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Education and coaching centre in hindi

 Education and coaching centre

शिक्षा तथा कोचिंग सेंटर(Education and coaching centre):-

Education and coaching centre

Education and coaching centre

(1.)अर्थ तथा उद्देश्य(Meaning and Purpose) :-

कोचिंग अंग्रेजी का शब्द है जिसका अर्थ होता है प्रशिक्षण देना, पढ़ाना या शिक्षा देना ।इस प्रकार कोचिंग सेंटर का अर्थ हुआ कि ऐसा स्थान जहां परीक्षा की तैयारी करवाई जाती हो तथा शिक्षा देने का स्थान ।

दूसरी ओर शिक्षा का अर्थ है सीखना या सिखाना ।इस प्रकार कोचिंग  और शिक्षा समान अर्थ रखने वाले शब्द हैं ।परन्तु व्यावहारिक रूप से कोचिंग ज्यादा व्यावसायिकता का रूप हैं ।

कोचिंग तथा शिक्षा का व्यापक रूप में उद्देश्य है कि छात्रों का सर्वांगीण विकास (मानसिक, चारित्रिक तथा आध्यात्मिक) अर्थात् शिक्षा छात्रों में जीवन के सुधार के लिए उसके विवेक को जागृत करती है जिससे छात्रों के चिन्तन, चरित्र तथा व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन हो।चिन्तन चरित्र तथा व्यवहार में परिवर्तन से छात्र ओर अधिक प्रतिभावान, कर्त्तव्यनिष्ठ तथा व्यक्तित्व सम्पन्न हो ।

संकुचित अर्थ है कि छात्रों तथा परीक्षार्थियों को नियंत्रित वातावरण में निश्चित ज्ञान को एक समय विशेष की अवधि में देने का प्रयास करना ।

(2.)कोचिंग संस्थान की आवश्यकता(Coaching institute required) :-

शिक्षा के सम्बन्धित यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब विद्यालय शिक्षा के लिए उपयुक्त स्थान है तो फिर कोचिंग सेंटर की क्या आवश्यकता है? वस्तुतः आज के प्रतिस्पर्धात्मक में केवल विद्यालय में शिक्षा अर्जित करना समुचित नहीं है और पर्याप्त नहीं है ।विद्यालय में जो कमी रह जाती है उसकी पूर्ति तथा ओर अच्छा करने व छात्रों की क्षमताओं का विकास करने के लिए कोचिंग की आवश्यकता है ।प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कराने हेतु भी कोचिंग की आवश्यकता है ।दूसरा कारण है कि घर अध्ययन का वातावरण नहीं मिलता है इसलिए बच्चों के अतिरिक्त समय का सदुपयोग नहीं होता है ।तीसरा कारण है कि स्कूलों में पढ़ाई कराने के पश्चात बच्चों को अभ्यास करना आवश्यक है ।

(3.)कोचिंग सेंटर्स का कर्त्तव्य(Duties of coaching centers) :-

कोचिंग संस्थानों का यह कर्त्तव्य ही नहीं है कि परीक्षाओं तैयारी करा देना वरना कोचिंग सेंटर और विद्यालय में क्या अन्तर रह जाएगा? आखिर क्या कारण है कि विद्यार्थी या परीक्षार्थी परीक्षा देने के बाद स्वाध्यायशील नहीं होते हैं ।दरअसल इन दिनों शिक्षा हो गई है जिससे छात्र येन केन प्रकारेण परीक्षा उत्तीर्ण करना ही अपना ध्येय समझता है ।अतः कोचिंग सेंटर्स का कर्त्तव्य है उन्हें परीक्षा केन्द्रित दृष्टिकोण ही न रखकर, उनको छात्रों की स्वाध्याय में रुचि जागृत करने का प्रयास करना चाहिए ।इसके लिए कोचिंग सेंटर को उन्हें अपने सेंटर में एक पुस्तकालय, वाचनालय भी आवश्यक रूप से हों।

