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4 Tips for Building Positive Attitude

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1.सकारात्मक दृष्टिकोण निर्माण करने की 4 टिप्स (4 Tips for Building Positive Attitude),छात्र-छात्राओं द्वारा सकारात्मक चिन्तन करने की 4 टिप्स (4 Tips for Students to Think Positively):

  • सकारात्मक दृष्टिकोण निर्माण करने की 4 टिप्स (4 Tips for Building Positive Attitude) के आधार पर सकारात्मक दृष्टिकोण अपना सकेंगे,सकारात्मक चिंतन करने में मदद मिलेगी।इससे पूर्व एक लेख “गणित को हल करने के लिए खुद को सकारात्मक रखें” भी पोस्ट किया हुआ है,उसको पढ़ेंगे तो अतिरिक्त जानकारी प्राप्त होगी।छात्र-छात्राओं को परीक्षा में,जॉब में तथा जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने से सफलता प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।
  • छात्र-छात्राओं को अध्ययन के अलावा भी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जैसे आर्थिक स्थिति कमजोर होना,किसी परिवार के सदस्य अथवा स्वयं का बीमार पड़ जाना या दुर्घटनाग्रस्त हो जाना आदि।इन स्थितियों में सकारात्मक दृष्टिकोण आपकी काफी मदद करता है और आप उस संकटपूर्ण स्थिति को सहज रूप से सामना करने में समर्थ हो जाते हैं।
    यदि छात्र-छात्राओं की हर कार्य,अध्ययन में,जॉब में,जीवन में घटित होने वाली प्रत्येक घटना में नकारात्मक देखने की प्रवृत्ति हो गई है तो इस नकारात्मक दृष्टिकोण को भी बदला जा सकता है परंतु दृष्टिकोण को बदलने के लिए लगातार आपको प्रयत्न करना होगा।
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2.सकारात्मक चिन्तन का क्या तात्पर्य है? (What Does Positivity Mean?):

  • कुछ विद्यार्थी तथा लोग अध्ययन न करना,आलस्य करना और लापरवाह होने को सकारात्मकता समझते हैं,परंतु सकारात्मकता का यह अर्थ नहीं है।सकारात्मकता का अर्थ है चुनौतियों,मुसीबतों,संकटों,समस्याओं,बाधाओं में भी निकलने का उपाय सोचना जिसके सहारे वह इन परिस्थितियों से बाहर निकल सके।विपरीत स्थितियों से बाहर निकलने से ही हमारे व्यक्तित्त्व का समुचित विकास होता है।
  • आधुनिक युग प्रतियोगिता का युग है और प्रतियोगिता के इस युग में हम समयानुकूल अपने आपमें बदलाव नहीं करते हैं तो सफल नहीं हो सकते हैं।इसलिए बुरी से बुरी स्थिति में से निकलने के लिए कोई न कोई सही व उचित रास्ता निकालने की कला जिसको आ जाती है वह सकारात्मक व्यक्तित्त्व वाला व्यक्ति बन जाता है।
