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Need for Virtues More Than Resources

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1.साधनों से भी अधिक सदगुणों की आवश्यकता (Need for Virtues More Than Resources),साधनों से ज्यादा सदगुणों का महत्त्व कैसे है (How Are Virtues More Important Than Resources?):

  • साधनों से भी अधिक सदगुणों की आवश्यकता (Need for Virtues More Than Resources) है क्योंकि सद्गुणों के आधार पर साधन प्राप्त किए जा सकते हैं परंतु साधनों से सद्गुण प्राप्त नहीं किया जा सकते।अक्सर उन्नति,प्रगति तथा विकास के लिए साधनों को अधिक महत्त्व दिया जाता है और सद्गुणों की ओर या तो ध्यान ही नहीं दिया जाता है अथवा सद्गुणों को गौण समझा जाता है।क्या एक विद्यार्थी को पुस्तकें,संदर्भ पुस्तकें,कोचिंग की व्यवस्था,घर में अलग से अध्ययन कक्ष,अच्छे विद्यालय या कॉलेज में प्रवेश जैसी सुविधाएं उपलब्ध करा देने मात्र से वह प्रगति कर लेगा,ऊंचा उठ जाएगा।नहीं,यदि विद्यार्थी में अध्ययन के प्रति लगन,उत्साह,समर्पण,कठोर परिश्रम करने की आदत,एकाग्रता,समय प्रबंधन इत्यादि सद्गुणों के बिना केवल साधनों के बल पर आगे नहीं बढ़ सकता है।परंतु यदि एक विद्यार्थी के पास साधन नहीं है परंतु सद्गुण है तो भी अभावों,कष्टों,साधनों के बिना भी आगे बढ़ सकता है।यहाँ साधनों की महत्ता नहीं है यह कहना मंतव्य नहीं है।साधनों की भी महत्ता है परंतु सद्गुणों के कारण ही उनकी महत्ता है।सद्गुणों के बिना साधनों का फायदा नहीं उठाया जा सकता,उपयोग नहीं किया जा सकता है।
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2.सद्गुणों के बिना साधनों से दुर्गति (Misery by Means without Virtues):

  • चाहे विद्या अर्जित करने का मामला हो,धनार्जन करने का या धन खर्च करने का मामला हो अथवा सेवा-सहायता या अन्य कोई मामला हो सद्गुणों के बिना साधनों का दुरुपयोग होता है और विद्यार्थी या व्यक्ति व संगठन का पतन ही होता है।
  • लेकिन जहां भी आवश्यकताओं और अभावों की चर्चा होती है,वहाँ साधन बढ़ाने के लिए प्रयत्नरत होने का सुझाव दिया जाता है।इसमें कुछ अनुचित भी नहीं है।बढ़े हुए साधनों के सहारे अनेक उपयोगी कार्य किए जा सकते हैं।इसलिए सज्जन,महामानव ‘सौ हाथों से कमाने’ का उत्साह उभारते हैं,पर उनके साथ ही ‘हजार हाथों से खर्च करने’ का निर्देश भी दिया जाता है।
  • यहाँ दुरूपयोग कर गुजरने के लिए नहीं,वरन सदाशयता भरे प्रगतिशील प्रयोजनों के लिए उस उपार्जन को नियोजित करने के लिए प्रोत्साहन दिया गया है।वैसा अनावश्यक संचय न किया जाए,जिसकी परिणति आमतौर से दुर्व्यसनों के लिए ही होती है,जो ईर्ष्या उभारती है और दूसरों को भी उसी अवांछनीय मार्ग पर चल पड़ने के लिए बरगलाती है।
  • पारा पचता नहीं,वह शरीर के विभिन्न अंगों में से फूट-फूटकर निकलता है।इसी प्रकार अनावश्यक और बिना परिश्रम का कमाया हुआ अथवा निष्ठुरता की मानसिकता से विलासिता जैसे दुष्प्रयोजनों में उड़ाया गया धन,हर हालत में अनर्थ ही उत्पन्न करेगा।इसके दुष्परिणाम ही सामने आएंगे।खुले तेजाब को,जलती आग को कोई कपड़ों में लपेटकर नहीं रखता।इसी प्रकार उत्पादन में लगी हुई पूंजी के अतिरिक्त,निजी खर्च के लिए,मौज-मजे में उड़ाने के लिए कुछ भी संचय जमा नहीं किया जाना चाहिए,अन्यथा उससे मात्र गलत परंपराएं ही जन्म लेंगी।
  • अमीरों की संताने,आमतौर से आरामतलब,निकम्मी और दुर्गुणी देखी गई है।जो कुछ परिश्रमपूर्वक ईमानदारी से नहीं कमाया गया है,जिसे उपयोगी प्रयोजन में लगाने से रोककर अनियंत्रित संकीर्ण स्वार्थपरता के लिए जमा कर रखा गया है,उसकी अवांछनीय प्रतिक्रिया न केवल संचयकर्त्ता को,वरन उससे किसी भी रूप से प्रभावित होने वाले को भी पतनोन्मुख प्रवृत्तियों में धकेले बिना न रहेगी।
  • कहने को तो यों भी कहा जाता है कि अभावग्रस्त परिस्थितियों के कारण मनुष्य को त्रास सहने पड़ते हैं,पर गंभीरता के साथ निरीक्षण-परीक्षण करने पर तो दूसरी बात सामने आती है।व्यक्तित्त्व की गहराई में घुसी हुई अवांछनीयताओं के कारण ही मनुष्य गई-गुजरी परिस्थितियों में पड़ा रहता है।
  • श्रमिकों में कितने ही अच्छी कमाई करते हुए भी देखे जाते हैं,पर उनकी आदत में नशेबाज,जुआ,आवारागर्दी जैसी कितनी बुरी आदतें जुड़ जाती हैं।जो कमाते हैं,उसे गँवा देते हैं और अभावों की शिकायत करते हुए ही जिंदगी गुजारते हैं।उनका परिवार भी इसी अनौचित्य की चक्की में पिसता और बर्बाद होता रहता है।
  • बात श्रमिकों तक ही सीमित नहीं है,वह धनिकों के ऊपर ओर भी अधिक स्पष्ट रूप से लागू होती है।दुरुपयोग उन्हें भी दुर्गुणी,दुर्व्यसनी बनाता ही है।अपव्यय के रहते किसी के पास खुशहाली रह सकेगी या उसके माध्यम से उपयोगी प्रगति संभव हो सकेगी,इसकी आशा-अपेक्षा ही नहीं करनी चाहिए।

