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Qualities of mathematics textbooks

1.गणित की पाठ्यपुस्तकों की विशेषताएं का परिचय(Introduction to the qualities of mathematics textbooks)-

गणित की पाठ्यपुस्तकें विद्यार्थियों तथा पाठ्यक्रम के अनुसार ही लिखी जानी चाहिए।वस्तुत: गणित की पाठ्यपुस्तकें इस प्रकार की लिखी जाती हैं जिनको विद्यार्थी तथा पाठक देखकर अपना सिर पकड़ लेते हैं।उनके समझ में ही नहीं आता कि इस प्रकार की पाठ्यपुस्तकों के लिखने का मतलब क्या है?इसलिए आजकल विद्यार्थी और पाठक पाठ्यपुस्तकों के बजाय अन्य माध्यमों का सहारा लेने लग गए हैं।इसका मूल कारण यही है की पाठ्यपुस्तकें पाठकों और विद्यार्थियों के अनुसार सहज,सरल तथा बोधगम्य रूप में नहीं लिखी जाती है।हम इस आर्टिकल में यह बता रहे हैं कि पाठ्य पुस्तकों को लिखने के लिए किन किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए।यदि निम्नलिखित बातों का पाठ्यपुस्तकों को लिखने में ध्यान रखा जाए तो पाठ्यपुस्तकों से विद्यार्थियों तथा पाठकों का मोह भंग नहीं हो सकता है ऐसा हमारा मानना है।

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2.गणित की पाठ्य पुस्तकों की विशेषताएं(Qualities of mathematics textbooks)-

(1.)गणित की पाठ्यपुस्तकें पाठ्यक्रम के अनुसार ही लिखी जानी चाहिए।पाठ्यक्रम में प्रत्येक टाॅपिक के विभिन्न पक्षों,कठिनाई स्तरों आदि के बारे में स्पष्ट स्पष्ट निर्देश हो जिससे पाठ्यपुस्तकों के लेखकों को विषयवस्तु की निर्धारित सीमाओं की जानकारी हो तथा विद्यार्थियों की आवश्यकताओं एवं स्तर के अनुसार ही वे विषयवस्तु को नियंत्रित कर सकें। पाठ्यक्रम में निर्धारित उद्देश्यों को पाठ्यपुस्तक का आधार बनाया जाना चाहिए।
(2.)गणित की पाठ्यपुस्तकों के लेखक वे ही व्यक्ति हों जो स्वयं गणित के सफल अध्यापक रहे हों जिन्हें गणित का अच्छा ज्ञान हो तथा जो गणित की विषयवस्तु को विद्यार्थियों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के अनुसार प्रस्तुत करने की क्षमता रखते हों। जो व्यक्ति विद्यार्थियों की गणित के सीखने की विभिन्न प्रक्रियाओं को सूक्ष्मता से नहीं समझते वे कदापि गणित की पाठ्यपुस्तकों के सफल लेखक नहीं हो सकते।केवल गणित की विषयवस्तु पर अच्छा अधिकार होना ही सब कुछ नहीं है।प्रत्येक प्रकरण की सामग्री को रोचक ढंग से प्रस्तुत करने के लिए विद्यार्थियों के तरीकों की जानकारी का होना भी आवश्यक है।