  • हमारे मन में तथा हमारे चारों ओर कई तरह के विचार होते हैं।इनमें से प्रत्येक विचार को ग्रहण कर लेना उचित नहीं होता है।जैसे परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए नकल करना,अनुचित तरीके अपनाना अथवा कठिन परिश्रम करके परीक्षा में उचित तरीके से प्रयास करके उत्तीर्ण होने के विचार उत्पन्न हो सकते हैं।परंतु हमें इन विचारों में से सर्वश्रेष्ठ विचारों का चयन करना चाहिए,अशुभ,गलत और निरर्थक विचारों को नहीं।उपर्युक्त उदाहरण में परीक्षा में कठिन परिश्रम करके परीक्षा में उचित तरीके से उत्तीर्ण होना ही सर्वश्रेष्ठ विचार है।
  • हमें श्रेष्ठ विचारों पर ही अमल करना चाहिए; क्योंकि हमारी जिंदगी के आधार में हमारे विचार व भावनाएं ही होती हैं।विचारों के उत्पन्न होते ही कल्पना शक्ति उन्हें साकार करने के लिए सक्रिय हो उठती है।विचार हमें लक्ष्य दिखाते हैं और उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कल्पनाशक्ति हमें रास्ता बताती है,इसके माध्यम से हम योजनाएं बनाते हैं और उन पर क्रियान्वयन के द्वारा हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।इस तरह कल्पनाएं हमें लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए रूपरेखा खींचती है और लक्ष्य तक जाने के लिए जरूरी संसाधनों को रेखांकित करती है।
  • विचारों में कल्पनाशक्ति की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।हमारे जीवन का सबसे रचनात्मक कार्य है- कल्पनाओं को वास्तविकता में बदलना।इसके लिए सही कल्पनाओं का चयन करना और उन्हें सकारात्मक रुख देना बहुत जरूरी है।तभी हम अपनी जिंदगी में सही दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
  • जब विद्यार्थी अध्ययन करता है तो उसे एक कक्षा के अध्ययन की पाठ्य सामग्री दिखाई देती है लेकिन विद्यार्थी की कल्पना में पाठ्यक्रम का विशाल अंबार दिखाई नहीं देता है बल्कि उसकी कल्पना में लक्ष्य होता है।इस प्रकार एक-एक कक्षा के सहारे वह कई कक्षाओं को पार करता जाता है क्योंकि एक-एक कक्षा के सहारे आगे की कक्षाओं में बढ़ता जाता है।
  • परीक्षा में तथा अध्ययन में आने वाली आसपास की रुकावटों को नजरअंदाज करना होता है।विद्यार्थियों को अपने विचारों व कल्पनाओं में अच्छी व उजली भावनाओं को देखना चाहिए; क्योंकि यही उजाला हमें असफलता से बाहर निकालकर पुन: प्रयास करने में मदद करता है और सफल बनाता है।
  • विद्यार्थियों को अपने जीवन में सकारात्मक व अच्छे विचारों के सहारे आगे बढ़ना चाहिए।जीवन में दिन व रात्रि की तरह सफलता व असफलता आती है,ऐसे समय में हमें सदैव अच्छे विचारों-भावनाओं और कल्पनाओं का चयन करना चाहिए; क्योंकि यही हमारे जीवन को नकारात्मक अंधेरे के गर्त में डूबने से बचा सकते हैं और उसे सुरक्षित रख सकते हैं।
  • अशुभ भावनाएँ,निरर्थक विचारों को जन्म देती है और जीवन नकारात्मकता की ओर मुड़ जाता है; जबकि शुभ चिंतन,श्रेष्ठ विचार सकारात्मकता का सहारा पाकर जीवन को सही दिशा में ले जाता है।इसलिए सदा सकारात्मक सोच को ही जीवन का ध्येय बनाकर रखना चाहिए।

