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Laboratory Method in Mathematics

गणित में प्रयोगशाला विधि (Laboratory Method in Mathematics)

1.भूमिका (Introduction)

विज्ञान की सभी शाखाओं के अध्ययन में प्रयोगशाला विधि अत्यन्त लाभदायक सिद्ध हुई है। गणित के अध्यापन को सुधारने एवं अर्थपूर्ण बनाने के लिए हुई तो विद्वानों ने प्रयोगशाला विधि को लाभप्रद समझा तथा इस विधि को गणित के अध्यापन के लिए उपयुक्त पाया। इस विधि में बालक स्वयं गणित की प्रयोगशाला में उपलब्ध यंत्रों, उपकरणों तथा अन्य सामग्री की सहायता से गणित के तथ्यों, नियमों, सिद्धान्तों, सम्बन्धों आदि की सत्यता की जाँच करते हैं और उनका उपयोग व्यावहारिक समस्याओं के हल ज्ञात करने में करते हैं। इस विधि की सहायता से विद्यार्थियों की गणित के प्रति रुचि जागृत होती है तथा वे स्वयं उपकरणों की सहायता से प्रत्यक्ष ज्ञान की प्राप्ति करते हैं। इस विधि में ‘क्रिया से सीखना’ का सिद्धान्त काम में लाया जाता है। इसमें केवल पुस्तकीय ज्ञान को उपयोगी नहीं माना जाता।
गणित की प्रयोगशाला के लिए निम्न यंत्रों तथा उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है –
ज्यामिति के उपकरण, गोला, घन, वर्ग, त्रिभुज, चतुर्भुज आदि के माॅडल तराजू, कैंची, सर्वे के औजार, थर्मामीटर, बैरोमीटर, लीवर, गोलियाँ, ग्राफ पेपर, स्लाइड रूल, लैबल, कैलीपर, गणना करनेवाली मशीन, सेक्सटेन्ट, घड़ी, कम्प्यूटर, माप-तौल के विभिन्न साधन, आयकर आदि के चार्ट, बाजार भाव, बैंक की दरों के चार्ट, जनसंख्या के तथ्य आदि-आदि।। यह आवश्यक नहीं है कि अध्यापक गणित का प्रत्येक उप-विषय प्रयोगशाला विधि द्वारा पढ़ाए। गणित में अनेक ऐसे उप-विषय हैं जिनमें विभिन्न पक्षों को प्रयोगशाला में स्वयं विद्यार्थी उपकरणों की सहायता से समझ सकते हैं एवं प्रतिपादित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए ज्यामिति में विभिन्न त्रिभुजों, चार भुजाओं की आकृतियों, वृत्तों आदि की प्रायोगिक जानकारी विद्यार्थी प्रयोगशाला में मापकर कर सकते हैं। विभिन्न आकृतियों के क्षेत्रफलों को प्रयोगशाला में ज्ञात कर सूत्रों का निर्धारण किया जा सकता है। प्रयोगशाला में उपकरणों की सहायता से विद्यार्थियों को वस्तुओं, चित्रों आदि के आकार के बारे में सही ज्ञान मिलता है तथा जीवन में इनका व्यावहारिक उपयोग सम्भव है। इस विधि का सफल प्रयोग अध्यापक की सूझबूझ पर निर्भर करता है। दशमलव प्रणाली, माप-तौल, प्रतिशत, औसत ब्याज के फलन की विधि, समय और दूरी, समय और काम, समानुपात, बीजगणित के सूत्रों, ज्यामिति में प्रायोगिक कार्य आदि को प्रयोगशाला में कार्य द्वारा विद्यार्थियों को इन उप-विषयों के व्यावहारिक पक्ष का बोध कराया जा सकता है। आज के युग में लेखाचित्र का अत्यन्त महत्त्व है तथा इसको प्रयोगशाला में अध्ययन तथा तुलना का एक उपयोगी साधन बनाया जा सकता है। खेल के मैदान का क्षेत्रफल, विद्यालय भवन का सर्वे, पुताई एवं रंगाई के खर्च की गणना आदि ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ विद्यार्थी स्वयं तथ्यों का संकलन कर अपेक्षित जानकारी की गणना कर सकते हैं। प्रयोगशाला में माप-तौल, चित्र खींचना, तुलना करना, अनुमान लगाना, विज्ञान के तथ्यों का गणितीय विश्लेषण करना, माॅडल बनाना, ज्यामिति के प्रमेयों के प्रायोगिक हल ढूँढ़ना, विज्ञान की नयी खोजों के गणित पक्ष को समझना, अनेक सूत्रों का विश्लेषण कर उनकी सत्यता की जाँच करना आदि अनेक क्रियाकलाप हैं जिनको प्रयोगशाला में भली प्रकार समझा जा सकता है। समस्या हल करने की योग्यता का विकास प्रयोगशाला विधि से भली प्रकार किया जा सकता है।
इस विधि से गणित को अन्य विषयों के क्रियात्मक रूप से सम्बन्धित किया जा सकता है। भौतिक विज्ञान, रसायनशास्त्र, जीव विज्ञान, भूगोल, अर्थशास्त्र आदि विषयों के साथ प्रयोगशाला विधि से एक उपयोगी सम्बन्ध जोड़ा जा सकता है। विद्यालय के स्तर पर गणित को एक व्यावहारिक विषय के रूप में इस विधि द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है। इसके लिए यह आवश्यक है कि अध्यापक विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों तथा सामाजिक जीवन से आवश्यक तथ्यों का निरन्तर संकलन कर तथा उनका उपयोग समस्याओं के निर्माण में करे जिससे कि प्रयोगशाला में प्रायोगिक हल ढूँढ़ने में विद्यार्थियों को सही तथ्य उपलब्ध हों। प्रयोगशाला विधि को सफल बनाना अध्यापक की स्वयं की क्षमता एवं सूझ-बूझ पर निर्भर करता है। यह आवश्यक नहीं कि सारा कार्य प्रयोगशाला में ही हो। आवश्यकतानुसार विद्यार्थियों को किसी भी सम्बन्धित स्थल पर ले जाकर उनसे प्रयोग कराए जा सकते हैं। उदाहरणार्थ – किसी पहाड़ की चोटी की ऊँचाई ज्ञात करना, विद्यार्थियों द्वारा छोड़े गए राकेटों की गति ज्ञात करना, नदी को बिना पार किए उसकी चौड़ाई ज्ञात करना, खेल के मैदान में दौड़ के ट्रेक (Tracks) बनाना आदि ।इस प्रकार विद्यार्थियों को गणित के सैद्धांतिक पक्ष का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हो सकेगा।

