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3 Spells for Being Firm in Judgement

1.स्थितप्रज्ञ होने के 3 मंत्र (3 Spells for Being Firm in Judgement),स्थितप्रज्ञ कैसे हों? (How to Be Sthitaprajna?):

  • स्थितप्रज्ञ होने के 3 मंत्र (3 Spells for Being Firm in Judgement) के आधार पर छात्र-छात्राएं स्थितप्रज्ञ की उपयोगिता और महत्त्व जान सकेंगे।स्थितप्रज्ञ होना किस प्रकार संभव है इसकी तकनीक के बारे में समझ सकेंगे।
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2.स्थितप्रज्ञ होने का अर्थ और तकनीक (Meaning and Technique of Being Sthitaprajna):

  • (1.)स्थितप्रज्ञ गीता का अपना शब्द है।किसी भी धर्मशास्त्र उपनिषद और वेद आदि में स्थितप्रज्ञ का उल्लेख नहीं मिलता है।यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण शब्द है।स्थितप्रज्ञ का अर्थ स्थिर बुद्धि से लिया जाता है।स्थितप्रज्ञ विद्यार्थी या व्यक्ति के निम्न लक्षण बताए गए:
  • (i.) वह मन में रही हुई सभी कामनाओं और वासनाओं को सब प्रकार से छोड़ देता है।(ii.)वह विद्या ग्रहण करने,अपने कर्त्तव्य को करने में ही संतुष्ट रहता है।(iii.)वह दुःख से उद्विग्न नहीं होता तथा सुख की सर्वथा लालसा नहीं करता।
  • (2.)यह तीसरा लक्षण स्थितप्रज्ञ का सबसे महत्त्वपूर्ण लक्षण है।दुःख में व्याकुल न होना और सुख की मन में लालसा न रखना साधारण मनुष्य के लिए यह संभव नहीं है।जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई है,वही दुःख में व्याकुल नहीं होता और सुख की लालसा नहीं करता।उसके मन में राग,भय,क्रोध आदि नहीं रहते।वह किसी से तृष्णा नहीं करता,किसी के प्रति अपने मन में द्वेष नहीं रखता।यह तभी संभव है जब मनुष्य की बुद्धि स्थिर हो जाए अर्थात् वह योग को प्राप्त हो जाए।
  • (3.)गीता का स्थितप्रज्ञ विद्यार्थी के लिए इस प्रकार समझा जा सकता है कि जिस प्रकार भक्ति का आदर्श पुरुषोत्तम है उसी प्रकार विद्यार्थी का आदर्श स्वाध्याय और विद्या ग्रहण करना है।यह विद्या ग्रहण करना,अध्ययन करना साधारण स्थिति नहीं है बल्कि सर्वोच्च स्थिति है।स्थितप्रज्ञ विद्यार्थी का आचरण अनुकरणीय है,क्योंकि वह सभी विद्यार्थियों के लिए मापदंड है।स्थितप्रज्ञ की धारणा बिल्कुल नई है जो किसी भी धार्मिक साहित्य में प्राप्त नहीं होती।अतः स्थितप्रज्ञ शब्द और इसका भाव दोनों गीता की विशेषता है।
  • (4.)स्थितप्रज्ञ का अर्थ है कि जिसकी प्रज्ञा या बुद्धि स्थिर हो जाती है,अतः स्थितप्रज्ञ का अर्थ हुआ केवल ध्येय विषय का ज्ञान होना।पुस्तक,शरीर,कमरे,टेबल तथा बाकी सभी चीजों से संपर्क छूट कर केवल ध्येय विषय का ज्ञान होना स्थितप्रज्ञ कहा जाएगा।यह स्थिति एक दिन में भी प्राप्त हो सकती है और कई वर्षों में भी प्राप्त नहीं हो सकती।कुछ लोग स्थिर बुद्धि (स्थित धी) को ही स्थितप्रज्ञ कहते हैं अर्थात् जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई हो,वही स्थितप्रज्ञ है।परंतु स्थिर बुद्धि और स्थितप्रज्ञ में भेद है।प्रज्ञा को स्थितप्रज्ञ कहा जा सकता है।