3.सकारात्मक चिंतन का परिणाम (The Result of Positive Thinking):

  • सकारात्मक चिंतन व्यक्ति को सफलता और लक्ष्य की ओर ले जाता है और निषेधात्मक चिंतन उसको सफलता और लक्ष्य से दूर करता है जिसको हम असफलता की ओर जाना कह सकते हैं। सकारात्मक चिंतन उपलब्ध साधनों के सकारात्मक उपयोग की प्रेरणा प्रदान करता है और नकारात्मक चिंतन पद्धति कार्य-प्रणाली को नकारात्मक बना देती है।सकारात्मक चिंतन अनुकूल साधनों को अपनी ओर आकर्षित भी करता है और अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण भी करता रहता है।
  • सकारात्मक चिंतन संकल्प,साहस एवं पुरुषार्थ को जाग्रत करके विद्यार्थी को सफलता की सीढ़ियों की तरफ ले जाता है।सकारात्मक चिंतन में एक चुंबक की तरह आकर्षण शक्ति होती है।चुंबक कूड़े के ढेर में से भी लौह-कणों को आकर्षित कर लेता है।प्रतिकूलतम,विषमतम एवं जटिल परिस्थितियों में से भी अनुकूल शक्तियां सकारात्मक चिंतन की ओर खिंची चली आती हैं।
  • इस संसार में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रत्येक वस्तु संकल्प शक्ति पर निर्भर है।संकल्प शक्ति सकारात्मक चिंतन का ही शिव पक्ष है जो दृढ़ इच्छाशक्ति एवं एकनिष्ठ क्रियाशीलता को प्रेरित करता है।
  • अच्छा काम करने के लिए धन की कम आवश्यकता  पड़ती है,उसके लिए अच्छे हृदय और संकल्प की आवश्यकता अधिक होती है।विषमतम परिस्थितियों में भी जो व्यक्ति अपना मनोबल बनाए रखते हैं,अच्छे परिणामों की आशा करते हैं,वे असफल होने पर भी सफलता के द्वार पर खड़े रहते हैं,उनके असफल होने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता है।
  • सकारात्मक चिंतन व्यक्ति को सदैव प्रसन्न और उज्जवल भविष्य के प्रति आस्थावान बनाए रखता है।उसकी कार्य प्रणाली रचनात्मक होती है और वह प्रत्येक पल और पग को संभावनाओं से परिपूर्ण देखता है।इसके विपरीत दिशा में जाने वाले व्यक्तियों का पतन होता जाता है।
  • परीक्षा में असफल होने पर असफलता के कारणों को जान-समझकर दूर करने की चेष्टा करना सकारात्मक आचरण है।असफलता के कारणों को दूर न करके अध्यापक व प्रश्न-पत्र के कठिन होने को कोसना अथवा असफलता के लिए किसी अन्य को जिम्मेदार ठहराना नकारात्मक चिंतन एवं आचरण का लक्षण है।
  • स्पष्ट है कि लक्ष्य का निर्धारण और उसके प्रति पूर्णनिष्ठा के साथ समर्पण करके ही हम जीवन को रचनात्मक और सकारात्मक बना सकते हैं अन्यथा अनावश्यक ऊहा-पोह करते रहकर अपने जीवन के अमूल्य समय को व्यर्थ गँवाते रहते हैं।ऐसे व्यक्ति कभी भाग्य को दोष देते हैं,कभी जमाने की शिकायत करते हैं और कभी अपनी परिस्थितियों को कोसते हैं।
  • संकल्प अथवा दृढ़ इच्छाशक्ति का धनी व्यक्ति अपनी धुन का पक्का होता है।वह अपनी कर्मठता,श्रम और पुरुषार्थ के बल पर कर्त्तव्य-पथ पर अग्रसर होता है तो उसके अंदर तड़प उत्पन्न होती है और वह गणितज्ञ,वैज्ञानिक,इंजीनियर,मनीषी,कलाकार,साहित्यकार के रूप में हमारे सामने प्रकट हो जाता है।

4.सकारात्मक चिंतन कैसे करें? (How to Think Positively?):

