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Discretion is Essential with Success

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1.सफलता के साथ विवेक जरूरी है (Discretion is Essential with Success),सफलता के साथ विवेक क्यों जरूरी है? (Why is Discretion Important with Success?):

  • सफलता के साथ विवेक जरूरी है (Discretion is Essential with Success) क्योंकि विवेक बिना छात्र-छात्रा अथवा व्यक्ति अपनी सफलता को पचा नहीं पाता है और अहंकार पैदा हो जाता है।अहंकार हमारे पतन का कारण बन जाता है।अहंकार मन में आते ही हम सफलता के शिखर को छूकर पतन के गर्त में गिरते जाते हैं।
  • सफलता के शिखर पर पहुंचकर हर कोई विद्यार्थी तथा व्यक्ति उसको कायम रखना चाहता है।हरेक की प्रबल इच्छा होती है कि वह अपने क्षेत्र में उन बुलंदियों तक पहुंचे,जहां अब तक कोई नहीं पहुंचा।किसी भी क्षेत्र में सफलता उसके लिए किए गए योजनाबद्ध क्रियान्विति,उत्कट लगन,अनथक कठिन परिश्रम,आत्मविश्वास,विवेक,धैर्य,साहस,एकाग्रता तथा अन्य कई बातों पर निर्भर करती है।
  • इनका पालन करके न केवल सफलता पाई जा सकती है,बल्कि सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचा जा सकता है परंतु सफलता के शिखर पर कोई भी स्थायी रूप से नहीं रह पाता है; क्योंकि यह वह चरम बिंदु है,जहां व्यक्ति केवल कुछ क्षण या कुछ समय के लिए इसका अनुभव पाता है और फिर वहां से लौटना पड़ता है।
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2.सफलता से उत्पन्न अहंकार पर विवेक द्वारा नियंत्रण (Control of Ego Generated by Success by Discernment):

  • सफलता और असफलता अध्ययन,जाॅब अथवा किसी भी कार्य के अति विपरीत एवं चरम बिंदु हैं।सफलता का अर्थ है कि अध्ययन,जाॅब या किसी भी क्षेत्र में बहुत आगे तक पहुंचना और वहां पहुंचकर शिखर को अर्थात् मंजिल या लक्ष्य को संपूर्ण रूप से प्राप्त करना।हालांकि यह उपलब्धि विरलों को ही होती है परंतु प्राप्ति अवश्य होती है।जैसे महान गणितज्ञ एवं वैज्ञानिक ईसाक न्यूटन,आर्किमिडीज,गणितज्ञ कार्ल फ्रेडरिक गाउस,गणितज्ञ यूक्लिड,आर्यभट,संगीत के क्षेत्र में तानसेन,बैजुबावरा वर्तमान में सोनू निगम,श्रेया घोषाल,ए आर रहमान,स्वास्थ्य एवं योग के क्षेत्र में स्वामी रामदेव,खेल के क्षेत्र में विराट कोहली,महेंद्रसिंह धोनी,विज्ञान के क्षेत्र में सीवी रमन,एपीजे अब्दुल कलाम आजाद,राजनीति के क्षेत्र में महात्मा गाँधी,जयप्रकाश नारायण,समाज सेवा में अन्ना हजारे आदि।ये तथा इनके जैसे अनेक महान् व्यक्तित्त्व ऐसे हैं,जिन्होंने सफलता के उस मुकाम को छुआ है,जिसकी व्यक्ति केवल कल्पना ही कर सकता है।इन महान् शख्सियतों को उस क्षेत्र-विशेष में सफलता का पर्याय माना जाता है।
  • सफलता के चरम शिखर पर पहुंचने वाले ये विख्यात एवं महान् व्यक्ति सदैव सफलता के चरम पर नहीं होते और न वे उस चरम शिखर पर सदैव आरूढ़ ही रहते हैं।इनके जीवन में भी उतार-चढ़ाव आता है।उतार-चढ़ाव तो प्राकृतिक नियम है।जीवन कभी सफलता के शिखर पर होता है तो कभी असफलता के गहन गर्त में गोता भी लगाता है।सफलता की नित्य-निरंतर नई बुलंदियों को पाते चले जाने से उत्साह,उमंग तथा आत्म-विश्वास में वृद्धि होती है,परंतु यदि इसे ठीक ढंग से,विवेकपूर्वक न संभाला जाए तो यह असफलता का द्वार भी खोल सकती है।विवेक यानी कि उचित एवं अनुचित का सूक्ष्म भेद के अभाव में अपार सफलता अहंकार को जन्म देती है और अहंकार पतन एवं विनाश की ओर धकेलता है,जिसे असफलता कहते हैं।
  • सफलता एवं असफलता की दिशा यों तो दीखने में स्थूल प्रतीत होती है,परंतु होती बड़ी सूक्ष्म है; क्योंकि सफलता के शिखर पर पहुंचने पर सफलता प्राप्त करने का वह जज्बा,कठिन परिश्रम,लगन एवं निरंतर नवीन प्रयास करने की इच्छाशक्ति का वैसी ही बने रहना बड़ा कठिन है।मंजिल के पास या मंजिल की प्राप्ति के बाद इस तरह का जज्बा संभवतः कमजोर पड़ जाता है।अपार सफलता व्यक्ति में थोड़ा ठहराव ला देती है।वह उसे भोगने के लिए,उसका आनंद उठाने के लिए शेष समस्त प्रयास एवं पुरुषार्थ को विराम दे देता है।
  • जैसे हाथ में रखी चीज तब तक सुरक्षित एवं संरक्षित रहती है,जब तक उसे आधार प्राप्त होता है।जैसे ही हाथ खींच लिया जाता है,चीजों का गिरना प्रारंभ हो जाता है।हो सकता है,गिरने में समय लगे,लेकिन गिरना अवश्य है।ठीक इसी प्रकार सफलताओं की उपलब्धियां तभी तक टिकी रहती है,जब तक उनको टिकाए रखने के प्रयास जारी रहते हैं।प्रयासों के हटते ही उपलब्धियां भी धीरे-धीरे गायब होने लगती है।

