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Heuristic Method in Mathematics

अनुसंधान विधि (Heuristic Method in Mathematics)

1.भूमिका (Introduction)

इस विधि की खोज प्रोफेसर एच. ई. आर्मस्ट्रांग ने की थी। इसका प्रयोग विज्ञान विषय को पढ़ाने के लिए किया गया था किन्तु इसकी उपयोगिता के कारण गणित में भी इसका प्रयोग किया जाने लगा है। ह्यूरिस्टिक शब्द ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है “मैं खोजता हूँ”। इस विधि में विद्यार्थी अन्वेषक के रूप में क्रियाशील रहते हैं तथा वे स्वयं कार्य कर समस्याओं के समाधान प्राप्त करते हैं। यह विधि शैक्षिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसके द्वारा विद्यार्थियों में वैज्ञानिक और गणितीय दृष्टिकोण उत्पन्न होता है। बालक एक अन्वेषक है। वह निष्क्रिय श्रोता नहीं है। वह स्वयं सत्य को खोजता है। वह स्वयं तथ्यों का संकलन कर निष्कर्ष ज्ञात करता है।
इस विधि की प्रक्रिया का केन्द्र विद्यार्थी है। वह पूर्व ज्ञान, निरीक्षण, परीक्षण, चिंतन, तर्क-वितर्क आदि द्वारा खोज करता है तथा स्वयं को शिक्षित करने के प्रयास करता है। इस विधि में अध्यापक विद्यार्थियों के सम्मुख समस्याएं प्रस्तुत करता है तथा विद्यार्थी स्वयं अपने प्रयासों द्वारा इनका हल ज्ञात करते हैं। इन समस्याओं को विद्यार्थियों के समक्ष पाठ्यपुस्तकों या अन्य साधनों द्वारा भी प्रस्तुत किया जा सकता है। इस विधि में अध्यापक का कार्य विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करना है तथा उनकी सामग्री, यन्त्र आदि साधनों का उपलब्ध कराना है जिनका उपयोग विद्यार्थी समस्याओं को हल करने में करते हैं। यहाँ पर अध्यापक का मुख्य कार्य विद्यार्थी को मार्गदर्शन प्रदान करना है जिससे वे नवीन नियमों, हलों तथा सम्बन्धों की स्वयं अपने प्रयत्नों द्वारा खोज कर सकें। यहाँ पर इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि पाठ्य-सामग्री से सम्बन्धित नियमों आदि की खोज में विद्यार्थियों की आयु, योग्यता तथा क्षमता का भी ध्यान रखा जाए अन्यथा यह विधि लाभदायक सिद्ध नहीं होगी। समस्या समाधान में विद्यार्थी पूर्णतया स्वतंत्र है।

