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11 Best Ways to Live Life for Students

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1.विद्यार्थियों के लिए जीवन जीने के 11 श्रेष्ठ तरीकें (11 Best Ways to Live Life for Students),उत्कृष्ट जीवन कैसे जीएं? (How to Live Excellent Life?):

  • विद्यार्थियों के लिए जीवन जीने के 11 श्रेष्ठ तरीकों (11 Best Ways to Live Life for Students) के आधार पर विद्यार्थी अपने जीवन की सुदृढ़ और टिकाऊ नींव रख सकेंगे।उत्कृष्ट और श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए उन्हें ऐसे तरीके अपनाने होंगे जिससे जीवन में सफलता एवं संतुष्टि मिल सके।
  • काॅलेज और विश्वविद्यालयी और प्रतियोगिता परीक्षार्थियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी लेख।
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2.किसी को सफलता एवं किसी को असफलता क्यों? (Why some succeed and some fail?):

  • जीवन में जाॅब में इस कदर डूब जाना कि धन-दौलत जोड़ने के लिए कुछ भी दिखाई ना दें।ऐसी धन-संपदा हम अपनी संतान के लिए छोड़ जाते हैं।और बाद में संतान इस संपदा के लिए लड़ते-झगड़ते हैं।अतः अच्छा है कि पूर्ण पुरुषार्थ करके कमाए गए धन में से केवल आवश्यक ही अपने तथा अपने परिवार के लिए लगाएँ और शेष का अच्छे कार्यों के लिए उपयोग करें।
  • भगवान ने संसार के अन्य प्राणियों के साथ मनुष्य को भी मुक्तहस्त से जो संपदा वितरित की है,उससे कुछ लोग जीवन काल में संतुष्ट प्रतीत होते हैं किंतु कुछ मनुष्य निरंतर असंतोष की आग में जलते-दहकते हैं।हमेशा उद्विग्न बेचैन बने रहते हैं।एक जैसी क्षमताएं जन्म से ही  प्राप्त करते हुए भी कुछ विद्यार्थी जिस भी क्षेत्र में उतरते हैं,सफलताएं अर्जित करते जाते हैं,किंतु कुछ जीवन पर्यंत दीनहीन,गई-गुजरी परिस्थितियों में बने रहते हैं और किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो पाते हैं।ऐसे विद्यार्थी परावलंबी बने जीवन को घसीटते और किसी तरह शेष दिन पूरे करते हैं।एक की सफलता और दूसरे की असफलता को देख कर मन में यह प्रश्न सहज ही उठता है कि सफल और असफल होने के मूलभूत कारण कौन-कौन से हैं? किन विशेषताओं के रहने से कुछ विद्यार्थी जिस भी क्षेत्र में उतरते हैं अपने लक्ष्य में सफल हो जाते हैं,जबकि दूसरों के द्वारा उनकी उपेक्षा कर देने से असफलता ही हाथ लगती है।असफल होने पर उद्विग्न होना सामान्य है,किंतु कभी-कभी अनुचित ढंग से सफल होने के पश्चात भी विद्यार्थी उद्विग्न हो जाता है।बाहर तो वह सफलता का दम्भ प्रदर्शन करता है,किंतु मन ही मन वह सफल होने के बावजूद असंतोष अनुभव करता है।अतः हमें वह सूत्र समझना हैं जिनका अवलंबन लेने पर विद्यार्थी सफल और श्रेष्ठ जीवन जी सकता है।

3.सही लक्ष्य का निर्धारण करें (Determine the Right Goal):

  • कुछ विद्यार्थियों का जीवनक्रम लक्ष्यविहीन होता है,उन्हें नहीं पता है कि वे अध्ययन क्यों कर रहे हैं।सफल विद्यार्थियों को देखकर उनका मन भी वह सौभाग्य प्राप्त करने के लिए ललचाता रहता है।कभी एक दिशा में बढ़ने की सोचते हैं और कभी दूसरी।गणितज्ञ को देखकर गणितज्ञ,वैज्ञानिक को देखकर वैज्ञानिक और विद्वान को देखकर विद्वान बनने की ललक उठती है।कभी धनवान होने की तो कभी खिलाड़ी बनने की बात सोचते हैं।अपना कोई सुनिश्चित लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पाते हैं।फलतः एक दिशा में क्षमताओं का नियोजन नहीं हो पाता।बिखराव के कारण कोई प्रयोजन पूरा नहीं हो पाता है।असफलता ही हाथ लगती है।