3.सफलता क्यों नहीं पचती? (Why Success is Not Digested?):

  • अपार वैभव एवं ऐश्वर्य भी एक दिन समाप्त हो जाते हैं। यहां पर आकर व्यक्ति की वह अदम्य इच्छा चुक जाती है,जिसके बल पर वह यह सब कुछ प्राप्त करता है।यहां पर एक ओर गंभीर समस्या उपजती है और वह है अहंकार एवं निरंकुशता।अहंकार पैदा होता है उपलब्ध सफलता के द्वारा अर्जित वैभव से।उसे लगता है कि वह इस सृष्टि का सबसे समृद्ध धनवान है; रूपवान है; गुणवान है; प्रतिभावान है।
  • किसी भी गुण या वैभव को अर्जित करने के लिए बाद उसके आधार पर अपने को बड़ा और वह वस्तु जिसके पास ना हो,उसे छोटा एवं ओछा समझना एक भयंकर मूर्खता है।यह एक ऐसी नासमझी एवं मूढ़ता है,जो एक दिन व्यक्ति को गहरी दलदल में डूबने को मजबूर कर देती है।यह अहंकार अधिक समय तक नहीं टिकता,धराशायी हो जाता है।
  • इतिहास गवाह है कि सफलता के चरम पर पहुंचकर गर्व एवं घमंड ने कितनों को पतित किया है एवं पतन के कगार पर धकेला है।रावण,जरासंध,कंस,दुर्योधन,शिशुपाल,कालयवन,सहस्रबाहु,हिरण्यकशिपु आदि सफलता पाकर पचा न सके।सत्ता,संपत्ति,अधिकार एवं वैभव पाकर अपने आपको भगवान समझने लगे और उद्धत प्रदर्शन करने लगे।ऋषियों,मुनियों,संतों,सामान्यजन को सताने लगे,नरपिशाच बन गए और आततायी बन गए।विपुल वैभव एवं ऐश्वर्य के बावजूद सुनिश्चित रूप से उनका ऐसा पतन और हश्र हुआ कि इसे कोई रोक नहीं सका।आधुनिक युग में जर्मनी में हिटलर का भी ऐसा ही हश्र हुआ था।
  • ये लोग चाहते तो सत्ता,अधिकारों,शक्ति और संपत्ति का उपयोग करके अनेक लोगों का उद्धार कर सकते थे,कल्याण व हित कर सकते थे।परंतु इन्होंने सफलता के मद में उन्मत होकर अपने सभी ऐश्वर्य एवं संपदा का उपयोग स्वार्थ,अहंकार,अनीति एवं अत्याचार में करने लगे।जर्मनी में हिटलर ने तो एक गैस चैंबर में 20 हजार यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया था।
  • अहंकार के अलावा सफलता न पचने का कारण यह भी है कि अस्थिर मन,अस्थिर चित्त,संशयग्रस्त मनोवृत्ति और उच्चाटन वाले छात्र-छात्रा को अनायास बिना पुरुषार्थ के सफलता मिल जाती है।बिना पुरुषार्थ या थोड़े-बहुत प्रयत्न करने पर सफलता हमारे भाग्य के प्रबल होने पर ही मिलती है।परंतु ऐसे छात्र-छात्रा अथवा व्यक्ति अनायास सफलता को पचा नहीं पाते हैं।कठिन परिश्रम,पुरुषार्थ से हमारे अंदर के विकार कट-कटकर,संघर्ष करने से निकल जाते हैं और व्यक्ति विनम्र बना रहता है।
  • इसके अलावा यदि कोई छात्र-छात्रा अथवा व्यक्ति घूसखोरी,अनुचित लेनदेन,तिकड़मबाजी,सौदेबाजी,सिफारिश तथा अपने अधिकारों,सत्ता,शक्ति का उपयोग करके कोई जाॅब,कोई परीक्षा,प्रवेश परीक्षा,कोई वस्तु अथवा अन्य कोई चीज,सत्ता आदि में सफलता प्राप्त कर लेता है,बिना योग्यता,सामर्थ्य के सफलता प्राप्त कर लेता है तब भी सफलता नहीं पचती है।
  • शासन एवं प्रशासन में ऐसे व्यक्तियों का चयन कर लिया जाता है जिनमें विशिष्ट विषय का तो ज्ञान होता है परन्तु चारित्रिक गुणों का अभाव होता है।राजनीति में भी ऐसे-ऐसे नेता चुन लिए जाते हैं जो ड्रग,भू-माफिया,हिस्ट्रीशीटर होते हैं,उनके चारित्रिक गुणों को नहीं देखा जाता है।जबकि होना तो यह चाहिए कि शासन-प्रशासन में अभ्यर्थी के चयन में चारित्रिक गुणों की भी परख हो,राजनीति में वही नेता खड़ा हो सके जिसका चरित्र उज्जवल हो।

