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Inspiring Personality of Mathematician

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1.गणितज्ञ का प्रेरक व्यक्तित्त्व (Inspiring Personality of Mathematician),अद्भुत गणितज्ञ का प्रेरक व्यक्तित्त्व (The Inspiring Personality of Wonderful Mathematician):

  • गणितज्ञ का प्रेरक व्यक्तित्त्व (Inspiring Personality of Mathematician) दिव्य,भव्य तथा तेजस्वी था।सरलता,विनम्रता,अहंकाररहित गणितज्ञ के रहन-सहन,आचार-विचार और घर-परिवार को देखकर ऐसा लगता ही नहीं था कि हम किसी महान गणितज्ञ से मिल रहे हैं।आधुनिक युग में उच्च गुणों से संपन्न गणितज्ञ,अध्यापक,शोध कार्य करने वालों में विरले ही होते हैं।नाम था उनका ज्ञानवीर जो आडंबर,पाखंड और अंधविश्वास से बिल्कुल दूर थे।
  • यह अलग बात है कि हम ऐसे व्यक्तित्त्व को चमत्कारिक व्यक्तित्त्व मान लेते हैं।चमत्कार का अर्थ ऐसा कोई काम या वस्तु जो आपको चकित या चमत्कृत कर दे।आपको वही काम या वस्तु चकित व चमत्कृत कर सकती है जिसके बारे में आप जानते नहीं है परंतु जो जानता है उसके लिए कोई चमत्कार नहीं होता।
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2.आचार्य चक्रपाणि से गणितज्ञ का मिलन (Mathematician Meets Acharya Chakrapani):

  • एक नवयुवक एक नगर में पहुंचकर बोला मुझे गणितज्ञ सेठ ज्ञानवीर के दर्शन करने हैं।गौरवर्ण नवयुवक गर्मी से तपकर थका हुआ लग रहा था परंतु इतने पर भी उसके मुख पर कर्मठता की उल्लासपूर्ण चमक थी।
  • आप दूर से आए जान पड़ते हैं और आचार्य जान पड़ते हैं।मैं आपको प्रणाम करता हूं हाथ जोड़कर मस्तक झुकाकर उस महापुरुष ने बड़ी श्रद्धा के साथ प्रणाम किया और बोला:गणितज्ञ सेठ ज्ञानवीर को आपके दर्शन करने चाहिए।वह कब ऐसा सेठ और महान हुआ की उसके दर्शन करने आप जैसे आचार्य पधारें?
  • आगंतुक आचार्य कैसे जानता कि उसके सामने जो साधारण वेशभूषा पहने पुरुष है,उसी से वह मिलने आया है और यही वह गणितज्ञ है जिसने गणित विद्या के बल पर धन संपदा अर्जित की है और जिसकी धाक चारों ओर फैली हुई है।आगंतुक आचार्य ने उसे सामान्य व्यक्ति ही समझा और कहा मैं सेठ से मिलकर ही विश्राम करूंगा।आप उनका घर बतलाने की कृपा करें।
  • एक विनम्र और सहज उत्तर दिया:आपके इस सेवक का नाम ही ज्ञानवीर है।सेठ ज्ञानवीर ने सोचा आगन्तुक आचार्य दूर से आया है,वह बहुत थका हुआ लगता है।उसे उलझन में डालना अनुचित जानकर विनम्रता से कहा: आप भीतर पधारने की कृपा करें।
  • आप! इस संबोधन को सुनकर आने वाला आचार्य दो क्षण स्तब्ध देखता ही रह गया सामने खड़े पुरुष को।उसने क्या-क्या सोच रखा था उसके बारे में।कितने भव्य,तड़क-भड़क,सेवक,सैनिकों से घिरे व्यक्तित्त्व की कल्पना की थी उसने और यह उसके सामने खड़ा बिल्कुल साधारण दीखता व्यक्ति।
  • आप पधारे! सेठ ज्ञानवीर ने फिर आग्रह किया।उसे भवन के भीतर जाकर अपनी कल्पना सार्थक जान पड़ी।राजसदन भी कदाचित ही उतना सुसज्जित और कलापूर्ण था।सेवकों की तत्परता,उसने सुना था कि उत्तम सेवक स्वामी के भाव समझते हैं।यहां वह देख रहा था कि उसके स्वागत-सत्कार में आतिथेय को कहीं एक शब्द बोलने की आवश्यकता नहीं हो रही थी।
  • तनिक अवकाश मिलने पर एक सेवक से उसने पूछ लिया।यह सेठजी का निजी सदन है? ‘यह उनका अतिथि ग्रह है।’ बड़ा सम्मानपूर्ण उत्तर मिला।
  • सेठजी आप यदि अन्यथा अर्थ ना लें,मुझे एक बात पूछनी थी।आगन्तुक आचार्य अपने को रोक नहीं सका।आप आज्ञा करें।सेठ ने सरल भाव से कहा।
  • आप देश के श्रेष्ठ धनाढ्यों में से हैं।स्वदेश और विदेश के अनेक धनाढ्य आपके अतिथि होते होंगे।अनेक राजनीतिक नेताओं,मंत्रियों,मुख्यमंत्रियों का भी आपने आतिथ्य किया होगा।आपकी अतिथिशाला आपके गौरव के अनुरूप है।आप जानते हैं कि मैं आचार्य हूं और आचार्य अतिथि का सत्कार धर्मनिष्ठ गृहस्थ प्रायः अपने घर में करते हैं।परंपरागत से पृथक जो व्यवहार आपने किया है,उसका कुछ कारण तो होगा? मुझमें ऐसी कोई त्रुटि कोई प्रमाद आपने….. ।
  • नहीं देव! सेठ ने आतुरतापूर्वक आचार्य के आगे विनीत भाव से कहा और घुटनों के बल झुक गया।आप थके हुए हैं।आपकी समुचित सेवा मेरा कर्त्तव्य है।विश्राम कर लें।तब यह जन आपके श्री चरणों से अपने आवास को भी पवित्र करेगा।