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(3.)गणित की पाठ्यपुस्तक की भाषा शैली ,विषयवस्तु,छपाई,चित्र,आकृतियां आदि उन बालकों की अवस्था तथा पृष्ठभूमि के अनुसार हो जिनके लिए पाठ्यपुस्तक लिखी गई है।प्राय:यह देखा गया है कि गणित की पाठ्यपुस्तक वयस्कों को ध्यान में रखकर लिखी जाती है तथा उन बालकों को ध्यान में नहीं रखा जाता जो उनका प्रयोग करते हैं।चित्रों एवं आकृतियां भी बहुधा प्रोढ़ों के अनुकूल ही होती है।आवश्यकता इस बात है कि हम पाठ्य-पुस्तकों में विषयवस्तु को उन्हीं बालकों की आवश्यकताओं, अपेक्षाओं तथा कठिनाइयों को ध्यान में रखकर करें जो इन पुस्तकों का अध्ययन करेंगे।
(4.)गणित की पुस्तकों को अध्यापकों की आवश्यकताओं एवं सुविधाओं को ध्यान में रखकर लिखना सैद्धांतिक रूप से दोषपूर्ण है।वर्तमान पाठ्यपुस्तकों में अध्यापक की आवश्यकताओं को ही सर्वोपरि समझा जाता है तथा विषय को प्रस्तुत करने ,विवेचन, समस्याओं को इकट्ठा करना इत्यादि अध्यापक की सुविधाओं के अनुसार किया जाता है। यह बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि पाठ्यपुस्तकों का निर्माण विद्यार्थियों के लिए किया जाता है।सिद्धांतत: अध्यापक के लिए पाठ्यपुस्तकें नहीं लिखी जानी चाहिए। अध्यापक के लिए अलग से मार्गदर्शिका का प्रावधान होना चाहिए जिससे उससे अध्यापन विधियों, विषयवस्तु आदि के बारे में मार्गदर्शन मिल सके।गणित की पाठ्यपुस्तकों की भाषा सरल और स्पष्ट होनी चाहिए।
(5.)गणित के संपूर्ण पाठ्यक्रम को इकाईयों में बांटकर ही पाठ्यपुस्तकों को लिखा जाना चाहिए।विषयवस्तु को इकाइयों में बांटने से संबंधित विषय सामग्री में परस्पर सह-संबंध स्थापित कर रुचिकर बनाया जा सकता है। उदाहरणार्थ त्रिभुजों से संबंधित समस्त विषयवस्तु एक ही इकाई के रूप में प्रस्तुत की जानी चाहिए तथा इसी प्रकार चतुर्भुजों से संबंधित विषयवस्तु की इकाई अलग हो।अंकगणित में ‘ब्याज’ की इकाई में साधारण ब्याज तथा चक्रवर्ती ब्याज शामिल हो तथा ‘लेखाचित्रों’ की इकाई में सभी प्रकार के लेखाचित्रों का समावेश हो। विषयवस्तु को इकाइयों में संबंधित कर प्रस्तुत करने से विद्यार्थी सामग्री को सहजता से समझ सकते हैं तथा परस्पर संबंधित सिद्धांत नियम प्रयोग कर सकते हैंतथा परस्पर संबंधित प्रत्ययों, सिद्धांतों ,नियमों आदि का सुगमता से प्रयोग कर सकते हैं।
(6.)अंकगणित,बीजगणित तथा ज्यामिति की विषय सामग्री को एकीकृत कर पाठ्यपुस्तकों में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।ऐसे अनेक पक्ष हैं जिनमें इन तीनों शाखाओं का एकीकरण संभव है।उदाहरणार्थ वर्ग, वर्गमूल को एकीकृत कर प्रस्तुत किया जा सकता है।समीकरण तथा लेखाचित्रों की विषय सामग्री का उपयोग कर गणित में व्यापक रूप से किया जा सकता है।बीजगणित से सूत्र निर्धारण की प्रक्रिया का उपयोग गणित के प्रत्येक उप-विषय में संभव है। ज्यामिति के त्रिभुज ,आयत, वर्ग आदि को अंकगणित तथा बीजगणित की विषय सामग्री के बीच की विभाजन रेखाओं को समाप्त किया जाए।
(7.)गणित की पाठ्यपुस्तक के प्रत्येक प्रकरण के प्रारंभ में उसकी उपयोगिता,आवश्यकता,विकास तथा विस्तार के बारे में संक्षेप में टिप्पणी अवश्य लिखी जानी चाहिए।इससे विद्यार्थी के प्रत्येक प्रकरण की विषय वस्तु के बारे में एक सही दृष्टिकोण का होना आवश्यक है क्योंकि विषयवस्तु का उपयोग करते समय विद्यार्थी उस सामग्री की उपयोगिता के बारे में सही चिंतन कर सकते हैं।प्रत्येक उप-विषय के विकास के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी द्वारा विद्यार्थियों को इस बात का ज्ञान हो सकेगा कि गणित के क्रमिक विकास में मानव के प्रयत्नों का कितना महत्वपूर्ण योगदान रहा है।प्रत्येक उप-विषय का महत्त्व, उसका इतिहास तथा उससे संबंधित भारत एवं अन्य देशों के गणितज्ञों का योगदान इस संदर्भ में अत्यंत लाभदायक होगा।