Laboratory Method in Mathematics

Laboratory Method in Mathematics

2.इस विधि की सफलता निम्नांकित बातों पर निर्भर करती हैं(The success of this method depends on the following) –

(1.)गणित के विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोगों का निर्धारण सत्र के आरम्भ में कर लिया जाए।
(2.)उप-विषयों के अध्यापन एवं उनसे सम्बन्धित प्रयोगों में सामंजस्य स्थापित किया जाए।
(3.)प्रत्येक प्रयोग के लिए आवश्यक उपकरण अपेक्षित संख्या में उपलब्ध हों तथा प्रत्येक प्रयोगों के तथ्यों को लिखने के लिए पूर्व निर्धारित रूपरेखा हो।
(4.)अध्यापक द्वारा विद्यार्थियों को प्रयोगशाला में उचित मार्गदर्शन उपलब्ध हो।
(5.)प्रयोगशाला में निर्धारित सूत्रों आदि का उपयोग समस्याओं को हल करने में किया जाए।
(6.)प्रयोगशाला विधि द्वारा विद्यार्थियों में गणित के व्यावहारिक पक्ष के प्रति आवश्यक जागरूकता का विकास हो।
(7.)विज्ञान के विभिन्न विषयों के गणितीय पक्ष को प्रयोगशाला में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाए।
(8.)प्रयोगशाला के बाहर भी अन्य समीचीन स्थलों पर ले जाकर विद्यार्थियों से प्रयोग कराए जाए।
(9.)विद्यार्थियों को गणित के विभिन्न क्षेत्रों में नवीन ज्ञान प्राप्त करने में प्रोत्साहन दिया जाए। कम्प्युटर का प्रयोग भी किया जाए।