3.गणितज्ञ के आवास पर वार्तालाप (Conversation at the Mathematician’s Residence):

  • आगंतुक आचार्य ने मन में सोचा था कि देश के अनेक राजनीतिक नेता कठिन समय में जिनसे ऋण लेते हैं,कहा जाता है कि जिनकी संपत्ति का कोई अनुमान नहीं है,उनका यह निजी आवास और ऐसा जीवन।विश्राम के पश्चात सेठजी के घर जाने पर आगन्तुक को जो अनुभव मिला वह चिन्तनीय था।
  • उसे जहां ले जाया गया था,कठिनाई से ही कह सकते हैं कि वह कोई सेठ का निवास स्थान था।क्योंकि बिल्कुल साधारण कमरे जो पक्की दीवारों से बने हुए थे,किंतु कुल 6 कक्ष।उसमें पूजन कक्ष भी शामिल था।
  • प्रायः आभूषण रहित एक सामान्य नारी ने उसका सत्कार किया।सेठ उन्हें बार-बार ‘देवी’ न कहते तो वह जान ही नहीं पाता कि वही सेठानी है।कोई विलास सामग्री नहीं।एक साधारण निर्धन व्यक्ति के घर में भी इससे अधिक साज-सज्जा और सामग्री मिल जाती है।
  • स्वच्छता,सुव्यवस्था,सौम्यता-अतिथि आचार्य था।अतः उसने केवल एक अनुभव किया कि वह किसी गृहस्थ के घर न पहुंचकर देवालय में पहुंच गया है।
  • युवक आचार्य अतिथि एक शब्द नहीं बोल सका था उस समय,जब वह सेठ के साथ उसके निज सदन गया था।उसने तो रात्रि के प्रथम प्रहर में अतिथिशाला में अपने पास बैठे से पूछा था:आप इतने अल्प में निर्वाह कैसे कर लेते हैं? इतना वैभव,इतना विस्तार और यह जीवन?अतिथि सांय-संध्या से पूर्व सेठ के व्यावसायिक कार्यालय भी हो आया था,विश्वविद्यालय में कई गणित के प्रोफेसर,प्राध्यापक,क्लर्क संभालने वालों की ओर।वहां देखा था कि एक व्यावसायिक विश्वविद्यालय के प्रबंध-प्रशासन और देश के प्रशासन में क्या अंतर होता है?
  • सेठ का आत्मीय जैसा सबके साथ उसने व्यवहार देखा तो यह भी देखा कि उनका कितना सम्मान करते हैं,उनके सेवक एवं सहचर।उनके प्रत्येक शब्द एवं संकेत को कितनी गंभीरता से ग्रहण किया जाता है।उस व्यक्ति का निजी जीवन,निजी जीवन की वह सादगी वह समझने का प्रयत्न कर रहा था।
  • सेठ ने सरल सा उत्तर दिया अल्प-अल्प में कहां निर्वाह कर पाता हूं,देवता? सेठ के व्यवहार और वाणी में आडंबर उसे सर्वथा नहीं दिखा।वे कह रहे थे:अपने देश भारत की संस्कृति,त्याग की संस्कृति है।धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष इसके चार पुरुषार्थ हैं।समाज और संस्कृति के लिए इन चारों की समान मजबूती आवश्यक है।इसमें अर्थ की मजबूती का दायित्व व्यवसायी वर्ग की है।अर्थ की मजबूती का एक ही अर्थ है:धन का अविरल प्रवाह,समाज के प्रत्येक व्यक्ति,प्रत्येक स्थिति तक समान रूप से पहुंचे।जिस पर उस प्रवाह-संचालन का दायित्व है,वहीं यदि उसे अवरुद्ध करने लगे,तो इससे बड़ी विडम्बना ओर क्या होगी? अवरुद्ध? आचार्य अतिथि को समझने में कठिनाई हो रही थी।
  • धन को भोगने के लिए अपने पास समेट-बटोरकर रख लेना,प्रवाह को अवरुद्ध करना ही हुआ।भगवान ने एक सेवा दी है।उसका पारिश्रमिक जितना लेना चाहिए,उससे अधिक न लेता हो तो उसकी कृपा है।शरीर की सुख-सुविधा के लिए कितना अल्प प्राप्त है,इस देश के अभावग्रस्त लोगों को।झोपड़ी के निवासी भी क्या मेरी जैसी सुविधा जुटा पाते हैं? जैसे सेठ को अपने साधारण रहन-सहन पर अभी संतोष नहीं था।सेठ दो क्षण मौन रहे और कहा-देव!आपने अपने आगमन से मुझे धन्य किया।आपका परिचय भी जानना चाहता था।

