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Justification of Result of Annual Exam

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2 2.वार्षिक परीक्षा के परिणाम का औचित्य का निष्कर्ष (Conclusion of Justification of Result of Annual Exam):

1.वार्षिक परीक्षा के परिणाम का औचित्य (Justification of Result of Annual Exam),वार्षिक परीक्षा के आधार पर परिणाम का औचित्य (Justification of Result on The Basis of Annual Examination):

  • वार्षिक परीक्षा के परिणाम का औचित्य (Justification of Result of Annual Exam):कोरोनावायरस से फैली महामारी कोविड-19 की दूसरी लहर के कारण संक्रमण की दर लगातार बढ़ रही थी।ऐसी स्थिति में बोर्ड व कॉलेज के स्टूडेंट्स इस संशय में थे की परीक्षा होगी या नहीं।परंतु केंद्रीय नेतृत्व ने सीबीएसई तथा सीआइएससीई की 10वीं एवं 12वीं बोर्ड की परीक्षाएं रद्द कर दी है।इस फैसले के फोकस में छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के स्वास्थ्य व सुरक्षा दिखता है।
  • बोर्ड परीक्षाओं के रद्द होने के कारण बहुत से छात्र-छात्राओं,शिक्षकों तथा अभिभावकों को खुशी हुई है तो कुछ छात्र-छात्राओं,शिक्षकों और अभिभावकों को मायूसी हुई है।
  • दरअसल पिछले साल महामारी के कारण हमने कोई सबक नहीं लिया।हम स्वास्थ्य सेवाओं को ही दुरुस्त करते रहे। परन्तु ज्योंही लाॅकडाउन में छूट मिली लोगों ने महामारी के निर्देशों का पालन करना छोड़ दिया।इस कारण दूसरी लहर का व्यापक प्रभाव देखने को मिला।
  • बोर्ड परीक्षाएं रद्द होने के कारण एक बार फिर यह बहस छिड़ गई है कि क्या बोर्ड परीक्षाओं और कॉलेज के विद्यार्थियों को केवल वार्षिक परीक्षा के 3 घंटे के पेपर के आधार पर मूल्यांकन करना उचित प्रक्रिया है?
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(1.)वर्तमान मूल्यांकन पद्धति के दोष (Demerits of the current valuation method):

  • वर्तमान परीक्षा पद्धति में डिग्री व डिप्लोमा प्राप्त करने का एकमात्र मकसद यह रह गया है कि नौकरी प्राप्त करना। इसलिए छात्र-छात्राएं बोर्ड व कालेज की वार्षिक परीक्षा में दिन-रात जुटे रहते हैं।बोर्ड में प्री-बोर्ड व अन्य मूल्यांकन परीक्षाओं को छात्र-छात्राएं गंभीरता से नहीं लेते हैं क्योंकि उनके अंक वार्षिक परीक्षा में नहीं जुड़ते हैं।
  • प्रश्न पत्र भी सीमित ज्ञान पर आधारित होते हैं।अधिकांश प्रश्नों की तो बार-बार पुनरावृत्ति होती होती रहती है।इसलिए छात्र-छात्राएं पिछले वर्षों के सॉल्वड पेपर व सीरीज को पढ़कर उत्तीर्ण हो जाते हैं।
  • वर्तमान परीक्षा प्रणाली में छात्र-छात्राओं की रुचि,रुझान,शारीरिक व सृजनात्मक क्षमता तथा पाठ्य सहगामी क्रियाओं का परीक्षण नहीं होता है।
  • विद्यार्थी दिन-रात खेलकूद को छोड़कर,भूखे रहकर परीक्षा की तैयारी में लग जाते हैं।इसके परिणामस्वरूप कई विद्यार्थी तो मानसिक व शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो जाते हैं।
  • कुछ विद्यार्थी तो अनैतिक तरीके अपनाने में मशगूल हो जाते हैं।जैसे परीक्षा प्रश्नपत्र को परीक्षा पूर्व हासिल करने की कोशिश करना,शिक्षकों को डराना-धमकाना,नकल करने का प्रयास करना,उत्तर पुस्तिका में अंक बढ़ाने के लिए रिश्वत का सहारा लेना।
  • इस प्रकार विद्यार्थी प्रारंभ से ही दुराचरण में लिप्त हो जाते हैं।कई विद्यार्थी तो बोर्ड के कर्मचारियों/अधिकारियों से सांठगांठ करके अपनी उत्तर पुस्तिका में अंक बढ़वा लेते हैं।कई बार इस प्रकार की खबरें प्रकाशित हो चुकी है कि परीक्षा में छात्र-छात्राओं को सामूहिक नकल करवाई जा रही है।
  • अध्यापक/अध्यापिका‌ भी छात्र-छात्राओं को परीक्षा में अव्वल आने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।वे इस प्रकार के माॅडल पेपर व प्रश्न-पत्र तैयार करके देते हैं जिनके आधार पर छात्र-छात्राएं उत्तीर्ण हो सकते हैं।विद्यार्थी बिना सोचे-समझे उनके दिए हुए सम्भावित प्रश्नों के उत्तरों को रटने लगते हैं।इस प्रकार छात्र-छात्राओं के ज्ञान का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन नहीं हो पाता है।कई परीक्षा केन्द्रों पर तो शिक्षक नकल कराते पाए गए हैं।
  • उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन भी वस्तुनिष्ठ आधार पर नहीं होता है।आज के शिक्षक प्राचीन गुरुओं की तरह निष्णात,निर्लोभी, अहंकाररहित तथा समर्पित नहीं है।आज शिक्षक उत्तर पुस्तिकाओं की जांच दुख,कष्ट,क्रोध तथा संतोष,प्रसन्नता की मनोदशा में जांच करते हैं तो दोनों मनोदशाओं में अलग-अलग अंक मिलते हैं।

