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Sacrifice of Female Mathematician

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1.महिला गणितज्ञा का त्याग (Sacrifice of Female Mathematician),महिला गणितज्ञा का उत्कृष्ट त्याग (The Outstanding Sacrifice of Female Mathematician):

  • महिला गणितज्ञा का त्याग (Sacrifice of Female Mathematician) उत्कृष्ट और प्रेरक था।सामान्यतः लड़कियां गणित क्षेत्र का चयन बहुत ही कम करती हैं।ज्यादातर लड़कियां और महिलाएं अध्यापन के क्षेत्र का चयन करती हैं।परंतु इस महिला गणितज्ञा को शुरू से ही ऐसा वातावरण मिला था जिससे उसकी गणितीय प्रतिभा निखरकर सामने आई थी।सभी उसे कल्पना दी के नाम से पुकारते थे।कल्पना दीदी को ही संक्षिप्त व प्यार से कल्पना दी ही कहकर संबोधित करते थे।ओर अब यही उसका नाम हो गया था।
  • छात्र-छात्राओं व बच्चों के अतिरिक्त,बच्चों के माता-पिता,अभिभावक तथा अन्य लोग (पास-पड़ोस व गांव के) भी कल्पना दी कहकर बुला लेते थे।बड़े-बुजुर्ग,प्रौढ़ और वृद्ध महिलाएं भी कल्पना दी कहकर बुलाने में संकोच नहीं करते थे।जिन शब्दों से साधारणजन और बच्चे पुकारते हैं,वही उसका नाम हो जाता है।
  • इस तरह ‘कल्पना दी’ ही उसका नाम था।ठीक-ठीक नाम ना कहें,तो जनसाधारण में प्रचलित नाम तो था ही।अपने इस नाम के प्रचलन में उसकी मूक सहमति थी।
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2.महिला गणितज्ञा का व्यक्तित्त्व (Personality of the Female Mathematician):

  • वैसे उसकी आयु अभी बहुत नहीं थी।बस यही कोई तीस साल के आसपास होगी।इकहरा शरीर,दुबली-पतली किंतु लंबी कद-काठी,उजले दूध में हल्का-सा सिंदूर मिला दिया गया हो ऐसा गोरा रंग,बड़ी ही सूक्ष्मता और सफाई से तराशे गए नाक-नक्श उसके समूचे व्यक्तित्त्व को अतिशय सुंदर कहने के लिए विवश करते थे।उसके चेहरे पर भोलेपन से लिपटी मासूमियत की बड़ी सम्मोहक आभा थी।बड़ी-बड़ी उसकी आंखों में पवित्रता-पारदर्शिता एवं तेजस्विता का प्रकाश चमकता रहता था।व्यक्तित्त्व के इस बाहरी देह कोश के घनीभूत सौंदर्य से कहीं अधिक सघन सुंदरता उसके विचारों एवं भावनाओं में थी।पवित्र,उत्कृष्ट एवं प्रखर विचार,सुकोमल संवेदनशील भावनाएं बरबस ही सबको अपना बना लेती थी।सब उसके अपने थे।वह भी सबकी अपनी थी।
  • हर एक काम में हाथ बटाना उसके स्वभाव में था,लेकिन उसका सबसे प्रिय बच्चों को गणित पढ़ाना,उन्हें चारित्रिक,नैतिक,धार्मिक शिक्षा और संस्कार देना था।गणित विषय को वह इतनी तन्मयता से पढ़ाती थी कि छात्र-छात्राएं उसकी कार्यशैली को देखकर दंग रह जाते थे।उन्हें यह विश्वास ही नहीं होता था कि गणित जैसे विषय को कोई इतने सरल और सहज तरीके से भी पढ़ा सकता था।
  • परंतु वास्तविकता यही थी।उसे गणित विषय से आत्मिक लगाव था।यह कहने में उसे एक गहरा आत्मिक सुख मिलता था।छात्र-छात्राओं के माता-पिता उसके गुणों से अभिभूत होकर उस पर अगाध विश्वास करते थे।छात्र-छात्राओं के भविष्य के बारे में उसकी सलाह के बिना किसी का काम न चलता था।उसका परामर्श सर्वोपरि था।एक तरह से बच्चों से उसका रक्त संबंध तो नहीं था परंतु भावनात्मक जुड़ाव गहरा था।अतः छात्र-छात्राओं के अभिभावक की सी भूमिका अदा करती थी।विद्यार्थी भी अपनी कल्पना दी के प्रति प्रेम से भरे थे।कल्पना दी उन्हें महान महिला गणितज्ञा,गणितज्ञों के प्रेरक प्रसंग सुनाती,होमवर्क कराती,खाने-पीने की चीजें देती और सबसे बढ़कर अपना भरपूर प्यार उन पर निछावर करती।
  • इन बच्चों के लिए उनकी कल्पना दी सब कुछ थी और कल्पना दी के लिए ये बच्चे सब कुछ थे।इन विद्यार्थियों के सिवा उसका कोई अपना न था।