4.लक्ष्य प्राप्ति में रुचि जगाएं (Spark interest in goal achievement):

  • श्रेष्ठ जीवन और सफलता के लिए लक्ष्य प्राप्ति में रुचि होना जरूरी है।जो लक्ष्य चुना गया है उसके प्रति उत्साह और उमंग जगाना-मनोयोग लगाना भी अनिवार्य है।लक्ष्य के प्रति उत्साह,उमंग न हो,मनोयोग न जुट सके तो सफलता सदा संदिग्ध बनी रहेगी।आधे-अधूरे मन से,बेगार टालने जैसे काम करने पर किसी भी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि की आशा नहीं की जा सकती।मनोविज्ञान का एक सिद्धांत है कि उत्साह और उमंग शक्तियों का स्रोत है।इनके अभाव में मानसिक शक्तियाँ परिपूर्ण होते हुए भी किसी काम में प्रयुक्त नहीं हो पातीं।

5.उत्साह संजीवनी है (Enthusiasm is life-giving):

  • उत्साह किसी भी कार्य की संजीवनी है।अतएव रुचि का अर्थ है कि जो लक्ष्य निर्धारित किया गया है,उसमें पूर्ण मनोयोग जुटाया जाए और उत्साह में कमी न आने पाए।प्रायः किसी काम (अध्ययन,जाॅब आदि) के आरंभ में जितनी रुचि दिखाई पड़ती है उतनी बाद में नहीं रह पाती।फलस्वरूप जितनी तत्परता और तन्मयता लक्ष्य के प्रति सतत् बनी रहनी चाहिए उतनी ना होने से आधी-अधूरी सफलता ही मिल पाती है।उत्साह हमें हमारी ऊर्जा को एकजुट करके लक्ष्य में झोंक देने के लिए प्रेरित करता है।

6.क्षमताओं का सदुपयोग (Utilizing Capabilities):

  • श्रेष्ठ और सफल जीवन का अगला सूत्र है अपनी क्षमताओं का सदुपयोग।उपलब्ध संपदाओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है-समय।शरीर,मन और मस्तिष्क की क्षमता का तथा समय रूपी संपदा का सही उपयोग असामान्य उपलब्धियों का कारण बनता है।निर्धारित लक्ष्य की दिशा में समय के एक-एक क्षण के सदुपयोग से चमत्कारी परिणाम निकलते हैं।शरीर से श्रम करना ही पर्याप्त नहीं है,वरन मस्तिष्क की क्षमता का उसमें पूर्ण योगदान होना आवश्यक है।मस्तिष्क में असीम संभावनाएं भरी पड़ी हैं।विचारों की अस्त-व्यस्तता और एक दिशा में सुनियोजन न बन पाने से ही उसकी अधिकांश शक्ति व्यर्थ चली जाती है।
    शक्तियों के बिखराव से कोई विशिष्ट उपलब्धि हासिल नहीं हो पाती।सूर्य की किरणें बिखरी होने से उसकी शक्ति का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।आतिशी शीशे पर केंद्रीभूत होकर वे प्रचंड अग्नि का रूप ले लेती हैं।मस्तिष्क की सामर्थ्य के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है।
  • सफल असफल विद्यार्थियों की आरंभिक क्षमता,योग्यता और अन्य बाह्य परिस्थितियों की तुलना करने पर कोई विशेष अंतर नहीं दीखता।फिर भी दोनों की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर आ जाता है।इसका एकमात्र कारण है कि एक ने अपनी क्षमताओं को एक सुनिश्चित लक्ष्य की ओर सुनियोजित किया,जबकि दूसरे के जीवन में लक्ष्य विहीनता और अस्त-व्यस्तता बनी रही।विद्यार्थी जीवन में आपसी व्यवहार और लोकाचार में भूलें,त्रुटियां और अपराध होने भी संभव है।अच्छे-बुरे का विवेक सदैव नहीं रहता।कुछ ना कुछ दोष तो सभी में होते हैं।पूर्णरूप से सद्गुणी और सदाचारी व्यक्ति बहुत ही थोड़े मिलेंगे।अधिकांश विद्यार्थियों के स्वभाव में कुछ ना कुछ बुराइयां ज़रूर होती हैं।

7.अपनी गलतियों को स्वीकार करें (Accept your mistakes):

