8 Techniques to Firm WillPower
1.इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाने की 8 तकनीक (8 Techniques to Firm WillPower),इच्छाशक्ति को दृढ़ कैसे बनाएँ? (How to Resolute WillPower?):
- इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाने की 8 तकनीक (8 Techniques to Firm WillPower) के आधार पर इच्छाशक्ति को दृढ़ करने की तकनीक जानेंगे और यह भी जानेंगे की इच्छाशक्ति को दृढ़ क्यों बनाना जरूरी है?
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2.दृढ़ इच्छाशक्ति से ही सफलता (Success only through strong will):
- जीवन में सफलता बिना संघर्ष के नहीं मिलती।अतः विपत्तियों का सहर्ष स्वागत करो।अपने पराक्रम से उन पर विजय प्राप्त करो यही श्रेयस्कर है।विपदाओं से भयभीत होकर जो भागते हैं निराशा उनके जीवन में सदा के लिए अपना घर बना लेती है।ऐसी दशा में बुराई उत्पन्न करने वाली शक्तियां और भी अधिक तेज हो जाती है,तथा हमारी मानसिक दशा में बेचैनी उत्पन्न कर देती है।वास्तव में जीवन की सफलता,यश एवं गौरव की प्राप्ति संघर्षपूर्ण जीवन में ही निहित रहती है।जीवन विपत्तियों का आना स्वाभाविक है,परंतु वही वीर है जो उन्हें हंस-हंसकर झेलता है-तब उसकी पराक्रमी शक्तियाँ एवं पवित्र विचार बलवती होकर उसे सभी प्रकार की सहायता करते हैं।
- संसार में जब जन्म लिया है तो विपत्तियों,कठिनाइयां,आएंगी ही।उनसे दूर भागना उचित नहीं।जो विपदाओं से भयभीत होने वाले होते हैं-उन्हें कायर पुरुष के रूप में संबोधित किया जाता है।ऐसे मनुष्यों का जीवन ही व्यर्थ है।।वे अपने जीवन में कोई सफलता प्राप्त नहीं कर सकते।जीवन में उन्हें उन्नति करने के लिए संघर्ष का स्वागत करना आवश्यक है।उनका निर्भय होकर सामना करो।ऐसा करने से अनेक सद्प्रवृत्तियाँ प्रोत्साहित होकर सफलता और सहायता प्रदान कर सकेंगी।जीवन में संघर्ष जब टाले नहीं जा सकते तो उनका डटकर मुकाबला करना ही श्रेष्ठ है।
- मनुष्य में जब साहस की भावना और पुरुषार्थ की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है-तो इन गुणों के साथ अनेक सहयोगी गुण स्वतः ही आ जाते हैं।इन गुणों के माध्यम से सारे कार्यों को सफलतापूर्वक किया जा सकता है।जीवन में कार्य कठिन और सरल सभी प्रकार के होते हैं तथा विपत्तियों का आना भी स्वाभाविक है।वह कार्य भी क्या जिसमें अड़चनें न हों।परंतु कभी भी इन अड़चनों और बाधाओं से डरना नहीं चाहिए।अपने जीवन को उत्साह से भरकर इस आशावादी भावना के साथ कि सफलता अवश्य मिलेगी,कार्य में जुटे रहने के अवश्य ही यशस्वी परिणाम निकलते हैं।यह साहसी व्यक्ति का परिचय है।परंतु पुरुषार्थी व्यक्ति के अपने निर्धारित लक्ष्य के प्रति दृढ़ संकल्प का होना भी जरूरी है।
- जो निश्चय पर अटल है-उसके समक्ष कठिनाइयाँ स्वयं नतमस्तक हो जाती है।वह अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के विपरीत परिस्थितियों में भी मार्ग निकाल लेता है और जीवन में सफलता प्राप्त करता है।इस प्रकार जीवन में सफलता बिना परिश्रम के नहीं मिलती।प्रत्येक कार्य परिश्रम करके ही पूर्ण किया जा सकता है।यदि कोई केवल योजनाएं बनाते रहें,इच्छाएं ही करता रहे तो इससे कार्य अथवा उद्देश्य कैसे पूर्ण हो सकेगा।योजनाओं व विचारों को जब परिश्रम करके क्रियान्वित किया जाएगा-तभी वास्तविक कठिनाइयों का पता चलेगा और सफलता मिलेगी।