Heuristic Method in Mathematics

Heuristic Method in Mathematics

गणित के क्षेत्र में ऐसे अनेक उप-विषय हैं जिनसे सम्बन्धित सिद्धान्तों की खोज विद्यार्थियों द्वारा कराई जा सकती है। उदाहरणार्थ निम्नांकित बातों को विद्यार्थी स्वयं ज्ञात कर पाठ्यवस्तु को समझ सकते हैं। सत्यप्रियता, निश्चितता, सूक्ष्म निरीक्षणता, चिंतन शक्ति, आत्म शिक्षण इस विधि के अवयव हैं।
प्रतिशत – (1.)प्रतिशत एक भिन्न है जिसमें हर 100 होता है।
(2.)प्रतिशत का उपयोग तुलनात्मक अध्ययन में सहायक होता है।
(3.)प्रतिशत में 100 को आधार माना गया है क्योंकि 100 एक ऐसी संख्या है जो न तो बहुत छोटी है और न बहुत बड़ी।
वर्गमूल-(1.)वर्गमूल का सम्बन्ध ज्यामिति के वर्ग से है।
(2.)वर्गमूल एक वर्ग की भुजा का माप है। इसका सम्बन्ध संख्या रेखा से है।
(3.)जितना अधिक वर्गमूल होगा उतना ही अधिक उस वर्ग का क्षेत्रफल होगा। संख्याओं का वर्गमूल ज्ञात किया जा सकता है।
(4.)वर्ग वह संख्या है जो किसी वर्ग के क्षेत्रफल को प्रदर्शित करती है।
क्षेत्रफल -(1.)जो वस्तु जितना स्थान घेरती है वह उसका क्षेत्रफल कहलाता है।
(2.)आयत का क्षेत्रफल =लम्बाई  x चौड़ाई
(3.)कमरे की चारों दीवारों का क्षेत्रफल =2(ल.+चौ.)xऊँचाई
(4.)किसी कमरे के फर्श एवं छत का क्षेत्रफल समान होता है।
इस प्रकार अनेक ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं जिनके बारे में स्वयं विद्यार्थी सामग्री एवं अध्यापक की सहायता से जानकारी प्राप्त कर नयी परिभाषाओं एवं सिद्धान्तों को समझ सकते हैं। गणित की पाठ्यपुस्तकों में अनेक ऐसे उप-विषय हैं जिनके बारे में विद्यार्थी स्वयं नयी बातों की जानकारी प्राप्त कर सकता है यदि उसे इन्हें प्राप्त करने की विधि के बारे में आवश्यक संकेत और मार्गदर्शन उपलब्ध हो।
इस विधि में अध्यापक का कार्य मार्गदर्शन प्रदान करना है तथा विद्यार्थियों को स्वयं को अधिक परिश्रम करना पड़ता है। अध्यापक विद्यार्थियों के सम्मुख समस्या प्रस्तुत करता है तथा विद्यार्थी अपने प्रयास से सम्बन्धित सामग्री का संकलन करते हैं तथा उसका अध्ययन करते हैं। परामर्श के लिए अध्यापक उपलब्ध रहता है तथा विद्यार्थियों की कठिनाइयों को हल करता है और उन्हें आवश्यक सुझाव देता है जिससे कि प्रत्येक विद्यार्थी की प्रगति में कोई बाधा उपस्थित न हो। इस विधि की सफलता अध्यापक द्वारा वातावरण तैयार करने की क्षमता पर निर्भर करती है। इस विधि में अध्यापक द्वारा दिया गया मार्गदर्शन और प्रोत्साहन विद्यार्थियों को नए ज्ञान की खोज में अग्रसर करता है। अध्यापक द्वारा दिए गए संकेत विद्यार्थियों को सही रास्ते से नहीं हटने देते। उदाहरण के लिए अध्यापक ने विद्यार्थियों को निम्न समस्या प्रस्तुत की –
यदि एक आयत तथा एक समान्तर चतुर्भुज एक ही आधार तथा एक ही समान्तर रेखाओं के बीच में स्थित हों तो उनके क्षेत्रफलों से सम्बन्ध ज्ञात करो।
यहाँ पर अध्यापक यह संकेत देगा कि यदि हम आयत तथा समान्तर चतुर्भुज का क्षेत्रफल ज्ञात करें तो हम अवश्य कोई ज्ञात कर सकेंगे।
इसके पश्चात् विद्यार्थी अध्यापक द्वारा दिए गए विभिन्न मापों के आयत तथा समान्तर चतुर्भुज अपनी पुस्तिकाओं में बनाते हैं तथा उनका क्षेत्रफल ज्ञात करते हैं।

2.विद्यार्थियों की निम्नांकित कठिनाईयों को अध्यापक व्यक्तिगत या सामूहिक स्तर पर हल करेगा(The teacher will solve the following difficulty of the teacher at the individual or group level) –

(1.)समान्तर चतुर्भुज का क्षेत्रफल ज्ञात करने सम्बन्धी कठिनाई।
(2.)आयत का क्षेत्रफल ज्ञात करने सम्बन्धी कठिनाई।
(3.)दो त्रिभुजों के क्षेत्रफलों में परस्पर सम्बन्ध स्थापित करने सम्बन्धी कठिनाई।
(4.)इस समस्या से सम्बन्धित और भी कोई कठिनाई।

3.ह्यूरिस्टिक विधि से लाभ(Benefits from the Heuristic method) –

(1.)बालकों में सत्य को जानने की उत्सुकता बनी रहती है तथा वे तथ्यों को ध्यानपूर्वक समझने की आदत डाल लेते हैं। बालक स्वयं अन्वेषणकर्ता है।
(2.)विद्यार्थी तथ्यों एवं प्रमाणों को तर्क-वितर्क की कसौटी पर जाँचने के बाद ही स्वीकार करते हैं। यह प्रवृत्ति उनको भविष्य में उच्चस्तरीय अनुसंधान में उपयोगी सिद्ध होती है। स्वाध्याय की आदत पड़ जाती है।
(3.)विद्यार्थियों में सही प्रकार से आलोचना करने की क्षमता का विकास होता है। आत्मविश्वास का विकास होता है।
(4.)इस विधि द्वारा विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास होता है। निरीक्षण, परीक्षण, तुलना, निर्णय करने की शक्ति का विकास होता है।
(5.)इस विधि में अध्यापक का कार्य बालकों के विकास की दृष्टि से अत्यन्त लाभदायक होता है तथा विद्यार्थी अध्यापक की सेवाओं का वास्तविक लाभ उठा सकते हैं। ज्ञान का संकुलन स्व:प्रेरणा पर आधारित है।
(6.)इस विधि में विद्यार्थी स्वयं नवीन ज्ञान की खोज करते हैं तथा उनका ज्ञान स्थायी एवं व्यावहारिक होता है। स्मृति पर बोझ नहीं पड़ता है।
(7.)इस विधि में बालकों को गृह कार्य देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। स्वयं समस्याओं का अध्ययन कर हल खोजता है। अध्यापक एवं विद्यार्थी में निकटता आती है।
(8.)अध्यापक को बालकों के गुण तथा अवगुणों को जानने के अवसर मिलते हैं तथा वह उनसे व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित कर सकता है।
(9.)इस विधि में विद्यार्थी अपने अनुभवों तथा क्षमताओं का नवीन ज्ञान को प्राप्त करने के लिए अधिकतम उपयोग कर सकता है तथा अपने ज्ञान के स्तर में वृद्धि कर सकता है। अनुसंधान करने का प्रशिक्षण मिलता है।
(10.)विद्यार्थी सीखने की प्रक्रिया में ऐसी अनेक बातों की सही जानकारी प्राप्त कर सकते हैं जो केवल इसी विधि द्वारा सम्भव है। कठोर परिश्रम की आदत का विकास होता है।