4.सफलता के चरम पर टिकने के लिए विनम्रता आवश्यक (Humility is Essential to Survive at the Peak of Success):

  • सफल होना,सफलता के चरम को उपलब्ध करना तथा उसका सुनियोजन एवं सार्थक उपयोग करना कठिन एवं चुनौतीपूर्ण कार्य है,परंतु असंभव नहीं है।इतिहास में इस चुनौती को स्वीकार करने वाले शूरमाओं की भी कमी नहीं है,जिन्होंने सफलता पाई,उसके चरम को उपलब्ध किया,परंतु फिर भी वैसे ही विनम्र,सहज एवं शांत बने रहे;अहंकार और स्वार्थ उनके पास तक नहीं फटक सका।ऐसे लोग ही सही मायने में सफल व्यक्ति कहलाते हैं,जो काल के संग दिव्य प्रकाश स्तंभ के समान खड़े होकर औरों को प्रकाशित करते रहने का प्रयास करते रहे हैं।ध्रुव,प्रह्लाद,गौतम बुद्ध,महावीर स्वामी,शिवाजी,महाराणा प्रताप,स्वामी दयानंद सरस्वती,महर्षि अरविंद,महात्मा गांधी,महान वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ ईसाक न्यूटन से लेकर वैज्ञानिक पीसी राय तक ऐसे अनगिनत नाम हैं,जो अपने क्षेत्र की बुलंदियों को पाने के बावजूद अति विनम्र एवं सहज बने रहे।
  • उनकी सादगी,सरलता,सहजता को देखकर अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता था कि क्या ये वही व्यक्ति हैं,जिन्होंने इतिहास को मोड़ा-मरोड़ा,परंतु इसका जरा सा भी अहं इनके व्यवहार में नहीं दिखा।
  • रेखागणित के अनेक सिद्धांतों के आविष्कारक का नाम था यूक्लिड।यूक्लिड के पिता के विरोध करने पर भी वे अपने काम में लगे रहे।एक दिन पिता ने कहा:”यह बेवकूफी का काम अगर तुम नहीं छोड़ोगे तो मेरी संपत्ति में हिस्सा न पा सकोगे।” यूक्लिड ने कहा:”आप अपना धन भले ही भाइयों को दे दें,मुझे अपने काम में इतना आनन्द आता है कि आपकी दौलत उसके सामने तुच्छ है।
  • यूक्लिड पिता के धन का लोभ न छोड़ते तो दुनिया को गणित के उच्च सिद्धांतों के लाभ देने में सफल न होते।छोटे लाभ में बड़े लाभ से वंचित रह जाते।उनकी सरलता और धन के प्रति अनासक्ति अभिभूत कर देने वाली थी।
  • सर आइजक न्यूटन वर्तमान भौतिक विज्ञान के जनक कहे जाते हैं।उन्होंने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का पता लगाया और कई खोजें की।उनके प्रशंसकों ने कहा कि आप तो विज्ञान की तह पहुंच गए हैं।इस पर न्यूटन बोले:”विज्ञान तो एक महान सागर है,मैं अभी बालक की तरह उसके किनारे के पत्थर मात्र चुन सका हूं।उसमें प्रवेश और तह तक जाना,उसमें से मूल्यवान रत्न निकालना तो बहुत आगे की बात है।” यह है एक महान वैज्ञानिक और गणितज्ञ की सरलता और विनम्रता।
  • एडीसन महान् वैज्ञानिक हुए हैं।गरीब मां के बेटे थे,पर बचपन से ही वैज्ञानिक बनने की बात किया करते थे।मां ने सोचा इसे किसी वैज्ञानिक के पास रख दूं,तो शायद इसका समाधान हो जाए।विज्ञान पढ़ने की क्षमता तो उसमें थी नहीं।
  • एक वैज्ञानिक के पास वे एडीसन को ले गई।वैज्ञानिक ने एडीसन को झाड़ू देकर अपनी प्रयोगशाला की सफाई करने को कहा।एडीसन ने हर काम बड़े करीने से किया।कहीं किसी कोने में भी गंदगी न छोड़ी और हर सामान सफाई के बाद यथास्थान जमा दिया।सरलता,सादगी एवं विनम्रता का पता ऐसे ही लगता है कि वह किसी भी काम को छोटा नहीं समझता बल्कि हर कार्य पूर्ण निष्ठा से करता है।
