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Dedication of Great Mathematician

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1.महान गणितज्ञ का समर्पण (Dedication of Great Mathematician),महान् गणितज्ञ का समर्पित व्यक्तित्त्व (The Dedication Personality of Great Mathematician):

  • महान गणितज्ञ का समर्पण (Dedication of Great Mathematician) का प्रभाव ही था कि पिछड़े,दलित,दबे,कुचले लोगों के बच्चे भी गणित शिक्षा अर्जित कर रहे थे।गणितज्ञ त्रिलोचन ने अपने जीवट,समर्पण,धैर्य,अटूट संकल्प शक्ति के बल पर कच्ची व गंदी बस्ती के बच्चों को पढ़ाकर इंजीनियरिंग,मेडिकल व अध्यापन के क्षेत्र में अनेक बच्चों को पढ़कर पहुंचाया।
  • कोई सोच भी नहीं सकता था कि इन बच्चों को शिक्षित किया जा सकता है और उन्हें उच्च शिक्षा के क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सकता है।आधुनिक शिक्षा पद्धति इतनी व्यावसायिक हो चली है कि इसका सबसे अधिक फायदा अमीर घराने के बच्चे,शिक्षित परिवारों के बच्चे ही उठा पाते हैं।
  • दबे-कुचले,पिछड़े,दलित व आदिवासी बच्चों की शिक्षा की तरफ ध्यान ही नहीं जाता है।यदि समाचार पत्रों में इनकी दयनीय हालत पर ख़बरें छपती भी है तो सरकारी तंत्र में बैठे ऊंचे पद वाले सरकारी सहायता को हड़प जाते हैं और इन तक न तो कोई सहायता पहुंचती है और न इनकी कोई सुध लेता है।
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2.गणितज्ञ द्वारा साफ-सफाई (Cleanliness by Mathematician):

  • गणितज्ञ त्रिलोचन झाड़ू लगा रहे थे।झाड़ू सींक की थी और वे सींक वाली झाड़ू से पीपल के एक विशाल छायादार वृक्ष के चारों ओर बुहार रहे थे।पीपल के पास में नागफनियों की घनी झाड़ियां लगी हुई थी।यदा-कदा उन झाड़ियां में से सांप-बिच्छू निकल आते थे और खुले आकाश के तले पीपल की छांह में पढ़ने वाले बच्चों को काट खाते थे।तब भी उनके काटने से वहां किसी बच्चे की मौत नहीं हुई थी; क्योंकि गणितज्ञ त्रिलोचन को जंगली विषहर एवं रोग निवारक जड़ी बूटियों की अच्छी-खासी जानकारी थी।उनको मंत्रों का गंभीर ज्ञान था,जिसके माध्यम से वे शरीर से विष का शमन करना जानते थे।त्रिलोचन इसीलिए आसपास के गांव वालों के सहयोग से नागफनी की झाड़ियों को कटवा रहे थे और वहां फैले काँटों को झाड़ू से साफ कर रहे थे।
  • गणितज्ञ त्रिलोचन के साथ पढ़ने वाले बच्चे और उनके अभिभावक थे।सभी के समन्वित प्रयास से पीपल के पास की जमीन को समतल करते हुए उसकी सफाई हो सकी थी।गणितज्ञ त्रिलोचन खुले आकाश में विशाल पीपल के वृक्ष के नीचे बच्चों को पढ़ाते थे और इस दलित,पिछड़ी बस्ती में पढ़ाते हुए उन्हें लगभग 20 वर्ष हो गए थे।इसके पूर्व वे दलित,पिछड़ी व गंदी बस्ती के परिवारों में जा-जाकर यह समझाने का प्रयास कर करते रहे कि आप अपने बच्चों का भविष्य सँवार लें और गणित पढ़ने,शिक्षा अर्जित करने,पढ़ने-लिखने के लिए अनुमति प्रदान करें,परंतु अशिक्षा,गरीबी एवं समाज के उत्पीड़न से पीड़ित दलित व पिछड़े परिवार विश्वास ही नहीं सँजो पाते थे कि कभी उनके बच्चे समाज में शिक्षा भी प्राप्त करने के योग्य होंगे।
  • गणितज्ञ के हाथ में झाड़ू थी।बुहार रहे थे,अपने मुक्त विद्यालय को,जिसकी कहीं कोई सीमा नहीं थी और जो खुले हुए अनंत आसमान से आच्छादित था।उनके अंदर अपार प्रसन्नता बोध बनकर उमड़ रही थी,आंखों में आशाओं की ज्योति ज्योतिर्मय हो उठी थी,हृदय में आल्हादिनी मधुर संगीत के स्वर फूट रहे थे।गणितज्ञ त्रिलोचन इतने हर्षित एवं आनंदित थे कि उनके सामने समाधि का सुख बेस्वाद जान पड़ रहा था।कोई भला औरों के लिए इतना खुश एवं रोमांचित हो सकता है,यह अतिदुर्लभ एवं विरल घटना थी।गणितज्ञ त्रिलोचन इस विरल घटना के प्रत्यक्ष एवं जीवंत साक्षी थे।यह तो निष्काम सेवा का चरम एवं पराकाष्ठा थी,जो गणितज्ञ त्रिलोचन के माथे के स्वेद कणों के रूप में झर रही थी।गणितज्ञ के संग सभी बच्चे अपने हाथों में झाड़ू लेकर जमीन बुहार रहे थे।बच्चों के अभिभावक एवं माता-पिता कटी हुई नागफनी को दूर फेंकने का काम कर रहे थे।