3.लक्ष्य प्राप्ति के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति जरूरी (Strong will is necessary):
- मृग स्वयं शेर के मुंह के पास जाकर उसके भोजन के लिए प्रस्तुत नहीं होता है,वरन् वह तो शेर का पराक्रम है कि अपनी क्षुधा को शांत करने हेतु अपने बल मृग को मारकर भोजन करता है।लक्ष्मी अर्थात् धन एवं यश भी संसार में उसे ही प्राप्त होता है-जो अथक परिश्रम करता है,जो लगनशील है।यह धारणाएं गलत हैं कि भाग्यवादी ही लक्ष्मी को प्राप्त कर सकते हैं।वास्तव में यह कथन कायरों का है।वे परिश्रम न करके भाग्य के भरोसे ही लक्ष्मी को प्राप्त करना चाहते हैं तथा अपने भाग्य की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।
- जीवन में अपने निर्धारित लक्ष्य की सफलता के लिए पुरुषार्थ ही विशेष गुण है।भाग्यवादी बनने से कोई कार्य पूर्ण नहीं हो सकता।भाग्यवती आलसी व्यक्ति केवल अपने भाग्य के भरोसे ही जीवन व्यतीत कर बैठता है,जबकि बिना प्रयास कोई कार्य संभव नहीं।पुरुषार्थी मनुष्य की विशेषता यही होती है कि वह भाग्य आदि बातों पर भरोसा नहीं करता।उद्यम ही उसके लिए प्रमुख है।यदि कहीं कठिनाई और असफलता मिलती है तो वह अपने परिश्रम को ही दोष देता है।अन्य किसी को असफलता के लिए वह दोषी नहीं मानता।यह विचार का ढंग श्रेष्ठ और निर्णायात्मक है।पुरुषार्थी सदैव अपने पराक्रम,अपनी बुद्धि और बल से ही सफलता प्राप्त करना चाहता है तथा प्राप्त न होने की दशा में अपनी दुर्बलताओं को दूर कर अपनी क्षमताओं को बढ़ाने में विश्वास रखता है।इन्हीं विशेषताओं के द्वारा वह विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बना लेता है।
- जो मनुष्य सदैव निराशावादी भावना ही लेकर चलता है,वह खाता पीता तो है किंतु उसमें जीवन के तत्त्व दिखाई नहीं देते।वह दुःखी,निर्बल एवं निरीह होकर जीवन बिताता है।उसका उद्यम और साहस नाम से कोई संबंध नहीं रहता।ऐसे मनुष्यों की जिंदगी इस संसार में अत्यंत दुःखी और विचारणीय होती है।अतः जीवन में कभी निराश मत हो।सदैव आशा व उत्साह से प्रेरणा लेते रहो।अपने मन में कभी दुर्बलता के भाव ग्रहण मत करो।असफलता मिलने पर भी सदा सफलता के लिए प्रयास करते रहो।सफलता का सबसे बड़ा रहस्य आशावादी जीवन है।जब यह विश्वास मन में रहता है कि यह कार्य अवश्य सफल होगा,अपने उद्देश्य को जीवन में निश्चित ही प्राप्त कर सकूंगा-तब तक वह बराबर प्रयास में लगा रहता है।ऐसा ही जीवन उत्साही और आशावादी माना जाता है।
- पुरुषार्थ और साहसी मनुष्य में अनेक गुणों का होना स्वाभाविक होता है।उन्हें अपने मन पर पूर्ण विश्वास होता है कि अम्मुख कार्य श्रेष्ठ है और उसमें सफलता निश्चित मिलेगी।इसी विश्वास के साथ ही अपने लक्ष्य के प्रति श्रद्धाभाव तथा अनवरत रूप से कार्य में लगे रहने का विचार उसमें पाया जाता है।यह बात स्वाभाविक है कि किसी लक्ष्य के मार्ग में कभी-कभी छोटी-मोटी असफलताएँ आ जाती है और वे निराशा उत्पन्न कर सकती हैं।परंतु ऐसे उत्साही आत्मविश्वासी व्यक्तियों का मन असफलताओं से अनुप्राणित हो अधिक परिश्रम की ओर उन्मुख हो जाता है।वास्तव में ऐसे मनुष्य में निष्ठा जिसे दूसरे शब्दों में लक्ष्य के प्रति अटूट विश्वास कह सकते हैं,पाया जाता है।जिससे वे अनवरत कर्मशील और आशावादी बने रहते हैं।यदि विपत्तियां और कठिनाइयां मार्ग को अवरुद्ध न बनावें-तो साहस और पुरुषार्थ की परीक्षा नहीं हो सकती।इससे संघर्ष करके मनुष्य को अनोखी शक्ति प्राप्त हो जाती है।यह शक्ति लक्ष्य की प्राप्ति में सहयोग प्रदान करती है।