3.साधनों का महत्त्व तो है (Resources Are Important):

  • अगली शताब्दी में उज्जवल भविष्य की संभावनाएं विनिर्मित करने के लिए क्या संपदा जुटानी पड़ेगी? किस स्तर की समृद्धि जुटानी पड़ेगी? किस प्रकार की योजना और विधि-व्यवस्था बनानी पड़ेगी? इसका ऊहापोह करना समय रहते उचित भी है और आवश्यक भी।
  • किंतु इतना तो ध्यान रखना ही पड़ेगा कि लोगों की मानसिकता यदि घटिया रही,उनका दृष्टिकोण,चिंतन एवं स्वभाव यदि गया-गुजरा रहा,दुरुपयोग का दौर यदि आज की तरह ही चलता रहा तो जो इच्छित एवं उपयुक्त है,उसे उपलब्ध कर सकना शताब्दियों-सहस्राब्दियों में भी संभव न हो सकेगा।
  • साधनों का महत्त्व तो अवश्य है,पर इतना नहीं कि उन्हें व्यक्तित्त्व के स्तर से भी ऊंचा माना जा सके।गरीब देशों के लोग सर्वथा निठल्ले-निकम्मे ही रहते हों,ऐसी बात भी नहीं है।इन्हें बहुत कुछ पाने की इच्छा-उत्सुकता न रहती हो,सो बात भी नहीं।शरीर-संरचना भी उनकी एक जैसी ही होती है।कई तो उनमें से शिक्षित और समर्थ भी रहते हैं,इतने पर भी गई-गुजरी परिस्थितियाँ उनका पीछा नहीं छोड़ती।
  • अभावों,कष्टों,विद्रोहों और संकटों का माहौल कहीं ना कहीं से आ ही धमकता है।व्यक्तित्त्व को गरिमा-संपन्न बना सकने में अड़ा रहने वाला अवरोध ही प्रधान इसका कारण होता है,जिसके कारण या तो वे अभीष्ट अर्जन-उत्पादन कर ही नहीं पाते या फिर से उसे स्वभावगत अस्तव्यस्तता के कारण ऐसे ही गँवा-उड़ा देते हैं।
  • कमजोर छात्र-छात्राएं कमजोर रहते हैं तो उसका कारण साधनों का अभाव नहीं है बल्कि कमजोरी को दूर करने का जीवट उनमें नहीं होता है।जबकि वे साधनों के अभाव का रोना रोते रहते हैं।परंतु उन्हीं परिस्थितियों,साधनों के बल पर दूसरे छात्र-छात्राएं अव्वल आते हैं और श्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं।
  • इसके ठीक विपरीत यह भी पाया गया है कि साधु,सज्जन,सद्गुणी,सेवाभावी लोग,नगण्य साधनों से सदाशयता की रीति-नीति अपनाए हुए हंसता-हंसाता और खिलता-खिलाता जीवन जी लेते हैं।उन्हीं परिस्थितियों में न केवल स्वयं को,वरन अन्य पिछड़े हुओं को भी ऊंचा उठाने,आगे बढ़ाने में समर्थ होते हैं।ऐसे ही आदर्शवादी,शालीनता संपन्नों का अपना पुरातन इतिहास जीवंत स्थिति में रहा है।
  • वह साधु,ब्राह्मण,वानप्रस्थ,परिव्राजकों का समुदाय,न केवल अपने देशवासियों का स्तर असाधारण रूप से ऊंचा उठाने में समर्थ हुआ था,वरन उन्हीं मुट्ठीभर लोगों ने देश-देशांतरों में प्रगतिशीलता का,सर्वतोमुखी सुसम्पन्नता का,सुसंस्कारिता का वातावरण बनाकर रख दिया था।गरीबी किसी के मार्ग में बाधक नहीं होती।मात्र कुपात्रता ही उसकी आड़ में छिपकर सर्वत्र गंदगी फैलाती और पतन-पराभव का माहौल बनाती रहती है।