(2.)वर्तमान मूल्यांकन पद्धति में सुधार (Improvements to the current evaluation method):

  • प्राचीन शिक्षण में गुरुकुल में नि:स्वार्थ,निर्लोभ, अहंकाररहित,तप व समर्पणयुक्त गुरुओं के द्वारा शिक्षा दी जाती थी।परंतु आज की शिक्षा व्यावसायिक होती जा रही है।इसलिए इसमें दोषों का प्रवेश होना स्वाभाविक है।क्योंकि धन में गुण-दोष दोनों ही है।जब हम धन का उपयोग विवेकयुक्त होकर करते हैं तो यह हमारे लिए शुभ व कल्याणकारी होता है परंतु जब धन साध्य बन जाता है तो उसके दुर्गुण भी हमारे अन्दर घुस जाते हैं।
  • आज की शिक्षण संस्थाएं व्यावसायिक हो गई है इसलिए वे भवन,फर्नीचर पर धन व्यय करके छात्र-छात्राओं व अभिभावकों को आकर्षित करते हैं।
  • माता-पिता व अभिभावक स्कूलों की मोटी-मोटी फीस चुकाने के बाद भी अपने बच्चों को बेरोजगार तथा किसी लायक नहीं समझते हैं तो वे अपने आप को ठगा-सा महसूस करते हैं।
  • शिक्षण के लिए परीक्षाएं तो परम आवश्यक है।क्योंकि शिक्षण के मूल्यांकन व परिणाम के आधार पर विद्यार्थियों को आगे बढ़ने,कठिनाइयों का सामना करने और उनका समाधान करने में सहायक है।
  • परीक्षा परिणाम के आधार पर छात्र-छात्राएं यह जान लेते हैं कि उन्हें किस विषय में कितनी योग्यता प्राप्त है तथा किस विषय में उनकी कमी है।इस तरह परीक्षा परिणाम छात्र-छात्राओं के लिए मील का पत्थर है जो यात्री को उसकी यात्रा में इस बात की सूचना देता है कि उसने अपनी यात्रा का कितना मार्ग तय कर लिया है और कितना मार्ग अभी शेष है।
  • शिक्षक को यह मालूम पड़ जाता है कि उसकी शिक्षा प्रक्रिया किस सीमा तक सार्थक हुई है।
  • यदि परीक्षा के मूल्यांकन की उचित प्रणाली हो तो छात्र-छात्राओं को इसके द्वारा यह पता लग जाता है कि उसकी रुचि,रुझान,स्तर,बुद्धि और प्रतिभा किस क्षेत्र में विशेष है।
  • हमारी शिक्षा पद्धति भारतीय संस्कृति के अनुरूप होनी चाहिए।कोई भी कार्य बिना निष्ठा के सम्पन्न नहीं होता है। भारतीय निष्ठा का अंतिम स्रोत अध्यात्म है।
  • पूर्व (भारत) के लोगों ने अध्यात्मवाद को पकड़ा और भौतिकवाद को खाली छोड़ दिया जबकि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।अध्यात्मवाद की नींव के बिना भौतिकवाद का महल डगमगाता रहेगा और उसके खतरे भी दिखाई देने लगे हैं जिसमें कुछ का हमने वर्णन ऊपर आर्टिकल में कर दिया है।प्राचीनकाल में पूरे के पूरे अध्यात्मवाद को पाखंडवाद ने जकड़ लिया था जिससे भारत को कई सदियों तक गुलामी में रहना पड़ा।आज अध्यात्म खो गया है और लोग धर्म के बजाए धन के पीछे भाग रहे हैं।