4.निश्चित लक्ष्य जरूरी (Definite goals are needed):
- जिस व्यक्ति के समक्ष कोई निश्चित उद्देश्य है और उसने अपनी संपूर्ण शक्तियों को उसकी सफलता हेतु केंद्रित कर लिया है-तो उसे यह मानकर चलना चाहिए कि लक्ष्य के मार्ग में विपत्तियां आएंगी,अतएव उसे उनका स्वागत करना चाहिए।बाधाएँ ऐसे मनुष्य को प्रेरणा प्रदान करती है तथा वे अधिक शक्ति और कार्य दक्षता से जुट जाते हैं।लक्ष्य का पूर्ण होना-एक पवित्र कार्य मानकर चलना प्रेरणा के लिए आवश्यक है।वह जीवन ही क्या जिसने अपने लक्ष्य की पूर्ति नहीं की।जीवन की दिशा निश्चित हो जाने पर जुट जाना एक महान पावन कर्त्तव्य है।जीवन की सफलता के लिए जिन कार्यों को टाला नहीं जा सकता-उन्हें पूरा करना आवश्यक है।हँसते हुए कष्टों को झेलना,विपत्तियों का स्वागत करना तथा अपने मार्ग पर अडिग रहना-यही भाव कर्त्तव्य के प्रति अटल श्रद्धा उत्पन्न करते हैं।साहसी और पुरुषार्थी को इसी प्रकार लक्ष्य की प्राप्ति हेतु कार्यों को कर्त्तव्य मानकर चलना चाहिए।
5.कामनाओं को नियंत्रित एवं मर्यादित रखें (Control and limit desires):
- शिथिल एवं अधूरी कामनाएं भी अशांति का एक कारण होती है।शिथिल कामना वाला व्यक्ति थोड़ा-सा प्रयत्न करके बड़ी उपलब्धि चाहने लगता है और जब उसको नहीं पा सकता तो समाज अथवा परिस्थितियों को दोष देकर जीवन भर असफलता के साथ बँधा रहता है।
- अपनी स्थिति के परे की कामनाएं करना,अपने को एक बड़ा दंड देने के बराबर है।मोटा-सा सिद्धांत है कि “अपनी शक्ति के बाहर की गई कामनाएं कभी पूर्ण नहीं हो सकतीं और अपूर्ण कामनाएँ हृदय में कांटे की तरह चुभा करती हैं।” मनुष्य को अपने अनुरूप,अपने साधनों और शक्तियों के अनुसार ही कामना करते हुए अपने पूरे पुरुषार्थ को उस पर लगा देना चाहिए।इस प्रकार एक सिद्धि के बाद दूसरी सिद्धि के लिए पूर्ण सिद्धि और उपलब्धियों का समावेश कर आगे प्रयत्न करते रहना चाहिए।इस प्रकार एक दिन वह कोई बड़ी कामना की पूर्ति कर लेगा।
- निःसंदेह कामनाएं मनुष्य का स्वभाव ही नहीं आवश्यकता भी हैं,नियंत्रण,दृढ़ और प्रयत्नपूर्ण होना भी वांछनीय है।तभी यह जीवन में अपनी पूर्ति के साथ सुख-शांति का अनुभव दे सकती हैं अन्यथा अनियंत्रित एवं अनुपयुक्त कामनाओं से बड़ा शत्रु मानव जीवन की सुख-शांति के लिए कोई दूसरा नहीं है।
- जो छात्र-छात्राएँ परीक्षा से निवृत्त हो चुके,उन्हें नये सत्र की शुरुआत अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करने के लिए योग को अपने जीवन में शामिल करना चाहिए।योग से न केवल आप फिट रहते हैं बल्कि इससे याददाश बढ़ती है और एकाग्रता सधती है।
6.विद्यार्थी अच्छी इच्छाएं करें (Students wish good luck):
