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How to be Friendly Behaviour in hindi

1.दोस्ताना व्यवहार कैसे करें? का परिचय (Introduction to How to be Friendly Behaviour in hindi),बच्चों के साथ कैसे दोस्ताना व्यवहार करें? (How to be friendly to children in hindi):

  • दोस्ताना व्यवहार कैसे करें? (How to be Friendly Behaviour in hindi),बच्चों के साथ कैसे दोस्ताना व्यवहार करें? (How to be friendly to children in hindi):बालक-बालिकाओं के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए।मित्रतापूर्ण व्यवहार करके बालकों का अधिक हित कर सकेंगे क्योंकि बालक-बालिकाएं अपनी मन की बात,अपनी समस्याएं तथा परेशानियाँ अपने मित्रों के साथ साझा करते हैं या उनके साथ साझा करते हैं जो उनके साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करता है।वेदों में तो यहाँ तक कहा गया है कि सब एक-दूसरे को मित्रता की दृष्टि से देखें।यदि यजुर्वेद की इस भावना को मन में उतारें तो दुनिया के सारे झगड़े समाप्त हो सकते हैं।वेदों के उपदेश मनुष्य की भलाई के लिए हैं किसी सम्प्रदाय विशेष के लिए नहीं।
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2.दोस्ताना व्यवहार कैसे करें? (How to be Friendly Behaviour in hindi),बच्चों के साथ कैसे दोस्ताना व्यवहार करें? (How to be friendly to children in hindi):

  • जिन बच्चों को प्रकृति के भरोसे या उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है अर्थात संसार में रहने वाले लोगों के भरोसे छोड़ दिया जाता है उनकी शिक्षा-दीक्षा जंगली झाड़ियों की तरह होती है और जिन बच्चों की शिक्षा दीक्षा में इस तरह ध्यान रखा जाता है जैसे एक बाग में माली पौधों की देखभाल करता है तो वे सुंदर व सुगंधित पेड़-पौधों की तरह विकसित होते हैं।
    माता-पिता,अभिभावक और शिक्षक बालकों के साथ बहुत कठोर व्यवहार करते हैं।वे ऐसा इसलिए करते हैं जिससे बालक अनुशासित रहे परंतु इससे बालकों में भय पैदा होता जाता है तथा वे ऐसा महसूस करते हैं जैसे उन्होंने कोई अपराध कर दिया हो।इसलिए बालकों के साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए।
  • जो अभिभावक तथा शिक्षक बालकों के साथ कठोर व्यवहार करते हैं बालक उनसे दूर रहने का प्रयास करते हैं।बालक उनको अपनी परेशानियां,कठिनाइयाँ तथा मन की बातें नहीं करते हैं और न ही उनको पसंद करते हैं।हमें अपने व्यवसाय की कटुता को बालकों पर नहीं उतारना चाहिए।इसलिए घर से बाहर की कटुता पर नियंत्रण रखकर इस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए जिससे बालक अपनी शिकायतें बता सके।उन शिकायतों को सुनकर चतुरतापूर्ण समाधान करना चाहिए।
  • बालकों की जिन कार्यों में रुचि है और वे अनुचित है या कोई मांग ऐसी है जिसे आप पूरी नहीं कर सकते हैं तो प्रेमपूर्वक उन्हें समझाना चाहिए।जो मांग आवश्यक हो और पूरी कर सकते हो तो तत्काल उसकी पूर्ति करनी चाहिए।ऐसा नहीं होना चाहिए कि बालकों की आवश्यकता खत्म हो जाए तब आप उसकी पूर्ति करें।जैसे मरीज के मर जाने के बाद डॉक्टर की आवश्यकता नहीं होती है।साथ ही उनकी माँग में संशोधन बिना कारण नहीं करना चाहिए।हमें उनकी आवश्यकताओं में संशोधन उपयोगिता,लाभ व हित के आधार पर ही करना चाहिए।
  • माता-पिता को बालकों में शुरू से ही हर कार्य ठीक से करने की आदत डालना चाहिए।जैसे समय पर सोना-उठना,समय पर पढ़ना,गृह कार्य करना,स्नान-ध्यान,पूजा पाठ करना तथा खेलना कूदना।इससे उनमें कार्यों को समय पर करने की आदत पड़ जाती है जिससे वे जीवनभर पालन करने के अभ्यस्त हो जाते हैं।
  • माता-पिता को यह नहीं सोचना चाहिए कि संतान पर उनका पूरा अधिकार है।वास्तविक रूप में संतान के पैदा होने में हम तो माध्यम ही होते हैं।
  • वस्तुतः बालक समाज और राष्ट्र का भी अंग होता है।प्रारंभ में भले ही वह माता-पिता के सहारे समाज में चलता है परंतु बाद में स्वतंत्र रूप से व्यवहार करता है।इसलिए बालकों पर अपने अधिकार तथा आदेश थोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि बालक का मानसिक विकास ठीक से नहीं होता है जिससे ऐसा बालक बाद में जाकर दब्बू,पिछड़ा हुआ और पंगु हो जाता है।
  • बच्चों को महत्त्वहीन समझकर बात-बात पर यह कहकर कि तुम अभी बच्चे हो,अभी तुम क्या जानो ऐसा कहकर झिड़कना नहीं चाहिए।कोई गलती होने पर या काम बिगड़ जाने पर उनकी मजाक उड़ाने के बजाय उन्हें समझाना चाहिए कि किस काम को किस तरह से किया जाना चाहिए था जिससे बालक भविष्य में ध्यान रखे।छिड़कने,अपमानित करने या हँसी उड़ाने पर बालक में आत्मविश्वास की कमी हो जाती है।
  • बच्चों की सहज अनुकरण बुद्धि और मानसिकता को समझकर व्यवहार करना चाहिए जिससे बालक अच्छी बातों का अनुकरण करें और उनके संस्कार अच्छा ही पड़े।कहने का तात्पर्य यह कि बालकों को समाज और राष्ट्र का भावी नागरिक समझ कर उनके मन पर ऊँचे संस्कारों की छाप पड़े।
  • बच्चों को अदब सिखाने के लिए बच्चों का भी सम्मान करना चाहिए।उनकी झिझक को दूर करने के लिए अतिथि,मेहमानों का स्वागत बालकों से ही कराना चाहिए।भाई-बहनों,गुरुजनों के साथ बातचीत करने का शिष्टाचार का अभ्यास कराया जाए।बालकों को यह अनुभव होना चाहिए कि वे परिवार,समाज के जिम्मेदार सदस्य है।लेकिन ऐसा वे तभी सीख सकेंगे जब हम उनके साथ मित्रतापूर्वक व्यवहार करेंगे।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में दोस्ताना व्यवहार कैसे करें? (How to be Friendly Behaviour in hindi),बच्चों के साथ कैसे दोस्ताना व्यवहार करें? (How to be friendly to children in hindi) के बारे में बताया गया है।
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