3.गणितज्ञा का परिवार और शिक्षा (Mathematician’s Family and Education):

  • कल्पना दी के माता-पिता बचपन में ही चल बसे थे।मां का किसी गंभीर बीमारी के कारण देहांत हो गया था,तब वह बहुत छोटी थी।उसकी मां के बारे में ज्यादा कुछ याद नहीं।बस इतना याद है कि उसने पिताजी से जब माँ के बारे में जानना चाहा,तो उनकी आंखें भर आई थी।वह कुछ बोल नहीं सके,बस आंसू उनकी अंतर्कथा और अंतर्व्यथा कहते रहे।उस दिन सब मौन में समा गया,पर अगले दिन उसकी नन्ही-सी ऊँगली थामकर पूजा के कमरे में ले गए।वही उनका अध्ययन कक्ष,पूजा कक्ष,शयन कक्ष सब कुछ था।अध्ययन कक्ष में अलमारी में रखी हुई एक तस्वीर को दिखाते हुए बोले,बेटी यही माँ है,हमारी माँ है,मैंने शुरू से ही इसकी आराधना की है।न जाने किस अनजानी प्रेरणा से कल्पना दी ने उस दिन पूछ लिया,मां का नाम क्या है? उत्तर में पिता का बहुत गहरे दर्द में सना स्वर उभरा गणित देवी (सरस्वती देवी)।
  • बाद में अपनी अनोखी गणित देवी (सरस्वती माँ) मां की कथा उसने पुस्तकों में पढ़ी।तब से वह गणित देवी (सरस्वती मां) की सगी बेटी बन गई।बालमन जब-जब माँ के लिए तड़पता,वह गणित देवी (सरस्वती माँ) के चित्र के सामने बैठकर रो लेती।कभी-कभी तो इसी तरह रोते-रोते सो जाती,पर जब जगती तो एकदम तरो-ताजा होती।बाद में एक दिन उसने पिता को बताया की तस्वीर वाली गणित देवी (सरस्वती माँ) उसके स्वप्न में आती है।बहुत सारा प्यार करती है,कहती है तुम मेरी अपनी बेटी हो।सुनकर पिता की आंखें एक बार फिर उमड़ी,लेकिन इस बार भी वह मौन रहे।
  • पढ़ते,घर का काम करते,इसी तरह दिन-महीने-वर्ष बीते।तभी एक दिन पिता छोड़कर चले गए।उसे तो ज्यादा कुछ पता नहीं चला,बस उस समय इतना मालूम हुआ कि सोए हुए पिताजी जगे नहीं।पड़ोस के लोगों ने जब डॉक्टर को बुलाया,तो उसने ‘नो मोर’ कह दिया।उस दिन वह बहुत रोई-बिलखी थी।माता गणित देवी (सरस्वती) की तस्वीर के सामने बैठकर बहुत उलाहने दिए थे,पर माँ ने स्वप्न में आकर उसे पता नहीं क्या समझाया कि वह एक बार फिर से मुस्करा पड़ी।
  • तब से किसी ने कभी रोते हुए नहीं देखा।कोई करीबी रिश्तेदार नहीं था,उसने किसी का द्वार खटखटाना उचित नहीं समझा।पैतृक मकान था,बैंक में कुछ रुपया था।मदद के लिए गणित देवी (सरस्वती देवी) के अदृश्य हाथ थे।उसने अपनी पढ़ाई जारी रखी।विद्या देवी सरस्वती के प्रति समर्पित उसके जप-तप ने उसे प्रखर मेधा का वरदान दिया था।विद्यालय,महाविद्यालय,विश्वविद्यालय सभी स्तर पर उसे छात्रवृत्ति मिलती रही।एमएससी (गणित शास्त्र) में प्रथम स्थान पाकर वह उत्तीर्ण हुई।विश्वविद्यालय में उसे सर्वोच्च अंक मिले थे।इसी के साथ उसने सी. एस. आई. आर. द्वारा आयोजित की जाने वाली शोध छात्रवृत्ति की परीक्षा भी सर्वश्रेष्ठ अंकों से उत्तीर्ण की थी और अब वह अपने ही विश्वविद्यालय में अंकों का रहस्य पर कुछ विशेष शोध कार्य कर रही थी।

