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6 Tips for Success in Teaching Career

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1.शिक्षण करियर में सफलता के 6 टिप्स (6 Tips for Success in Teaching Career),शिक्षण करियर में सफलता के 6 बेहतरीन टिप्स (6 Best Tips for Success in Teaching Career):

  • शिक्षण करियर में सफलता के 6 टिप्स (6 Tips for Success in Teaching Career) के आधार पर न केवल सफलता प्राप्त कर सकते हैं बल्कि शिक्षण को नई दिशा भी दे सकते हैं।इसके भावार्थ को इस प्रेरक प्रसंग से समझ सकते हैं:
  • एक बार एक डिग्रीधारी युवक एक प्रसिद्ध उद्योगपति के पास रोजगार प्राप्त करने के उद्देश्य से गया। उद्योगपति ने उस पढ़े-लिखे युवक से पूछा कि आपने कौन-कौन सी पुस्तकें पढ़ी है।युवक ने पढ़ी हुई पुस्तकों के नाम बता दिए।तब उद्योगपति ने कहा कि उन पुस्तकों को एक बार फिर से पढ़ कर मेरे पास आओ।युवक ने उन पुस्तकों को पुनः पढ़ा तथा कुछ समय पश्चात युवक उद्योगपति के पास पुनः गया।उद्योगपति ने युवक का नाम,पता पूछा और फिर से कहा कि उन पुस्तकों को एक बार फिर से पढ़ो।युवक ने मन लगाकर तथा एकाग्रतापूर्वक फिर अध्ययन किया।उनका मनन-चिन्तन किया।साथ ही उद्योगपति द्वारा पुनः उन पुस्तकों को पढ़ने का रहस्य समझा।इसके पश्चात् युवक उद्योगपति के पास नहीं गया।तब उद्योगपति ने स्वयं युवक को बुलाया और उसे यथोचित पद पर नियुक्त किया।
  • इस प्रसंग का मर्म यह है कि जब तक हम पढ़ी हुई बातों का अनुशीलन नहीं करते हैं तब तक वह शिक्षा हमारे किसी काम की नहीं है।मात्र रटी हुई शिक्षा के आधार पर हम भटकते रहते हैं।वह शिक्षा न तो हमें रोजगार उपलब्ध करा सकती है और न ही हमारे जीवन को सही दिशा दे सकती है।यदि शिक्षा से प्राप्त एक गुण का भी ठीक से अनुशीलन (चिन्तन तथा गंभीर अभ्यास) (Careful Study) कर लें तो उसका अद्भुत प्रभाव हमारे जीवन में देखने को मिल सकता है।राजा हरिश्चंद्र ने सत्य का पालन किया,भगवान श्रीराम ने मर्यादा का पालन किया तथा भगवान श्री कृष्ण ने अनासक्त कर्म का पालन किया और कर्मयोगी कहलाए।इन्होंने एक-एक गुणों को धारण किया और आज संसार में उन्हें पूजा जाता है।
  • एक गुण को हम पकड़ लेते हैं और उसको धारण कर लेते हैं तो अन्य विभूतियां स्वयंमेव उनके पीछे-पीछे चली आती है।अब शिक्षण करियर में सफलता के 6 टिप्स (6 Tips for Success in Teaching Career) प्रस्तुत है:
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2.छात्र-छात्राओं के प्रति समर्पित हों (Be Dedicated to Students):

