आने के पश्चात द्वितीय चरण परीक्षा के लिए कुछ समय ही शेष बचता है जो द्वितीय चरण परीक्षा की तैयारी के लिए अपर्याप्त होता है अतः प्रारम्भ से ही अभ्यर्थी को उसकी तैयारी करते रहना चाहिए। वास्तव में अंतिम रूप से चयनित अभ्यर्थियों की सूची में जब तक अभ्यर्थी का नाम नहीं जुड़ जाता, तब तक उसे सदैव परिश्रमी, अध्यवसायी और सजग बने रहना चाहिए। यही सफलता की कुंजी है। 

उपर्युक्त प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के टिप्स (Preparation Tips for Competition Examination) के आधार पर आप किसी भी काम्पीटिशन की तैयारी कर सकते हैं जैसे UPSC,PSC,BANK P.O., इत्यादि।
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