  • हमारा देश भारत स्वतंत्र हुआ था उसी समय भारत के कर्णधारों को इस प्रकार की शिक्षा पद्धति रखनी चाहिए थी जिसमें मूल्य,सदाचार,उन्नत व श्रेष्ठ आदर्शों,भव्य मूल्यों और उत्तम आचरणयुक्त सिद्धांतों का ज्ञान देने वाली शिक्षा शामिल होती।हमारी शिक्षा देश के छात्र-छात्राओं के जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने और संपन्न बनाने वाली होनी चाहिए।और यह संभव था क्योंकि उस समय भारत का लोकतंत्र शैशवावस्था में था।
  • दूसरा तरीका यह है कि हमारी भारतीय संस्कृति के मूल्यों को पाठ्यक्रम में धीरे-धीरे समाविष्ट किया जाए।
  • तीसरा तरीका यह है कि प्रत्येक माता-पिता,अभिभावक को भी एक शिक्षक की भूमिका निभानी चाहिए।उसे अपने बच्चों की प्रतिभा को पहचानकर निखारने व उभारने का प्रयास करना चाहिए।
  • चौथा तरीका है कि छात्र-छात्रा को स्वयं अपनी प्रतिभा को पहचानकर अपने शिक्षकों व माता-पिता से परामर्श लेकर अपनी स्किल को डवलप करना चाहिए जिससे डिग्री लेने के बाद उसका भविष्य अंधकारमय न हो।
  • छात्र-छात्राओं का मूल्यांकन करना और उसको सही दिशा देने का हम सभी का उत्तरदायित्व है,उसे बखूबी निभाना चाहिए।

(3.)वर्तमान (2021) में मूल्यांकन का क्या तरीका हो? [What is the method of evaluation in the present (2021)?]:

  • वर्तमान में देश के अधिकांश राज्यों में लाॅकडाउन लागू है। इसलिए छात्र-छात्राओं के बोर्ड की परीक्षाएं केन्द्र तथा अधिकांश राज्यों ने रद्द कर दी है।
  • छात्र-छात्राओं के लिए 12वीं बोर्ड की परीक्षा एक टर्निंग प्वाइंट है।12वीं बोर्ड परीक्षा के बाद छात्र-छात्राएं अपने करियर के विषय में महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते हैं।जैसे आगे उच्चतर अध्ययन के लिए विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया जाए या नहीं।यदि प्रवेश लिया जाए तो कौनसे विषयों का चुनाव किया जाए।12वीं के बाद कोई डिप्लोमा कोर्स किया जाए अथवा प्रतियोगिता परीक्षाओं जैसे-जेईई-मेन,नीट (NEET), एनडीए में भाग लिया जाए अथवा नहीं।इन सबमें हमें 12वीं की मार्कशीट एक दिशा सूचक यंत्र का काम देती है।
  • 12वीं बोर्ड परीक्षा के परिणाम के लिए 10वीं की अंकतालिका को सबसे अधिक वेटेज दिया जाए,इसके पश्चात् प्री-बोर्ड,मासिक परीक्षाओं तथा आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर अंक दिए जा सकते हैं।11वीं की परीक्षा की अंक तालिका को भी आधार माना जाए।इस प्रकार 10वीं,11वीं की परीक्षा की अंक तालिका तथा प्री-बोर्ड व मासिक टेस्ट को आधार मानकर अंक दिए जा सकते हैं।