  • भारत में स्कूल तथा कॉलेज व विश्वविद्यालयों में अध्यापकों का अभाव है।इस अभाव की पूर्ति छात्र-छात्राओं के प्रति समर्पित भाव से की जा सकती है।समर्पित शिक्षक छात्र-छात्राओं की न केवल विषय से सम्बन्धित समस्याओं का समाधान करता है बल्कि छात्र-छात्राओं से सम्मान भी प्राप्त करता है।वस्तुतः भारतीय विद्यालयों में अधिकांश शिक्षक अन्यत्र जाॅब न मिलने मिलने पर विवश होकर शिक्षण व्यवसाय अपना लेते हैं।ऐसे शिक्षक छात्र-छात्राओं को समर्पित भाव से नहीं पढ़ाते हैं। पैसा कमाने की लालसा भी ऐसे अध्यापकों में कूट-कूटकर इस कदर भरी हुई होती है कि वे प्राइवेट ट्यूशन कराते हैं अथवा पार्टटाइम कोचिंग संस्थानों में पढ़ाते हैं।जहां पर उनकी औपचारिक नियुक्ति होती है वहाँ पर मन लगाकर नहीं पढ़ाते हैं बल्कि आधे-अधूरे मन से पढ़ाते हैं।छात्र-छात्राओं को ट्यूशन करने अथवा कोचिंग करने के लिए प्रेरित करते हैं।
  • जब तक शिक्षक विषय में पारंगत न हो,मन लगाकर न पढ़ाता हो तथा धन कमाने की लालसा इस कदर हावी हो नैतिक-अनैतिक तरीके से,कैसे भी धन कमाया जाए तब तक छात्र-छात्राओं के प्रति समर्पित भाव से अध्यापन नहीं कर सकता है। अध्यापक का अपने व्यवसाय व विषय के प्रति पूर्ण निष्ठा का होना आवश्यक है।परन्तु यथार्थ में इससे विपरीत स्थिति देखने को मिलती है।
  • यह सच है कि अध्यापन के प्रति निष्ठावान को अनेक कष्टों को सहना पड़ता है।मानवीय मूल्यों के लिए बहुत कुछ त्याग और बलिदान करना पड़ता है।अपना संपूर्ण जीवन तपश्चर्या में व्यतीत करना होता है।लेकिन छात्र-छात्राओं की सफलता और उनको मिलने वाले पुरस्कारों से ये सारे कष्ट आनन्द की अनुभूति में परिवर्तित हो जाते हैं।
  • जो अध्यापक केवल धन कमाने में की उधेड़बुन में लगे रहते हैं।अपने चारो ओर धन कमाने का जाल फैलाते हैं,वे धन तो कमा लेते हैं क्योंकि उनकी निष्ठा धन कमाने में है।परंतु उन्हें छात्र-छात्राओं से सम्मान और मानसिक शांति नहीं उपलब्ध होती है। हर व्यक्ति को निष्ठा के अनुसार प्राप्ति होती है।

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3.विद्यार्थियों को नैतिक व मूल्यों की शिक्षा दी जाए (Students Should be Taught Moral and Values):

  • शिक्षण संस्थान,शिक्षक तथा माता-पिता यदि यह सोचते हैं कि छात्र-छात्राओं को केवल पाठ्यक्रम पूरा करा दिया जाए तो निस्संदेह बहुत बड़ी गलती कर रहे होते हैं।छात्र-छात्राओं को परीक्षा में उत्तीर्ण करा देना,कोर्स की तैयारी करा देना,प्रतियोगिता परीक्षा पास करा देने के अलावा भी शिक्षण संस्थान,शिक्षक व माता-पिता के कंधों पर बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है।यह उत्तरदायित्व है छात्र-छात्राओं को संस्कारवान बनाना,नैतिकता,सदाचार और मूल्यों की शिक्षा देना।
  • मानवीय मूल्यों के लिए चरित्र का निर्माण करना तथा अपने व्यक्तिगत,सामाजिक व सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए रोजगार करने में सक्षम होना भी जरूरी है।शिक्षा के द्वारा इन दोनों स्तरों को प्राप्त किया जाना जरूरी है।विद्यार्थी में इन दोनों का निर्माण करने पर ही पूर्णता आती है।
  • परंतु वर्तमान शिक्षा में छात्र-छात्राओं को विशिष्ट कौशल अर्थात् करियर के लिए तो तैयार किया जाता है परंतु मानवीय मूल्यों,नैतिक मूल्यों और संस्कारों के पक्ष को खाली छोड़ दिया जाता है। नतीजा यह है कि प्रत्येक व्यक्ति धन कमाने में लगा हुआ है परंतु फिर भी उसे आत्म संतुष्टि नहीं मिलती है।60-70 की उम्र में ही शरीर जर्जर होकर संसार से विदा होने की तैयारी कर लेता है।

