How to Earning Money?
1.अर्थ का अर्जन कैसे करें? (How to Earning Money?),अर्थ का अर्जन करने की नीति कैसी हो? (What Should Be Policy of Acquiring Money?):
- अर्थ का अर्जन कैसे करें? (How to Earning Money?) वर्तमान युग में अर्थ को प्राप्त करने,अर्जित करने के तरीके बदल गए हैं।यदि कोई परंपरागत तरीके से ही अर्थ का अर्जन करने के तरीके अपनाता है तो पिछड़ता ही चला जाता है,चाहे वह कितना ही कुशल हो।
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2.प्राचीन और आधुनिक युग में अर्थ के अर्जन के तरीके (Methods of Accumulating Wealth in the Ancient and Modern Era):
- भारतीय संस्कृति में अर्थ का स्थान धर्म के पश्चात आता है अर्थात् नीतिपूर्वक अर्थोपार्जन करना तथा श्रेष्ठ कार्यों में इसका नियोजन करना।परंतु आज के बाजारवाद,व्यापार एवं व्यावसायिकता के दौर में अर्थ का स्थान धर्म से पहले प्रतिष्ठित हो चुका है।अतः अधिक से अधिकतम धन कमाना और किसी भी तरह कमाना इसका लक्ष्य हो गया है।धन तो अर्जन करना है,पर इस अधिकतम अर्जित धन का क्या करना है,इसका ज्ञान नहीं है।इसी वजह से आज के समाज में धनी और धनी होते जा रहे हैं तथा निर्धन और निर्धन।समाज में आर्थिक असमानता की खाई चौड़ी हुई है,इससे वैषम्यता तथा वैमनस्यता बढ़ी है।
- अर्थ सामाजिक पूंजी है।इसके अर्जन में कई वर्गों का योगदान होता है,इसलिए इसके साथ इनका भी अंश सुनिश्चित होना चाहिए।धन कमाना बुरी बात नहीं है,परंतु इसका निजी स्वार्थ एवं अहंकार प्रदर्शन के लिए भोग अनुचित है और आज ऐसा ही हो रहा है।जबसे अर्थ का स्थान धर्म के स्थान पर आरूढ़ हुआ है,तभी से यह सारा व्यक्तिक्रम खड़ा हुआ है।विकास के लिए अर्थ का योगदान अति महत्त्वपूर्ण है,परंतु लोभ-स्वार्थ के लिए इसका उपयोग विनाश का कारण बनता है और यह सब हुआ है-अर्थ के साथ जुड़ी नीति,मर्यादा एवं पवित्रता के दुर्बल एवं कमजोर होने पर।
- किसी समय में व्यवसाय श्रम का पर्याय था,परंतु बाजारवाद के इस दौर में यह बौद्धिक कुशलता का साधन मात्र बन गया है।उद्योग एवं व्यापार में सफल वही होता है,जिसके पास नए विचार एवं नई कार्यशैली होती है,क्योंकि नित नूतन माँग के प्रति अभिरुचि बदलती रहती है।जो कल है,वह आज नहीं और जो आज है,वह आगामी कल में बदल जाती है।अतः बाजार की मांग की परिवर्तनशीलता एवं अभिरुचि के अनुरूप रचनात्मकता का प्रावधान होना चाहिए।आज का यह पक्ष बाजारवाद का विधेयात्मक पक्ष है और जिसके कारण धन उपार्जन की क्षमता में बेहहाशा वृद्धि हुई है।
- आज बाजार में जिसके पास नए विचार हैं,नई योजनाएं हैं,परिस्थिति के मुताबिक जो अपने आप को ढाल सकता है तथा क्रेता की मनपसंद चीजों को जो उपलब्ध करा सकता है,वही सफल हो रहा है।भारतीय बाजार-व्यवस्था ने अपनी पारंपरिक व्यवस्था को छोड़कर आधुनिक विश्व बाजार के साथ बढ़ना प्रारंभ किया है और इसके परिणाम भी सामने हैं,परंतु इस कदम से लाभ के साथ हानि भी हुई है।तात्कालिक अर्थोपार्जन में तो यह सहायक बन रहा है,परंतु अनेक सवालों को खड़ा कर रहा है।आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान बाजार-व्यवस्था तात्कालिक लाभ-हानि को देखकर ही निर्णय करता है और अर्थ के इस बेहद लचीलेपन के कारण शेयर बाजार में इतने उतार-चढ़ाव देखे जाते हैं।हमारे देश के सकल घरेलू उत्पाद में सेवा-क्षेत्र के लगभग 54% का योगदान है और यही वजह है कि भारतीय सेवा-क्षेत्र के लिए बहुत बड़ा विश्व बाजार उपलब्ध है।