4.महिला गणितज्ञा की कार्यशैली (Working Style of Female Mathematician):

  • उपर्युक्त तो उसके पढ़ाई-लिखाई के कार्य थे।इसके अलावा ढेरों काम थे,जो वह पड़ोसियों,विद्यार्थियों के लिए करती थी।पड़ोस के बुजुर्ग अपने घरों में उसका उदाहरण देते हुए कहते थे,देखना है तो तुम अपनी कल्पना दी को देखो।बनना है तो उसके जैसे बनो।कितनी शिष्ट,शालीन और सौम्य है।कर्मठता तो उसमें कूट-कूटकर भरी हुई है।न कभी किसी से झगड़ा,न कभी किसी से शिकायत।अपने काम में जुटी रहती है।दूसरों के भी दस काम कर देती है।ऊपर से पूजा-पाठ करने के लिए समय निकाल लेती है।पढ़ाई-लिखाई में अव्वल है ही।बुजुर्गों द्वारा की जाने वाली इस प्रशंसा में अतिशयोक्ति तनिक भी नहीं होती थी।
  • उसको सबसे ज्यादा पसन्द था,बच्चों को गणित पढ़ाना,उन्हें सिखाना।आसपास के सभी बच्चे अपनी कल्पना दी के प्रभाव से बहुत कुछ सीख गए थे।प्रातः काल उठना,नित्यकर्म से निवृत्त होकर नियमित गणित देवी (सरस्वती मां) महामंत्र का ध्यान करना,माता-पिता और अपने बड़ों को रोज प्रणाम करना उन सबकी नियमित आदत बन गई थी।
  • सबने अपने पढ़ने और खेलने का समय निश्चित कर लिया था।यह सब किसी भय से नहीं प्रेम से हुआ था।कल्पना दी छात्र-छात्राओं को कभी भी नहीं डांटती थी।डांटना तो जैसे उसे आता ही नहीं था।बस जब कभी बच्चों के किसी काम में कोई कमी दिखाई देती,तो वह उन्हें कुछ भी नहीं कहकर बस अपनी कमी निकालने लग जाती।थोड़ा-सा गंभीर होकर कहने लगती,मुझमें ही कुछ कमी होगी।
  • मैं ही नहीं तुम लोगों को ठीक से समझा पाती हूँगी।विद्यार्थी अपनी कल्पना दी कि इन बातों से परेशान हो जाते।वे बार-बार वायदा करते कि अब किसी भी तरह से कोई गलती नहीं होने देंगे।उन्हें अपनी कल्पना दी को थोड़ा-सा भी दुःखी करना बिल्कुल भी मंजूर नहीं था।
  • कल्पना दी भी छात्र-छात्राओं को मुस्कराते हुए देखना चाहती थी,लेकिन साथ ही उसकी यह भी चाहत थी कि बच्चे मनोयोग से गणित का अध्ययन करें।उसकी क्रिया में उनके विचारों की उत्कृष्टता एवं भावनाओं की सरलता हर तरह से झलके।इसके लिए उसने बच्चों से व्रत लिया था कि वह पूरे दिन में कोई-न-कोई एक अच्छा काम जरुर करेंगे।यह अच्छा काम गणित की पढ़ाई-लिखाई,अध्ययन,खेलकूद या नियमित ध्यान-योग से अलग था।
  • इसका मतलब था किसी की सेवा-सहयोग करना,किसी को सहायता पहुंचाना,किसी रोते हुए को हँसाना,किसी दुःखी जन को सुखी करना।बच्चे अपनी कल्पना दी को सुखी करने के लिए दिन भर में एक-न-एक कोई अच्छा काम अनिवार्य रूप से कर लेते थे।कभी तो किसी बीमार को दवा लाकर देते या फिर कभी उसकी कोई अन्य सेवा करते।कभी किसी वृद्ध या वृद्धा को सड़क पार करा देते।फिर प्रसन्नता से अपनी कल्पना दी को अपने किए हुए कामों का ब्योरा देते।
  • छुट्टी के दिनों में कल्पना दी बच्चों के खेलकूद में भागीदार होती।उनके लिए खासतौर पर लिखी गई गणित पजल,गणित पहेली,गणित की कविताएं सुनातीं।अब तो बच्चों को ये पजल,पहेली,कविताएं रट गई थीं।वे सब मिलकर उन्हें हल करते थे और गाते थे “एक दो तीन चार गणित से हुआ प्यार,
    जागो रे जागो अब गणित पढ़ने का हुआ भोर,
    डूबे गणित के ज्ञान के प्रकाश में,चहुँ दिशा में फैले गणित का ज्ञान,
    आई जगने की नई प्रातः,आलस छोड़ों अब गणित पढ़ने का हुआ समय।