(4.)शिक्षकों की योग्यता(Teachers qualification) :-

कोचिंग सेंटर में ऐसे कर्मठ तथा समर्पण युक्त शिक्षक हों जो इस संसार रूपी कीचड़ में फँसे हुए को घसीटकर किनारे तक ला सके यह पुण्य परमार्थ ही है ।हर शिक्षक को यह सोचकर कार्य करना चाहिए कि वे दूसरे के घर का नहीं बल्कि स्वयं अपने घर का ही कचरा साफ कर रहें हैं ।

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(5.)अभिभावकों की सोच(Thinking of parents) :-

कुछ अभिभावकों की यह सोच होती है कि जब विद्यालय की फीस चुकाते हैं तो कोचिंग की फीस दुगुनी हो जाती है ऐसी स्थिति में निर्धन छात्र कोचिंग की फीस कैसे चुका सकते हैं? उत्तर में निवेदन है कि हम कई काम ऐसे करते हैं जो स्वेचाछापूर्वक करते हैं तथा उसमें धन भी खर्च करते हैं जैसे दान-पुण्य, तीर्थयात्रा, त्योहार, बच्चों की ख्वाहिशे, सेवा-सहायता तो कोचिंग तो बच्चों का भविष्य बनाने के केंद्र हैं शर्त यही है कि उत्कृष्ट कोचिंग सेंटर की सेवाएं ही ली जानी चाहिए ।ऐसे कोचिंग सेंटर की सेवाएं नहीं लेनी चाहिए जहां लूटने खसोटने का कार्य होता है ।

(6.)शिक्षा को इतना महत्त्व क्यों(Why is education so important):-

शिक्षा को इतना महत्त्व इसलिए देना आवश्यक है अर्थात् क्यों बच्चों को कोचिंग क्लासेज, पढ़ने हेतु प्रेरित किया जाए? हमारा निवेदन है कि व्यक्ति खेलकूद को फिर भी छोड़ सकता है लेकिन यदि शिक्षा से वंचित रखा जाए तो बच्चा मूढ़ और अज्ञानी रह सकता है ।नीति में कहा है कि “जो निरन्तर अध्ययनशील रहता है उसमें मूर्खता नहीं रहती है ।जो बराबर जप करता रहता है उसमें कोई पातक नहीं रह सकता है ।जो जागता रहता है उसे किसी का भी भय नहीं हो सकता है ।जो मौन धारण करनेवाला होता है उसको किसी से भी कलह नहीं होता है ।

(7.)अध्ययन का महत्त्व(Importance of study) :-

समाज में बिना पढ़े-लिखे या कम पढ़े लिखे को कोई नहीं पूछता है ।हर कोई उसका तिरस्कार करते हैं ।गँवार और मूर्ख समझकर उससे कोई बात नहीं करना चाहता है ।ऐसे व्यक्ति से कोई सलाह या सुझाव नहीं लेना चाहता है ।सार्वजनिक संस्थाओं में अशिक्षित को कोई पद नहीं मिलता है ।समाज में आदर व सम्मान का पात्र उन्हें ही समझा जाता है जो सुशिक्षित और सुसंस्कृत है और जिन्हें देश-विदेश की नवीनतम गतिविधियों का ज्ञान है ।जो लोग शिक्षा का महत्त्व नहीं समझते हैं वे शिक्षा लाभदायक होते हुए भी अनदेखी करते हैं ।जबकि धन का महत्त्व हम समझते हैं क्योंकि धन से सुख साधन खरीद सकते हैं इसलिए लोग धन कमाने के लिए कठिन परिश्रम करते हैं ।कुछ लोग तो धन कमाने के लिए नीति-अनीति का भी विचार नहीं करते हैं ।शिक्षा का महत्त्व वे लोग नहीं समझ पाते हैं जो मनुष्य योनि को मात्र शरीर समझते हैं तथा पेट भरने से संतुष्ट हो जाते हैं ।

(8.)मनुष्य जीवन का महत्त्व तथा शिक्षा का योगदान(Importance of human life and contribution of education) :-