4.शिक्षक अपना दायित्व निभाएं (The Teacher Should Fulfill his Responsibility):

  • शिक्षा की सबसे प्रमुख धुरी छात्र,शिक्षक,पाठ्यक्रम है।शिक्षा की संपूर्ण योजना छात्र-छात्राओं के लिए तैयार होती है।परंतु उसको क्रियान्वित करने की सबसे प्रमुख भूमिका शिक्षक की होती है।क्या पढ़ना है,कितना पढ़ाना है और किसे पढ़ाना है ये सब बातें शिक्षक पर निर्भर करती है।बालक के संपूर्ण जीवन का रूपांतरण,कायाकल्प करना सबसे अधिक शिक्षक पर निर्भर रहता है।परंतु आज व्यावसायिक युग में निजी व सरकारी वेतनमान में इतनी खाई बढ़ गई है कि एक समान नीति लागू करना मुश्किल है।जहां सरकारी स्कूल में शिक्षकों को उचित वेतन मिलता है वहाँ शिक्षक को धन लोलुप न होकर छात्र-छात्राओं को शिक्षा प्रदान करने में संलग्न बने रहना चाहिए।
  • निजी क्षेत्र में वेतनमान में बहुत असमानता है।एक तरफ लाखों रुपयों का पैकेज प्राप्त करने वाले शिक्षक हैं तो ऐसे भी शिक्षक हैं जिनको अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल है।जिनको रोजी-रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल है ऐसे शिक्षक संस्थान में अध्यापन के अलावा ट्यूशन अथवा पार्टटाइम कोचिंग में पढ़ाकर अपना गुजर-बसर करते हैं।ऐसे शिक्षकों से आदर्शवादी होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।
  • यदि वेतनमान की विसंगति को दूर किया जा सके जो कि बहुत मुश्किल है तो आदर्शवाद की बात की जा सकती है।
    जिन शिक्षकों की आर्थिक आवश्यकताएं पूरी हो रही है उन्हें छात्र-छात्राओं के प्रति समर्पित होकर शिक्षा अर्जित करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।कुछ छात्र-छात्राएं ऐसे भी होते हैं जो शोध कार्य कर सकते हैं अथवा शोध करने के इच्छुक हैं उन्हें शोध कार्य करने में सहायता प्रदान करनी चाहिए।
  • एक शिक्षक शोध कार्य में तभी सहायता प्रदान कर सकता है जब वह पढ़ाने के साथ-साथ पढ़ने के प्रति जिज्ञासु हो।क्योंकि तकनीकी के इस युग में शिक्षक को नवीन ज्ञान ग्रहण करके अपने आपको अपडेट व अपग्रेड करते रहना चाहिए।

5.छात्र-छात्राओं की सफलता-असफलता की जवाबदेही कायम हो (Accountability of Success and Failure of Students Remains):