3.गणितज्ञ द्वारा भजन गाना (Singing Hymns by Mathematician):

  • गांव के दलित समाज के जगदंबिका ने कहा:”श्रीमन!अब चलें,शाम हो आई है।तुलसी एवं पीपल के नीचे दीपक जला लें तथा मंडली में बैठकर थोड़ा भजन-कीर्तन कर लें।” जगदंबिका के प्रस्ताव से सभी सहमत हुए और समवेत स्वर में सभी ने एक साथ कहा:”हां श्रीमन! चलें,अब भजन-कीर्तन का समय हो गया है।” गणितज्ञ के अधरों पर स्मित-मंद मुस्कान बिखर गई।उधर अस्ताचलगामी सिंदूरी शाम सिंदूरी आभा बिखेर कर अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो रही थी।इन सुनहली किरणों के समक्ष गणितज्ञ की मुस्कान ओर भी सुर्ख और गहरी हो रही थी।गणितज्ञ बोले:”जगदम्बिका जी! चलें संध्यावंदन एवं कीर्तन कर लें।” सभी गांव के बीच स्थित एक विशाल भवन में पहुंचे।यह भवन सभी ग्रामवासियों के सहयोग से बनवाया गया था।यहाँ सामूहिक भजन-कीर्तन एवं अन्य कार्यक्रम कर लिया करते थे।वहां पर गांव की कुछ महिलाएं एवं बच्चे पहले से ही विद्यमान थे एवं भजन-कीर्तन की तैयारी कर रहे थे।
  • गणितज्ञ के साथ हुए सभी लोगों एवं बच्चों ने वहां के हैंडपंप से पानी निकालकर हाथ-मुंह धोया एवं भजन-कीर्तन में शामिल हो गए।पहले महिलाओं ने भगवान की आरती की,फिर कीर्तन आरंभ हुआ।महिलाओं ने कहा:”श्रीमान! आज आप भजन गाइये ना।” गणितज्ञ ने कहा:”आज जगदीश कहां गया।वह नहीं है क्या? उसकी आवाज बड़ी ही सुरीली एवं मधुर है।उसे ही गाने दो।” जगदीश हृदय से भजन गायन करता था।उसकी आवाज में ऐसा दर्द एवं गहराई थी कि लोग भावविभोर हो जाते थे।वह भी गणितज्ञ की खोज एवं अथक परिश्रम का परिणाम था।जगदीश ने कहा:श्रीमन मैं यहां हूं,पर आज आप भजन गाएँ।जब भी आप प्रसन्न होते हैं तो उस समय आपका गाया भजन सबके मन में प्रसन्नता भर देता है,सभी हर्षित एवं पुलकित हो उठते हैं और ऐसे भी आज हमारा मुक्त विद्यालय का प्रांगण ओर अधिक व्यवस्थित एवं विस्तृत जो हो गया है।
  • गणितज्ञ ने कहा:”अच्छा चलो आज हम ही भजन गाते हैं।” गणितज्ञ ने भजन गाना आरंभ किया।पूरी मंडली शांत और नीरव हो गई।इतनी शांत हो गई कि आसपास की सांसों की आवाज सुनाई पड़ रही थी।बाहर खड़े नीम,पीपल,बरगद,अशोक,तुलसी वाटिका एवं अन्य पेड़ों की पत्तियों के सरसराने की आवाज सुनाई पड़ रही थी।बाहर शाम ढल चुकी थी और रात्रि का प्रथम प्रहर दस्तक दे चुका था।इसी सन्नाटे को चीरती हुई गणितज्ञ की आवाज गूँजने लगी,पता नहीं गणितज्ञ की आवाज में कौन-सा ऐसा जादुई आकर्षण था कि सभी मुग्ध एवं विभोर होकर उसमें खो जाते थे।सभी उनके भजन में सम्मोहित एवं जीवन्त हो उठते थे।
  • वस्तुतः गणितज्ञ भौतिक ज्ञान के साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान भी रखते थे।वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।वे एक अच्छे गायक भी थे और उनका गीत उन्हीं के द्वारा सृजित था।गीत का भाव एवं मर्म,दोनों गहरे थे।उनके गीत के एक-एक शब्द में भावामृत अनुभव होता था।
  • गणितज्ञ त्रिलोचन गा रहे थे:”ऐ मन! अपने भगवान के घर चलो।यह संसार तो एक धर्मशाला है,एक दिन इसको छोड़कर जाना ही है।भगवान का घर अपना असली घर है।संसार को घर समझकर तथा इसमें भटक-भटक कर तू खूब चोटिल हुआ है।स्वार्थ एवं अहंकार के कारण तूने अपने असली रूप को नहीं जाना है।निस्सार संसार में पाने को खूब मचला है,पर यहां कुछ नहीं पाने को,खोने को सब कुछ है।पाने के लिए बस,दूसरों की सेवा ही एकमात्र सहारा है।औरों के अधरों में दो पल की खुशी देना ही यहां का सच है।औरों के लिए जीने में ही खुद का जीना है।असली जीवन जीने का सार यही है।”
  • इस बोल के संग गणितज्ञ ने खुद गाया।इसे कौन कितना समझा,पता नहीं,पर सभी उनके स्वर माधुर्य से भीग रहे थे और वे स्वयं अपने भक्तिरस में तैर रहे थे।इस प्रकार बड़े ही खुशनुमा माहौल के संग भजन-कीर्तन का दौर समाप्त हुआ।प्रसाद के रूप में नारियल,इलायची दाना एवं तुलसी दल वितरित किया गया।इसके बाद सभी अपने घर की ओर लौट चले।बच्चे उछलते-कूदते,आवाज करते चले गए।