5.महिला गणितज्ञा की साधना (The Spiritual Practice of a Female Mathematician):

  • एक अकेली लड़की क्या-क्या करती है? क्या-क्या कर लेती है? देखकर लोग हैरत से हैरान हो जाते।टीवी,सिनेमा,पॉप म्यूजिक,तकनीकी और इंटरनेट की तेज रफ्तार के इस युग में छात्र-छात्राओं का ध्यान-योग,आराधना,अध्ययन एवं सेवा में जुटे रहना किसी बड़े-से-बड़े अचरज से कम नहीं था,पर वह स्वयं इसे आश्चर्य नहीं मानती थी।उसका कहना था की सच्ची बात भले ही देर से समझ में आए,लेकिन जब आ जाती है तो न भूलती है,ना छूटती है।फिर बच्चे तो वैसे भी बहुत समझदार होते हैं,बस उन्हें प्यार और धीरज से समझाने-बताने की जरूरत है।फिर तो वह ऐसे पक्के हो जाते हैं कि कुछ पूछो मत,लेकिन एक बात है,उन्हें समझाने वाला वैसे स्वयं करें।
  • बेटी,तुम्हें कभी कोई इच्छा नहीं होती? तुम्हें कभी कोई चाहत नहीं होती? यदा-कदा पड़ोस की प्रौढ़-बुजुर्ग महिलाएं व पुरुष उससे पूछ लेते।जवाब में वह हंसकर कहती,होती है,होती क्यों नहीं? पर मेरे पास एक कल्पवृक्ष है,जिससे सब कुछ मिल जाता है और प्रायः बिना मांगे मिल जाता है।ज्यादा पूछने पर वह उन्हें सरस्वती मंत्र सुना देती।सरस्वती मंत्र की चमत्कारी सामर्थ्य उसके जीवन में प्रत्यक्ष थी।मां सरस्वती के आंचल की छाया में वह कितनी सुखी-प्रसन्न थी,इसे सब देख रहे थे।प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या? लोगों को मानने पर विवश होना पड़ता।उसकी प्रत्यक्ष अनुभूतियों की वेगवती धारा ने अनेकों को अपने में बहा लिया था।सरस्वती महामंत्र के अनुष्ठान के प्रति अगणित लोगों की श्रद्धा प्रबल और प्रगाढ़ हो चली थी।
  • उसके मन में कोई चाहत नहीं बची थी।सतत सरस्वती साधना से उसका चित्त निष्कल्मष हो गया था।यदि कभी उससे कोई उसके भविष्य के बारे में पूछता,तो वह हंस देती।इस हंसी में बहुत कुछ होता था।एक रहस्य,आत्मा से उपजी प्रसन्नता का उजलापन,आध्यात्मिक जीवन की जगमग ज्योति,सभी कुछ इसमें घुले-मिले थे।उसकी रहस्यमय हँसी के बारे में सबको तब पता चला,जब वह एक दिन देर तक अपने घर से बाहर नहीं आई।बच्चे उसका हाल मालूम करने गए,देखा उनकी दीदी अपने अध्ययन कक्ष में सरस्वती के चित्र के सामने पद्मासन पर बैठी है,पर न जाने क्यों आज उसका सिर अपने माता सरस्वती के चित्र के सामने पूजा की चौकी पर टिका है।बच्चे थोड़े घबराए,उन्होंने अपने माता-पिता को भागकर बताया।सभी लोग दौड़े हुए आए।कुछ ने चिकित्सक को भी बुला लिया था।
  • थोड़ी देर में सभी को सत्य पता चल गया।सबने जान लिया कि कल्पना दी के प्राण माता सरस्वती में विलीन हो गए थे।मां सरस्वती अपनी पुत्री को अपने आंचल में छुपाकर हंस रही थी।बच्चों के साथ वृद्धजन भी एकबारगी बिलख उठे।हालांकि थोड़ी देर बाद बच्चों से सबको पता चला की कल्पना दी ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि थोड़े ही दिनों में वह अपनी मां के पास चली जाएँगी,लेकिन तभी बच्चों को याद आया की कल्पना दी ने उनसे कहा था कि वह उनके लिए अपना संदेश छोड़ जाएंगी।सबने इधर-उधर चीजों को उलट-पलट देखा।एक कागज के टुकड़े पर दो पंक्तियां लिखी थी:
  • ‘एक गणितज्ञ संसार से विदा होता है,तो हजार गणितज्ञ पैदा हो जाते हैं।
    एक रास्ता बंद होता है तो हजार रास्ते खुल जाते हैं।।
    सचमुच ही कल्पना दी के द्वारा गढ़े गए बच्चे हजार गणितज्ञों,हजार रास्तों की तरह पैदा होकर-हजार रास्ते खोल रहे थे।
    उपर्युक्त आर्टिकल में महिला गणितज्ञा का त्याग (Sacrifice of Female Mathematician),महिला गणितज्ञा का उत्कृष्ट त्याग (The Outstanding Sacrifice of Female Mathematician) के बारे में बताया गया है।