  • दोष,दुर्गुण और गलतियां विद्यार्थी की स्वाभाविक प्रक्रिया है परंतु 99% स्थितियों में कोई भी विद्यार्थी अपने को दोषी नहीं ठहराता,चाहे उससे कितनी ही भारी भूल क्यों ना हुई हो? भूल को स्वीकार कर लेने में हानि कुछ भी नहीं है।विद्यार्थी का मन निर्मल हो जाता है और वह आगे जीवन के लिए स्वस्थ चित्त एवं जागरूक हो जाता है,किंतु दोष को जब दोष मानकर स्वीकार नहीं किया जाता तो विद्यार्थी का दुस्साहस उद्दीप्त होता है और उसे अपराध करने में ही आनंद आने लगता है।छिपाई हुई भूलें भी अनेक दूसरे प्रकार के अनर्थों को जन्म देती हैं।अपने दोषों को छिपाने से विद्यार्थी की अशांति बढ़ती है किंतु इन दोषों को प्रकट कर दिया जाए तो मस्तिष्क का बहुत-सा बोझ हल्का हो जाता है और आत्मविकास का नैतिक पथ प्रशस्त होने लगता है।
  • अपने दोषों,भूलों को स्वीकार कर लेने का अर्थ है सच्चाई के प्रति प्रेम।अपनी बातों को ठीक मानने का अर्थ तो यही होता है कि दूसरे सब झूठे हैं।इस प्रकार अहंकार,अज्ञान का द्योतक है।इस असहिष्णुता से घृणा और विरोध बढ़ता है,सत्य की प्राप्ति नहीं होती।सत्य की प्राप्ति तभी संभव है जब हम अपनी त्रुटियों,भूलों और कमियों को निष्पक्ष भाव से देखें।विद्यार्थी का मन ऐसा हो जैसा किसी बाग का रखवाला होता है।माली का काम केवल पौधा लगाना ही नहीं वरन् फूलों के पौधों के आस-पास उगने वाले अनावश्यक झाड़-झंखाड़ को भी उखाड़ फेंकना है।गुणों की पौध भी तभी अंकुरित एवं पल्लवित हो सकती है जब मानसिक विद्वेषों को समय-समय पर मस्तिष्क से निकाला जाता रहे।इससे चित्त,मन,स्वास्थ्य प्रसन्न और मस्तिष्क विकासशील बना रहता है।

8.दूसरों के दुर्गुणों को देखने से बचें (Avoid seeing the vices of others):

  • अपने दोष व्यक्त करते हुए आंतरिक निष्कपटता पा लेना जितना जरूरी है,उतना ही दोषान्वेषण की प्रवृत्ति के त्याग में भी सावधान रहना चाहिए।मन में भरी हुई बुराइयों की सड़ाँध से कुछ कम घातक प्रभाव दूसरों के दुर्गुणों को देखने का नहीं होता।मन को दोषों में रस नहीं लेने देना चाहिए।फिर वे चाहे अपने हों चाहे पराए।दूसरों में दोष न निकालना,दूसरों को उन दोषों से उतना नहीं बचाता जितना अपने को बचाता है।यदि आप गुणों का चिंतन न करें केवल अवगुणों पर ही दृष्टिपात करें तो अपना प्रत्येक सहपाठी,मित्र भी अनेक बुराइयों,दोषों से ही ग्रस्त दिखाई देगा।अतः स्नेह,आत्मीयता,सौजन्यता तथा प्रेमपूर्ण व्यवहार में कमी आएगी,जिससे जीवन के सुखों का अभाव हो जाएगा।
  • अपने बच्चों के छोटे-छोटे दोष भूल जाने की पिता की दृष्टि ही सच्ची होती है।माँ यदि बेटों की गलतियों को खोजा करें तो उसे दंड देने से फुर्सत न मिले।शिक्षक छात्र-छात्राओं के हर समय दोष देखता फिरे तो पढ़ाएगा कब अर्थात् पढ़ाने के लिए समय ही नहीं रहेगा।दूसरों के अवगुणों को उपेक्षा की दृष्टि से देखना उचित है,जबकि स्वयं के संबंध में अत्यन्त ही कड़ा रुख होना चाहिए। अपनी बुराइयां एवं उनके निराकरण का प्रयास करना नित्य अनिवार्य माना जाए।

9.निंदक के प्रति सकारात्मक रहें (Be positive towards the critic):

  • जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियाँ सामने आती हैं जो असह्य होती है और मन को खिन्न,दुःखी तथा उदास बना देती हैं।इसी तरह की परिस्थितियों में एक है-किसी के द्वारा अपनी आलोचना या निंदा किया जाना।सामान्यतः विद्यार्थी अपने लिए प्रशंसा ही सुनना चाहता है।किसी विद्यार्थी में कितने ही दोष-दुर्गुण क्यों ना भरे हों,उसे अपनी कमियां दिखाई नहीं देतीं।दिखाई देता भी हैं तो वह उनके लिए अपने स्वभाव को नहीं परिस्थितियों को ही जिम्मेदार ठहराता है।गलतियां होती हैं तो कारण बताया जाता है कि परिस्थितियाँ ही अमुक प्रकार की थी,जिनमें ऐसा होना स्वाभाविक था।गलतियां करने और स्वभाव में त्रुटियां होने के बावजूद भी विद्यार्थी उन्हें स्वयं तो नजरअंदाज करता ही है,अपने साथियों,मित्रों-परिचितों और अन्य लोगों से भी यह अपेक्षा करता है कि वह भी उन परिस्थितियों को नजरअंदाज कर दें।
  • एक तो विद्यार्थी को अपनी कमियां,त्रुटियां कम ही दिखाई देती हैं और दूसरे दिखाई भी देती हैं तो वह इतना असहिष्णु अनुदार होता है कि किसी ओर के द्वारा उनकी ओर इंगित किया जाना सहन नहीं कर पाता।इसे विद्यार्थी का अहंकार भी कह सकते हैं कि वह दूसरों को अपने दोषदर्शन का अधिकार देना नहीं चाहता और यदि कोई दोष देखता है या बताता है तो न केवल दुःखी होता है वरन् उनका प्रतिकार करने के लिए भी कटिबद्ध हो जाता है।अपनी निंदा-आलोचना को न सह पाना एक कमजोरी ही कही जाएगी।उसी तरह की कमजोरी कि विद्यार्थी सुखकर अनुकूल परिस्थितियों की कामना करता है और दुःखदायी प्रतिकूल परिस्थितियों से घबराकर दूर भागता है।उसी प्रकार विद्यार्थी अपनी प्रशंसा सुनना तो पसंद करता है,किंतु निंदा या आलोचना से बचना चाहता है।जबकि निंदा-आलोचना प्रशंसा का ही दूसरा पक्ष है।दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं।जो विद्यार्थी जितने प्रशंसित और चर्चित होते हैं,उनकी उतनी ही निंदा-आलोचना भी होती है।
  • सचमुच विद्यार्थी यदि अपनी निंदा को सकारात्मक भाव से स्वीकार करने लगे तो इसमें हित और उत्कर्ष साधन ही होता है।कई बार यह निंदा अपने प्रकट-अप्रकट दोषों की ओर इंगित करती है तथा उन्हें सुधारने की प्रेरणा देती है तो कई बार जब अतिरंजित ढंग से आलोचना-निंदा की जाती है तो उन दोषों की ओर से सतर्क करती है।
  • निंदा एवं आलोचना से रुष्ट होने,दुःखी होने या प्रतिकार लेने की भावना रखने की अपेक्षा रचनात्मक उपयोग करने की ही बात सोचनी चाहिए।इसी में भला है और इसी में हित।यदि निंदा-आलोचना को सहज भाव से स्वीकार किया जाए तो मनीषियों का कथन है कि इसमें दुर्गुणों का विनाश हो जाता है।निंदा,आलोचना का उपयोग अपने उत्कर्ष एवं आत्मपरिष्कार के लिए भी किया जा सकता है।इसमें कोई संदेह नहीं है।चाहिए वह दृष्टि जो निंदा के प्रकाश में अपने दोष-दुर्गुणों को खोज सके और चाहिए वह सहिष्णुता जो निंदा-आलोचना सह सके।

10.विद्यार्थी क्या करें? (What should students do?):

