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9 Ways to Get Free of Psychic Disorder

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1.मनोविकारों से मुक्त होने के 9 उपाय (9 Ways to Get Free of Psychic Disorder),मनोविकारों से कैसे मुक्त हों? (How to Get Rid of Mental Disorders?):

  • मनोविकारों से मुक्त होने के 9 उपाय (9 Ways to Get Free of Psychic Disorder) के आधार पर हम जानेंगे कि मनोविकार कौन-कौन से हैं और उनसे मुक्त होने के क्या उपाय हो सकते हैं? मनोविकारों से मुक्त होना इसलिए जरूरी है क्योंकि ये प्रगति में बाधक हैं।
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2.मन का पहला शत्रु काम (The first enemy of the mind is desire):

  • मन के छः शत्रु हैं:काम,क्रोध,लोभ,मद,मोह और मत्सर (ईर्ष्या)।इस जीवन में कदम-कदम पर ये शत्रु हमारे मन पर हमला करते रहते हैं।यदि पहले से ही इनसे सावधान रहें तो ये हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते।
    काम का एक अर्थ है कामना यानी इच्छा (Desire) और दूसरा अर्थ है यौन (sex)।काम को चार पुरुषार्थों धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष में भी शामिल किया गया है।हमें न तो काम की उपेक्षा करनी चाहिए और न ही इसका गलत ढंग से उपयोग करना चाहिए।लेकिन होता यह है कि बच्चों को काम के विषय में सही सही जानकारी होती नहीं इसलिए जैसे ही युवावस्था शुरू होती है वैसे ही अधिकांश बच्चे बुरी संगत में पड़कर ‘काम’ से संबंधित गलत और गन्दी क्रियाएँ करने लगते हैं।विवाह होने से पहले आप ‘काम-वासना’ से संबंधित विचार करने और कामुक क्रीड़ा करने से बिल्कुल बचकर रहें।ऐसा बचाव करने में आप तभी सफल हो सकेंगे जब कामुक विचारों को मन में ना आने देंगे,ऐसे दोस्तों से दूर रहेंगे जो आपसे ऐसी बातें करते हों या गंदी आदतें सिखाते हों।
    सौ बात की एक बात तो यह है कि आप ऐसा कोई भी काम नहीं करेंगे जिसे छिपा कर करना पड़े,जिसके विषय में आप अपने माता-पिता और भाई-बहन से बातचीत न कर सकें।एक बात सदा याद रखें कि जिस काम को करने में भय लगे,ऐसी शंका मन में उठे कि करें या ना करें और लज्जा का अनुभव होता हो वह काम शुभ नहीं होता,अशुभ होता है,उत्तम कर्म नहीं होता,पाप कर्म होता है।बस,आपको ऐसे कर्म कदापि नहीं करना है ऐसा सुदृढ़ संकल्प कर लें।ऐसा करके ही आप ठीक से अध्ययन कर सकेंगे वरना अध्ययन करने का परिणाम खतरनाक होगा।
  • अब बात यह है कि इसे पुरुषार्थ में क्यों शामिल किया गया है।जहां तक ‘काम’ को उचित मर्यादित ढंग से सेवन करने का प्रश्न है वहाँ तक ‘काम’ उपयोगी,आवश्यक और महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सारा सृजन का आधार और कारण यह ‘काम’ ही है।सृष्टि के सभी निर्माण एवं प्रजनन वाले कार्य इस ‘काम’ के ही कारण हो रहे हैं वरना यह दुनिया कभी की रुक जाती,खत्म हो जाती।सिर्फ सृजन एवं प्रजनन के लिए ‘काम’ का उपयोग करना इसका सही उपयोग है और इसी रूप में ‘काम’ को पुरुषार्थ माना गया है लेकिन जब ‘काम’ का उपयोग वासना के रूप में अतिरेकपूर्वक किया जाता है तब यह पुरुषार्थ नहीं रहता बल्कि अत्याचार और दुराचार हो जाता है इसीलिए गीता में इसे भी क्रोध और लोभ के साथ नरक का द्वार कहा है।
    ‘काम’ बहुत आवश्यक है,महत्त्वपूर्ण है और उपयोगी है इसमें कोई संदेह नहीं क्योंकि संसार में जो भी सृजन कार्य हो रहा है वह ‘काम’ की ऊर्जा से ही हो रहा है पर ‘काम’ का उपयोग ‘सृजन’ के लिए न करके सिर्फ मौज मज़े के लिए करना विनाशकारी सिद्ध होता है।ऐसे व्यक्ति जो काम के वेग को रोकते नहीं और कामुक विचार करते रहते हैं उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।ऐसे लोग ‘कामवासना’ के प्रभाव से अंधे के समान हो जाते हैं।उल्लू को दिन में दिखाई नहीं देता और कौए को रात में दिखाई नहीं देता परंतु कामान्ध को ना दिन में दिखाई देता है ना रात में।