4.सदगुणों को अपनाने को प्राथमिकता दें (Give Priority to Adopting Virtues):

  • साधनों के दुरुपयोग की तरह निष्क्रियता-निरुत्साह भी अनिष्टकारक है।आलसी-प्रमादी ही आमतौर से दरिद्र पाए जाते हैं।उत्साह का अभाव ही उन्हें शिक्षा से वंचित रखता है।सभ्यता के अनुशासन को अभ्यास में न उतार पाने के कारण ही लोग अनगढ़ और पिछड़ी स्थिति में पड़े रहते हैं।
  • यदि उनके इन दोष-दुर्गुणों को हटाया-घटाया जा सके तो इतने भर से ही निजी प्रतिभा में नया उभार आ सकता है और उस दरिद्रता से छुटकारा मिल सकता है,जिसके कारण कि आए दिन अभावों,असंतोषों और अपमानों का दबाव सहना पड़ता है।
  • धनिको की,विद्वानों की,असमर्थों की और कलाकारों की अपने देश में कमी नहीं है।देश में गरीब और अशिक्षितों का बाहुल्य होते हुए भी,प्रतिभावानों का इतना बड़ा वर्ग मौजूद है,जो अपने साधनों को सर्वतोमुखी प्रगतिशीलता के लिए नियोजित कर सके,तो उतने भर से ही उत्थान,उत्कर्ष और अभ्युदय का वातावरण देखते-देखते बन सकता है।
  • महापुरुषों का आकलन दो ही आधारों पर होता है,एक तो उन्होंने समर्थता अर्जन के लिए कठोर प्रयत्न किया है,दूसरा उन उपलब्धियों को उदारतापूर्वक प्रगतिशीलता के पक्षधर सत्प्रयोजनों के लिए नियोजित कर दिया होता है।यह दो कदम उठाने पर कोई भी महामानवों की पंक्ति में बैठ सकने की स्थिति में पहुंच जाता है।ऐसे लोगों का बाहुल्य जिस भी समुदाय में,क्षेत्र में होगा,वहाँ न सौहार्द्र की कमी रहेगी,न समर्थता की और न प्रगतिशीलता की।
  • उदारता,प्रामाणिकता और परामर्शपरायणता ये तीन ही ऐसे गुण हैं,जिनका उपार्जन-अभिवर्द्धन करने पर व्यक्ति न केवल अपने को सुखी-समुन्नत बना सकता है,वरन उसके क्रिया-कलापों से संबद्ध समूचा परिजन ऊंचा उठता,आगे बढ़ता चला जाता है।
  • छात्र-छात्राओं को अध्ययन करने,परीक्षा की तैयारी करने अथवा प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए केवल साधनों के पीछे ही पड़े नहीं रहना चाहिए।क्योंकि साधनों का सही उपयोग भी वही कर सकता है जिनमें सद्गुण हैं।सद्गुणों के अभाव में अधिक संभावना यही है कि वह उनका दुरुपयोग करेगा।जैसे आग से रोटी भी पकाई जा सकती है और आग से घरों को भी जलाया जा सकता है।
  • साधनों के अभाव में शिकवा-शिकायत न करके जो भी साधन है अथवा अल्प साधनों में भी अपनी अध्ययन करने की प्रवृत्ति को जारी रखना चाहिए।बहुत से महान गणितज्ञों व वैज्ञानिकों ने अल्प साधनों के बल पर ही खोजें और आविष्कार किए हैं।साधनों को जुटाने के बजाय अपने अंदर कठिन परिश्रम करने की प्रवृत्ति,धैर्य,निडरता,विवेक,एकाग्रता,लगन,उत्साह,समर्पण आदि गुणों को अपने आचरण में उतारने की भरपूर कोशिश कर सकते हैं।आपमें सद्गुण होंगे तो आप अल्प साधनों के बल पर भी उन्नति और प्रगति कर सकते हैं।
  • वस्तुतः आजकल शिक्षा संस्थानों तथा हमारे चारों ऐसा वातावरण नहीं है जिससे सद्गुणों को धारण करने पर बल दिया जाता हो।शिक्षा संस्थानों का एक ही फोकस रहता है कि पाठ्यक्रम पूर्ण करवा दिया जाए।
  • अतः माता-पिता को स्वयं भी बच्चों में सद्गुणों का विकास करना चाहिए।जब विद्यार्थी वयस्क हो जाएं तो उन्हें स्वयं प्रयत्न करके अपने अंदर सद्गुणों का विकास करने का भरपूर प्रयास करना चाहिए।
  • बाद में परिपक्व हो जाने,गृहस्थी संभालने,जॉब करने पर सद्गुणों को धारण करना बहुत मुश्किल है।विद्यार्थीकाल में ही सद्गुणों की नींव लगाने का सबसे अच्छा समय है।बाल्यावस्था में जैसे संस्कार बच्चों को दिए जाते हैं बड़े होने पर वे वैसे ही बन जाते हैं।