  • (5.)स्थितप्रज्ञ जाग्रत अवस्था की समाधि है।इस अवस्था में विद्यार्थी का संबंध केवल और केवल ध्येय विषय से हो जाता है।अध्ययन करते हुए,अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए भी अकर्त्तापन अनुभव होता है।इस अवस्था में काम,क्रोध आदि विकार समाप्त हो जाते हैं।यह होशपूर्वक समाधि है।यह ध्यानजन्य समाधि से भिन्न है।ध्यानजन्य  समाधि में एक स्थान पर बैठकर आंखें बंद कर भगवान का एकाग्रतापूर्वक ध्यान किया जाता है।इस अवस्था में शरीर और इंद्रियों का ध्यान नहीं रहता। इस अवस्था को लयावस्था भी कहते हैं।निद्रा भी लय ही है।निद्रा में जो लय होता है उस अवस्था में अज्ञान भी मौजूद रहता है।ध्यानजन्य में भी अज्ञान नष्ट नहीं होता क्योंकि समाधि भी एक लय है।समाधि प्राप्त करने के बाद भी काम,क्रोध आदि के बीज बने रहते हैं।स्थितप्रज्ञ की समाधि हमेशा रहती है,हर कर्त्तव्य का पालन करने में रहती है,कभी समाप्त न होने वाली होती है,शुद्ध ज्ञान स्वरूप रहती है,अज्ञान लेश मात्र भी नहीं रहता।अतः यह समाधि एक स्थिति है,लय नहीं।लय मन की वृत्ति है जिसमें सदा परिवर्तन होता रहता है।स्थिति स्थिर रहने वाली अवस्था है।इस प्रकार स्थितप्रज्ञ स्थिर रहने वाली अवस्था है।
  • यह जागृत अवस्था में ही ध्येय में समाधि है जो आंखें बंद कर ध्यानन्य समाधि से भिन्न है।इसी प्रकार स्थितप्रज्ञ और स्थिर बुद्धि में भेद है।बुद्धि का अर्थ ज्ञान या प्रकाश है।ज्ञान में अज्ञान भी रहता है,जैसे-प्रकाश में अंधकार भी।जब ज्ञान अज्ञान से रहित हो शुद्ध हो जाता है अर्थात् बुद्धि विकारहीन हो जाती है तो बुद्धि को प्रज्ञा कहते हैं।ऐसी शुद्ध बुद्धि या प्रज्ञा से ही विद्यार्थी या मनुष्य अपने ध्येय में स्थिर रह सकता है।साधारण बुद्धि में अस्थिरता भी आ सकती है,परंतु ध्येय विषय में जो प्रज्ञा लग गयी है,उसमें अस्थिरता नहीं आ सकती।अनुभव और बोध के साथ ध्येय विषय का ज्ञान होता है तो वह प्रज्ञा होती है। इस प्रकार स्थितप्रज्ञ जाग्रत अवस्था में ही ध्येय विषय (अध्ययन में) स्थिर बुद्धि की अवस्था है।इस अवस्था में सभी कार्य अध्ययन के प्रति समर्पण में किए जाते हैं।
    (6.)स्थितप्रज्ञ विद्यार्थी अध्ययन में संतुष्ट रहता है।इच्छाओं का त्याग तब तक नहीं हो सकता जब तक अध्ययन में श्रद्धा ना हो।समर्पण और अध्ययन में तल्लीनता होने पर वह अध्ययन में डूब जाता है,अध्ययन के प्रति अपने आप को समर्पित कर देता है।ऐसे विद्यार्थी की सभी इच्छाएं और कामनाएं समाप्त हो जाती हैं,वह कामनाओं का त्याग अध्ययन में,अपने आप को झोंक देने पर,कर देता है।अध्ययन के प्रति ऐसे समर्पण से स्थितप्रज्ञ संतुष्ट रहता है।
  • (7.)स्थितप्रज्ञ सर्वदा अनासक्त रहता है।उसकी आसक्ति केवल अध्ययन (अपने ध्येय विषय) में रहती है और अन्य सांसारिक कार्यों में वह आसक्त नहीं रहता क्योंकि अन्य सभी कार्य अनित्य हैं।
  • (8.)शुभ और अशुभ,प्रिय और अप्रिय सभी में स्थितप्रज्ञ तटस्थ रहता है।इस तटस्थता का कारण यह है कि स्थितप्रज्ञ समझता है कि शुभ और अशुभ,प्रिय और अप्रिय भगवान के अधीन है,मनुष्य के अधीन नहीं।इसी कारण वह शुभ प्राप्त होने पर भी हर्षित नहीं होता और अशुभ प्राप्त होने पर द्वेष नहीं करता।महाभारत में भी एक स्थल पर कहा गया है कि प्रिय हो या अप्रिय,अनुकूल हो या प्रतिकूल,जिस समय जो प्राप्त हो जाए उसका हृदय से सेवन करना चाहिए और उससे हार नहीं मानना चाहिए।स्थितप्रज्ञ की भी ठीक यही स्थिति है।
  • (9.)स्थितप्रज्ञ सभी प्रकार के विषयों से इंद्रिय निग्रह या संयम करता है।मनुष्य की ग्यारह इंद्रियां हैं।इनमें पांच ज्ञानेंद्रियाँ,पांच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन है।दस इंद्रियाँ मन के अधीन होकर कार्य करती हैं।स्थितप्रज्ञ दस इंद्रियों और मन पर विजय प्राप्त कर लेता है।स्थितप्रज्ञ के संपूर्ण इंद्रिय-निग्रह की तुलना कछुए के अंगों से की जाती है।जिस प्रकार कछुआ अपने संपूर्ण अंगों को सब ओर से खींच लेता है,उसी प्रकार स्थितप्रज्ञ भी अपने सभी इंद्रियों को विषयों की ओर से खींचकर अध्ययन में लगा देता है।