  • छात्र-छात्राओं को शिक्षा प्रदान करने में शिक्षक,प्रधानाध्यापक तथा माता-पिता की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।आज अनेक शिक्षण संस्थाएं हैं,पर्याप्त पुस्तकें,कोचिंग संस्थान,ट्यूटर तथा गाइड़े हैं।माता-पिता भी पढ़े-लिखे मिल ही जाते हैं।शिक्षा संस्थानों में हर तरह की भौतिक सुविधाएं हैं।उत्तीर्ण होने के लिए भी मात्र 33% अंक चाहिए।उसमें भी कहीं-कहीं 20 अंक सत्रांक के मिल जाते हैं।इन सबके बावजूद छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं।अनुत्तीर्ण होने पर शिक्षक,प्रधानाध्यापक,छात्र-छात्रा व माता-पिता एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हैं।
  • शिक्षण कार्य में इसकी समीक्षा होनी चाहिए कि किस स्तर पर लापरवाही बरती गई है।शिक्षा संस्थान के प्रधानाध्यापक के स्तर पर,शिक्षक के स्तर पर,छात्र छात्रा स्वयं अथवा माता-पिता के स्तर पर लापरवाही बरती गई है।नियमित रूप से दैनिक डायरी में इसका उल्लेख हो तो लापरवाही के स्तर का पता लगाया जा सकता है।आखिर मासिक,साप्ताहिक टेस्ट भी होते रहते हैं फिर भी छात्र-छात्राएं असफल हो जाते हैं।
  • यदि माता-पिता अपने बच्चों के साथ नहीं बैठते हैं अथवा उन्हें अध्ययन करने में सहायता नहीं करते हैं।ऐसी स्थिति में वे दैनिक डायरी में भी लापरवाही बरतेंगे।अध्यापक,प्रधानाध्यापक द्वारा दैनिक डायरी में किए गए प्रश्नों के उत्तर नहीं देंगे।इस प्रकार माता-पिता की लापरवाही का पता लगाया जा सकता है।छात्र-छात्राओं को दिए गए गृह कार्य को समय पर नहीं करते हैं।पाठ को समय पर याद नहीं करते हैं।सवालों को हल करने में रुचि नहीं लेते हैं तो मासिक,साप्ताहिक टेस्ट से पता लगाया जा सकता है।इस प्रकार छात्र-छात्राओं की लापरवाही का पता लगाकर उनकी जवाबदेही कायम की जा सकती है।
  • अध्यापक समय पर पाठ्यक्रम पूर्ण नहीं करवाता है।छात्र-छात्राओं द्वारा क्लास में पूछे गए सवालों,प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर नहीं देता है तो समय-समय पर छात्र-छात्राओं से फीडबैक लेकर अध्यापक की जवाबदेही कायम की जा सकती है। आज छात्र-छात्राएं असफल हो जाते हैं तो शिक्षक के वेतन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।न उसकी जवाबदेही कायम होती है।इसलिए शिक्षक की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।

6.शिक्षण में अप-टू-डेट रहें (Stay Up-to-date in Teaching):

  • तकनीकी के इस युग में नवीन अनुसंधान होते रहते हैं।शिक्षण में भी नई-नई बातों की खोज होती रहती है।जैसे प्राचीन काल में शिक्षण ज्ञान प्रधान था उसमें बालक पर विचार नहीं किया जाता था।बालक संबंधित ज्ञान प्राप्त करने की पात्रता रखता है या नहीं इस पर विचार नहीं होता था।आधुनिक युग में शिक्षण बाल केंद्रित है।यदि बालक की पात्रता गणित पढ़ने में नहीं है तो उसे गणित का ज्ञान जबरदस्ती देना उस पर थोपना या लादना उचित नहीं है।बालक की रूचि,जिज्ञासा व लगन जिस विषय में है वही उसे पढ़ाया जाता है।यदि पढ़ने में रुचि नहीं है खेल,संगीत,भजन,कला अथवा अन्य व्यवसाय में रुचि है तो सेकेंडरी/सीनियर सेकेंडरी स्कूल के बाद ही उसे व्यवसायिक शिक्षा का प्रशिक्षण दिया जा सकता है।
  • अतः शिक्षक तथा छात्र-छात्राओं को हमेशा ज्ञान के बारे में अप-टु-डेट रहना चाहिए।हमेशा नई-नई बातों के बारे में जानकारी प्राप्त करते रहना चाहिए।जानकारी प्राप्त करने के अनेक साधन है।पुस्तकें,इंटरनेट,सोशल मीडिया तथा विभिन्न वेबसाइट्स हैं जिनके द्वारा अपने काम की बातों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।आज विश्व के किसी भी कोने में कोई भी खोज व अनुसंधान हुआ हो,उसकी तत्काल जानकारी प्राप्त की जा सकती है।लेकिन इसके लिए चेष्टा तो स्वयं को ही करनी होगी।यदि हम सोते रहेंगे,निष्क्रिय रहेंगे,लापरवाही बरतेंगे तो ज्ञानरूपी प्रकाश आकर हमें नहीं जगाएगा।हर विद्यार्थी में किसी न किसी प्रकार की प्रतिभा होती है।विद्यार्थी की उस प्रतिभा का पता लगाकर उसे उभारने, निखारने की जिम्मेदारी शिक्षक,छात्र,माता-पिता व हम सभी की है।