  • हर विद्यार्थी जीवन में सफलता पाना चाहता है।आप भी सफल होना चाहेंगे।कृपया इस आर्टिकल में सुझाए गए सूत्रों को अपने जीवन में अपनाएं,उनका उपयोग करें।आप देखेंगे कि सफलता के साथ-साथ आपका मुखमंडल आंतरिक संतोष की कांति से चमक रहा होगा।इसके लिए संपूर्ण प्रयास आपको ही करना है।
  • आप कक्षा 12 के विद्यार्थी हैं।आपकी इच्छा इंजीनियर बनने की है।अब सबसे पहले आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आपको किस शाखा को वरीयता देनी है।आपको ऑनलाइन माध्यम और समाचार पत्रों द्वारा प्रवेश परीक्षा हेतु आवेदन करने की तिथियां ज्ञात करनी हैं।आवेदन पत्र प्राप्त करने के साथ-साथ उसे सब प्रकार से पूर्ण करके निश्चित पते पर,निर्धारित तिथि तक,निर्धारित शुल्क सहित भेज देना है।अब आपको अपनी क्षमताओं का इस प्रकार सुनियोजन करना है जिससे आप कक्षा 12 की परीक्षा की तैयारी भी करते रहें और नियमित रूप से इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा हेतु अध्ययन भी जारी रखें।आपकी रुचि इतनी जागृत हो और एकाग्रता इतनी सधी हुई हो कि दोनों परीक्षाओं की तैयारी के अतिरिक्त अन्य किसी कार्य में आपका मन ही ना लगे।इसी बीच परिवार में कोई आपको टोका-टाकी कर दे तो आप आवेशित ना हों।प्रतिक्रिया स्वरूप अन्यों की कमियां खोजने के बजाय विचार करें।संभव है,आपकी ही कोई कमी हो।यदि आप में कमी हो,तो उसे साहसपूर्वक स्वीकार करें।हमें विश्वास है कि इस पद्धति से आप सफल भी होंगे और संतुष्ट भी।श्रेष्ठ और उत्कृष्ट जीवन वही होता है जिसमें सफलता के साथ संतोष और आत्म-संतुष्टि भी हो।आत्म-संतुष्टि तभी होती है जब विद्यार्थी कठिन परिश्रम करके सही तरीकों से सफल होने का प्रयास करता है।अन्यथा अनैतिक और गलत तरीकों से प्राप्त सफलता असंतोष ही पैदा करती है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में विद्यार्थियों के लिए जीवन जीने के 11 श्रेष्ठ तरीकें (11 Best Ways to Live Life for Students),उत्कृष्ट जीवन कैसे जीएं? (How to Live Excellent Life?) के बारे में बताया गया है।

Also Read This Article:सकारात्मक दृष्टिकोण निर्माण करने की 4 टिप्स

11.प्रसन्नता का कारण (हास्य-व्यंग्य) (Reason to Laugh) (Humour-Satire):

  • बिल्लू ने अपनी छोटी मासूम बच्ची से पूछा विद्यार्थी हंसता क्यों हैं?
  • बच्ची:मुँह विद्यार्थी का है वह चाहे तो हँसे और चाहे तो रोए,वो उसकी मर्जी है सो करें।
  • बिल्लूःक्या सफल होने पर नहीं हंसा करता है?
  • बच्ची:कई विद्यार्थी बेवजह भी हंसते रहते हैं,इस पर कोई रोक-टोक नहीं है।कोई नकल करके सफल होने पर कुटिल हँसी भी हँस सकता है,कोई दूसरे के असफल होने पर भी हंस सकता है।

12.विद्यार्थियों के लिए जीवन जीने के 11 श्रेष्ठ तरीकें (Frequently Asked Questions Related to 11 Best Ways to Live Life for Students),उत्कृष्ट जीवन कैसे जीएं? (How to Live Excellent Life?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.क्या विद्यार्थियों के लिए सफल होना पर्याप्त है? (Is it enough for students to succeed?):

उत्तर:नहीं,सफलता के साथ-साथ आत्म-संतुष्टि होना भी जरूरी है।सफलता भी नैतिक,जायज और कठिन परिश्रम से प्राप्त करने वाली होनी चाहिए।

प्रश्न:2.श्रेष्ठ जीवन के लिए और क्या जरूरी है? (What else is needed for a better life?):

उत्तर:श्रेष्ठ जीवन के लिए सद्गुणों धैर्य,विवेक,सद्बुद्धि,साहस,एकाग्रता,विनम्रता आदि गुणों का भी विकास होना चाहिए।

प्रश्न:3.सद्गुणों का विकास कैसे करें? (How to develop virtues?):

उत्तर:आधुनिक शिक्षा पद्धति में तो सद्गुणों के विकास का कोई जरिया नहीं है।परंतु छात्र-छात्रा स्वयं के एफर्ट (effort) से तथा माता-पिता के प्रयास द्वारा सद्गुणों का विकास किया जा सकता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा विद्यार्थियों के लिए जीवन जीने के 11 श्रेष्ठ तरीकें (11 Best Ways to Live Life for Students),उत्कृष्ट जीवन कैसे जीएं? (How to Live Excellent Life?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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