3.भारतीय उद्योगों की स्थिति (Status of Indian Industries):
- उपर्युक्त स्थिति मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए उपलब्ध नहीं है।भारत की टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज,चाइना बैंक से सॉफ्टवेयर सेवाएँ दे सकती हैं और चेकोस्लोवाकिया के बैंकों को भी,परंतु ट्रकों का बाजार इतना सरल नहीं है,क्योंकि वहां ट्रक वाले अत्यंत सुदृढ़ स्थिति में हैं।भारतीय टी०वी० सीरियलों का बाजार केवल भारतीय सीमाओं में आबद्ध नहीं है।यह व्यवसाय अत्यंत लोकप्रिय हो रहा है,विशेषकर उन देशों में जहां भारतीयों की संख्या अधिक है।इस संदर्भ में अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारतीय सेवा कंपनियों से,अपने व्यवसाय में बौद्धिक कुशलता,रचनात्मकता तथा वर्तमान सामाजिक परिवेश को उकेरने में सफल हुए हैं,इसलिए उनका व्यवसाय मुनाफे का सौदा दे रहा है;जबकि मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के साथ यह बात नहीं है।अतः उनका व्यवसाय इनके मुकाबले कम है।भारतीय चावल उद्योग को विश्व बाजार में पाकिस्तान के साथ प्रतिस्पर्द्धा करनी पड़ती है,पर भारत की सॉफ्टवेयर कंपनियों की प्रतिस्पर्द्धा में कोई पाकिस्तानी कंपनी नहीं है।अमेरिका में भारतीय कपड़ा कंपनियों को,चीन के कपड़ों से कड़ी टक्कर मिलती है,परंतु कोई चीनी सॉफ्टवेयर कंपनी इन्फोसिस और टाटा कंसल्टेंसी के समकक्ष नहीं है।आज की बाजार व्यवस्था का स्वरूप परिवर्तित हुआ है।जो उद्योग वर्तमान में कुछ ही समय में करोड़ों रुपए का कारोबार करती है,उसे पाने के लिए कभी सफल उद्योगों को अत्यधिक धन,समय एवं ऊर्जा की खपत करनी पड़ती थी।सास-बहू सीरियल बनाने वाली कंपनी बालाजी टेली फिल्म्स ने वर्ष 2005-06 में 280 करोड रुपए का कारोबार करके लगभग 60 करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा कमाया।पर एक समय बेहद सफल कंपनी रही बाम्बे डाईंग को लगभग इतना ही शुद्ध मुनाफा कमाने के लिए करीब 1000 करोड़ का कारोबार करना पड़ा।कहने का तात्पर्य है कि आज बाजार में बौद्धिक कुशलता का अहम स्थान है।
- किसी समय कपड़ा उद्योग भारत में ही नहीं,विश्व बाजार को भी प्रभावित करता था।ढाका का कपड़ा उद्योग विश्व के सबसे उन्नत उद्योगों में माना जाता था।मध्य प्रदेश,राजस्थान एवं गुजरात के कई क्षेत्रों से कपास लेकर मैनचेस्टर में वस्त्र फैक्ट्री का कारोबार अत्यंत सफल माना जाता था।आज भी सूडान के वस्त्र आर्थिक क्षेत्र में प्रतिष्ठित हैं,परंतु रचनात्मक दृष्टि से सीरियल एवं सॉफ्टवेयर उद्योग इसमें कहीं आगे बढ़ गए हैं।अर्थवेत्ता मानते हैं कि किसी समय कपड़ा उद्योग लाभ एवं प्रतिष्ठा का व्यवसाय था,परंतु वर्तमान स्थिति में संचार,तकनीकी उद्योग,अंतरिक्ष आदि के क्षेत्र में कारोबार बढ़ा है।इसके पीछे मूल कारण को रेखांकित करते हुए अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का कहना है कि आज युग की मांग बदल गई है।कम समय में अधिक काम एवं लाभ तथा साथ में बौद्धिक संतुष्टि इस युग की बड़ी आवश्यकता बनती चली जा रही है।यह मांग दिन-प्रतिदिन आवश्यकता के अनुरूप परिवर्तित हो जाती है।अतः जो कल थी,आज पुरानी पड़ जाती है तथा आज की चीजें भविष्य की स्थिति में पुरानी पड़ जाएँगी।ऐसे में रचनात्मकता,बौद्धिक कुशलता,हुनर आदि को बेहद जरूरी पाते हैं।इसलिए जो कंपनियां इन आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं,वह अधिक लाभ कमाती है।