3.खुद को जलाने वाली क्रोधाग्नि (fiery-anger who burns herself):

  • क्रोध का जन्म ‘काम’ की पूर्ति में बाधा पड़ने पर होता है यानी हमारी इच्छा या वासना के विपरीत स्थिति उत्पन्न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है।काम,क्रोध,लोभ आदि को ऐसे मानसिक वेग कहा है जिन्हें रोक देना ही बुद्धिमानी है क्योंकि ये मानसिक वेग पहले हमारे आचार विचार और व्यवहार को दूषित करते हैं फिर हमारे अध्ययन करने की वृत्ति को चौपट कर देते हैं।ऐसी कोई दवा नहीं है जो क्रोध करने की आदत छुड़ा दे,कामुकता की आदत दूर कर दे,लोभ,मद (नशा),मत्सर (ईर्ष्या) की भावना को मन से हटा दें।मानसिक विकारों को दूर करना बहुत ज्यादा कठिन काम होता है।बचपन से जैसा स्वभाव बन जाता है वह दिन-ब-दिन और मजबूत होता जाता है और फिर उसे बदलना बहुत ही मुश्किल हो जाता है बल्कि ज्यादातर तो असंभव ही होता है।क्रोध के मामले में भी ऐसा ही होता है।
  • क्रोध का सबसे बुरा प्रभाव यह पड़ता है कि क्रोध उत्पन्न होते ही विवेक नष्ट हो जाता है और फिर क्रोध के वश में क्रोधी व्यक्ति विवेकहीन होकर ऐसे जघन्य काम कर डालता है जैसे बिना क्रोध के नहीं कर सकता था।फिर बाद में सिवाय पछताने के और कुछ हाथ में नहीं रहता।विवेकहीन होकर अच्छे काम नहीं किये जा सकते बल्कि विवेकरहित होकर जो भी किया जाएगा वह बुरा ही होगा।
  • क्रोध करने से पित्त कुपित होता है जिससे भूख मरना,अनिद्रा रोग होना,चिंता एवं मानसिक तनाव से ग्रस्त रहना,सिर दर्द होना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।ऐसी मानसिक स्थिति में अध्ययन किया ही नहीं जा सकता है।अध्ययन,स्वाध्याय,सत्संग के बिना आप शिक्षित ना हो सकेंगे।याद रखें स्वास्थ्य की अनदेखी फिर भी सहन की जा सकती है परंतु अशिक्षित होना जिंदगी भर मूर्ख बने रहने के बराबर है जिससे जिंदगी नरक बन जाती है।
    क्रोध करने पर शरीर और सिर गर्म हो जाता है,यह क्रोधाग्नि का ही प्रभाव होता है,इसीलिए क्रोध करने वाले को जब ठंडा पानी पिलाते हैं तो उसे शांति का अनुभव होता है।क्रोध के प्रभाव से मन की शांति और सहजता नष्ट होती है,भूख और नींद भी उड़ जाती है।
  • क्रोध से शरीर में कमजोरी पैदा होती है और कमजोरी से क्रोध पैदा होता है।क्योंकि किसी भी प्रकार की कमजोरी हमारी इच्छा की पूर्ति में बाधा सिद्ध होती है और इच्छा की पूर्ति में बाधा पड़ने से ही क्रोध पैदा होता है इसीलिए कमजोर को गुस्सा ज्यादा आता है।हमें क्रोध तभी आता है जब वैसा ना हो रहा हो जैसा हम चाहते हैं,जैसी हम इच्छा यानी कामना (choice or Desire) करते हैं इसके बिना क्रोध हो ही नहीं सकता।
  • क्रोध करना अच्छी आदत नहीं क्योंकि क्रोध से घृणा,हिंसा और प्रतिशोध की भावना का जन्म होता है।मुँह के सामने भले ही कोई कुछ ना कहे पर क्रोधी व्यक्ति को कोई पसंद नहीं करता।क्रोध हमारे स्नेह भाव,उदारता,अपनत्व और संबंधों का नाश करके हमारी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता का भी नाश करता है।क्रोध करने से सिवाय नुकसान के फायदा कुछ भी नहीं होता इसलिए बुद्धिमान और गंभीर स्वभाव के लोग क्रोध करते ही नहीं बल्कि विवेक,धैर्य और सहजभाव से काम लेकर उस कारण को ही दूर कर देते हैं जो क्रोध उत्पन्न कर रहा हो।क्रोध करना दरअसल टुच्चेपन यानी ओछेपन का सूचक होता है,गलत आधार का सूचक होता है किसी कमजोरी का सूचक होता है क्योंकि गंभीर,उदार,गरिमायुक्त,बुद्धिमान और सच्चे व्यक्ति को क्रोध करने की आवश्यकता महसूस ही नहीं होती।यदि व्यक्ति जल्दबाजी और आवेश से काम न लेकर क्रोध करने से पहले ठंडे दिमाग से इतना विचार कर ले कि क्रोध करने से लाभ क्या है तो वह क्रोध कर ही नहीं सकेगा।
  • जो विचारवान हैं वे क्रोध नहीं करते और क्रोधी व्यक्ति विचारवान नहीं होते।क्रोध विवेक का नाश कर देता है और जिसका विवेक नष्ट हो जाए उसका अध्ययन-मनन-चिंतन नष्ट हो जाता है अर्थात वह ये नहीं कर पाता।