  • (10.)संपूर्ण इंद्रिय-निग्रह स्थितप्रज्ञ के लिए सबसे बड़ा गुण है।स्थितप्रज्ञ केवल इंद्रियों को विषयों से अलग नहीं करता,वरन सभी विषयों का भोग त्याग की भावना से करता है उसमें आसक्ति रखकर नहीं।विषयों का सेवन शरीर निर्वाह के लिए करता है और उसमें अति नहीं करता है।इससे स्पष्ट है कि इन्द्रिय निग्रह अध्ययन के प्रति समर्पण के बिना संभव नहीं।सभी इंद्रियां मन के अधीन है।मन अध्ययन में लगा देने से सभी इंद्रियाँ अपने आप वश में हो जाती है।अध्ययन में मन के लगते ही उसकी आसक्ति केवल अध्ययन के प्रति रह जाती है।इसी कारण वह संसार में सुख और दुःख के प्रति,मित्र और शत्रु के प्रति समभाव से आचरण करता है।अतः स्थितप्रज्ञ ही सच्चा विद्यार्थी है,आदर्श विद्यार्थी है।उसी विद्यार्थी की प्रज्ञा स्थिर मानी जाएगी जो इन्द्रिय-निग्रह कर अध्ययन के प्रति पूर्ण और शुद्ध समर्पण कर देता है।
  • (11.)इस प्रकार गीता के स्थितप्रज्ञ का पालन करके एक विद्यार्थी आदर्श विद्यार्थी,कर्मयोगी हो जाता है।इस स्थितिप्रज्ञ की धारणा में एक विद्यार्थी कर्म,ज्ञान और योग का समन्वय कर सकता है।अतः स्थितप्रज्ञ तीनों योगों का समन्वित रूप है।वह अनासक्त कर्म करता है,अतः कर्मयोगी है।वह अपने मन और बुद्धि को अध्ययन में लगा कर रखता है,अतः योगी है।वह सुख और दुःख में समभाव से आचरण करता है,अतः वह ज्ञानी है।इस प्रकार स्थितप्रज्ञ के चरित्र में कर्म,ज्ञान और योग की त्रिवेणी प्रवाहित होती है।स्थितप्रज्ञ की तुलना वेदांत के जीवनमुक्त और बौद्ध धर्म के बोधिसत्व से की जा सकती है।बोधिसत्व के हृदय में करुणा और मैत्री भरी रहती है।अतः वह (विद्यार्थी) श्रेष्ठ कार्यों के लिए अध्ययन करता है।अध्ययन अपनी वासना की पूर्ति,छल-कपट आदि के लिए नहीं करता बल्कि मानव मात्र की भलाई के लिए करता है।सभी लोगों को अध्ययन का लाभ पहुंचाना ही उसका धर्म है।जीवनमुक्त अनासक्त आचरण का प्रतीक है।वह शरीर के रहते हुए भी शरीर के धर्मों से अलग रहता है।गीता का स्थितप्रज्ञ भी इन्हीं के समान है।
  • (12.)जो मनुष्य अपने मन में गति करने वाली सब कामनाओं को त्याग देता है और अपने आप में संतुष्ट रहने लगता है वह मनुष्य स्थितप्रज्ञ यानी स्थिर बुद्धि वाला कहलाता है।उसे किसी वस्तु के प्रति मोह नहीं रहता,वह अच्छा होने पर प्रसन्न नहीं होता और बुरा होने पर अप्रसन्न नहीं होता।वह कर्म करना तो नहीं छोड़ता पर कर्म के फल के प्रति आसक्त नहीं रहता।वह सुख-दुःख को समान भाव से लेता है और इन दोनों से ऊपर उठ जाता है।वह त्यागी नहीं अनासक्त हो जाता है। सभी कर्म अपना कर्त्तव्य समझ कर करता है और जो भी परिणाम हो,उसे साक्षी भाव से देखता हुआ अलिप्त और अप्रभावित बना रहता है।ऐसे व्यक्ति को स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
  • (13.)बुद्धि और सद्बुद्धि में बहुत फर्क है।आजकल के हालात को देखते हुए निष्कर्ष प्राप्त होता है कि हमारी चालाकी का नाम बुद्धि है और सद्बुद्धि नाम है समझदारी का।चालाकी (conningness) और समझदारी (wisdom) में बहुत फर्क है।इसलिए दुनिया में होना तो यह चाहिए था कि लोग जितने शिक्षित होते,जितने बुद्धिमान होते उतने ही विनम्र,सरल और विद्यावान होते पर इसका उल्टा ही हो रहा है।आज के अधिकांश शिक्षित और बुद्धिमान व्यक्ति,कम पढ़े लिखे लोगों के मुकाबले ज्यादा चालाक,अहंकारी,पाखंडी और बेईमान हो गए हैं।दूसरों को मूर्ख बनाने और शोषण करने की कला में बहुत कुशल हो गए हैं।बुद्धि यदि सतोगुणी यानी सद्बुद्धि नहीं है तो जहां वह सांसारिक व्यवहार कुशलता और सफलता देती है वहां उलझन,दिखावा,तिकड़मबाजी,तनाव और छल-कपट करने की प्रेरणा भी देती है जबकि सद्बुद्धि समझदारी,दायित्व बोध,सुकर्म,ईमानदारी,तत्त्व ज्ञान,आध्यात्मिक शक्ति,मन की शांति और परमात्मा (अध्ययन) के प्रति प्रेम करने की प्रेरणा देती है।