4.भारतीय उद्योगों को स्थापित करने की आवश्यकता (Need to set up Indian industries):
- पुराने उद्योग कभी भारतीय अर्थ-व्यवस्था को सुदृढ़ करते थे,परंतु उदारीकरण के आधुनिक दौर में नई अर्थ-व्यवस्था में इनका आगमन आसान नहीं और जब तक पुरानी व्यवस्था नई व्यवस्था से जुड़ेगी नहीं,विकास का सही स्वरूप सामने नहीं आ सकता है।प्रतिष्ठित कंपनी बॉम्बे डाइंग अपने समय में बेहतरीन कंपनियों में से एक थी,परंतु वर्तमान अर्थ-व्यवस्था में इसकी स्थिति पूर्ववत् नहीं है।इस समय सॉफ्टवेयर कंपनी और बैंकिंग जैसे क्षेत्र अत्यधिक मुनाफा कमा रहे हैं।
- देश के शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों में पांच कंपनियां ऐसी हैं,जिनकी कीमत एक लाख करोड रुपए से ऊपर है।ये हैं:ओ०एन०जी०सी०,रिलायंस,एन०टी०पी०सी०,टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज और इन्फोसिस।इनमें आखिरी दो सेवा-क्षेत्र की कंपनियां हैं।ये कंपनियां भारतीय अर्थ-व्यवस्था को प्रभावित करती हैं,क्योंकि इनके कारोबार लाखों-करोड़ों में हैं।बेहतरीन सेवा एवं नई तकनीकी के कारण ऑपरेटिंग मार्जिन कई गुना अधिक है।
- आई०सी०आई०सी०आई० बैंक अपनी आधुनिक सेवाओं की वजह से बाजार में स्टेट बैंक से अधिक कीमती माना जाता है।देश का दूसरा सबसे बड़ा बैंक पंजाब नेशनल बैंक इस मामले में काफी पीछे है।2006 में शेयर बाजार में स्टेट बैंक की कीमत 51000 करोड़ थी;जबकि आई०सी०आई०सी०आई० की कीमत 52000 करोड़ थी।इसी समय पंजाब नेशनल बैंक की कीमत 15000 करोड रुपए थी।इससे स्पष्ट पता चलता है कि आधुनिक तकनीकी एवं उत्तम सेवा का प्रभाव पड़ता है।व्यवसाय एवं व्यापार में आधुनिक तकनीक का समावेश होना चाहिए।इससे आर्थिक विकास होता है,जो किसी भी राष्ट्र को समृद्ध एवं उन्नत बनाता है।
- व्यापार एवं व्यवसाय के इस नए युग में अपना देश जितना समृद्ध एवं समुन्नत होना चाहिए,हो नहीं पाया है,क्योंकि आर्थिक विकास में कुछ गिने-चुने उद्योग एवं उद्योगपतियों का योगदान है।इससे ये वर्ग अत्यधिक साधन संपन्न होते जा रहे हैं और कुछ वर्ग ऐसा है,जो पिछड़ा ही रहा है।इस विषमता एवं असमानता का कारण है-हमारे मूलभूत ढांचे की ओर ध्यान न जाना।आज का व्यापार वर्तमान लाभ-हानि की गणना पर टिक गया है।ऐसे में देश का कच्चा संसाधन,कृषि आदि जो कि हमारे जमीन से जुड़े लोगों की मुख्य आजीविका का साधन है,अछूता रह गया है।अपने देश में ऐसे अनेक संसाधन है,जिनका उपयोग करके अधिक एवं सुदृढ़ लाभ कमाया जा सकता है।यह लाभ स्थायी इसलिए है,क्योंकि संसाधन बड़े पैमाने में हैं।इस दिशा में उड़ीसा का संबलपुरी वस्त्र उद्योग,छत्तीसगढ़ का रेशम उद्योग,मिट्टी,बाँस,कपड़े से बनी विभिन्न चीजें,खाद्य उद्योग,बिहार का सत्तू,राजस्थान की कढ़ी,पंजाब की तंदूरी,दक्षिण भारत की इडली-डोसा आदि चीजें किसी मैकडॉनल्ड की पिज़्ज़ा,बर्गर से कम नहीं हैं।विदेशी कंपनियां जिस प्रकार हमारे देश में खाद्य एवं सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में भी अपने को स्थापित कर चुकी हैं,क्या हमें भी विदेशी सरजमीं पर अपनी इन चीजों का व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं करना चाहिए।
