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6 Tips to Stand on One’s Own Strength

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1.अपने बलबूते खड़े होने के 6 मूलमंत्र (6 Tips to Stand on One’s Own Strength),अपने बलबूते कैसे खड़े हों? (How to Stand on Your Own Strength?):

  • अपने बलबूते खड़े होने के 6 मूलमंत्र (6 Tips to Stand on One’s Own Strength) के आधार पर आप जानेंगे कि अपने बलबूते खड़े होने का क्या अर्थ है और कैसे खड़े हो सकते हैं?

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2.विद्यार्थी स्वयं खड़े हों? (Students should stand up on their own):

  • सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन करने,सांसारिक जीवन खुशहाल तरीके से जीने के लिए विद्यार्थी काल में ये सारी तकनीक सीखनी पड़ती है।सांसारिक जीवन की तो बात छोड़ दी जाए तो भी विद्यार्थी काल में विद्यार्थी अनेक कठिनाइयों में फँस जाते हैं,अनेक संकटों का सामना करता है,उनमें से अपने आप को उबारने के लिए विद्यार्थी सामान्यतः अपने मित्रों,शिक्षकों अथवा दूसरों की ओर निहारते हैं।लगता है कि इन्हीं मित्रों,हमारे सहयोगी-साथियों में से हमारी कोई मदद कर देगा।अपनी ओर हम देखते नहीं।विद्यार्थी काल में कुछ हद तक यह तथ्य ठीक भी है कि दूसरों की हमने कभी सहायता की है,हमारी सहायता वे करेंगे,किंतु कदम-कदम पर,हर संकट में,हर बात के लिए दूसरों पर निर्भर रहना ठीक नहीं है।और आंतरिक जीवन में भी ऐसा नहीं है।हमारी आंतरिक व्यवस्था में हमारे अलावा,हमारे आत्मबल के अलावा और कोई शक्ति हमारी मदद नहीं कर सकती।आत्मविश्वास के लिए हर व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से,स्वयं निज का पुरुषार्थ ही करना पड़ेगा।
  • सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि विद्यार्थी को स्वयं,अपनी मदद करने के लिए आगे आना चाहिए।जितने भी विद्यार्थी टॉप पर पहुंचे हैं,सफलता के शिखर पर पहुंचे हैं या पहुंचते हैं,वे सदैव अपनी आत्मशक्ति का आश्रय लेकर,उसे सशक्त बनाकर ही पहुंचे हैं।विद्यार्थी को अपने आप को स्वयं,अपने द्वारा ही ऊंचा उठाना चाहिए।
  • हम जितेंद्रिय हैं,ऊंचे उद्देश्यों में उच्चस्तरीय प्रयोजनों में रुचि रखते हैं तो हम अपने निज के,अपने मन के मित्र हैं।उसको ऊंचा उठने में हम मदद कर रहे हैं।यदि हम भोग-ऐश्वर्य के प्रवाह में खिंच जाते हैं,हम स्वयं को बिखेर देते हैं,उच्छृंखल विचारों में बहते चले जाते हैं,तो हम अपने मन के शत्रु हैं।हमारा आपा ही हमारा बंधु है,मित्र है और अपना आपा ही हमारा दुश्मन है।जिस दिन हम मन को मित्र बनाकर,उसे जीत लेते हैं तो फिर हम अपने क्षेत्र (अध्ययन) के साथ लौकिक जगत में भी एक सफल विद्यार्थी बनते चले जाते हैं।
  • जब तक विद्यार्थी अपने बलबूते खड़ा होना नहीं सीखेगा तब तक वह दूसरों पर निर्भर रहेगा और दूसरों पर निर्भर रहने के अनेक नुकसान होते हैं।उन नुकसानों की फेहरिस्त यहाँ प्रस्तुत करें दी जाए तो विद्यार्थी की आँखें फटी की फटी रह जाएंगी।उसके शरीर में सिरहन दौड़ पड़ेगी कि ऐसा भी हो सकता है।दरअसल विद्यार्थी की यह आदत होती है कि जब तक वह ठोकर खाकर गिर नहीं जाता है तब तक सीखने के लिए तैयार नहीं होता है।कुछ ही मेधावी,सजग और होश में रहने वाले विद्यार्थी ऐसे होते हैं जो या तो आने वाले संकटों का तोड़ पहले ही ढूंढ लेते हैं या सामना करने पर उनसे जूझते हैं और पार पा लेते हैं।तो विद्यार्थियों यह विद्यार्थी काल है ही ऐसा कि इसमें आप चाहे तो जिंदगी जीने की कला सीख सकते हैं और जिंदगी नर्क बनाने की कला भी सीख सकते हैं।