4.गणितज्ञ की सादगी (The Simplicity of the Mathematician):

  • जगदंबिका,जगदीश आदि कुछ लोग पास की कुटिया तक गणितज्ञ के साथ गए,जहां वे रहते थे।उनका उपवास था।आज वे (गणितज्ञ) गंगाजल का ही सेवन कर रहे थे।सभी लोग इस बात से दुःखी रहते थे कि गणितज्ञ ने इस गांव के चहुँमुखी विकास के लिए इतना कष्ट सहा,घोर अपमान,तिरस्कार एवं निंदा झेली,फिर भी वे अपने प्राणों के अंतिम छोर तक इस गांव की सेवा में सदा तत्पर रहते थे,परंतु अपनी स्वयं की सेवा किसी ओर से नहीं कराते थे।
  • इतनी सादगी,इतना सरल एवं इतना पवित्र जीवन शायद ही किसी ने देखा हो।सब जानते थे कि गणितज्ञ को कहने से कोई लाभ नहीं कि लाइए हम आपका गिलास साफ कर दें,आपकी कुटिया को बुहार दें।वे कहते थे:” छोड़ो! तुम लोगों को सेवा की आवश्यकता है,मेरी आवश्यकता ही क्या है? इसलिए क्या करोगे तुम लोग।रहने दो,अब अपने-अपने घर जाओ,फिर कल मिलेंगे।” इसके पश्चात वे सदा की भांति अपनी कुटिया में कैद हो गए।

5.गणितज्ञ की साधना (Mathematician’s Practice):

  • गणित के निजी जीवन के बारे में कोई नहीं जानता था कि वे रात में कौनसी साधना करते थे,उनकी तपस्या का स्वरूप क्या था? पर यह जरूर था कि गांव वालों ने उनको सोते हुए कभी नहीं पाया,चाहे कितनी भी रात क्यों न बीत गई हो।किसी कष्ट-कठिनाई के साथ कोई उनकी कुटिया में आता तो भी वे जागते हुए ही पाए जाते थे।दिनभर की मेहनत एवं थकान की एक शिकन तक उनके माथे पर दृष्टिगोचर नहीं होती थी।पता नहीं कहां से उनको इतनी ऊर्जा मिलती थी।
  • खाने के संदर्भ में उनकी जीवन शैली बड़ी विचित्र थी।वे महीनेभर कभी भुने चने,कभी बिस्किट या कभी लड्डू या कभी अन्य कोई चीज ले लेते थे।हाँ,दोपहर में एक गिलास दूध लेते थे।भोजन के बारे में पूछने पर वह कहते थे:”हम वर्षभर चान्द्रायण व्रत करते हैं।” वहाँ लोग बस चान्द्रायण का नाम जानते थे और उसके अलावा कुछ नहीं जानते थे।वे सोचते थे कि यह कोई उपवास का नाम होगा।गणितज्ञ का एक पल भी व्यर्थ नहीं बीतता था।इसी कारण पूरा गांव मेहनतकश हो गया था।