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(8.)पाठ्यपुस्तक में उन्हीं विधियों द्वारा सामग्री प्रस्तुत की जाए जो उस कक्षा के विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त है।विषयवस्तु का प्रस्तुतीकरण इस प्रकार किया जाए कि प्रत्येक विद्यार्थी उसे पढ़कर स्वयं समझकर सीख सके तथा विशेष बातों की ओर ध्यान आकर्षित किया जा सके। विद्यार्थियों के गणित के ज्ञान में खामियां न रह जाए, इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए।
(9.)गणित की पाठ्यपुस्तकों में समुच्चय भाषा का प्रयोग होना चाहिए तथा समुच्चय सिद्धांत को प्रमुख स्थान दिया जाना चाहिए।बीजगणितीय भाषा में पाठ्यवस्तु प्रस्तुत की जानी चाहिए।
(10.)प्रत्येक प्रकरण में विभिन्न उदाहरणों द्वारा हल करने की क्रियाओं का स्पष्टीकरण किया जाना चाहिए।उदाहरणों की सहायता से विद्यार्थी अभ्यास में दिए गए प्रश्नों को हल कर सकते हैं।विषयवस्तु के विभिन्न पक्षों का स्पष्टीकरण ,जितनी भी प्रभावी विधियां हैं, उनके द्वारा किया जाना आवश्यक है।इसका उद्देश्य यह होना चाहिए कि विद्यार्थी स्वयं पाठ्यपुस्तक की सहायता से विषय को समझकर अपनी प्रगति बनाए रखें।प्रत्येक के साथ उस पर आधारित समस्याएं दी गई हो तथा प्रत्येक अभ्यास के साथ ही समस्याओं के उत्तर हों। जहां पर आवश्यक हों, वहां पर संकेत भी दिया हो जिससे विद्यार्थी समस्या का हल सुविधापूर्वक ज्ञात कर सके।
(11.)गणित की पाठ्यपुस्तकों में मौखिक तथा मानसिक गणित का भी प्रावधान हो जिससे विद्यार्थियों का पूर्ण विकास हो सके‌।
(12.)पाठ्यपुस्तक में प्रत्येक प्रकरण से संबंधित क्रियाओं तथा प्रयोगों को करने के लिए आवश्यक निर्देश हों जिससे गणित के व्यावहारिक पक्ष को बल मिले।तथ्यों का संग्रह, समस्याओं का निर्माण, मापना,तौलना,अनुमान लगाना, मॉडल बनाना,चार्ट बनाना आदि ऐसी प्रवृत्तियां तथा क्रियाएं हैं जिनका पाठ्य पुस्तकों में प्रावधान होना वांछनीय है।
(13.)गणित के अध्ययन द्वारा विद्यार्थियों में अमूर्त चिन्तन, सामान्यीकरण, सिद्धांतों का प्रयोग आदि क्षमताओं का विकास होना वांछनीय है।पाठ्यपुस्तक की सामग्री को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाए कि विद्यार्थियों में इन क्षमताओं का विकास हो सके।
(14.) प्रत्येक प्रकरण में दी गई समस्याओं में जीवन की परिस्थितियों से तथ्यों का प्रयोग हो ।समस्याएं इस प्रकार की हों जो विद्यार्थियों के समक्ष चुनौतियां प्रस्तुत करें। समस्याओं की भाषा सरल और स्पष्ट हो जिससे विद्यार्थी विश्लेषण द्वारा यह समझ सके कि उन्हें क्या ज्ञात करना है? भौतिकशास्त्र,रसायनशास्त्र ,भूगोल ,अर्थशास्त्र ,इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों के तथ्यों पर समस्याओं का निर्माण करना उपयोगी सिद्ध होगा। कंप्यूटर के उपयोग पर बल दिया जाए।