- यदि आज का व्यापार बौद्धिक कुशलता पर निर्भर है तो हमारी कुशलता इसमें होनी चाहिए कि हम अपनी चीजों को व्यवसाय की व्यापक प्रतिस्पर्द्धा में खड़ा करें तथा आगे बढ़ें।जिस दिन हमारे अनमोल,परंतु बिखरे पड़े संसाधनों को आज के सॉफ्टवेयर व्यवसाय के समान महत्त्व मिलेगा,अपने देश के विकास को कोई भी रोक नहीं सकता।समृद्धि के इस दौर में अपने अर्जित धन का कुछ अंश समाज सेवा एवं राष्ट्र के विकास में लगाने से ही समुचित विकास संभव हो सकेगा।अर्थ को धर्मपूर्वक अर्जन करने की हमारी प्राचीन परंपरा है।इसी सूत्र को अपनाकर ही हम प्राचीन अर्थ-व्यवस्था के साथ नई अर्थ-व्यवस्था को जोड़ सकते हैं तथा उदारीकरण की प्रतिस्पर्द्धा में भी सफल हो सकते हैं।यह नीति ही हमें एवं हमारे राष्ट्र को समृद्ध एवं समुन्नत बना सकती है।
5.भारतीय उद्योगों की हालत खस्ता (Indian industries are in a bad shape):
- उपर्युक्त विवरण से यह निष्कर्ष निकलता है कि आधुनिकता की दौड़ में,नए-नए उद्योगों को संरक्षण देने तथा परंपरागत उद्योगों,कुटीर उद्योगों को संरक्षण न देने के कारण भारतीय उद्योग तथा कुटीर उद्योग नष्ट होते जा रहे हैं।कुटीर उद्योग मरणासन्न स्थिति में है,खत्म होते जा रहे हैं,नष्ट होने के कगार पर हैं।विदेशों की नकल करने तथा भारत की अर्थ-व्यवस्था को न समझ पाने के ये दुष्परिणाम हैं।कुटीर उद्योग नष्ट होने के कारण बेरोजगारी बढ़ती जा रही है।
- इसका अर्थ यह नहीं है कि ऑनलाइन जॉब,नवीन उद्योगों को नहीं अपनाया जाए।ऐसा करने से हम विकसित देशों,विश्व के अन्य देशों के साथ विकास नहीं कर पाएंगे और पिछड़ते चले जाएंगे।नए उद्योगों,स्टार्टअप को तो बढ़ावा दिया ही जाना चाहिए परंतु भारत के औद्योगिक वातावरण को समझते हुए इतनी अधिक जनसंख्या को रोजगार मिल सके इसके लिए छोटे उद्योगों को भी संरक्षण दिया जाना चाहिए।छोटे उद्योगों को नवीन तकनीकी में ढालकर उन्हें बढ़ावा दिया जाना चाहिए।नए और परंपरागत उद्योगों में एक संतुलन होना चाहिए वरना हम हमारी प्राचीन उद्योगों की विरासत,भारत की आबोहवा के अनुसार विकसित हो चुके परंपरागत उद्योगों,कुटीर उद्योगों को खो बैठेंगे।इसके कारण एक बहुत बड़ी जनसंख्या बेरोजगार हो जाएगी।फिर कितना ही विकास कर लिया जाए,उस विकास पर यह बेरोजगारी पानी फेर देगी।बेरोजगार नवयुवक-युवतियां अपराध जगत की ओर अग्रसर होंगे।
- साइबर क्राइम,बैंक डकैती,अपहरण,ठगी,चोरी आदि आर्थिक अपराध बढ़ते जाएंगे।इस प्रकार हमारे देश भारत की तस्वीर विकसित भारत,ईमानदार और नेक भारत,अच्छे और सच्चे भारत की न होकर लुटेरों,नशेड़ियों,अय्याशियों आदि की होगी जो कि हमारे लिए कलंक की बात होगी।आज पढ़े-लिखे युवक-युवतियां धन कमाने के लिए अनैतिक तरीके अपनाते जा रहे हैं तो इसका मूल कारण है कि हमने धर्म से ज्यादा धन को महत्त्व दिया हुआ है बल्कि यह कहा जाए कि धर्म को बिल्कुल छोड़ दिया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।प्राचीन काल में भारत विश्वगुरु रहा है तो उसका कारण था कि लोगों में धार्मिक भावना थी।धर्मपूर्वक,नीतिपूर्वक व्यवसाय करते थे।कोई दिवालिया हो जाता,कर्ज में डूब जाता था तो अन्य लोग सहायता का हाथ बढ़ाते थे।परंतु आज काम ही ऐसे करते हैं कि हमारा व्यवसाय दिवालिया हो जाता है क्योंकि उद्योगों की नींव नीतिपूर्वक,धर्मपूर्वक नहीं डाली जाती है।प्रतिस्पर्द्धा करते हुए हम येन-केन प्रकारेण आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।