यह मनुष्य जीवन बड़ी मुश्किल से तथा परमात्मा की कृपा से मिला है तथा हमारा जीवनयापन समाज के सहयोग से होता है ।परन्तु हमारे सौभाग्य का उदय तब होता है जब हम सार्थक विद्या अर्जित करते हैं और हमारे अज्ञान का पर्दा हट जाता है ।लेकिन साक्षर होने से ही विद्या अर्जित नहीं हो सकती है ।धर्म, अध्यात्म, ज्ञान तथा शिक्षा अर्जित करने का अर्थ यह मान लेते हैं कि पूजा-पाठ करना, स्वर्ग प्राप्ति, देवी देवताओं से उचित-अनुचित मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है तो यही समझा जाना चाहिए कि धर्म, अध्यात्म इत्यादि का ठीक से अर्थ समझा ही नहीं हैं ।साधु-वेश में कई व्यक्ति इस प्रकार घुस गए हैं जो मौज-मस्ती का निर्वाह तथा बिना सेवा-साधनों के ही सम्मान पाते रहते हैं ।सामान्य व्यक्ति इनकी पहचान नहीं कर पाता है ।जब तक हमारा विवेक जागृत नहीं होता अज्ञान नहीं हटेगा तो ऐसे लोगों की गिरफ्त में आ जाते हैं ।

कोचिंग सेन्टरों की भी यही हालत है हर जगह कुकुरमुत्तों की तरह कोचिंग सेन्टरों की स्थापना हो रही है तथा अधिकांश सेन्टरों का एक मात्र उद्देश्य है धन कमाना यानि उनका एकमात्र उद्देश्य है व्यावसायिक दृष्टिकोण ।जो छात्र-छात्राएं तथा अभिभावक इन सेन्टरों के बाहरी आकर्षण, भौतिक-सुविधाओं तथा उनके आकर्षण को ही देखते हैं वे ठगे जाते हैं ।

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सामान्यजन में ऐसी दूरदर्शिता नहीं पाई जाती है कि अच्छे तथा परमार्थ की भावना रखनेवाले कोचिंग सेंटर की पहचान कर सके ।वे तात्कालिक लाभ को देखते हुए उनके दुष्परिणाम उठाने को मजबूर हो जाते हैं ।लुटेरों, चतुरों, अनाचारियों की पहचान करना है तो अपने आपको प्रज्ञावान, प्रतिभासम्पन्न तथा विवेकवान बनाना होगा ।वातावरण ऐसा है कि जब प्रबुद्ध व्यक्ति ही ठगे जाते हैं तो सामान्यजन कहाँ लगते हैं ।इसलिए विवेक व विनम्रता के लिए शिक्षा की आवश्यकता है ।

विमर्श(Discussion) :-

प्राचीन काल में गुरुकुल शिक्षा के केंद्र थे जिनमें नि:शुल्क शिक्षा दी जाती थी ।वर्तमान काल आर्थिक युग है अतः शिक्षा का भी व्यावसायिकरण हो गया है ।वर्तमान में शिक्षा प्राप्त करने के केंद्र कोचिंग सेंटर और विद्यालय हो गए हैं ।व्यावसायिक दृष्टिकोण रखना बुरा नहीं है परन्तु दूसरों को नुकसान पहुंचाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना गलत हैं ।यदि परीक्षार्थियों का हित करके अपना जीवनयापन करना अर्थात् व्यावसायिक दृष्टिकोण रखने में बुराई नहीं है, यह भी अपना कर्तव्य है ही ।परीक्षार्थियों का हित इसमे है कि उनको की समस्याओं का समाधान करनेवाली शिक्षा भी प्रदान की जाए ।परन्तु यह शिक्षा पात्र व्यक्ति को ही देने में ही सार्थकता है वरना उनके जीवन में विवेक, विनय का समावेश नहीं हुआ तो ऐसा शिक्षित व्यक्ति अशिक्षितों  से ज्यादा स्वयं तथा दूसरों के लिए हानिकारक है ।

 
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