  • महान गणितज्ञ बड़ी-बड़ी खोजें इसलिए कर पाए कि काम के प्रति निष्ठा,अहंकाररहित और विनम्रता जैसे कई गुण उनमें घुले मिले थे,भले ही वे भगवान को नहीं मानते हों।सुप्रसिद्ध गणितज्ञ सर माइकल फ्रेंसिस आतियाह ने कहा है:”भगवान एक महान ‘गणितज्ञ’ था।” इस कथन से सिद्ध होता है कि या तो भगवान का अस्तित्व अब नहीं है अथवा वह अब ‘मैथमेटिशियन’ नहीं रहा है।यह संभव है कि उसने विश्व की गणित के आधार पर रचना की है,तदुपरान्त वह लोप हो गया है।
  • 400 वर्ष पूर्व सर जेम्स जींस ने यही विचार व्यक्त किए थे कि संपूर्ण विश्व की रचना गणित के आधार पर हुई है।किसी भी ग्रह,नक्षत्र,ध्रुव आदि को लिया जाए,प्रत्येक में गणित का ठोस आधार विद्यमान है।विश्व के प्रत्येक प्राणी-चल-अचल सभी का अपना व्यक्तित्त्व एवं चरित्र है।विश्व की प्रत्येक वस्तु की अपनी मर्यादा है,नियम है और वह उस पर गतिशील है।यह सब गणित पर आधारित है।
  • इसी प्रकार गणितज्ञ एवं वैज्ञानिक अलहसन का जीवन रहा है।जहां अहंकार होगा वहाँ खोज कैसे की जा सकेगी,यदि प्रारंभ में सफलता मिल भी गई तो अहंकार के बल पर बहुत आगे नहीं बढ़ा जा सकता है और जल्दी ही उसका पतन हो जाता है।काहिरा की एक पुरानी मस्जिद के गुंबद में रहकर गुजर करने वाले अलहसन गणित,ज्योतिष और भौतिकी के असाधारण विद्वान थे।उनने विज्ञान के हर क्षेत्र का नए सिरे से पर्यवेक्षण किया और पुरानी जानकारियों को बहुत कुछ सुधारा और उनमें बहुत कुछ जोड़ा।उनके ग्रन्थों का पश्चिम की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ और नई पीढ़ी के वैज्ञानिकों ने अपने आविष्कारों में भारी सहायता प्राप्त की।
  • अलहसन को राजदरबार में जगह मिली थी और ऊंचा वेतन भी था।किंतु उसे छोड़कर,बड़े ग्रन्थों की प्रतिलिपियां तैयार करने का परिश्रम करके अपनी आजीविका चलाई।बादशाह नसीरुद्दीन की तरह टोपी सीकर और कुरान लिखकर,रोटी कमाने का तरीका अलहसन का अपनाया हुआ रास्ता ही था।
  • भारत के वैज्ञानिक प्रफुल्लचंद्र राय ने लगभग ढाई सौ कंपाउंड की खोज की थी।उनकी लोकख्याति देश-विदेश में फैली हुई थी।वे तमाम रिसर्चपेपर अपने मार्गदर्शन में कार्य करने वाले छात्र-छात्राओं के नाम पर प्रकाशित कर देते थे।इतने बड़े वैज्ञानिक का जीवन इतना सरल था कि एक दिन उनके घर पर इंग्लैंड से आए किसी वैज्ञानिक ने पहचान न होने के कारण उन्हें सेवक समझ लिया,लेकिन इसे उन्होंने हंसकर सहजता से टाल दिया।
  • राजा चक्रवेण अपनी आजीविका कृषि करके चलाते थे।सत्ता और अहंकाररहित होना दुर्लभ योग ही होता है।सत्ता से अहंकार और निरंकुश्ता पैदा हो जाती है।इसमें कठोर निर्णय एवं दण्ड-व्यवस्था भावनाओं को क्षत-विकसित कर देती है,जबकि दूसरी और भावभरा हृदय न तो सत्ता चाहता है न किसी पर इसके अधिकारों का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करता है।
  • राजा जनक को विदेह राजा जनक कहा जाता था,उनमें अहंकार बिल्कुल नहीं था।सत्ता और भावना के चरम पर आरूढ़ होकर भी उन्हें न स्वार्थ ने घेरा और न ही अहंकार छू सका।जहां अहंकार होगा,वहाँ भावना कैसे होगी।भावना और अहंकार का दूर-दूर तक कहीं मेल नहीं है।जब अहंकार गलता है तो भावना अंकुरित होती है।सत्ता में अहंकार का आ जाना एक सामान्य सी बात है,परंतु उक्त दोनों राजाओं ने सत्ता पाकर भी जन सेवा की और यही सच्ची सफलता है।