  • विद्यार्थियों को सोचना चाहिए कि वह परीक्षा में,जॉब में अथवा जीवन में अपने आपको असफल नहीं होने देंगे और किसी भी घटना पर रचनात्मक प्रतिक्रिया देंगे इसके लिए ध्यान (meditation) करें और अपने आपको मानसिक रूप से संतुलित रखने का प्रयास करें।किसी भी घटना में अच्छे तत्त्व को ढूंढे।जब किसी विषय में अच्छा विचार और चिंतन किया जाता है तो इस दिशा में प्रयास करने से कुछ न कुछ अच्छी बातें मन में आ जाती है।जो हमें सही दिशा में कार्य करने के लिए मानसिक बल प्रदान करती है।लेकिन किसी विषय में नकारात्मक सोचने के लिए थोड़े से प्रयास की जरूरत होती है क्योंकि हमारे चारों ओर नकारात्मक वातावरण मौजूद है इसलिए सकारात्मक सोचने का प्रयास व अभ्यास करना चाहिए।
  • विद्यार्थी हमेशा अपने आपसे कहे कि मुझे अध्ययन अच्छा लगता है,आज अध्ययन में मैंने अमुक नई बात पढ़ी है,मैं स्वयं को पसंद करता हूं/करती हूं; ऐसे करते समय कोई नकारात्मक विचार आएँ,उन्हें केवल देखें,अपनाएँ नहीं,केवल उनसे गुजर जाएँ।जैसे स्कूल जाते समय हम आवारा,गुण्डों,बदमाशों लड़कों और छात्रों से बचकर स्कूल में चले जाते हैं,उसी प्रकार नकारात्मक विचारों से बचकर निकल जाना चाहिए और अच्छे,मेधावी,कुशाग्र छात्रों के समान सकारात्मक विचारों को अपनाना चाहिए क्योंकि जिन्हें हम अपनाते या स्वीकार करते हैं,वे हमारे अवचेतन मन में गहराई से उतरकर हमारे व्यक्तित्त्व का स्थाई हिस्सा बन जाते हैं।
  • जीवन और अध्ययन में आने वाली चुनौतियां को अस्थायी,वस्तुनिष्ठ और बाहरी कारक के रूप में स्वीकारें।समस्याओं को एक-एक करके समाधान करें,इन समस्याओं से जुझते समय अक्सर हम एक-दूसरे से जोड़ते हैं और उन्हें सम्मिलित रूप से सुलझाने का प्रयास करते हैं।इस कारण हम समस्याओं पर पूरी तरह से केंद्रित नहीं हो पाते हैं और समस्याओं को एक साथ जोड़ने पर वे विकराल रूप धारण कर लेती हैं।हमेशा यह सोचें कि सभी समस्याएं कभी भी एक साथ हल नहीं हो सकती हैं।
  • अध्ययन में या जीवन में आने वाली समस्याओं का सामना करने पर ही वे हल हो सकती हैं।इसलिए जटिल,कठिन समस्याओं को देखकर घबराएं नहीं बल्कि दृढ़ता के साथ सामना करें।एक मजबूत व्यक्तित्त्व के लिए इन चुनौतियों से ऊपर उठना जरूरी है।
  • चुनौतियों का सामना करके ही हमारा व्यक्तित्त्व व जीवन निखरता है,अनुभव व आत्मविश्वास बढ़ता है,इसलिए कभी यह न सोचें की चुनौतियां हमारे मार्ग की रुकावट हैं बल्कि यह सोचें कि ये जीवन का अंग है जिन्हें पार करना है और आगे बढ़ना है।ऐसा करने पर ही एक स्थिति ऐसी आएगी कि ये चुनौतियां हमारे लिए खेल के समान मनोरंजक व रोचक बन जाएंगी,फिर इनका सामना करने में भय नहीं लगेगा बल्कि उत्साह जगेगा; क्योंकि हर चुनौती का सामना करने पर हम ओर मजबूत बनते जाते हैं।
  • अपने सपनों और लक्ष्यों पर लगातार सोचते रहें क्योंकि ऐसा करने में हमें अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए पर्याप्त ऊर्जा,शक्ति और हिम्मत मिलती है।जब हम किसी चीज के बारे में गहराई से सोचते हैं तो उससे संबंधित नए विचार व नए तरीके उभरकर आते हैं और हमारे स्वप्न व लक्ष्य को एक सुनिश्चित आकार मिलता है और हम सही दिशा में आगे बढ़ते हैं।इसलिए यदि जीवन की भटकन से उबरना है और अपने इच्छित लक्ष्य तक पहुंचना है तो मन में उठने वाले नकारात्मक तत्त्वों को हटाना होगा और अपने अंदर की सकारात्मक रचनात्मकता को उभारना होगा।
  • इसके अतिरिक्त स्वाध्याय,सत्संग,अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करना,अच्छे लोगों व मित्रों की संगत करने से भी जीवन में सकारात्मकता आती है।

5.सकारात्मक सोच का दृष्टांत (An Example of Positive Thinking):

  • एक गणित का विद्यार्थी था।वह हर व्यक्ति,स्थान,घटना में कुछ न कुछ सकारात्मक ढूँढ ही लेता था।वह हमेशा सकारात्मक व प्रसन्न रहता था।एक बार गणित के कुछ सवाल हल नहीं हो रहे थे अतः वह इसी चिंतन में लगा रहता की इन्हें कैसे हल किया जाए।
  • उसकी मां अपने बच्चे की सकारात्मक चरम (extreme) सोच से थोड़ा परेशान रहती थी।वह सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के विषय में उसकी सोच को संतुलित करना चाहती थी।एक दिन उसने योजना बनाई।उसने गणित की पुस्तक के जले हुए पृष्ठ लिए और जब वह सो रहा था तो उसके तकिए के नीचे रख दिए ताकि वह कुछ नकारात्मक सोच सके और उसका व्यवहार बदल सके।
  • विद्यार्थी सुबह उठा और उसने अपने बिस्तर पर पुस्तक के जले हुए पृष्ठ देखें,उसने बड़े ध्यान से देखा और फिर खुशी से चिल्लाया-गणित की पुस्तक के जले हुए पृष्ठ वाह! इसका मतलब आसपास कोई लाइब्रेरी होनी चाहिए,कितनी अच्छी बात है अब मुझे सवालों को हल करने में मदद मिल जाएगी।आनंद आ जाएगा।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में सकारात्मक दृष्टिकोण निर्माण करने की 4 टिप्स (4 Tips for Building Positive Attitude),छात्र-छात्राओं द्वारा सकारात्मक चिन्तन करने की 4 टिप्स (4 Tips for Students to Think Positively) के बारे में बताया गया है।