3.गणित में प्रयोगशाला विधि के लाभ(
Benefits of Laboratory Methods in Mathematics)
 –

(1.)प्रयोगशाला में सीखा हुआ ज्ञान स्थायी होता है तथा उसके प्रायोगिक उपयोग की सम्भावनाएं अधिक होती है।
(2.)इस विधि से जो ज्ञान प्राप्त होता है वह सक्रिय रहता है तथा स्थूल तथ्यों पर आधारित होता है।
(3.)इस विधि द्वारा विद्यार्थियों की प्रयोग करने की भावना को प्रोत्साहन मिलता है।
(4.)इससे गणित के सिद्धान्तों, प्रयत्नों, संकल्पनाओं, सम्बन्धों विधियों आदि का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त करना सम्भव है।
(5.)विद्यार्थियों में निरीक्षण एवं तर्क करने की क्षमता का विकास होता है।
(6.)विद्यार्थियों को प्रयोगशाला एवं कक्षा के बाहर भी गणित के प्रयोग एवं अध्ययन के अवसर मिलते हैं।
 (7.)विद्यार्थी प्रयोगशाला के उपकरणों आदि का कुशलता से उपयोग करना सीखते हैं जो उनको विज्ञान, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों में लाभप्रद सिद्ध होता है।
 (8.)विद्यार्थी अपनी कुशलता का प्रयोग विद्यार्थियों के समुचित विकास में कर सकता है।
 (9.)मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह विधि अत्यन्त उपयोगी है।
 (10.)विद्यार्थी इस विधि से गणित के अनेक उप-विषयों का निर्धारित सीमा के बाहर भी ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं तथा सम्बन्धित विषय-सामग्री के विभिन्न पक्षों के बारे में सोचने के अवसर प्राप्त करते हैं।
 सीमाएँ –
 (1.)यह विधि सभी विद्यार्थियों के लिए समान रूप से उपयोगी नहीं है क्योंकि प्रत्येक विद्यार्थी की कार्यक्षमता समान नहीं होती है।
 (2.)प्रयोगों के द्वारा गणित के सिद्धान्तों की खोज आसान कार्य नहीं है।
 (3.)यह एक बहुत ही धीमी विधि है तथा निर्धारित पाठ्यक्रम को इसकी सहायता से समय पर पूरा नहीं किया जा सकता।
 (4.)यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि विद्यार्थी गणित के प्रत्ययों को प्रयोग के बिना समझ नहीं सकते हैं। यह एक गलत धारणा है।
 (5.)प्रत्येक अध्यापक इस विधि का सफलता से उपयोग नहीं कर सकता है।
 (6.)इस विधि में उपकरण आदि पर अधिक व्यय करना पड़ता है जो कि वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों के कारण हमारे शिक्षा संस्थानों के लिए सम्भव नहीं है।
 (7.)गणित के अनेक उप-विषय हैं जिनको इस विधि से नहीं पढ़ाया जा सकता है।
 (8.)यह विधि छोटी कक्षाओं के लिए उपयोगी नहीं है क्योंकि इस स्तर के विद्यार्थी उपकरणों से सीखने के बजाए खेलना शुरू कर देते हैं।
 (9.)गणित के सूक्ष्म विचारों को केवल कक्षा में अध्यापक द्वारा ही पढ़ाया जा सकता है।
 (10.)इस विधि से विद्यार्थी गणित के अनेक उप-विषयों का निर्धारित सीमा के बाहर भी ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं तथा सम्बन्धित विषय-सामग्री के विभिन्न पक्षों के बारे में सोचने के अवसर प्राप्त करते हैं।