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2.वार्षिक परीक्षा के परिणाम का औचित्य का निष्कर्ष (Conclusion of Justification of Result of Annual Exam):

  • प्राचीन काल में हमारे देश की प्रतिभाओं का लोहा दुनिया मानती थी।नालंदा तथा तक्षशिला विश्वविद्यालय इसके प्रत्यक्ष प्रमाण है।इनकी प्रसिद्धि इतनी थी कि दूसरे देशों के विद्वान भी यहां के साहित्य का अध्ययन करने आते थे।
    आज भी भारत के युवा विदेशों में पढ़ने जाते हैं तो भारतीय युवाओं की साख इतनी है कि यहां की शिक्षा को वे अहमियत देते हैं।
  • परंतु अब जो मूल्यांकन पद्धति अपनाई ‌जा रही है उसमें प्रतिभाशाली छात्रों के साथ न्याय नहीं हो पाएगा।ऐसा इसलिए क्योंकि हमने परीक्षा प्रणाली को वार्षिक परीक्षा के परिणाम पर केंद्रित कर दिया है।
  • पिछले दो वर्षों से छात्र-छात्राओं के अध्ययन का तौर-तरीका भी बदल रहा है।अब छात्र-छात्राएं ऑनलाइन एजुकेशन की तरफ बढ़ रहे हैं।पिछले वर्ष की महामारी से भी हमने सबक नहीं लिया है।
  • अब मूल्यांकन पद्धति पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है।हालांकि पिछले समय में मात्र बोर्ड के वार्षिक मूल्यांकन के आधार पर परिणाम तय होता था। इसलिए सीबीएसई तथा अधिकांश राज्यों के बोर्ड ने आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर 20-20 अंक देने के लिए विद्यालयों को अथाॅराइज किया है।अब 20-20 अंकों की इस तरह बंदरबांट हो रही है जैसे खैरात बंट रही हो। विद्यार्थी के मूल्यांकन में वस्तुनिष्ठता कहां रह गई है।
  • मौजूदा महामारी ने हमें मौका दिया है कि हम मूल्यांकन पद्धति पर एक ठोस रणनीति तैयार करें।मूल्यांकन पद्धति को बाह्य तथा आंतरिक मूल्यांकन को कई स्तरों में बांटा जाए जिससे विद्यार्थी की रुचि,रुझानों,पाठ्यसहगामी क्रियाओं तथा प्रतिभा का पूर्ण मूल्यांकन हो सके।
  • ऑनलाइन मूल्यांकन पद्धति अपनाने पर इसका मूल्यांकन कई स्तरों पर हो सकता है।
    प्रश्न-पत्र इस प्रकार तैयार होने चाहिए कि वह संपूर्ण पाठ्यक्रम को कवर करता हो जिससे कुछ प्रश्नों को रटकर उत्तीर्ण होने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगे।
  • परीक्षा प्रश्न-पत्र में कुछ इस तरह के प्रश्न भी देने चाहिए जिनमें बालकों को अपनी बुद्धि का प्रयोग करना पड़े।प्रायः अध्यापक छात्र-छात्राओं को मॉडल पेपर बना कर दे देते हैं तथा बालक पढ़ते ही रटे हुए प्रश्नों के उत्तर उत्तरपुस्तिका में लिख देते हैं।अतः परीक्षा में इस तरह के प्रश्न भी होने चाहिए जैसे छ: घण्टियां एक साथ बजना प्रारंभ होती है। यदि ये 3,5,7,4,6,2 सेकंड के अंतराल से बजे तो पुनः एक साथ कब बजेगी? यह L.C.M. का प्रश्न है।
  • प्रश्न-पत्रों में प्रश्नों की संख्या अधिक देने से छात्र-छात्राओं को नकल करने का समय नहीं मिलेगा।इनमें वस्तुनिष्ठ प्रश्न भी दिए जाने चाहिए।परीक्षा पद्धति में मौखिक,निबन्धात्मक तथा आन्तरिक मूल्यांकन जैसे कई स्तर होने चाहिए।वर्ष में केवल एक बार ही वार्षिक परीक्षा के आधार पर परिणाम देना व्यावहारिक रूप से असंगत है।
  • करोड़ों विद्यार्थी बोर्ड परीक्षाओं में बैठते हैं तथा कोरोनावायरस से फैली कोविड-19 महामारी भी अनिश्चित है कि यह कब तक रहेगी।इसलिए परीक्षा के नए विकल्पों जैसे-ऑनलाइन माध्यम से परीक्षा के विकल्प पर विचार करना चाहिए।ऑनलाइन माध्यम से सालभर में कई तरह की परीक्षाएं मौखिक,लिखित,निबन्धात्मक,वस्तुनिष्ठ विविधतायुक्त ली जा सकती है जिसके आधार पर छात्र-छात्राओं को बहुआयामी मूल्यांकन किया जा सकता है।वर्ष में एक से अधिक बार मूल्यांकन होने के कारण छात्र-छात्राएं वर्षभर व्यस्त रहते हैं।साथ ही उन परीक्षाओं के अंक जुड़ने पर वे इसे गम्भीरता से लेते हैं।छात्र-छात्राओं मूल्यांकन भी समग्र रूप से होता है।
  • उपर्युक्त विवरण में वार्षिक परीक्षा के परिणाम का औचित्य (Justification of Result of Annual Exam),वार्षिक परीक्षा के आधार पर परिणाम का औचित्य (Justification of Result on The Basis of Annual Examination) के बारे में बताया गया है।