- आज हर घर में एक से अधिक निष्क्रिय लोग मिल जाएंगे जिनको काम नहीं मिलता है,वे अपने भाई-बंधु या माता-पिता पर बोझ बनकर जीवन जी रहे हैं।काम मिलता भी है तो उन्हें नाम मात्र की मजदूरी मिलती है।यदि वह काम करता है तो उसकी आजीविका के आधार पर भरण-पोषण करना मुश्किल है और नहीं करता है तो भूखों मरना पड़ता है,दूसरों पर आश्रित रहकर जीवनव्यापन करना पड़ता है।इन चार पुरुषार्थों धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष में धर्म का सबसे प्रथम स्थान था।इन चार पुरुषार्थों में हमने धर्म और मोक्ष को छोड़ दिया है।अब सीधे हमें अर्थ और काम के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता है।धन आना चाहिए चाहे वह कैसे भी आए।धन आने के बाद कामनाओं की पूर्ति में लग जाते हैं,यह जानते हुए भी कि कामनाएं कभी पूरी नहीं होती हैं।जब तक धन कमाने के तरीके साफ-सुथरे नहीं होंगे,धर्म और मोक्ष को पुरुषार्थ में शामिल नहीं किया जाएगा तब तक केवल धन कमाने,मालामाल होने,वैभव और संपदा होने पर भी अशांत,अहंकारी,शराबी,कबाबी आदि रहेंगे।ऐसी आधुनिकता किस काम की,ऐसा धन किस काम का जिससे शांति न मिल सके,मन को संतुष्टि,आत्मिक संतुष्टि ना मिल सके।अतः धर्मपूर्वक धन कमाना ही सबसे अच्छी,सुख-शांतिदायक नीति है,हो सकती है।
- उपर्युक्त आर्टिकल में अर्थ का अर्जन कैसे करें? (How to Earning Money?),अर्थ का अर्जन करने की नीति कैसी हो? (What Should Be Policy of Acquiring Monery) के बारे में बताया गया है।
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6.अर्थ अर्जन करने का तरीका (हास्य-व्यंग्य) (Way of Acquire Money) (Humour-Satire):
- चंपा:एक व्यक्ति हर समय मेरे पीछे लगा रहता है।स्कूल में पढ़ाने जाती हूं तो वहां भी पहुंच जाता है।शॉपिंग के लिए जाती हूं तो वहां भी सामने ही मिल गया।और गिड़गिड़ाने लगा।
- चमेलीःक्या चाहता है वह?
- चंपा:कहता है मात्र हजार रुपए में धन कमाने के फंडे सीख लो,जिंदगी आराम से गुजरेगी।
7.अर्थ का अर्जन कैसे करें? (Frequently Asked Questions Related to How to Earning Money?),अर्थ का अर्जन करने की नीति कैसी हो? (What Should Be Policy of Acquiring Monery) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न:1.वास्तविक धन क्या है? (What is real money?):
उत्तर:जिस काम को करने से मनुष्य के अंतःकरण को संतोष होता है वास्तविक धन उसी को माना जाता है। लौकिक धन को धन नहीं कहा जाता।
प्रश्न:2.धन के साथ क्या जरूरी है? (What’s important with money?):
उत्तर:धन के साथ इंद्रियों पर नियंत्रण जरूरी है।जो अधिक धन का स्वामी होकर भी इंद्रियों पर अधिकार नहीं रखता,वह इंद्रियों को वश में न रखने के कारण ही ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है।
प्रश्न:3.क्या शील भी धन है? (Is modesty also wealth?):
उत्तर:हां,विदेश में विद्या धन (सुख का साधन) है,संकट-काल में बुद्धि धन है,परलोक में धर्म धन है किंतु शील सर्वत्र धन है।
- उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा अर्थ का अर्जन कैसे करें? (How to Earning Money?),अर्थ का अर्जन करने की नीति कैसी हो? (What Should Be Policy of Acquiring Money?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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Satyam
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