3.विद्यार्थी में पूर्ण क्षमताएं विद्यमान (The student has full potential):

  • विद्यार्थी को ना तो अभागा बताया गया है और न अपूर्ण।उसमें वे सभी क्षमताएं बीजरूप में विद्यमान हैं,जिनके आधार पर अभीष्ट करियर की कला,भौतिक एवं आत्मिक सफलताएं प्रचुर परिमाण में प्राप्त की जा सकती है।आवश्यकता उनके समझने और उपयोग करने की है।जिन्हें यह विश्वास है कि हम आत्मनिरीक्षण और आत्मविकास का अवलंबन करके अपनी आवश्यक क्षमताएं विकसित कर सकते हैं,उन्हें यही उचित प्रतीत होता है कि दूसरों के सामने सहायता के लिए गिड़गिड़ाने की अपेक्षा अपनी ही शक्ति,सामर्थ्य एवं प्रतिभा के विकास में जुटा जाए।
  • विद्यार्थी अपने जीवन में अपने प्रकार की बढ़ी-चढ़ी सफलताएं प्राप्त करते हैं।इसके पीछे एकमात्र कारण यही होता है कि उन्होंने अपने साहस और संकल्प को जाग्रत किया और अपने को इस योग्य बनाया कि अभीष्ट उपलब्धियों को प्राप्त कर सकना कठिन न रहे।जो विद्यार्थी प्रगति के साधन बाहर ढूंढते हैं,परिस्थितियों अथवा  शिक्षकों,अपने सहपाठियों के सहयोग-अवरोध को अनावश्यक महत्त्व देते हैं,वे भूल जाते हैं कि बाहरी सहयोग यदा-कदा ही क्वचित उपयोगी सिद्ध होता है।उसे प्राप्त करके किसी समय,किसी प्रकार की एक छोटी सफलता भले ही प्राप्त कर ली जाए,निरंतर प्रगति पथ पर बढ़ने के लिए हर समय आवश्यक सहायता अन्यत्र कहीं से नहीं मिल सकती।वह तो अपनी भीतर से ही जगानी पड़ती है।
  • कितने विद्यार्थियों के पास प्रतिभा एवं क्षमता का अपार भंडार भरा होता है,पर वे उसे जानते नहीं और जानते हैं तो यह अनुभव नहीं करते कि यह विशेषताएं कितनी अधिक मूल्यवान है।आमतौर से विद्यार्थी साधनों को महत्त्व देते रहते हैं,उन्हें ही प्रगति का आधार मानते हैं।इस तथ्य को कोई बिरले ही समझ पाते हैं कि अपना संकल्प बल और उसका गुण-कर्म-स्वभाव के परिष्कृत रूप में सामने आने वाला सदुपयोग कितना अधिक मूल्यवान है।यदि इस सच्चाई को समझा जा सके तो सबसे अधिक प्रयत्न इसी एक बिंदु पर एकत्रित किया जाए कि अपनी साहसिकता,तत्परता एवं एकाग्रता को किस तरह अभीष्ट प्रयोजन के लिए जुटा दिया जाए। प्रगति के पथ पर चलने के लिए कई प्रकार के साधनों की जरूरत पड़ती है।इनमें से सबसे बड़ा साधन है-अपना मनोबल।अपने को समझने और सुधारने से बढ़कर और कुछ बुद्धिमत्ता इस संसार में नहीं है।अपनी बिखरी हुई शक्तियों को यदि एकत्रित करने का अभ्यास कर लिया जाए और उन्हें किस काम में,किस प्रकार लगाना है-यह निश्चित कर लिया जाए तो समझना चाहिए की सफलता का अधिकांश प्रयोजन पूरा कर सकने का आधार बन गया है।
  • दूसरे विद्यार्थी,शिक्षक हमें एक सीमा तक ही सहारा दे सकते हैं।हर विद्यार्थी की अपनी समस्याएं हैं,उन्हीं को सुलझाना कठिन पड़ता है,फिर दूसरों की सहायता करने में कोई कितनी दिलचस्पी ले सकता है या सहयोग दे सकता है,यह एक विचारणीय बात है।जब हमीं दूसरों से आशाएं बाँधते हैं और अपनी गुत्थी आप नहीं सुलझा सकते तो दूसरों से ही यह आशा कैसे रखी जा सकती है कि अन्य लोगों के पास इतना फालतू समय या साधन होगा कि हमारे लिए कुछ अधिक कर सकें।
    हम जिन दूसरों से सहायता की आशा करते हैं,उनके वर्चस्व को स्वीकार करते हैं।हमें स्वीकार करना चाहिए कि यदि अपना आपा विकसित और व्यवस्थित किया जा सके तो उसकी गरिमा उन सभी सहायकों की मिली-जुली सहायता से भी अनेक गुनी उच्च है,जिनसे कुछ पाया है या पाने का स्वप्न देखा है।