5.सफलता के लिए विवेक और वैराग्य (Discretion and Detachment for Success):

  • सफलता के लिए आवश्यक है परमात्मा के विधि-विधान पर अटूट विश्वास रखना एवं अपने कर्त्तव्यों का समुचित रूप से पालन करना।समय की चाल को पहचानते हुए परिस्थितियों के साथ सुमेल स्थापित करना एवं भावुकता से दूर रहकर विवेक एवं वैराग्य का अभ्यास करना सफलता का मूल मंत्र है।सफलता के लिए विवेक एवं वैराग्य की सर्वोपरि आवश्यकता है; क्योंकि विवेक उचित एवं अनुचित की समझ पैदा करता है।जो करने योग्य है,उसे प्राथमिकता देकर पूरे मनोयोग के साथ करने का साहस पैदा करता है और अकरणीय एवं वर्जित चीजों को सिरे से नकार कर उनकी कोई चर्चा तक नहीं करने देता।
  • सफलता के साथ वैराग्य का भाव अटपटा लगता है; क्योंकि मन करता है कि जो पाया है,उसे तो भोग लें।भोगना बुरी बात नहीं है,भोग के साथ चिपक जाना बुरी बात है।इसी कारण ईशावास्योपनिषद का प्रथम मंत्र इससे आगाह करता है कि भोग को त्याग के साथ स्वीकार करना चाहिए।वैराग्य इसी कारण आवश्यक है,ताकि जिस समय तक भोगकाल है,उसे भोगकर निर्विकार भाव से अलग हट सके।यदि ऐसा नहीं होता है तो सफलता की उपलब्धियों में,उसके वैभव की चकाचौंध में मन अटका रहेगा और आगे की यात्रा यहीं पर पड़ाव डाल देगी,आगे बढ़ेगी ही नहीं।अतः पूरी समझदारी के साथ यह अभ्यास करना उचित है कि सफलता को थमने नहीं दिया जाना चाहिए।असीम धैर्य,कठिन परिश्रम एवं समय के साथ तालमेल करके आगे बढ़ते रहना चाहिए।
  • सफलता में आनंद मनाने के साथ ही असफल होने पर भी अविचलित रहने का हौसला होना चाहिए।हम सफल होते हैं तो प्रसन्न होते हैं एवं असफल होते हैं तो दुखी हो जाते हैं।सुख एवं दुःख दोनों को समान भाव से अपना लिया जाए,तो ही जीवन की सार्थकता है।सुख के चरम में भी वही आनंद की निर्झरिणी बहे और दुःख के पलों को भी तप में परिवर्तित करके उसका आनंद उठाया जाए।ऐसे में व्यक्ति सदैव अपने चरम पर जीता है; क्योंकि वह गिरता ही नहीं।सफलता का सुख एवं असफलता का दुःख दोनों ही उसे अस्थिर नहीं करते।यही सफलता का मूल मंत्र है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में सफलता के साथ विवेक जरूरी है (Discretion is Essential with Success),सफलता के साथ विवेक क्यों जरूरी है? (Why is Discretion Important with Success?) के बारे में बताया गया है।