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6.गणितज्ञ और राजनीतिज्ञ में अंतर (हास्य-व्यंग्य) (Difference Between a Math Teacher and a Politician) (Humour-Satire):

  • एक व्यक्ति:गणितज्ञ और राजनीतिज्ञ में क्या अंतर है?
  • दूसरा:कोई अंतर नहीं।गणितज्ञ भी पहले गणित से और राजनीतिज्ञ भी राजनीति से पहले तो बच्चों को डराते हैं फिर कहते हैं कि सब कुछ ठीक हो जाएगा,डरने की कोई बात नहीं।

7.महिला गणितज्ञा का त्याग (Frequently Asked Questions Related to Sacrifice of Female Mathematician),महिला गणितज्ञा का उत्कृष्ट त्याग (The Outstanding Sacrifice of Female Mathematician) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.क्या साधना से गणित की सिद्धि हो सकती है? (Can Mathematics Be Perfected by Spiritual Practice?):

उत्तर:पहले मन संयम हो,फिर साधना तब सिद्धि प्राप्त होती है।मन कई विकारों से ग्रस्त हो,मन दुर्गुणों से भरा हो तो सिद्धि (गणित का ज्ञान) प्राप्त नहीं किया जा सकता है।जैसे फूटी हुई बाल्टी से पानी निकल जाता है उसी प्रकार मन में छेद हो (दुर्गुण हों) तो साधना नहीं हो सकती और साधना के बिना सिद्धि (गणित का ज्ञान) प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न:2.स्मरण करने में क्या ध्यान रखना चाहिए? (What Should Be Kept in Mind in Remembrance?):

उत्तर:देखा जाए कि कौन-सी घटनाएं स्मरण रखने योग्य हैं? किन बातों की उपयोगिता है? किन तथ्यों को चिरकाल तक स्मृति पटल में जमा रहना आवश्यक है? जो उपयोगी जान पड़े,उन्हें गंभीरतापूर्वक समझने का प्रयत्न किया जाए,उन पर चित्त को एकाग्र किया जाए।कई-कई बार उन्हें मौन रूप से एवं वाणी से दोहराया जाए।जरुरी लगे तो नोट करके रखा जाए।ऐसा करते रहने से उन्हें केवल उपयोगी व आवश्यक तथ्य स्मृति में बने रहेंगे अपितु स्मरण शक्ति भी अनायास ही इस प्रक्रिया में बढ़ती चलेगी और व्यक्ति को प्रतिभा संपन्न,विचारशीलों की श्रेणी में ला खड़ा करेगी।

प्रश्न:3.क्या पढ़ा-लिखा होना पर्याप्त है? (Is Being Educated Enough?):

उत्तर:आधुनिक शिक्षा में आज जो जितना अधिक पढ़ा-लिखा है,वह उतना ही चालाक,पाखंडी दूसरों को चूसने,सताने वाला होता जा रहा है।अतः साक्षर होने के साथ-साथ शिक्षित होना,संस्कारित होना,चरित्रवान होना ज्यादा जरूरी है तभी पढ़ने-लिखने की सार्थकता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा महिला गणितज्ञा का त्याग (Sacrifice of Female Mathematician),महिला गणितज्ञा का उत्कृष्ट त्याग (The Outstanding Sacrifice of Female Mathematician) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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