4.अपने बलबूते खड़े न होने के नुकसान (Disadvantages of not being able to stand on your own):

  • सबसे बड़ा नुकसान तो यह है कि एक विद्यार्थी की सुप्त शक्तियां जाग्रत नहीं हो पाती है।जबकि यह मनुष्य जीवन इसलिए मिला है कि सुप्त शक्तियों को जाग्रत किया जाए विशेष कर विद्यार्थी जीवन।विद्यार्थी जीवन में सोई पड़ी हुई सुप्त शक्तियों को जाग्रत करके नींव लगाने का अवसर मिलता है।यदि हम हमारी शक्तियों को काम में नहीं लेंगे तो ऊँचे नहीं उठ सकेंगे,हमारी प्रगति और विकास नहीं हो पाएगा।
  • दूसरा नुकसान यह है कि हम इंसान की परख नहीं कर सकेंगे।कौन इंसान मानव की खाल पहनकर अंदर हैवान है,दुर्जन है,राक्षस है और कौन इंसान देवता है,महामानव है,सज्जन है इसकी पहचान नहीं कर सकेंगे।जब अच्छे और बुरे इंसान की परख खो देंगे तो बुरा इंसान हमारे से नाजायज फायदा उठा सकता है।दूसरा विद्यार्थी,शिक्षक अथवा व्यक्ति द्वारा नाजायज फायदा उठाने देना परोपकार नहीं होता है।
  • बुरे लोगों और दुर्जनों की संगत नहीं करनी चाहिए परंतु हमारा विवेक जाग्रत नहीं होगा,हमारी आत्मिक शक्ति का जागरण नहीं होगा तो हम दुर्जनों की संगत कर बैठेंगे।दुर्जनों की संगत से हमारा चारित्रिक पतन हो जाएगा।किसी कवि ने कहा है कि
  • संगत से गुण होत है,संगत से गुण जाए।बाँस फाँस और मिसरी,एक ही भाव बिकाय।।
  • मिसरी की डली में पड़ी हुई बाँस की फाँस भी मिसरी के भाव बिकती है।
  • चौथा नुकसान यह है कि हम छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए भी दूसरे विद्यार्थियों और शिक्षकों पर निर्भर हो जाएंगे।हमारे सहपाठी और शिक्षक हमेशा हमारे साथ नहीं रह सकते और जीवन में कदम-कदम पर समस्याओं और संकटों का सामना करना पड़ता है,ऐसी स्थिति में हम बार-बार ठोकर खाकर गिरेंगे,पड़ेंगे और उठना हमें आता नहीं तो हमारा पतन होना निश्चित है।
  • अगला नुकसान यह है कि हमें कदम-कदम पर अपमान और जलालत सहन करनी पड़ेगी क्योंकि स्वाभिमानपूर्वक जीने के लिए अपने आंतरिक गुणों को विकसित करना होता है,अपने आत्मबल को पहचानना होता है,अपने ऊपर आत्मविश्वास रखना होता है।
  • अगला नुकसान यह है कि हम हमारे जीवन का सही लक्ष्य नहीं चुन सकते हैं और बिना लक्ष्य के जीवन जीना पतवार के बिना नाव चलाना है जो एक ही जगह चक्कर काटती रहती है।लक्ष्य दिशासूचक यंत्र की तरह है जो हमारे अंदर लगन और प्रेरणा प्रदान करता है,हमारी आत्मिक शक्तियों को जगाने के लिए प्रेरित करता है।
  • विद्यार्थी स्वयं अध्ययन करके ना तो किसी पाठ या एक्सरसाइज को पढ़ कर समझ सकता है और न ही स्वयं सवालों को हल कर सकता है।न स्वयं किसी विषयवस्तु के नोट्स बना सकता है।केवल रट्टू तोते की तरह रटकर परीक्षा को उत्तीर्ण करने का प्रयास करता है।