4.लोभ नरक का द्वार (Greed is the gateway to hell):

  • लोभ का मतलब लालच होता है और लालची होना भी अच्छा नहीं होता।जैसे कामुक व्यक्ति ‘काम’ से अंधा होता है,क्रोधी,क्रोध से अंधा होता है वैसे ही लालची व्यक्ति भी लोभ में अंधा हो जाता है।कहा भी है कि लालच बुरी बला है इससे बचकर रहना ही बुद्धिमानी है।लालच में फँसकर ही लोग मुसीबतों में फँस जाते हैं।छोटे बच्चों को अनजाने लोग खाने पीने का लालच देकर उड़ा ले जाते हैं,कुछ लोग लालच देकर गंदी हरकतें सिखा देते हैं तो कुछ लोग लालच देकर बुरे काम करवाते हैं इसीलिए आपको कभी भी,किसी प्रकार का लालच नहीं करना चाहिए।जब भी कोई आपको किसी प्रकार का लालच दे तब तुरंत आपके कान खड़े हो जाना चाहिए यानी आपको सावधान हो जाना चाहिए कि वह आदमी किसी गलत काम के लिए ही आपको लालच दे रहा है क्योंकि सही काम के लिए कोई लालच नहीं देता है।
  • लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है,लोभ से ही कामना उत्पन्न होती है,लोभ से ही मोह पैदा होता है तथा लोभ से नाश होता है इसलिए लोभ को पाप का हेतु (कारण) समझा गया है।दरअसल ये तीनों वेग ही यानी काम,क्रोध और लोभ मनुष्य को पीड़ा देने वाले मानसिक वेग हैं।