- न अनंत कामनाएं पूरी होती हैं और नहीं बुरी कामनाएँ पूरी होती हैं।छात्र-छात्राओं को अपनी इच्छाओं को एक कागज पर लिख लेना चाहिए।फिर उसमें से छँटनी करनी चाहिए कि उनमें से कौन-सी कामना या इच्छा की पूर्ति करनी चाहिए।जिस इच्छा को पूरी करने के लिए दिल की आवाज निकलती है,जिसे करने में दिल प्रसन्न होता है,उस कामना या इच्छा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाइए।इच्छा अपनी शक्ति,सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार होनी चाहिए।अच्छी इच्छाएं तो अनेक होती है परंतु सभी इच्छाओं को हर कोई विद्यार्थी पूरी नहीं कर सकता है।धीरे-धीरे अपनी सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार इच्छा को लक्ष्य बनाकर पुरुषार्थ करें और उसको प्राप्त करें।छोटी-छोटी इच्छाएं (लक्ष्य) अपनी सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार पूरी करने पर आत्मिबल बढ़ता है।फिर धीरे-धीरे बड़ी इच्छाओं को अपना लक्ष्य बनाइए और उन्हें पूरी करने का पुरुषार्थ करें।संकल्प शक्ति,पुरुषार्थ और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर ही इच्छाएं और जीवन का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।
- अनंत कामनाएं,अनंत इच्छाएँ मन में उठती हैं परंतु किसी भी विद्यार्थी या व्यक्ति की अनंत कामनाएं,अनंत इच्छाएं पूरी नहीं होती है।
जब विद्यार्थी की किसी इच्छा के पीछे पूर्ण पुरुषार्थ होता है और अपना लक्ष्य बना लेता है तथा अपनी दिल की आवाज के अनुसार इच्छा को अपना लक्ष्य तय करता है तभी दृढ़ इच्छाशक्ति का रूप लेती है।इच्छा के पीछे आत्मिक शक्ति कार्य नहीं करती है,संकल्प शक्ति नहीं होती है और न ही पुरुषार्थ होता है तो ऐसी इच्छाएं अपनी मौत मर जाती है। - जिस इच्छा के पीछे आत्मिक शक्ति और पुरुषार्थ नहीं होता है वह एक मनोकामना होती है और मनोकामना तो एक भावावेश होता है और मन में ही उठती है और थोड़ी-सी समस्या सामने आते ही हाथ-पांव फूल जाते हैं।ऐसी मनोकामना के पीछे न दूरदर्शी विवेकशीलता का समावेश होता है और ना समुचित तैयारी वाली परिकल्पना एवं साधन संपन्नता का।प्रतिरोधों का चिंतन भी समय रहते नहीं किया जाता है।ऐसी मनोकामनाएं पूरी नहीं होती है और विद्यार्थी असफल हो जाता है और असफलता का ठीकरा दूसरों पर फोड़ता है।उसने मेरी मदद नहीं की,परीक्षा प्रश्न-पत्र कठिन था,शिक्षण संस्थानों में अध्यापकों ने ठीक से नहीं पढ़ाया आदि आदि।इस प्रकार के विद्यार्थी जिस इच्छा,उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ते हैं उसी में असफल हो जाते हैं।जब असफलता का ताँता लग जाता है तो मन निराशा,हताशा,अनुत्साह,द्वेष,ईर्ष्या आदि से भर जाता है।ऐसा विद्यार्थी जैसे-तैसे अपना जीवन गुजारता है।
7.इच्छाओं का त्याग कीजिए (It is necessary to renounce desires):
- स्वार्थपरता का अनिवार्य परिणाम असंतोष और निराशा है,क्योंकि इच्छाओं का कोई अंत नहीं है।इसलिए सुख की समस्या का एकमात्र उपाय इच्छा-त्याग है।बाहरी दमन के द्वारा इच्छाओं पर पूर्ण विजय प्राप्त नहीं की जा सकती वे केवल ज्ञान के द्वारा ही जड़ से मिटाई जा सकती हैं।यदि तुम विचारों की गहराई में डूबो और थोड़ी गंभीरता पूर्वक विचार करो,तो तुम्हें इच्छाओं का खोखलापन मालूम हो जाएगा।सोचो कि इतने वर्षों में तुमने कितना सुख मिला तथा कितना दुःख मिला।