5.छात्र-छात्राओं के लिए अपने बलबूते खड़े होने के उपाय (Ways for students to stand on their own):

  • कोई भी व्यक्ति जन्म से ही अपने बलबूते खड़ा नहीं होता है।जन्म होते ही उसे सभी कार्यों के लिए माँ पर निर्भर रहना पड़ता है।न चल सकता है,न खा-पी सकता है।लेकिन माँ उसे स्वयं चलना सिखाती है।इस प्रक्रिया में वह कई बार गिरता-पड़ता है और चोट भी लगती है लेकिन फिर वह उठता है,बार-बार गिरता है,बार-बार चोट खाता है लेकिन माँ फिर भी उसे चलना,खाना-पीना सिखाती है और एक दिन वह स्वयं अपने पैरों पर खड़ा होकर चलना सीख जाता है,स्वयं खाना-पीना सीख जाता है,स्वयं अपने कपड़ों को पहनना,धोना सीख जाता है,स्वयं नहाना सीख जाता है आदि।लेकिन इस सारी प्रक्रिया को वह तत्काल नहीं सीख जाता है और ना सीख सकता है।समय लगता है,धीरे-धीरे बड़ा होता जाता है और स्वयं अपने कार्य करना सीख जाता है।जब तक माँ के हाथ में रहता है,माँ उसे सिखाती है,परंतु ज्योंही वह परिपक्व हो जाता है तो पढ़ना-लिखना भी दूसरों पर आश्रित होकर सीख जाता है।
  • परंतु इसमें कुछ छात्र-छात्राएं गलती कर बैठते हैं कि पाठ को अध्यापक समझाएगा तो समझेगा,अध्यापक सवाल हल करवाएगा तो हल करेगा,अध्यापक नोट्स बनवाएगा तो बनाएगा।अब यहां पर माँ तो है नहीं जो उसे स्वयं के पैरों पर खड़ा होना सीखने के लिए प्रेरित करेगी।यहां अध्यापक आपको समझाएगा,नोट्स बनवाएगा और कालांश समाप्त होते ही अपने-अपने घर चले जाएंगे।छात्र-छात्रा अध्यापक,सहपाठियों पर निर्भर रहते हैं।स्वयं अध्ययन करके समझने का प्रयास नहीं करेंगे,स्वयं नोट्स बनाना नहीं सीखेंगे।ऐसे बहुत कम अध्यापक होते हैं जो छात्र-छात्राओं को स्वयं अध्ययन करके समझने,स्वयं के नोट्स बनाने,स्वयं समझ कर सवाल हल करने के लिए प्रेरित करते हों।अधिकांश शिक्षक अपना टास्क पूरा करके चले जाते हैं,उन्हें कोई मतलब नहीं है कि आप स्वयं अपने बलबूते खड़े होते हैं अथवा नहीं।आप स्वयं प्रेरणा से खड़े होना चाहते हैं तो खड़े हो जाइए।स्वयं का कार्य स्वयं करना सीखें।
  • धीरे-धीरे जब आप  स्वयं अध्ययन करके समझना सीखेंगे।यदि पाठ्यपुस्तक से समझ में नहीं आता है तो संदर्भ पुस्तकों का सहारा लीजिए लेकिन धीरे-धीरे पाठ्य पुस्तक से ही समझने का प्रयास कीजिए।इसके लिए अंतःप्रेरणा ही आवश्यक नहीं है,इसके लिए जरूरत है अंतःप्रज्ञा की।अंतःप्रज्ञा के बल पर ही आप अपने बलबूते खड़े हो सकते हैं।स्वयं के बलबूते खड़े होने में आपसे कई बार गलतियां होंगी परंतु आप स्वयं अपने बलबूते खड़े होने का प्रयास करेंगे तो एक न एक दिन सफल हों ही जाएंगे।सहारे कितने ही मजबूत हों एक न एक दिन आपको त्यागने ही पड़ेंगे।यदि आप वैसाखियों के सहारे चलना चाहते हैं और सहारे को नहीं छोड़ना चाहते हैं तो फिर अपने बलबूते खड़े नहीं हो सकते हैं।अंतः प्रेरणा और प्रज्ञा ही वह ब्रह्मास्त्र है जिसके द्वारा आप आगे बढ़ सकते हैं।कोशिश करके देखिए तो सही,आप बहुत से मामलों में अपना काम खुद करना सीख जाएंगे।हालांकि सभी मामलों में तो कोई भी विद्यार्थी अपने बलबूते खड़ा नहीं हो पाता है परंतु आप अधिक से अधिक अपना कार्य स्वयं के आत्मबल पर करना सीख जाएंगे।स्वयं अध्ययन करके कैसे समझना है,स्वयं के नोट्स कैसे तैयार करने हैं,स्वयं अध्ययन करके पाठ को कैसे स्मरण करना है आदि बातों को सीखते जाएंगे।आप देखेंगे कि आत्मबल के आधार पर आप बहुत सी बातें अपने आप सीखते चले जाएंगे।एक बार कोशिश तो करके देखिए,आप कोशिश ही नहीं करेंगे तो कैसे आगे बढ़ेंगे।हार से हताश मत हो,हार से निराश मत हों।ज्यों-ज्यों आप आगे बढ़ते जाएंगे,स्वयं के बल पर अध्ययन करना सीख जाएंगे तो आपका आत्मबल बढ़ेगा,आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा।शीर्ष पर पहुंचने,उन्नति करने का यही उत्तम तरीका है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में अपने बलबूते खड़े होने के 6 मूलमंत्र (6 Tips to Stand on One’s Own Strength),अपने बलबूते कैसे खड़े हों? (How to Stand on Your Own Strength?) के बारे में बताया गया है।
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6.छात्र का अपने ही बलबूते पर खड़ा होना (हास्य-व्यंग्य) (Student Standing on His Own) (Humour-Satire):