4.ह्यूरिस्टिक विधि की सीमाएँ(Limitations of the Heuristic method) –

(1.)प्रारम्भिक अवस्था में बालकों द्वारा नवीन ज्ञान की खोज करना सम्भव नहीं है। उनका विकास इस विधि द्वारा अपेक्षित स्तर का नहीं होता। अतः उनसे अनुसंधान करने की आशा नहीं की जा सकती। यह विधि छोटी कक्षाओं में प्रायः असफल सिद्ध होगी। शिक्षण का कार्य अत्यन्त कठिन हो जाता है।
(2.)अध्यापक द्वारा औपचारिक अध्यापन आवश्यक है। सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को इस विधि से पढ़ाया जा सकता। गणित में कुछ उपविषयों को ही इस विधि से पढ़ाया जा सकता है। विद्यालय में वांछित वातावरण का अभाव।
(3.)कक्षा में सब विद्यार्थी समान क्षमता के नहीं होते हैं। अतः इस विधि का प्रयोग वर्तमान कक्षाओं के लिए सम्भव नहीं है। उचित पुस्तकों का अभाव है।
(4.)इस विधि में खोज कम तथा समय की बर्बादी अधिक होती है। वर्तमान पाठ्यक्रमों को निर्धारित समय में इस विधि से पूरा नहीं किया जा सकता। ऊँची आशा रखना नितान्त असंगत है।
(5.)अध्यापक के सम्मुख इस विधि द्वारा अनेक कठिनाईयां प्रस्तुत होती है। सब विद्यार्थियों के लिए सामग्री जुटाना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव है।
(6.)यह विधि केवल ऐसी कक्षाओं के लिए ही उपयोगी है जिनमें विद्यार्थियों की संख्या कम हो।
(7.)ज्ञान तथा सिद्धान्तों के अनेक ऐसे गूढ़ पक्ष हैं जो विद्यार्थियों को बिना अध्यापन के समझ में नहीं आ सकते हैं। इस विधि के भरोसे रहने से, विद्यार्थी केवल मोटी-मोटी बातें ही सीख पाएंगे तथा अनेक सूक्ष्म बातों से अनभिज्ञ रह जाएंगे।
(8.)परीक्षा केन्द्रित शिक्षा व्यवस्था में यह विधि व्यावहारिक नहीं है।
(9.)प्रत्येक अध्यापक के लिए यह विधि सम्भव नहीं है।

5.अध्यापकों को सुझाव(Suggestions to teachers) –

(1.)इस विधि का प्रारम्भिक स्तर पर उपयोग न करें।
(2.)विद्यार्थी गणित विषय में जब योग्यता प्राप्त कर लें तभी इस विधि का उपयोग कुछ चुने हुए उप-विषयों के लिए करें।
(3.)जब इस विधि का उपयोग किया जाए तो सारी कक्षा को विधि के बारे में आवश्यक एवं स्पष्ट निर्देश दें।
(4.)ज्यामिति तथा बीजगणित में ऐसे उप-विषय हैं जिनका चयन सोच-विचार कर करना आवश्यक है।
(5.)सामग्री का संकलन करने के पश्चात् हीरा इस विधि को काम में लाने की योजना बनानी चाहिए।
इस पद्धति में बालक एक अन्वेषक है। उसे सत्य की खोज करनी है। सूक्ष्म निरीक्षण, चिंतन शक्ति एवं आत्म शिक्षण की क्षमता की सहायता से तथ्यों का संकलन करना इस पद्धति की विशेषता है। प्रयोग एवं समस्या समाधान विश्लेषण प्रक्रिया के अंग है। इस प्रकार अनुसंधान प्रवृत्ति एवं तर्कसंगत चिंतन का विकास होता है।
हर्बार्ट स्पेन्सर का कथन इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। उन्होंने लिखा है, “बालकों के समक्ष कम से कम कथन करना चाहिए। उन्हें अधिक से अधिक खोजने के लिए प्रेरित किया जाए।”

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