6.लोकसेवकों की जिज्ञासा का समाधान (Queries of Public Servants):

  • एक दिन कुछ लोकसेवक इस गांव में आए; क्योंकि वह दलित व पिछड़ी बस्ती उस क्षेत्र से मीलों आगे विकसित हो चुकी थी।सरकारी सहायता के बगैर इतना विकसित होना उनके लिए एक आश्चर्य एवं हैरतअंग्रेज करने वाला विषय था।इसलिए कुछ लोकसेवक उस गांव के विकास के रहस्य को जानने के लिए आए थे।उस समय गणितज्ञ बच्चों को गणित पढ़ाने में व्यस्त थे।
  • उन लोकसेवकों से जगदीश ने कहा:”आप लोगों को गणितज्ञ से मिलने के लिए कुछ समय तक इंतजार करना पड़ेगा,क्योंकि लोकसेवा के संदर्भ में वही आपकी जिज्ञासा को शांत कर सकते हैं या फिर आपकी समस्याओं को सुलझा सकते हैं।हम तो केवल इतना जानते हैं कि गणितज्ञ महोदय ने हमारे जीवन एवं गांव के परिवेश को एकदम परिवर्तित कर दिया है।उनके सान्निध्य में हम दलित एवं पिछड़े वर्ग में सामान्य जीवन जीने लगे हैं।हमारे बच्चे यहां पढ़ते हैं तथा यहां से इंजीनियरिंग,गणित के प्राध्यापक,गणित के अध्यापक,प्राध्यापक,अध्यापक एवं मेडिकल आदि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अध्ययन करने लगे हैं।
  • लोकसेवकों को जगदीश की इन बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था,परंतु सचाई वही थी,जो वह बता रहा था।इसी समय गणितज्ञ त्रिलोचन वहीं चौपाल पर पहुंचे,जहां जगदीश उनको कुछ समझा रहा था।लोकसेवकों ने गणितज्ञ को प्रणाम किया।गणितज्ञ ने ससम्मान एवं आदरपूर्वक उनका अभिवादन स्वीकार कर उन्हें यथास्थान बैठने के लिए कहा।
  • बिना भूमिका के सीधी बातों में आकर गणितज्ञ ने उन लोकसेवकों से कहा:”आपसे पूर्व भी हमारे पास ऐसे कई लोकसेवक आ चुके हैं और उन सबकी समस्याएं यही थीं कि प्रचुर मात्रा में सरकारी सहायता के बावजूद दलित एवं पिछड़े समाज में कोई विशेष परिवर्तन क्यों नहीं नजर आता?” गणितज्ञ ने सभी के मन की बातों को छेड़ दिया था।वे सभी यही तो जानने आए थे।सभी ने समवेत स्वर में जवाब दिया:”हां श्रीमन! यही तो हमारी समस्या है।आखिर इसका समाधान क्या है?”
  • गणितज्ञ की धीर-गंभीर दृष्टि उन पर पड़ रही थी और वे इसी अंदाज में बड़े ही सहज भाव से बोले: “किसी भी पिछड़े समाज को मुख्यधारा में लाने के लिए,केवल सरकारी सहायता ही पर्याप्त नहीं है।मुख्य बात तो यह है कि इस समाज के लोगों की जीवनशैली में परिवर्तन करना आवश्यक है और जीवनशैली में परिवर्तन करना आसान कार्य नहीं है।यह अत्यंत धैर्यपूर्वक और दीर्घकाल तक की जाने वाली प्रक्रिया है।आप गहराई से सोचें तो पाएंगे कि इंसान या समाज की वर्तमान दुरवस्था का कारण उनके अतीत के कर्मों में सन्निहित होता है।जिन कर्मों के कारण व्यक्ति और समाज इस हेय एवं दयनीय स्थिति में जीने के लिए विवश है,उससे ठीक विपरीत शुभ एवं सत्कर्मों के माध्यम से वांछित एवं आशातीत परिवर्तन लाया जा सकता है।
  • एक लोकसेवक ने कहा:” इस परिवर्तन की प्रक्रिया कैसे संभव है और इसे कहां से आरंभ करना होगा।” गणितज्ञ ने कहा:”समाज की महिलाओं एवं पुरुषों को केवल पैसा या सहायता देना पर्याप्त नहीं है,बल्कि उस सहायता से उनके अंदर की क्षमता एवं रचनात्मकता के आधार पर आत्मनिर्भर होने का कार्य प्रारंभ करना चाहिए,उन्हें शुभ कर्मों से जोड़ना चाहिए,सेवा कार्यों में संलग्न करना चाहिए।इससे उनकी जीवनशैली में परिवर्तन आएगा,उनके जड़ जमाए नकारात्मक विचार बदलेंगे।
  • शिक्षा एवं विभिन्न प्रकार की सेवा एवं आत्मनिर्भर करने के कार्य के करने से उनके अंदर आत्मविश्वास जागेगा एवं वे स्वयं इन कार्यों में प्रवृत्त होंगे,हालांकि,यह आसान कार्य नहीं है,परंतु इसके बगैर दूसरा विकल्प भी तो नहीं है।जीवन शैली एवं विचारों में परिवर्तन किए बगैर पिछड़े,दलित या किसी ऐसे समाज का उत्थान संभव नहीं है।”इतना कहकर गणितज्ञ अभिव्यक्त विचारों को क्रियान्वित करने लगे और बच्चों को गणित शिक्षा देने में जुट गए।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में महान गणितज्ञ का समर्पण (Dedication of Great Mathematician),महान् गणितज्ञ का समर्पित व्यक्तित्त्व (The Dedication Personality of Great Mathematician) के बारे में बताया गया है।