4. गणित के प्रयासों के उदाहरण(Examples of mathematical efforts) –

 (1.)दाशमिक सिक्कों से सम्बन्धित प्रयोग।
 (2.)माप सम्बन्धी इकाइयों पर आधारित प्रयोग।
 (3.)तौल सम्बन्धी इकाइयों पर आधारित प्रयोग।
 (4.)बाजार में वस्तुओं के भावों पर आधारित प्रतिशत एवं लाभ-हानि से सम्बन्धित प्रयोग। इस प्रकार के प्रयोगों को सफल बनाने के लिए वास्तविक तथ्यों का संकलन आवश्यक है।
(5.)औसत सम्बन्धी प्रयोग जिनमें विद्यार्थी दिए हुए तथ्यों का प्रयोग कर उनकी केन्द्रीय प्रवृत्ति का अध्ययन करते हैं। यहाँ पर विद्यार्थी तीनों केन्द्रीय प्रवृत्तियों अर्थात् मध्यमान (Mean) ,मध्यांक(Median) , बहुलांक(Mode) का अध्ययन कर सकते हैं।
(6.)विद्यार्थी विभिन्न संख्याओं के वर्ग ज्ञात कर सम्बन्धित नियम ज्ञात कर सकते हैं – जैसे जिस संख्या में 5 इकाई के स्थान पर है तो इसके वर्ग में अवश्य प्राप्त की संख्या 25 होगी। इसी प्रकार संख्याओं के वर्गमूल, घनमूल आदि की सारणी तैयार की जा सकती है। अध्यापक विद्यार्थियों को ऐसी सारणियाँ बनाने को कह सकता है जिनमें ऐसी संख्याओं को लिखा जाए जिनके वर्गमूल तथा घनमूल पूर्ण संख्या में नहीं ज्ञात नहीं किए जा सकते हैं। इन सारणियों को प्रयोगशाला में प्रदर्शित किया जा सकता है। वर्गो तथा घनों के क्रमशः क्षेत्रफल तथा आयतन सम्बन्धी प्रयोग भी किए जा सकते हैं।
(7.)बैंकों तथा सरकारों द्वारा जमा पूँजी तथा कर्जों की ब्याज दरों की सारणियाँ तैयार करना तथा पूँजी को अधिक लाभ से जमा कराने की परिस्थितियों का अध्ययन।
(8.)कमरे के माॅडल तैयार कर उनके फर्श, छत, चारदीवारी के क्षेत्रफलों से सम्बन्धित प्रयोग।
(9.)समय, दूरी, काम आदि के प्रयोग।
(10.)विभिन्न त्रिभुजों के चित्र खींचना, उनका क्षेत्रफल ज्ञात करना तथा उनके सम्बन्धों का अध्ययन। त्रिभुजों के माॅडल तैयार करना।
(11.)चार भुजाओं वाले क्षेत्रों का अध्ययन एवं उनके माॅडल बनाना। उनके क्षेत्रफल ज्ञात करना।
(12.)वृत्तों तथा गोलों के माॅडल तैयार करना तथा उनके क्षेत्रफल एवं आयतन ज्ञात करना।
(13.)आँकड़ों के लेखाचित्र खींचना तथा उनमें प्रदर्शित तथ्यों को समझना।
(14.)बीजगणित के सूत्रों को संकेतों तथा रेखाचित्रों द्वारा प्रदर्शित करना।
(15.)ज्यामिति के अनेक साधनों का जीवन की परिस्थितियों में व्यावहारिक प्रयोग करना तथा उनसे सम्बन्धित क्षेत्रों का अध्ययन करना।
(16.)बेलनाकार वस्तुओं का निर्माण करना, उनको मापना तथा उनके पृष्ठों का क्षेत्रफल तथा सम्पूर्ण क्षेत्रफल ज्ञात करना।
(17.)ज्यामिति में समुच्चय सिद्धान्त के नियमों का प्रयोग करना तथा आकृतियों को संकेतों से प्रदर्शित करना। समुच्चय सिद्धान्तों की क्रियाओं आदि को चित्रों से प्रदर्शित करना।
(18.)आँकड़े एकत्रित कर सांख्यिकी के सूत्रों का उपयोग करना।
(19.)रैखिक प्रोग्रामन द्वारा समस्याओं को हल करना।
(20.)ज्यामिति के विभिन्न साध्यों के चित्रों को सही खींचकर प्रदर्शित करना।
(21.)गणित की विभिन्न विशेष समस्याओं का संकलन तथा उनके हलों को चार्टों आदि द्वारा प्रदर्शित करना।

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