5.मद नाश करने वाला विकार (Addictive disorder):

  • मद का अर्थ है नशा।नशा यूं तो कई प्रकार का होता है जैसे जवानी का नशा,सत्ता का नशा,सौंदर्य का नशा,रुपए पैसे और धन संपदा का नशा लेकिन हम मादक द्रव्यों के सेवन से पैदा होने वाले नशे की बात कर रहे हैं।मादक द्रव्यों में शराब,तंबाकू,भांग,गांजा,चरस,अफीम,हशीश,हेरोइन,स्मेक,ब्राउन शुगर आदि नामों से पुकरे जाते हैं।अब तो छात्र-छात्राएँ और लोग इंजेक्शन से अपने शरीर में ड्रग प्रविष्टि कर रहे हैं।ये सभी नशा हमारा सत्यानाश और बेड़ा गर्क करने वाले हैं।ये सभी नशे संगी साथियों के द्वारा सीखे जाते हैं और किए जाते हैं।अतः कुसंगति का त्याग करना चाहिए।नशा पर एक विस्तृत लेख लिखा हुआ है उसे पढ़ें।

6.सभी दुखों का जनक मोह (The Father of All Sorrows is Attachment):

  • मोह का शाब्दिक अर्थ है झूठ और भ्रम।इसका दूसरा नाम ‘माया’ (Illusion) भी है।मोह का जन्म अज्ञान से होता है,अहंकार से प्रेरित होकर यह फलता फूलता है,संकीर्ण भावना इसे शक्ति देती है,ममत्व इसकी खुराक है और शोक इसका परिणाम है।शोक और दुःखों का जन्म मोह से ही होता है।
  • मोह का एक अर्थ ‘लगावट’ यानी आसक्ति (Attachment) भी है।’मद’ और ‘मोह’ ये दो ऐसे मानसिक वेग हैं कि जितने बढ़ते हैं उतने ही हमें दुःखी करते हैं क्योंकि जब भी ये टूटते हैं,खत्म होते हैं तब दुःख ही देते हैं।जब नशा उतरता है या टूटता है तब शरीर में बहुत वेदना होती है और जब किसी का मोह यानी भ्रम टूटता है तब भी बहुत निराशा और पीड़ा होती है।जो अत्यंत चेतनावान और अनासक्त प्रकृति के होते हैं वे इस दुःख या पीड़ा से बचे रहते हैं।
  • आप अभी से ही अपने संस्कार और विचार ऐसे निर्मित करना शुरू करें जो आपको मद से भी दूर रखें और मोह से भी यानी आप नशों से भी दूर रहें और भ्रम,झूठ,छल-कपट आदि से भी बच कर रहें।अभी से ऐसा अभ्यास कीजिए जैसे-जैसे आपकी आयु बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे अभ्यास भी बढ़ता जाएगा।अभ्यास में बड़ी शक्ति और क्षमता होती है।
  • आप अभी से जैसा स्वभाव बनाना चाहे बना सकते हैं।अच्छा स्वभाव बनाएंगे तो खुद भी सुखी रहेंगे और दूसरों को भी सुख दे सकेंगे।आपको एक बात बता दें।यह दुनिया गोल है,यहाँ सब कुछ वर्तुलाकार है इसलिए हम जो देते हैं वही लौटकर हमारे पास आता है।इसमें देर होती है अंधेर नहीं होती।हम सुख देंगे तो सुख पाएंगे,दुःख देंगे तो दुःख पाएंगे,चाहे अभी चाहे कभी बाद में,पर पाएंगे जरूर।इस सिद्धांत को आप गांठ में बांध लें।इसके पालन करने में आपको कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा इसमें कोई शक नहीं क्योंकि अच्छे कामों में कठिनाइयां आती ही हैं पर जो उत्तम प्रकृति के व्यक्ति होते हैं वे कठिनाइयों से विचलित नहीं होते।यह विशेषता और बड़प्पन से भरा सद्गुण जिन विरले पुरुषों में होता है उनका मनुष्य जीवन में आना सफल हो जाता है।