3.वार्षिक परीक्षा के परिणाम का औचित्य (Justification of Result of Annual Exam),वार्षिक परीक्षा के आधार पर परिणाम का औचित्य (Justification of Result on The Basis of Annual Examination) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.वार्षिक परीक्षा प्रणाली क्या है? (what is annual system of examination?):

उत्तर:शिक्षा की वार्षिक प्रणाली में,एक शैक्षणिक वर्ष को अलग-अलग पदों में विभाजित नहीं किया जाता है।अंतिम परीक्षा,जिसे वार्षिक परीक्षा के रूप में भी जाना जाता है, पूरे वर्ष सीखने की एकमात्र परीक्षा है।भारत में अभी तक कई कॉलेज शिक्षा की वार्षिक प्रणाली का पालन नहीं करते हैं, कई स्कूल अभी भी इस प्रणाली के साथ चलते हैं।
कई विश्वविद्यालयों द्वारा लंबे समय से अपनाई गई वार्षिक परीक्षा प्रणाली,जो सभी श्रेणियों में प्रासंगिक सत्र के अंत में एक अंतिम परीक्षा आयोजित करती है।

प्रश्न:2.परीक्षा प्रणाली क्या है? (What is examination system?):

उत्तर:परीक्षा एक औपचारिक मूल्यांकन प्रक्रिया है,जहां उम्मीदवार किसी दिए गए विषय या विषय में अपने ज्ञान और दक्षता का प्रदर्शन कर सकते हैं।उन्हें एक मूल्यांकन या भर्ती निकाय द्वारा अलग-अलग उद्देश्यों और अलग-अलग आवृत्तियों पर प्रशासित किया जाता है।परीक्षाओं को विभिन्न आयामों के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

प्रश्न:3.परीक्षा प्रणाली कितने प्रकार की होती है? (What are the types of examination system?):

उत्तर:परीक्षा के मुख्य प्रकार हैं निबंध परीक्षा (essay exams), बहुविकल्पी परीक्षा (multiple choice exams), ओपन-बुक (open-book) और टेक-होम परीक्षा (take-home exams),समस्या या केस-आधारित परीक्षा (problem or case-based exams) और मौखिक परीक्षा (oral exams)।

प्रश्न:4.टेस्ट का प्रकार क्या है? (What is type of test?):

उत्तर:सब्जेक्टिव टेस्ट सब्जेक्टिव टेस्ट को निबंध टाइप टेस्ट भी कहा जाता है।एक निबंध परीक्षा वह होती है,जिसमें एक या अधिक प्रश्न या अन्य कार्य होते हैं जिनमें छात्रों से लंबी लिखित प्रतिक्रियाओं की आवश्यकता होती है।योगात्मक परीक्षण यह छात्रों के सीखने का निर्धारण करने और ग्रेड आवंटित करने के लिए निर्देश के अंत में दी गई एक परीक्षा है।