7.शिक्षण कार्य की समीक्षा हो (Be a Review of Teaching Work):

  • छात्र-छात्राओं के शिक्षण कार्य की समीक्षा होती रहनी चाहिए।यह समीक्षा विद्यालय स्तर पर तो होती है।परंतु माता-पिता,अभिभावक तथा छात्र स्वयं द्वारा भी अपने शिक्षण कार्य की समीक्षा की जाती रहनी चाहिए।जहां पर कमजोरी दिखाई देती है तथा जिस स्तर पर कमजोरी दिखाई देती है उस कमजोरी को दूर करते रहना चाहिए।जैसे यदि अध्यापक के द्वारा पढ़ाने में लापरवाही हो रही है तो माता-पिता,प्रधानाध्यापक से मिलकर इस संबंध में संवाद करना चाहिए।इसके पश्चात उचित कदम उठाना चाहिए।परीक्षा परिणाम के आधार पर हायतोबा करना वैसा ही है जैसे सांप की लीक को पीटना।
  • यदि समय रहते शिक्षण की समीक्षा होती रहे तथा समय पर ही कमजोरी को दूर कर दिया जाए तो विपरीत परिणाम देखने को नहीं मिलेगा।दरअसल शिक्षण एक साधना है।शिक्षण बोझ नहीं लगना चाहिए बल्कि शिक्षण आनन्ददायक लगना चाहिए।शिक्षण छात्र-छात्राओं के रूपांतरण की प्रक्रिया है। शिक्षण से व्यक्तित्व निखरता है।शिक्षण व अध्ययन में छात्र केंद्र बिंदु है और प्रधानाध्यापक,शिक्षक,माता-पिता तथा अन्य उसके सहायक है,उसकी परिधि हैं,धुरी है।इसमें जो कोई भी अपने कर्त्तव्य का निष्पादन नहीं करता है तो शिक्षण कार्य का कचरा हो जाता है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में शिक्षण करियर में सफलता के 6 टिप्स (6 Tips for Success in Teaching Career),शिक्षण करियर में सफलता के 6 बेहतरीन टिप्स (6 Best Tips for Success in Teaching Career) के बारे में बताया गया है।

8.गणित के चमत्कारिक लाभ (हास्य-व्यंग्य) (The Miraculous Benefits of Mathematics) (Humour-Satire):

  • गणित टीचर (छात्रों से):गणित हल करने के कौन-कौनसे लाभ हैं? (What are the benefits of solving mathematics?)
  • एक छात्रा:वैसे तो गणित पढ़ने के अनंत लाभ हैं परंतु जिनको मैंने जाँचा और परखा है तथा सही पाया है वे निम्न हैं:
  • (1.)गणित की पुस्तक लेते ही आराम से नींद आ जाती है।
  • (2.)गणित के पीरियड में बातें करने का मौका मिल जाता है।
  • (3.)गणित दिमाग का दही कर देती है।
  • (4.)साथियों को परेशान करने का मौका मिल जाता है।
  • (5.)ट्यूशन के बहाने माता-पिता से ट्यूशन फीस ऐंठने का मौका मिल जाता है।
  • (6.)रटने की जरूरत नहीं पड़ती है।

9.शिक्षण करियर में सफलता के 6 टिप्स (6 Tips for Success in Teaching Career),शिक्षण करियर में सफलता के 6 बेहतरीन टिप्स (6 Best Tips for Success in Teaching Career) के संबंध में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.वोकेशनल शिक्षा का क्या उद्देश्य है? (What is the purpose of vocational education?):

