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What is Dharma in hindi

1.धर्म क्या है? का परिचय (Introduction to What is Dharma in hindi),धर्म का अर्थ क्या है? (What is meaning of Dharma in hindi):

  • धर्म क्या है? (What is Dharma in hindi),धर्म का अर्थ क्या है? (What is meaning of Dharma in hindi):भारतीय संस्कृति में धर्म बहुत व्यापक अर्थ रखनेवाला शब्द है।जो धारण किया जाए वह धर्म है,कर्त्तव्यों का पालन करना धर्म है,जिनको कर्मों को करने से वर्तमान जीवन और आगामी जीवन सुधरता है वह धर्म है।इस की व्याख्या अत्यन्त व्यापक और गहराई लिए हुए है।
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2.धर्म क्या है? (What is Dharma in hindi),धर्म का अर्थ क्या है? (What is meaning of Dharma in hindi):

  • आहार,निद्रा,भय,मैथुन ये चारों पशुओं व मनुष्यों में समान है।फिर मनुष्य में विशेष क्या है?मनुष्य में विवेक,बुद्धि विशेष है जिसके द्वारा धर्माचरण करता है।अतः मनुष्य योनि अन्य योनियों से श्रेष्ठ है जिसमें धर्माचरण करके मनुष्य मोक्ष या मुक्ति प्राप्त कर सकता है।यदि मनुष्य सदाचरण तथा धर्म का पालन नहीं करता है तो उसके द्वारा मनुष्य योनि प्राप्त करने का कोई फायदा नहीं है।ऐसा धर्महीन जीवन पशु के समान है।हम सभ्यता के प्रारम्भ से गौर करें तो पाएंगे कि अन्य योनियों के जीवन व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया है जबकि मनुष्य के जीवन व्यवहार में बहुत परिवर्तन आ चुका है।ऐसा इसलिए सम्भव हो सका है कि उसने अपनी बुद्धि,विवेक का उपयोग किया है।जिन्होंने अपनी बुद्धि का प्रयोग अधर्म के लिए किया है उसका नैतिक व चारित्रिक पतन हुआ है।
  • धर्म व्यक्तिगत होता है सामाजिक नहीं।अतः धर्म का सम्बन्ध मनुष्य के आचार-विचार से होता है। जब विचार का पालन किया जाता है तो वह आचार है तथा आचार को धारण करना धर्म है।भारतीय धर्मशास्त्रों एवं संस्कृति के अनुसार मनुष्य के जीवन का उद्देश्य है चारों पुरुषार्थों धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष की प्राप्ति।धर्म का अर्थ अपने सदाचार युक्त कर्त्तव्यों का पालन करना।भक्ति और उपासना धर्म के बिना निरर्थक है।अर्थ अपने सांसारिक कर्त्तव्यों के निर्वाह के लिए उपार्जित पदार्थ को कहते हैं।काम का अर्थ है फल की कामना से अथवा उद्देश्य विशेष से किया जानेवाला कर्म।मोक्ष जीवन का अन्तिम लक्ष्य है।इसे निर्वाण,मुक्ति,कैवल्य आदि भी कहते हैं।
  • जीवन का प्रथम उद्देश्य हैं धर्म।भारतीय षडदर्शन में वैदिक,जैन तथा बोध धर्म को निवृत्ति मार्ग का रास्ता अपनाने का आक्षेप लगाया जाता है अर्थात् धर्म, अर्थ और काम को छोड़कर केवल मोक्ष की साधना करनी चाहिए क्योंकि ये तीनों मोक्ष में बाधक है।परन्तु वास्तव में यह धारणा गलत है।भारतीय धर्म एवं संस्कृति में धर्म,अर्थ,काम को पूरा महत्त्व दिया गया है।इन्हें पुरुषार्थ कहा गया है।शर्त यही है कि ये साधन शुद्ध होने चाहिए।मनुष्य के सभी सगे-संबंधी यहाँ तक कि उसका शरीर भी अन्त समय में साथ छोड़ जाता है।जीवात्मा का अन्ततः साथ केवल उसका धर्म ही देता है।नीति में कहा है किः
    “जिस मनुष्य में धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों में से एक भी न हो उसका जन्म बकरी के गले में लटके हुए थन के समान निरर्थक है।”
  • चौथी और अन्तिम बात संसार में भाग्य तथा पुरुषार्थ दोनों के ही मानने वाले मनुष्य मौजूद हैं।कई मनुष्य केवल भाग्य को ही सर्वोपरि मानते हैं जबकि कई मनुष्य पुरुषार्थ को सर्वोपरि महत्त्व देते हैं।धर्मशास्त्रों में दोनों को महत्त्व देने वाली तथा मानने वाली बातें मौजूद हैं।अतः सामान्य मनुष्य दिग्भ्रमित हो जाता है कि किसे महत्त्व दिया जाए और किसे नहीं।वस्तुतः भाग्य तो है पर उसे पुरुषार्थ से जीता जा सकता है किन्तु पुरुषार्थ प्रबल होना चाहिए।पुरुषार्थी मनुष्य भाग्य को भी बदल सकता है।अशुभ कर्मों के प्रभाव को शुभ कर्मों से रोका जा सकता है।भाग्य के भरोसे मनुष्य को अपना प्रयास करना नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि प्रयास व कर्म के बिना भाग्य का फल भी नहीं मिलता है और यही धर्म कहता है।जैसे तिलों से ही तेल निकलता है मिट्टी से तेल नहीं निकाला जा सकता है।
  • इसलिए मनुष्य को चाहिए कि अपने इस जीवन अर्थात् वर्तमान काल और आगामी जीवन अर्थात् भविष्य काल की उन्नति के लिए सदैव अच्छे गुणों को धारण करें।कई लोग कहते हैं कि अभी तो हमारा बहुत सा जीवन बाकी पड़ा है।जब तक बच्चे हैं,खेले कूदें, जवानी में खूब आनन्द भोग करें फिर जब बूढ़े होंगे तब धर्म को देख लेंगे।
  • इसका उत्तर है कि पहली बात तो यह है कि हमारे जीवन का कोई ठिकाना नहीं है न मालूम कब मृत्यु आ जाए।दूसरी बात जब बुढ़ापा आ जाता है तो फिर हमारी इन्द्रियाँ और यह शरीर साथ नहीं देता है तो फिर धर्म का संचय कैसे कर पाएंगे।अतः बाल्यावस्था से ही धर्म का पालन करना चाहिए।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में धर्म क्या है? (What is Dharma in hindi),धर्म का अर्थ क्या है? (What is meaning of Dharma in hindi) के बारे में बताया गया है।
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