प्रश्न:5.परीक्षा का दूसरा नाम क्या है? (What is the other name for examination?),परीक्षा के लिए दूसरा शब्द क्या है? (What is another word for examination?):

उत्तर:exam t/est
assessment /paper
quiz/practical
oral/investigation
research/appraisal

प्रश्न:6.परीक्षण में क्यूए क्या है? (What is QA in testing?):

उत्तर:Quality assurance testing is quality assurance(QA)
गुणवत्ता आश्वासन परीक्षण गुणवत्ता आश्वासन (क्यूए) या एक गुणवत्ता परीक्षण प्रक्रिया है जो यह सुनिश्चित करती है कि एक संगठन सर्वोत्तम उत्पादों या सेवाओं को संभव प्रदान करता है।ध्यान में रखने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि क्यूए में उत्पादों का वास्तविक परीक्षण शामिल नहीं है। इसके बजाय, यह सर्वोत्तम परिणाम सुनिश्चित करने के लिए प्रक्रियाओं पर ध्यान केंद्रित करता है।

प्रश्न:7.परीक्षा का क्या महत्व है? (What is importance of examination?),परीक्षाओं का क्या महत्व है? (What is importance of exams?):

उत्तर:सीखने की प्रक्रिया और पूरे शैक्षणिक संस्थान में परीक्षाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।परीक्षा और परीक्षण यह आकलन करने का एक शानदार तरीका है कि छात्रों ने विशेष विषयों के संबंध में क्या सीखा है।
परीक्षा छात्र के समग्र व्यक्तित्व, स्मृति और उनके संशोधन कौशल में सुधार करती है।आमतौर पर छात्र अपने स्कूल/कॉलेजों में मौखिक और लिखित परीक्षा देते हैं।उनकी यह गलत धारणा है कि परीक्षा अनावश्यक है,लेकिन अगर वे विस्तृत सकारात्मक तरीके से सोचने की कोशिश करते हैं, तो वे परीक्षा के लाभों को समझ सकते हैं।इसलिए वार्षिक प्रणाली में,अधिकांश छात्र पढ़ाई के प्रति लापरवाही दिखाते हैं क्योंकि परीक्षाएं वर्ष में एक बार आयोजित की जाती हैं।

प्रश्न:8.कॉलेज में सेमेस्टर परीक्षा क्या है? (what is semester exam in college?),सेम परीक्षा क्या हैं? (What are sem exams?):

उत्तर:कभी-कभी,यह तिमाही या तिमाही सेमेस्टर हो सकता है।सचमुच,सेमेस्टर का मतलब छह महीने की अवधि है। भारत में आमतौर पर इस छह महीने की प्रणाली का पालन किया जाता है।स्कूलों में हम वर्ष को छुट्टियों में और उसके आसपास दो (अक्सर तीन) प्रमुख परीक्षाओं के बीच विभाजित पाते हैं।

प्रश्न:9.सेमेस्टर सिस्टम अच्छा है या बुरा? (Is semester system good or bad?):

उत्तर:कुल मिलाकर,उच्च शिक्षा के संस्थानों में सेमेस्टर प्रणाली को वार्षिक प्रणाली से बेहतर माना जाता है क्योंकि छात्रों को पूरे वर्ष व्यस्त रखा जा सकता है।प्रणाली, वास्तव में, अच्छा इरादा रखती है।

प्रश्न:10.परीक्षा का क्या अर्थ है? (What does examination mean?):

उत्तर:(1)परीक्षा की क्रिया या प्रक्रिया:जाँच की जाने की अवस्था। (2) प्रगति या परीक्षण योग्यता या ज्ञान की जाँच करने के लिए डिज़ाइन किया गया एक अभ्यास।

उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा वार्षिक परीक्षा के परिणाम का औचित्य (Justification of Result of Annual Exam),वार्षिक परीक्षा के आधार पर परिणाम का औचित्य (Justification of Result on The Basis of Annual Examination) के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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