5.सद्गुणों का दृष्टांत (An Example of Virtue):

  • एक विद्यार्थी ने B.Ed कर लिया।उसके पास साधन नहीं थे तो,उसने बच्चों को नोटबुक में ही पढ़ाना प्रारंभ कर दिया।बिना श्यामपट्ट के बहुत दिनों तक उसने बच्चों को पढ़ाया।कुछ आय हुई तो उसने श्यामपट्ट खरीद लिया।श्यामपट्ट पर पढ़ाते-पढ़ाते कुछ समय व्यतीत हुआ।
  • अभिभावकों ने उस शिक्षक में सद्गुण देखकर अपने बच्चों को कोचिंग पर भेजना प्रारंभ कर दिया।उस शिक्षक में ईमानदारी,धैर्य,लगन,निष्ठा,समर्पण आदि कूट-कूटकर भरी हुई थी।अतः अभावों,कष्टों से वे विचलित नहीं बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों में तपकर उनमें ओर अधिक निखार आ गया।
  • धीरे-धीरे उनके गुणों की कीर्ति चारों ओर फैलने लगी।दूर-दूर से छात्र-छात्राएं उनके पास पढ़ने के लिए आने लगे।विद्यार्थी अच्छे अंकों से तो उत्तीर्ण होते ही थे परंतु वे शिक्षक के आचरण से गुणों को भी सीखते थे।शिक्षक भी केवल उन्हें पढ़ाते ही नहीं थे बल्कि उनमें गुणों का विकास करने का प्रयास करते थे।
  • अल्प साधनों के बावजूद भी अपने सदगुणों,विद्या के बल पर आगे बढ़ते गए।उनकी उदारता,निश्चछलता तथा समर्पण को देखकर छात्र-छात्राएं और अभिभावक उनके कायल हो जाते थे।
  • विद्या के साथ झूठा अहंकार भी पैदा हो सकता है परंतु वास्तविक विद्या वह है जहां विद्या के साथ विनम्रता तथा सद्गुण भी हो।इसी के साथ अल्प साधनों के बल पर भी व्यक्ति उन्नति और प्रगति कर सकता है और महान बन सकता है।एक दिन वह शिक्षक अपने क्षेत्र में चोटी के शिक्षक बन गए और उनके सद्गुणों की सुगंध चारों ओर फैल गई।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में साधनों से भी अधिक सदगुणों की आवश्यकता (Need for Virtues More Than Resources),साधनों से ज्यादा सदगुणों का महत्त्व कैसे है (How Are Virtues More Important Than Resources?) के बारे में बताया गया है।