  • टीचर (छात्र से):आप बार-बार,हर सवाल मेरे से पूछते हो।आप अपने बलबूते खड़े होना भी सीखें।
  • छात्र:सर,आपको दिखाई नहीं दे रहा है,मैं अपने पैरों पर ही तो खड़ा हूं,अपने पैरों से ही तो चलता हूं आपके पैरों से थोड़े चलता हूं।

7.अपने बलबूते खड़े होने के 6 मूलमंत्र (Frequently Asked Questions Related to 6 Tips to Stand on One’s Own Strength),अपने बलबूते कैसे खड़े हों? (How to Stand on Your Own Strength?) से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:

प्रश्न:1.स्वयं अध्ययन कैसे करें? (How to study yourself?):

उत्तर:पाठ समझ में नहीं आता है तो फिर से पढ़ें और कठिन शब्दों को शब्दकोश या संदर्भ पुस्तकों से देखें।बार-बार अभ्यास करने पर स्वयं समझना सीख जाएंगे।

प्रश्न:2.उन्नति का सही तरीका क्या है? (What is the right way to advance?):

उत्तर:अपना कार्य स्वयं करना,अधिक से अधिक कार्य स्वयं करना,स्वयं का कार्य स्वयं करने में सिद्धहस्त होना।

प्रश्न:3.स्वयं का कार्य एक अधिकारी करने लगेगा,तो कैसे पूरा होगा? (If an officer starts doing his own work,how will it be completed?):

उत्तर:कुछ न कुछ कार्य अधिकारी को भी स्वयं करना चाहिए,सभी कार्य कर्मचारियों से नहीं करवाता है।मानिटरिंग करना और कर्मचारियों से काम लेने की कला भी आनी चाहिए।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा अपने बलबूते खड़े होने के 6 मूलमंत्र (6 Tips to Stand on One’s Own Strength),अपने बलबूते कैसे खड़े हों? (How to Stand on Your Own Strength?) के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  • *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*
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