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7.बॉयफ्रेंड की विशेषता (हास्य-व्यंग्य) (Boyfriend Speciality) (Humour-Satire):

  • बॉयफ्रेंड (गर्लफ्रेंड से):’तुम्हें मुझमें सबसे ज्यादा क्या अच्छा लगता है? मेरी पर्सनालिटी या मेरा गणित के प्रति जुनून?’
  • गर्लफ्रेंड ने जवाब दिया:तुम्हारी ऐसे मजाक करने की आदत।

8.महान गणितज्ञ का समर्पण (Frequently Asked Questions Related to Dedication of Great Mathematician),महान् गणितज्ञ का समर्पित व्यक्तित्त्व (The Dedication Personality of Great Mathematician) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.चान्द्रायण व्रत से क्या तात्पर्य है? (What is Meant by Chandrayana Vrat?):

उत्तर:इसका उद्देश्य पाप-मोचन है।घोर अपराधों के प्रायश्चित रूप में यह व्रत किया जाता है।

प्रश्न:2.क्या गणित शिक्षा व्यावसायिकता का दृष्टिकोण रखते हुए देना गलत है? (Is It Wrong to Give Mathematics Education with a Professionalism Approach?):

उत्तर:गणित शिक्षण या अन्य भौतिक विषयों की शिक्षा अथवा आध्यात्मिक शिक्षा व्यावसायिक दृष्टिकोण रखते हुए देना गलत नहीं है यदि छात्र-छात्राओं के हित व कल्याण का ध्यान रखा जाए।परंतु होता यह है की व्यावसायिकता घुसने के बाद अध्यापकों का ध्यान केवल धन अर्जित करने पर रहता है,छात्र-छात्राओं से धन लूटने,खसोटने पर रहता है और उनको गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की तरफ ध्यान ही नहीं रहता है।

प्रश्न:3.लोकसेवा से क्या तात्पर्य है? (What is Meant by Public Servant?):

उत्तर:जनता की सेवा में लगा हुआ हो उसे लोकसेवक कहते हैं।लोगों के दुःख,दर्द,तकलीफों का समाधान करने वाले को लोकसेवक कहते हैं।सरकारी कर्मचारियों को भी लोक सेवक कहते हैं।परंतु आजकल जो जनता को चूसने,ठगने,धोखाधड़ी करने में लगे हुए हैं उन्हें लोकसेवक समझा जाता है जो कि लोकसेवक का विकृत रूप है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा महान गणितज्ञ का समर्पण (Dedication of Great Mathematician),महान् गणितज्ञ का समर्पित व्यक्तित्त्व (The Dedication Personality of Great Mathematician) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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