जीवन में तुम्हें जो भोग किया,वह आज शून्य के बराबर है और जीवन में तुम्हें जो कष्ट मिला,वह भी कुछ नहीं के समान है।वास्तव में दोनों ही भ्रम थे।सुखी होने का तुम्हें अधिकार अवश्य है,लेकिन तो भी तुम स्वयं वस्तुओं की चाह करके अपने लिए दुःख पैदा करते हो।चाह या इच्छा सदैव अशांति का कारण होती है।जिस वस्तु की तुमने चाह की,यदि वह तुम्हें नहीं मिली तो तुम निराश होते हो।यदि वह तुम्हें मिली,तुम उसे और भी अधिक परिणाम में चाहते हो और इस कारण दुःखी होते हो।इसलिए तुम यह कहो कि मुझे कुछ भी नहीं चाहिए,इससे तुम सुखी हो जाओ।इच्छाओं या चाहो की असारता की अनुभूति तुम्हें अंत में ज्ञान प्रदान करेगी।यह आत्मज्ञान इच्छाओं से तुम्हें मुक्त करेगा और इस प्रकार स्थायी सुख का पथ तुम्हें मिल जाएगा।
उपर्युक्त आर्टिकल में इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाने की 8 तकनीक (8 Techniques to Firm WillPower),इच्छाशक्ति को दृढ़ कैसे बनाएँ? (How to Resolute WillPower?) के बारे में बताया गया है।
Also Read This Article:दृढ़ इच्छाशक्ति का क्या महत्त्व है?
8.छात्र की इच्छा (हास्य-व्यंग्य) (Student’s Desire) (Humour-Satire):
- माँ (छात्र के पिता से):मैं तो अपने पुत्र को डॉक्टर बनाऊंगी।
- पिता:मैं तो अपने पुत्र को वकील बनाऊंगा,डॉक्टरी में क्या धरा है।
- पुत्र:परंतु मेरी तो इंजीनियर बनने की इच्छा है।मैं ऐसा करता हूं कि पार्ट टाइम वकील,डॉक्टर का काम कर लूंगा और इंजीनियर भी बन जाऊंगा।
- मित्र:अपनी प्रतिभा और योग्यता तथा सामर्थ्य का तो ख्याल करो,क्या तुम अतिप्रतिभाशाली हो जो ये सब कर लोगे।
9.इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाने की 8 तकनीक (Frequently Asked Questions Related to 8 Techniques to Firm WillPower),इच्छाशक्ति को दृढ़ कैसे बनाएँ? (How to Resolute WillPower?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.दृढ़ इच्छाशक्ति से क्या तात्पर्य है? (What is meant by strong will?):
उत्तर:अपनी मौलिक प्रतिभा को पहचान कर अपनी समस्त शक्तियों को उसी इच्छा को पूरी करने में लगा देता है।गणितज्ञ,वकील,डॉक्टर,इंजीनियर में से जो बनने की इच्छा है,अपनी क्रियाओं को उसी दिशा में मोड़ देता है।
प्रश्न:2.दृढ़ इच्छाशक्ति में क्या बाधाएँ हैं? (What are the obstacles to strong will?):
उत्तर:किसी इच्छा को पूरी करने के लिए कोई विद्यार्थी अपनी समस्त शक्ति लगा देता है परंतु कोई प्रलोभन सामने आने पर उसका शिकार होते ही विद्यार्थी की इच्छाशक्ति निर्बल पड़ जाती है।
प्रश्न:3.क्या बाधाओं का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है? (What odds can be predicted?):
उत्तर:कोई विद्यार्थी या व्यक्ति कितना ही दूरदर्शी एवं कल्पनाशील हो,परंतु किसी कार्य में आने वाली कठिनाइयों का शत प्रतिशत अनुमान लगा लेना आसंभव है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाने की 8 तकनीक (8 Techniques to Firm WillPower),इच्छाशक्ति को दृढ़ कैसे बनाएँ? (How to Resolute WillPower?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Satyam
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