4.आचार्य का परिचय और उद्देश्य (Acharya’s Introduction and Purpose):

  • आचार्य ने बिना किसी भूमिका के परिचय दिया:गलकोटिया विश्वविद्यालय से गणित का अध्ययन पूर्ण कर देश भ्रमण को निकल पड़ा मुझे चक्रपाणि के नाम से जानते हैं देश भ्रमण के प्रारंभ से ही आपकी कीर्ति कानों में पहुंच चुकी थी।इधर आया तो आपके दर्शन की उत्कंठा हुई।मेरा अध्ययन आज पूर्ण हुआ,ऐसा अनुभव करता हूं।
  • आप प्रमुख भ्रमण पथ त्याग कर केवल एक व्यवसायी से मिलने मात्र के लिए तो यहां नहीं आए होंगे।सेठ ने इस बार आग्रह किया कि आचार्य संकोच त्यागकर उद्देश्य सूचित करें।
  • चक्रपाणि तनिक हंसकर बोला आपका अनुमान अयथार्थ नहीं है।मन में एक महत्वाकांक्षा थी।कुछ पल रुककर वह किसी सोच में डूब गया।सोच में क्यों डूब गया उसका विवरण दृष्टान्त में देखें।उसका मौन का कपाट खोलते हुए सेठ ने कहा-निस्संकोच कहिए।
  • आप जानते हैं कि देश में कुछ गिने-चुने ही गणित संस्थान हैं।मेरी आकांक्षा थी कि देश में एक विदेश स्तर का भारतीयता से परिपूर्ण गणित शोध संस्थान स्थापित किया जाए।ताकि जो छात्र-छात्राएं विदेश में शोध के लिए जाते हैं,वे अपना शोध कार्य देश में रहकर पूर्ण कर लें।
  • आकांक्षा नहीं संकल्प कहें।सेठ के मन में ऐसा उल्लास उमड़ पड़ा,जैसे उन्हें कोई निधि मिल गई हो।सेठ बोला वैसे तो जो विश्वविद्यालय मेरे द्वारा संचालित है,उसमें गणित का अध्ययन-अध्यापन की पूर्ण व्यवस्था है।मैंने गणित से शिक्षा प्राप्त करके अपने पूर्वजों की संपत्ति लगाकर इस विश्वविद्यालय की स्थापना की है।परंतु गणित के शोध संस्थान का अभाव मैं भी अनुभव करता हूं।
  • आचार्य बोला:पर अब मैं धन ग्रहण कर परिग्रही नहीं होना चाहता।आचार्य के कथन पर सेठ हँस पड़े और कहां:परिग्रह तो तब होगा जब आप विद्या और तप के प्रवाह-संचालन से मुंह मोड़ लेंगे।आपका धन लौकिक संपत्ति नहीं विद्या और तप है,भगवान ने आपको आचार्य बनाकर इसके प्रवाह को लोक जीवन तक प्रभावित करने का दायित्व सौंपा है।