  • (14.)प्रकृति के तीन गुण हैं-सत,रज और तम।हमारी बुद्धि इन गुणों से प्रभावित और ग्रस्त रहती है।जो व्यक्ति माया के प्रपंच से अलिप्त रहकर अनासक्त भाव से अपने कर्त्तव्यों का धर्मानुसार पालन करते हुए अध्ययन को श्रेष्ठ कार्यों,लोगों का भला करने की प्रवृत्ति रखते हुए उसमें तत्पर रहते हैं ऐसे श्रेष्ठ,सात्विक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि सतोगुणी होती है।जो व्यक्ति अपना भला करते हुए सबका भी भला करते हैं और सांसारिक सुख भोगों को भोगने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं,किसी को दुःख नहीं देते और ऐश्वर्य पूर्ण जीवन जीते हैं ऐसे व्यक्ति रजोगुणी एवं चंचल बुद्धि के होते हैं।जो अपने सुख और लाभ के लिए दूसरों को दुःख व हानि पहुंचाते हैं और अपना ही स्वार्थ सिद्ध करने में जुटे रहते हैं ऐसे व्यक्ति तमोगुणी और दुष्ट बुद्धि के होते हैं।और कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो दूसरों को अकारण दुःख व हानि पहुंचाते रहते हैं और इसी में आनंद का अनुभव करते हैं,ऐसे लोग किस प्रकार के गुण और बुद्धि के होते हैं वे कौन सी श्रेणी के होते हैं यह हमें भी ज्ञात नहीं है।
  • (15.)यदि हम भी हमारे शरीर को भी कामनाओं और काम-क्रोधदि वेगों से खाली करके बांसुरी से भर लें तो जैसे बांसुरी भगवान को प्रिय हो गई थी वैसे ही हम भी भगवान के प्रिय हो सकते हैं।बांसुरी की सबसे बड़ी विशेषता है समर्पण भाव कि जैसा स्वर फूंकना चाहे,जैसा राग बजाना चाहो,उसे कोई आपत्ति नहीं।जो भगवान की मर्जी हो उससे राजी रहना ही समर्पण है।
  • (16.)तो प्रिय छात्र-छात्राओं यह जीवनकाल ही ऐसा है,विद्यार्थी काल ही ऐसा है जिसमें आप अपने आप को कर्मयोगी बना सकते हैं।शर्त यही है कि विद्या ग्रहण करें तो समर्पण,पूर्णनिष्ठा,कर्त्तव्य समझकर,पूजा समझकर करें।सत्साहित्य,व्यावहारिक ज्ञान की पुस्तकों का अध्ययन करें और केवल अध्ययन ही न करें बल्कि चिंतन और मनन भी करें।स्वाध्याय और सत्संग करें।इसके लिए आपको कुछ समय निकालना चाहिए।अन्यथा आपका चरित्र विकसित नहीं हो सकेगा।फिर जीवन क्षेत्र में केवल जाॅब की कला लेकर जाॅब तो प्राप्त कर लेंगे लेकिन जीवन क्षेत्र में आने वाली समस्याओं,कठिनाइयों का सामना नहीं कर सकेंगे क्योंकि आपका चरित्र निर्माण नहीं हुआ।जिसमें चरित्र बल नहीं होता वह ठोकर खाकर गिरता है,बार-बार ठोकर खाकर गिरता है।उसे समझ में ही नहीं आता है कि उसके जीवन में बार-बार समस्याएँ क्यों आती है और उनसे कैसे पार पाएं,कैसे मुक्त हों।चरित्र बल के सामने बड़ी से बड़ी समस्याएं टकराकर फुस्स हो जाती है और आप संघर्ष में तपकर निखरते चले जाते हैं।चरित्र बल में इतनी ताकत होती है कि बड़े से बड़े शूरमा भी झुक जाते हैं।आप संघर्षों का सामना करके फौलाद जैसे बन जाते हैं।अतः अभी से अपने कैरेक्टर को बिल्ड (build of character) करने का कार्य करें।जब जागे तभी सवेरा समझ कर अपने कैरेक्टर का निर्माण करें। स्थितप्रज्ञ बनें,स्थितप्रज्ञ व्यक्ति बड़े-बड़े संघर्षों,समस्याओं,कठिनाइयों से जूझ पड़ता है और अकेला ही उनसे निपटा लेता है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में स्थितप्रज्ञ होने के 3 मंत्र (3 Spells for Being Firm in Judgement),स्थितप्रज्ञ कैसे हों? (How to Be Sthitaprajna?) के बारे में बताया गया है।