7.ईर्ष्या आत्मविश्वास को खत्म करने वाली (Jealousy destroys self-confidence):

  • मत्सर का अर्थ होता है ईर्ष्या।दूसरे के बड़प्पन को पसंद न करना,दूसरे के मुकाबले अपने को हीन समझ कर द्वेष भाव रखना ईर्ष्या करना होता है।ईर्ष्या वास्तव में हीन मनोवृत्ति की भावना से पैदा होती है।ईर्ष्या ऐसी भावना होती है जो ईर्ष्या करने वाले को ही दुःखी करती है क्योंकि ईर्ष्यालु व्यक्ति जिसके प्रति ईर्ष्या करता है उसे इसका पता भी नहीं चलता।ईर्ष्या परायेपन की भावना की सूचक होती है क्योंकि जिन्हें हम अपना मानते हैं उनके उत्कर्ष से,उनके बड़प्पन से हमें प्रसन्नता होती है,ईर्ष्या नहीं।ईर्ष्या बंधुत्व से नहीं वैरभाव से पैदा होती है,यह मित्र भाव नहीं शत्रु भाव है,उदारता नहीं संकीर्णता है,महानता नहीं हीनता है।ऐसी भावना है जो ईर्ष्या करने वाले के अंदर कुंठा पैदा करती है,जलन और क्रोध पैदा करती है जिससे ईर्ष्या करने वाला अंदर ही अंदर कुढ़ता रहता है।
  • इस कुढ़न से अनावश्यक रूप से तनाव पैदा होता है जिसका हमारे मानसिक तल पर बुरा प्रभाव पड़ता है।हमारा स्वभाव रूखा और चिड़चिड़ा हो जाता है और व्यवहार सरल और सामान्य नहीं रह पाता।यह प्रवृत्ति बिना कुछ करें धरे ही हमारे मानसिक और शारीरिक तल को हानि पहुँचाती रहती है।ईर्ष्या की आग अंदर ही अंदर सुलगती रहती है हमें जलाती रहती है।इससे होने वाली हानियाँ कमोबेश वैसी ही होती है जैसी क्रोध करने से होती है।ईर्ष्या करने से सिवाय नुकसान के फायदा कुछ नहीं होता क्योंकि ईर्ष्या करके हम किसी का कुछ बिगाड़ नहीं सकते,सिर्फ अपने आप का नाश करते हैं।

8.मनोविकारों का निष्कर्ष (Conclusion of psychic):