5.गणितज्ञ का प्रेरक व्यक्तित्त्व का दृष्टांत (The Mathematician’s Example of Inspiring Personality):

  • जब गणितज्ञ सेठ ज्ञानवीर ने आचार्य चक्रपाणि से उसके आगमन का उद्देश्य पूछा,उसी दौरान सेठ का एक सेवक आया।वह दूध व नाश्ता लेकर आ रहा था कि असावधानीवश ठोकर खाकर गिर गया और दूध तथा नाश्ता नीचे आंगन में बिखर गया।सेठ ने सेवक को फटकारा और कहा कि सावधानीपूर्वक कार्य नहीं किया जा सकता है।सेठ द्वारा इस प्रकार फटकारे जाने पर आचार्य चक्रपाणि संकोच में पड़ गया कि इसे गणित शोध संस्थान के लिए धन का आग्रह करना बेकार है।जो एक छोटी सी बात के लिए सेवक को फटकार रहा है वह धन क्या देगा?
  • परंतु सेठ ने जब कहा कि आप निस्संकोच अपना उद्देश्य बताएं।तब आचार्य ने संकोच करते हुए बताया कि वह एक गणित शोध संस्थान स्थापित करना चाहता है।सेठ ने कहा कि आपने सेवक को फटकारने पर ऐसा महसूस किया होगा कि शायद सेठ सहायता-सहयोग नहीं कर सकेगा।परन्तु किसी वस्तु,धन का अपव्यय करना गलत है।सेवक की असावधानी के कारण यह नुकसान हुआ तथा उसको सावधान करने के लिए फटकार लगाई थी।
  • अब कहने को कुछ न बचा था।अतः भारत के प्रसिद्ध शहर में सेठ ने अपना वैभव उड़ेलना शुरू किया।गणित शोध संस्थान के साथ शोध करने वालों के लिए आवास और 300 प्रकोष्ठ बने।सभासदन 10 भागों में विभक्त था।शोध करने वालों के लिए 300 आवास कक्ष बने।भवन बनाकर भी सेठ को संतुष्टि नहीं मिली।उन्होंने तीन विशाल पुस्तकालयों की स्थापना के लिए अपरिमित धन दिया।
  • चक्रपाणि गणित शोध संस्थान के निदेशक बनें।उसमें कई सहयोगियों,शोध करने वालों,कर्मचारी आदि की भर्ती की।
  • शोध करने वालों तथा चक्रपाणि के प्रचंड पुरुषार्थ ने इस गणित शोध संस्थान को विद्यातीर्थ में बदल दिया।यह स्थान विश्व का अद्वितीय गणित शोध संस्थान हो सका था।चक्रपाणि के निर्देशन में स्थापना को पूर्ण कर सेठ ने कहा:आज मैं अपनी संस्कृति को अर्घ्य देकर,अर्थ (धन) का प्रयोजन सिद्ध कर सका।
  • भारतीय संस्कृति,भारत के गौरव को ऊंचा उठाने के लिए ऐसे ही व्यक्तित्त्वों की आवश्यकता है,तभी भारत गणित में सिरमौर हो सकता है।प्राचीन भारतीय गौरव को तभी हासिल किया जा सकता है।प्राचीनकाल में भारत विद्या,ज्ञान के क्षेत्र में विश्व गुरु रहा है।उस ऊंचाई को छूने के लिए महान पुरुषार्थ और जीवट की आवश्यकता है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में गणितज्ञ का प्रेरक व्यक्तित्त्व (Inspiring Personality of Mathematician),अद्भुत गणितज्ञ का प्रेरक व्यक्तित्त्व (The Inspiring Personality of Wonderful Mathematician) के बारे में बताया गया है।

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6.विद्यार्थी क्या कर रहा है? (हास्य-व्यंग्य) (What is Student Doing?) (Humour-Satire):

  • गणित शिक्षक एक बार छात्र-छात्राओं के अभिभावकों से संपर्क करने के लिए निकले।गणित शिक्षक एक छात्र के घर गए।
  • गणित शिक्षक (छात्र के पिता से):छात्र पढ़ने में कैसे,क्या है?
    पिता:श्रीमन् गणित में बहुत कमजोर है।
  • गणित शिक्षक (छात्र के पिता से):छात्र इस समय क्या कर रहा है?
  • छात्र का पिता:श्रीमन् आपके जाने का इंतजार कर रहा है।

7.गणितज्ञ का प्रेरक व्यक्तित्त्व (Frequently Asked Questions Related to Inspiring Personality of Mathematician),अद्भुत गणितज्ञ का प्रेरक व्यक्तित्त्व (The Inspiring Personality of Wonderful Mathematician) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.क्या गणितज्ञ ज्ञानवीर वास्तविक पात्र है? (Is Mathematician Gyanveer a Real Character?):