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3.बुद्धि स्थिर करने का तरीका (हास्य-व्यंग्य) (How to Stabilize Intellect) (Humour-Satire):

  • चंदन (नगेंद्र से):चलो आज तो चाट-पकौड़ी खाते हैं।
  • नगेंद्रःपर तुमने तो आज से बुद्धि को स्थिर करने का प्रण किया है।चाट-पकौड़ी खाने से तो मन और इन्द्रियाँ चंचल हो जाएंगी।
  • चंदनःआज मौसम चाट-पकौड़ी खाने का है और बुद्धि को स्थिर कल से कर लेंगे,एक दिन में क्या फर्क पड़ता है?
  • नगेंद्र:बुद्धू चंचल मन से बुद्धि स्थिर हो सकती है क्या?

4.स्थितप्रज्ञ होने के 3 मंत्र (Frequently Asked Questions Related to 3 Spells for Being Firm in Judgement),स्थितप्रज्ञ कैसे हों? (How to Be Sthitaprajna?) से सम्बन्धित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.बुद्धि की शुद्धि का क्या उपाय है? (What is the remedy for the purification of the intellect?):

उत्तर:बुद्धि की शुद्धि के लिए अध्ययन के प्रति समर्पण से बढ़कर कोई भी साधन नहीं है।हां,सत्संग भी साधन है परंतु अध्ययन श्रेष्ठ साधन है।

प्रश्न:2.क्या स्थिर बुद्धि द्वारा तनाव व अशांति से बचा जा सकता है? (Can stress and unrest be avoided by a stable intellect?):

उत्तर:तनाव,अशांति,समस्याओं आदि से बचा तो नहीं जा सकता परंतु उन्हें मन में घरौंदा बनाने से बचा जा सकता है।स्थिर बुद्धि से समस्याएं हमारे लिए अवसर बन जाती है।

प्रश्न:3.बुद्धि की महत्ता क्या है? (What is the importance of intelligence?):

उत्तर:बुद्धि की स्थिरता के बिना कोई भी आदर्श पूरा नहीं होता है।बुद्धि के द्वारा ही व्यक्ति सच्चे रूप में इंसान बनता है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा स्थितप्रज्ञ होने के 3 मंत्र (3 Spells for Being Firm in Judgement),स्थितप्रज्ञ कैसे हों? (How to Be Sthitaprajna?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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