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6.गणित की पुस्तक चोरी (हास्य-व्यंग्य) (Maths Book Theft) (Humour-Satire):

  • गणित की पुस्तक चोरी होने पर छात्र प्रिंसिपल के पास गया और बोला मेरी गणित पुस्तक और उसके नोट्स किसी ने चोरी कर लिए।
  • प्रिंसिपल:तुम्हारी कक्षा का कमरा तो स्कूल के सामने है।यहाँ स्कूल के गेट के ताला लगवा देता हूं अतः स्कूल के अंदर का कोई
  • विद्यार्थी उधर गया ही नहीं।वही तलाश करो।

7.सफलता के साथ विवेक जरूरी है (Frequently Asked Questions Related to Discretion is Essential with Success),सफलता के साथ विवेक क्यों जरूरी है? (Why is Discretion Important with Success?) से संबंधित भोग से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.त्याग के साथ भोग करने से क्या आशय है? (What is Meant by Indulgence with Renunciation ?):

उत्तर:त्याग की भावना के साथ भोगने का अर्थ है कि उसमें लिप्त होकर नहीं,अलिप्त होकर भोग करो ताकि किसी भी मामले में अति ना करो।इसके लिए मध्यम मार्ग को श्रेष्ठ बताया गया है।चाहे धन को भोगने का मामला हो या भोजन के स्वादिष्ट व्यंजनों का भोग लगाने का सवाल हो या विषय भोग को भोगने की बात हो अर्थात् जहां भी भोग को भोगने का सवाल हो उसमें अति करना अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना सिद्ध होता है।

प्रश्न:2.सफलता किस पर निर्भर करती है? (What Does Success Depend on?):

उत्तर:किसी भी कार्य की सफलता सिर्फ उसके अंतिम पड़ाव तक पहुंचा देने से परिभाषित नहीं होती;वरन उन प्रयासों के पीछे निहित भावनाओं और आदर्शों पर निर्भर करती है।योजनाओं की सफल परिणीति तो भाग्य के बूते अनगढ़ व अयोग्य के द्वारा भी हो सकती है,पर उच्च उद्देश्यों को ध्यान में रख कर लिए गए प्रयास,परिस्थितियाँ विपरीत होने पर भी,सफल परिणाम का वरण करते हैं।निकट के लाभ व त्वरित निष्कर्ष की चाह में हम सभी से जाने-अनजाने अनेक भूल हो बैठती हैं,पर सच्चा कर्मयोगी तो वही है,जो उन गलतियों का परिमार्जन कर पुनः निर्मल हृदय से कार्य की शुरुआत करें ;ताकि भविष्य में असफलता का मुँह न देखना पड़े।

प्रश्न:3.विवेक से क्या तात्पर्य है? (What Do You Mean by Discretion?):

उत्तर:ज्ञान अच्छा और बुरा दोनों हो सकता है जबकि विवेक अच्छे और बुरे की पहचान रखता है,उसका विश्लेषण कर सकता है।इसलिए विवेक से काम लेने वाला गलत और बुरे काम नहीं करता।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा सफलता के साथ विवेक जरूरी है (Discretion is Essential with Success),सफलता के साथ विवेक क्यों जरूरी है? (Why is Discretion Important with Success?) के बारे में ओर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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