उत्तर:इस आर्टिकल में वर्णित घटनाएं,सभी पात्र और गणितज्ञ ज्ञानवीर आदि सभी कुछ हमारी कल्पना पर आधारित है और किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति या घटना से इस आर्टिकल का कोई संबंध नहीं है।किसी समस्या के समाधान के विषय में चर्चा करने के साथ कुछ शिक्षाप्रद बातों को रोचक ढंग से प्रस्तुत करने के लिए हमने इस पात्र की,काल्पनिक चरित्र की रचना की है।इस दृष्टांत में गणित का प्रसंग कम और कहानी अंग अधिक रखा गया है ताकि रोचकता भी बनी रहे और कुछ शिक्षाप्रद चर्चा भी की जा सके।

प्रश्न:2.तप किसे कहते हैं? (What is Austerity?):

उत्तर:द्वन्द्वों अर्थात् सुख-दुख,हानि-लाभ,जय-पराजय,सफलता-असफलता,शीत-उष्ण,गर्मी-सर्दी आदि के प्रति समभाव रखना यानी दोनों से प्रभावित न होना ही तप है।सुख-दुःख से प्रभावित न होना ही तप है,द्वन्द्व से दूर रहना ही तप है और यही आनंद है।जहां न सुख हो और ना दुःख हो वही आनंद होता है इसलिए तपस्वी ही वास्तव में आनंदित होता है।संसारी व्यक्ति सुखी भी होता है,दु:खी भी होता है,परंतु आनन्दित कभी नहीं होता हालांकि वह कहता जरूर है कि बड़ा आनंद आया,बड़े आनंद में हूं पर ऐसा वह आदतन कहता है बिना यह जाने की वास्तव में आनंद है क्या?

प्रश्न:3.आकांक्षा से क्या तात्पर्य है? (What Do You Mean by Aspiration?):

उत्तर:हरेक व्यक्ति में उन्नति करने की,जीवन में सफल होने की और आगे बढ़ाने की आकांक्षा रहती है।यह कोई बुरी बात नहीं,बल्कि आवश्यक है,क्योंकि आकांक्षा ही मनुष्य को प्रेरित करती है।अपनी आकांक्षा पूरी करने के लिए मनुष्य को तन,मन और लगन से जुट जाना चाहिए।परंतु जब कोई आकांक्षा हद से बाहर होती है और उसे पूरी करने के लिए सभी तरह के भले-बुरे उपाय का सहारा लिया जाता है तो वह गलत होती है।हद से बाहर आकांक्षा को पूरी करने के लिए जब व्यक्ति कदम बढ़ाता है तो दूसरों को नुकसान पहुँचाने में भी नहीं हिचकता।नैतिक,धर्म-कर्म,परहित आदि उसके लिए गौण हो जाते हैं।ऐसे मनुष्य की अंत में दुर्गति ही होती है।फिर वह उन्नति का साधन नहीं बल्कि साध्य बन जाती है।उसके पीछे मनुष्य दीवाना हो जाता है और अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है।

प्रश्न:4.दान कितने प्रकार के हैं? (How Many Types of Donations are There?):

उत्तर:दान तीन प्रकार के हैं:सात्विक,राजस,तामस।श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार:जो दान कर्त्तव्य समझकर,बदले में उपकार न करने वाले को तथा देश,काल और पात्र का विचार करके दिया जाता है,उसे सात्विक दान कहा गया है।
जो बदले में कुछ पाने के लिए तथा किसी फल की इच्छा से तथा क्लेशपूर्वक दिया जाता है उसे राजस दान कहा जाता है।
जो दान देश,काल तथा पात्र का विचार न करके,तिरस्कारपूर्वक कुपात्रों को दिया जाता है,वह दान तामस कहा गया है।
दान का पात्र वह माना गया है जो निर्धन विद्वान हो अथवा दीनहीन,रोगी,अपंग,निराश्रित अथवा संकटग्रस्त हो।अनाथों और विधवाओं की सहायता उत्तम दान है।इसके विपरीत दुष्टों,बनावटी भिखारियों,संदिग्ध संस्थाओं को पैसा देना निकृष्ट दान है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा गणितज्ञ का प्रेरक व्यक्तित्त्व (Inspiring Personality of Mathematician),अद्भुत गणितज्ञ का प्रेरक व्यक्तित्त्व (The Inspiring Personality of Wonderful Mathematician) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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