उत्तर:व्यावसायिक शिक्षा का उद्देश्य विभिन्न पाठ्यक्रमों से कुशल कैंडिडेट्स को तैयार करना है।विशेष रूप से असंगठित क्षेत्रों में।इस शिक्षा का उद्देश्य स्वरोजगार के माध्यम से योग्यता का विकास करना है।व्यावसायिक शिक्षा औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान,आईटीआई काॅलेजों के माध्यम से दी जाती रही है लेकिन अब कुशल कैंडिडेट्स की बढ़ती मांग के कारण बहुत से निजी संस्थान भी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत इस क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं।
शिक्षाविदों का मानना है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली की कमजोरियों में से एक यह है कि यहां व्यावसायिक शिक्षा को उतना महत्त्व नहीं दिया जाता है जितना दिया जाना चाहिए।हर साल लाखों स्नातक तैयार होते हैं लेकिन मार्केट की डिमांड के अनुसार उनमें किसी खास हुनर का अभाव होता है।

प्रश्न:2.योग शिक्षक का कोर्स कहां से कर सकते हैं? (From where can you do the course of yoga teacher?):

उत्तर:छात्र-छात्राओं तथा प्रत्येक व्यक्ति को तनावरहित जीवन जीने के लिए योग को अपने दैनिक जीवन में शामिल कर लेना चाहिए। कोरोनावायरस संक्रमण की वजह से योग का ओर भी महत्त्व बढ़ गया है।योग शिक्षक बनने के लिए योग के हर पक्ष की जानकारी होनी चाहिए।भारत में अनेक शैक्षणिक संस्थान योग में सर्टिफिकेट,डिप्लोमा और डिग्री प्रदान करते हैं। प्रमुख संस्थान निम्न हैं:
(1.)महर्षि पतंजलि योग विद्यापीठ,हरिद्वार
(2.)डॉक्टर हरिसिंह गौड़ विश्वविद्यालय,सागर,मध्य प्रदेश
(3.)मुंबई विश्वविद्यालय,मुंबई
(4.)महर्षि महेश योगी प्रशिक्षण केंद्र,नोएडा
(5.)गांधी स्मारक प्राकृतिक चिकित्सा समिति,नई दिल्ली
(6.)देव संस्कृति विश्वविद्यालय,हरिद्वार,उत्तराखंड
(7.)भारतीय योग संस्थान,शालीमार बाग,दिल्ली
(8.)योग साधना केंद्र भारतीय विद्या भवन,नई दिल्ली
(9.)जैन विश्व भारती लाडनूं,राजस्थान
(10.)जेएसएम इंस्टीट्यूट ऑफ नेचुरोपैथी एंड यौगिक साइंसेस,तमिलनाडु
(11.)डाॅ.भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय,आगरा
(12.)अमरावती विश्वविद्यालय,अमरावती,महाराष्ट्र

प्रश्न:3.शारीरिक शिक्षक के लिए योग्यता क्या है? (What is the important qualification for a physical teacher?):

उत्तर:एक फिटनेस ट्रेनर के तौर पर आपको शारीरिक फिटनेस के साथ एरोबिक्स, फलेक्सीबिल्टी ट्रेनिंग,पोषण और ट्रेनिंग से जुड़े उपकरणों की जानकारी होना अनिवार्य है।योग व नैचुरोपैथी का ज्ञान होना अतिरिक्त योग्यता होगी।फिटनेस शिक्षक के रूप में अच्छी बातचीत और व्यावहारिक कला भी आनी चाहिए क्योंकि इस क्षेत्र में अनेक लोगों से मिलना होता है।

उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा शिक्षण करियर में सफलता के 6 टिप्स (6 Tips for Success in Teaching Career),शिक्षण करियर में सफलता के 6 बेहतरीन टिप्स (6 Best Tips for Success in Teaching Career) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

6 Tips for Success in Teaching Career

शिक्षण करियर में सफलता के 6 टिप्स
(6 Tips for Success in Teaching Career)

6 Tips for Success in Teaching Career

शिक्षण करियर में सफलता के 6 टिप्स (6 Tips for Success in Teaching Career) के
आधार पर न केवल सफलता प्राप्त कर सकते हैं बल्कि शिक्षण को नई दिशा भी दे सकते हैं।
इसके भावार्थ को इस प्रेरक प्रसंग से समझ सकते हैं:

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