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6.गणित पढ़ने से बोरियत (हास्य-व्यंग्य) (Boredom From Reading Math) (Humour-Satire):

  • गणित शिक्षक:चलो श्याम,गणित के सवाल हल करना शुरू कर दो।
  • श्याम:सर (sir),आज कुछ अलग पढ़ाओ,कुछ अलग हल करवाओ।
  • गणित शिक्षक:क्यों
  • श्याम:रोज-रोज गणित के सवाल हल करते-करते बोरियत महसूस कर रहा हूं।

7.साधनों से भी अधिक सदगुणों की आवश्यकता (Frequently Asked Questions Related to Need for Virtues More Than Resources),साधनों से ज्यादा सदगुणों का महत्त्व कैसे है (How Are Virtues More Important Than Resources?) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.क्या मनुष्य सर्वगुण संपन्न होता है? (Is Man Endowed With All Qualities?):

उत्तर:कोई भी मनुष्य सर्वगुण संपन्न नहीं होता,यह सही है कि हरेक मनुष्य में गुण और अवगुण दोनों ही होते हैं अर्थात् अवगुण से शून्य कोई भी मनुष्य नहीं होता।जिस प्रकार सद्गुणों के कारण मनुष्य प्रसिद्ध होता है,उसी प्रकार अवगुणों के कारण वह बदनाम होता है।जब किसी मनुष्य में सदगुणों की अधिकता होती है तो उसके दुर्गुण छिप जाते हैं।इसी प्रकार दुर्गुणों की अधिकता से सद्गुण छिप जाते हैं।गुणवान मनुष्य में भी कोई न कोई अवगुण होता है और बुरे आदमी में भी कोई न कोई गुण जरूर होता है।इसलिए आदमी की नेकगामी या बदनामी इस पर निर्भर करती है कि उसमें सदगुणों की प्रधानता है या दुर्गुणों की।
सारे गुण एक ही जगह नहीं मिलते।इसलिए किसी मनुष्य के आचरण की मीमांसा करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए।ख्यातिप्राप्त करने के लिए गुण ही काफी नहीं होते,बल्कि कोई विशेष गुण भी होना चाहिए जो साधारण स्तर से ऊँचा नजर आए।

प्रश्न:2.दुष्ट और सज्जन में क्या अन्तर है? (What is the Difference Between a Wicked and a Gentleman?):

उत्तर:विद्या का उद्देश्य है ज्ञान प्राप्त करना।ज्ञान दो तरह का होता है।एक ज्ञान मनुष्य को भौतिक उन्नति के साधन प्रदान करता है।कला,शिल्प और विज्ञान इसी श्रेणी में आते हैं।दूसरा ज्ञान मनुष्य को धर्म,सदाचार,परोपकार आदि के गुण सिखाता है और उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।जो विद्या केवल तर्क-वितर्क और पंडिताई प्रदर्शन के लिए सीखी जाती है,वह व्यर्थ है।
धन को पाकर बहुत लोग मदांध हो जाते हैं।वे किसी को कुछ नहीं समझते और विवेक खो बैठते हैं।ऐसे लोगों को दुष्ट कहते हैं।सज्जनगण धन का उपयोग परोपकार के लिए करते हैं।
यही बात शक्ति या बल या ताकत के बारे में कह सकते हैं।यह बल शारीरिक भी हो सकता है और शासन-पद का भी।दुष्ट नर इस बल से दूसरों को सताते हैं।उन्हें ऐसा करने में मजा आता है।परंतु जो अपनी शक्ति का उपयोग दुर्बलों की रक्षा में करते हैं,वे सज्जन कहलाने के पात्र होते हैं।

प्रश्न:3.साधन की महत्ता क्या है? (What is the Importance of the Instrument?):

उत्तर:(1.)उत्तम साध्य (लक्ष्य) के लिए उत्तम साधन भी होना चाहिए।सुगंध की प्राप्ति चंदनादि सुगंधित द्रव्यों से ही संभव है।मिट्टी का तेल जलाकर हवन की सुगंध पैदा नहीं की जा सकती।
(2.)अभ्यास की दृष्टि रही तो साधन काम आते हैं।अभ्यास की दृष्टि नहीं रही तो उत्तम साधन भी निकम्मे हो जाते हैं।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा साधनों से भी अधिक सदगुणों की आवश्यकता (Need for Virtues More Than Resources),साधनों से ज्यादा सदगुणों का महत्त्व कैसे है (How Are Virtues More Important Than Resources?) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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