(15.) ज्यामिति के प्रमेयों में जितनी संभावित परिस्थितियां हों उनके चित्र अवश्य दिए जाने चाहिए। इससे विद्यार्थियों में ज्यामितीय आकृतियों में प्रदर्शित विभिन्न संबंधों को समझने की योग्यता में वृद्धि होगी।
(16.)गणित की पाठ्यपुस्तकों में महान गणितज्ञों की जीवनियां दी जानी चाहिए।भारतीय गणितज्ञों के योगदान को महत्त्व दिया जाए।
(17.)गणित की पाठ्यपुस्तकों द्वारा विद्यार्थियों को इस बात का ज्ञान अवश्य हो कि हमारी प्रगति गणित के विकास पर निर्भर करती है।
(18.)योजनाबद्ध अध्ययन के सिद्धांतों पर यदि पाठ्यपुस्तकों को लिखा जाए तो विद्यार्थियों को अपनी योग्यतानुसार गणित को सीखने के अवसर मिल सकेंगे।विश्व में विज्ञान तथा गणित की पुस्तकों को अब अधिकांशतः योजनाबद्ध करके ही लिखा जा रहा है।
(19.) पुस्तकों की छपाई,कागज आदि आकर्षक हो जिससे विद्यार्थी पाठ्यपुस्तकों को रुचि के साथ पढ़े।रंगीन चित्रों एवं आकृतियों को सम्मिलित किया जाए।
(20.)गणित की पाठ्य पुस्तकों को स्वीकृत करने से पहले उनकी अध्यापकों और विद्यार्थियों से समीक्षा कराई जानी चाहिए जिससे की भाषा ,प्रस्तुतीकरण शैली, विषयवस्तु आदि में सुधार किया जा सके।
(21.)प्रत्येक प्रकरण के साथ एक जांच पत्र हो जिसमें नवीन प्रणाली के प्रश्न ,लघुत्तरात्मक प्रश्न तथा निबंधात्मक प्रश्न हो।
(22.)पाठ्यपुस्तक की सामग्री को रोचक बनाने हेतु ग्राफों, चित्रों,माॅडलों, आकृतियों , प्रारूपों ,सारणियों, उदाहरणों आदि का प्रचुर मात्रा में उपयोग होना चाहिए।

3.समीक्षा(Review)-

पाठ्यपुस्तकों को लिखने के बाद विद्यार्थियों के समक्ष आने वाली कठिनाइयों का समाधान करके पाठ्यपुस्तक में शामिल करके पाठ्यपुस्तकों को अपडेट करते रहना चाहिए।पाठ्यपुस्तक की भाषा सरल,सहज होनी चाहिए जिससे विद्यार्थी आसानी से समझ सके।पाठ्यपुस्तकें इस प्रकार लिखी जाती है जो विद्यार्थियों के समझ में नहीं आती है ,इस प्रकार की पाठ्यपुस्तकें लिखने की कोई उपयोगिता नहीं है।वास्तविक उपयोगिता पुस्तकों की तभी है जबकि इस बात का ध्यान रखा जाए कि विद्यार्थियों को वह सहजता से समझ में आ जाए।अक्सर पाठ्यपुस्तकों में क्लिष्ट और तकनीकी शब्दों का प्रयोग किया जाता है ,इसके बजाय सरल,सहज और बोधगम्य शब्दों का प्रयोग किया जाए तो पाठ्यपुस्तक रुचिकर तथा उपयोगी हो सकती है।

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