  • इस प्रकार यदि हम मानसिक रूप से संतुलित और तनाव रहित तथा शांत रहना चाहते हैं,अपने मन मस्तिष्क को प्रसन्न और चिंता तनाव से मुक्त रखना चाहते हैं,तो हमें इन छः शत्रुओं से सावधान रहना होगा और इनसे बचना होगा।आप अभी से इन शत्रुओं को अच्छी तरह से पहचान लें और इनसे दूर रहने का अभ्यास करने लगें।यह हो सकता है और होगा भी कि शुरू शुरू में आपको पूरी सफलता न मिले तो चिंता न करें और कोशिश बराबर जारी रखें।जितनी अधिक हो सके उतनी कोशिश करते रहें।अच्छा काम अधूरा भी रहे तो भी शुभ होता है और बुरा काम पूरा हो जाए तो भी शुभ नहीं होता इसलिए इसकी चिंता ना करें कि आपका अच्छा प्रयत्न पूरा नहीं होता।धीरे-धीरे सफलता बढ़ती जाएगी।हमारे कदम सही राह पर आगे बढ़े यही शर्त है फिर हमारी रफ्तार कम हो ज्यादा,इसकी फिक्र करने की जरूरत नहीं।तेज रफ्तार से बुरी राह पर चलने की अपेक्षा सही राह पर धीरे-धीरे चलना भी शुभ और कल्याणकारी होता है।
  • विद्यार्थी को शिक्षित होने,विद्याध्ययन करने और एकाग्रता पूर्वक अपना पाठ याद करने के लिए मन के इन विकारों से मुक्त होना बहुत जरूरी है।बहुत से विद्यार्थियों के पाठ समझ में नहीं आता है,पढ़ा हुआ याद नहीं होता है,अध्ययन में मन नहीं लगता है इन सब का कारण ये मन के विकार हैं।मन के विकार हमें अच्छा कार्य करने में बाधा उत्पन्न करते हैं।तथा वे समझ ही नहीं पाते हैं कि पढ़ाई में रुचि क्यों नहीं होती है,टीचर द्वारा पढ़ाया हुआ समझ में क्यों नहीं आता है।आप इस लेख को पढ़कर कुछ तो समझ गए होंगे और कुछ विकारों से मुक्त हो जाएंगे तो ठीक से समझ में आ जाएगा कि इन विकारों की वजह से कितना भारी नुकसान हो रहा था।विकारों से एक साथ मुक्त होना तो मुश्किल है परंतु धीरे-धीरे प्रयत्न करने पर देर-सबेर सफल हो ही जाएंगे इसमें तनिक भी संदेह नहीं हैं।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में मनोविकारों से मुक्त होने के 9 उपाय (9 Ways to Get Free of Psychic Disorder),मनोविकारों से कैसे मुक्त हों? (How to Get Rid of Mental Disorders?) के बारे में बताया गया है।

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9.लोभी छात्र (हास्य-व्यंग्य) (Greedy Student) (Humour-Satire):

  • मनीष:यार सक्सेस कोचिंग सेंटर में कोचिंग करेंगे।वहाँ पांच छात्र-छात्राओं पर एक छात्र-छात्रा को फ्री कोचिंग कराया जाता है और दो साल लगातार कोचिंग करने पर तीसरे साल फ्री कोचिंग की व्यवस्था है।
  • ललित:पहले सक्सेस कोचिंग सेंटर में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण कराया जाता है या नहीं इसकी जांच तो कर लो,ऐसे कोचिंग सेंटर छात्र-छात्राओं को प्रलोभन देकर फीस ऐंठ लेते हैं और पढ़ाई के नाम पर मामला चौपट नजर आता है।

10.मनोविकारों से मुक्त होने के 9 उपाय (Frequently Asked Questions Related to 9 Ways to Get Free of Psychic Disorder),मनोविकारों से कैसे मुक्त हों? (How to Get Rid of Mental Disorders?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.मनोविकारों से मुक्त होने के मुख्य उपाय क्या हैं? (What are the main ways to get rid of psychic?):

उत्तर:स्वाध्याय,सत्संग,अध्ययन,मनन,चिंतन और सत्साहित्य का अध्ययन करना तथा बुरी संगत से दूर रहना,बुरे लोगों से किसी प्रकार वास्ता न रखना मनोविकारों से मुक्त होने के मुख्य उपाय हैं।

प्रश्न:2.क्रोध से कैसे बचें? (How to avoid anger?):

उत्तर:क्रोध आते ही ठंडा पानी का गिलास पीना चाहिए।वैसे कई बार बुराई को खत्म करने के लिए क्रोध करना जरूरी भी हो जाता है जिसे मन्यु कहते हैं परंतु यह क्षणिक ही होता है।

प्रश्न:3.कामवासना से कैसे मुक्त हों? (How to get rid of libido?):

उत्तर:कामुक साहित्य न पढ़ें,कामुक दृश्य न देखें,कामुक बातचीत न करें आदि।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा मनोविकारों से मुक्त होने के 9 उपाय (9 Ways to Get Free of Psychic Disorder),मनोविकारों से कैसे मुक्त हों? (How to Get Rid of Mental Disorders?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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