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6.आधी रात को कोचिंग फीस (हास्य-व्यंग्य) (Coaching Fees at Night) (Humour-Satire):

  • आर्यन ने आधीरात को कोचिंग के गणित शिक्षक का दरवाजा खटखटाया।
  • गणित शिक्षक ने गुस्से से पूछा:क्या बात है?
  • आर्यन:मैं इस माह की कोचिंग फीस नहीं दे पाऊंगा।
  • गणित शिक्षक:सुबह बता देते।
  • आर्यन:मैंने सोचा की रात को इस चिंता में अकेला ही क्यों जागता रहूं।

7.सकारात्मक दृष्टिकोण निर्माण करने की 4 टिप्स (Frequently Asked Questions Related to 4 Tips for Building Positive Attitude),छात्र-छात्राओं द्वारा सकारात्मक चिन्तन करने की 4 टिप्स (4 Tips for Students to Think Positively) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.निषेधात्मक चिंतन से मुक्ति का क्या उपाय है? (What is the Way to Get Rid of Negative Thinking?):

उत्तर:सही तर्क और युक्ति के द्वारा निषेधात्मक चिंतन को बदला जा सकता है।सकारात्मक चिंतन के निकट निषेधात्मक प्रवृत्तियां आ ही नहीं सकती है,क्योंकि वहां इनके लिए स्थानाभाव रहता है।सकारात्मक चिंतन स्वभावतः आशावान एवं साहसी व्यक्तित्त्व के रूप में निर्मित होता रहता है।वह हर क्षण अपनी क्षमताओं से परिचित होता रहता है और अपने कर्त्तव्य पथ पर अग्रसर होता रहता है।दुष्प्रवृत्तियाँ उसके मार्ग में बाधा नहीं पहुंचा पाती है क्योंकि वे अभावात्मक होती है,उनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता,वे तब प्रकट होती हैं,जब सत्प्रवृत्तियां गायब हो जाती हैं।सकारात्मक चिंतन,सार्थक चिंतन एवं सदाचरण की त्रिवेणी के सम्मुख अवरोधों की श्रृंखला रेत की दीवार के समान ढह जाती है।

प्रश्न:2.क्या सकारात्मक एवं नकारात्मक विचार मन में एक साथ उठते हैं? (Do Positive and Negative Thoughts Come Together in the Mind?):

उत्तर:हमारा चेतन मन एक समय में एक ही तरह के विचारों को पकड़ता है,ये विचार सकारात्मक या नकारात्मक हो सकते हैं और जिस तरह के विचार मन में लंबे समय तक बने रहते हैं,वैसे ही हम बन जाते हैं।इसलिए निराशा के क्षणों में स्वयं से सकारात्मक संवाद करना चाहिए क्योंकि सकारात्मक संवाद के समय उपजे सकारात्मक शब्द मन में निराशा के कारण उपजे अंधेरे को दूर करके आशाओं के द्वार खोलते हैं।

प्रश्न:3.विचार व भावनाएँ हमें कैसे प्रभावित करती हैं? (How Do Thoughts and Feelings Affect Us?):

उत्तर:विचार और उनमें घुली भावनाएं हमें सक्रिय व निष्क्रिय बनाती है।विचार हमारे अंदर जितनी गहराई तक प्रवेश करते हैं,उतना ही हमें चैन से नहीं बैठने देते और हमे सक्रिय बनाते हैं।यदि हमारे विचार उथले स्तर के हैं तो ये हम पर कोई खास प्रभाव नहीं डाल पाते।दृढ़,मजबूत व सशक्त विचार न केवल हमें प्रभावित करते हैं बल्कि हमारे माध्यम से दूसरों को भी प्रभावित करते हैं और जीवन में परिवर्तन का कारण बनते हैं।यदि एक भी स्वस्थ व परिपुष्ट विचार हमारे मन में कौंधता है,तो वह अपने साथ इस तरह के विचारों की श्रृंखला गढ़ता चला जाता है और स्वयं को पहले की अपेक्षा ओर अधिक सुदृढ़ कर लेता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा सकारात्मक दृष्टिकोण निर्माण करने की 4 टिप्स (4 Tips for Building Positive Attitude),छात्र-छात्राओं द्वारा सकारात्मक चिन्तन करने की 4 टिप्स (4 Tips for Students to Think Positively) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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