Menu

Righteousness as Spiritual Hunger:A Student’s Guide to Inner Peace and Purpose

Contents hide

1.धर्म एक आध्यात्मिक भूख:आंतरिक शांति और उद्देश्य के लिए एक छात्र की मार्गदर्शिका (Righteousness as Spiritual Hunger:A Student’s Guide to Inner Peace and Purpose):

  • जानिए धर्म एक आध्यात्मिक भूख (Righteousness as Spiritual Hunger) कैसे है? धर्म विद्यार्थियों की आध्यात्मिक भूख को कैसे शांत करता है और उन्हें स्थिरता,मानसिक शांति और सफलता की दिशा में ले जाता है।
  • आज के आधुनिक युग में जब हम पढ़ रहे हैं,करियर और भविष्य की चिंता में दिन-रात भाग-दौड़ कर रहे हैं,तब एक प्रश्न हर आत्मा के अन्दर उठता है:क्या केवल डिग्री और अच्छी नौकरी ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है?
  • जैसे हमारे शरीर को ऊर्जा के लिए भोजन की जरूरत होती है,ठीक वैसे ही हमारे मन और आत्मा (mind and soul) को शांति,संतुष्टि और उपदेश के लिए धर्म (धार्मिकता/सही आचरण) की जरूरत होती है।यही कारण है कि धर्म एक आत्मिक भूख है।

Also Read This Article:Recognize Unity of Science and Philosophy:Vigyan Aur Darshan ka Gehra Rishta

2.आत्मिक भूख क्या है? (What is spiritual hunger?):

  • आत्मिक भूख का मतलब कोई कर्मकाण्ड या पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है।जब एक छात्र पढ़ाई में सब कुछ करते हुए भी अन्दर से तनावग्रस्त हो जाता है,तो भटका हुआ या तनाव महसूस होता है तो उसका कारण है कि विद्यार्थी के मन और दिमाग को (अध्ययन द्वारा) तो भोजन मिल रहा है परन्तु आत्मा को भोजन (धर्म) नहीं मिल रहा है।
  • आत्मा हमेशा सत्य,नैतिकता और शांति की तलाश करती है।जब हम सही राह और कर्त्तव्य पर चलते हैं और आत्मिक संतुष्टि मिलती है तभी ये भूख शांत होती है।

3.विद्यार्थी जीवन में धर्म का सही अर्थ और महत्ता (The True Meaning and Importance of Righteousness in Student Life):

  • विद्यार्थी के लिए धर्म का अर्थ है:कर्त्तव्य पालन।बिना किसी छाल,कपट,दिखावे या धोखाधड़ी के अपनी मेहनत पर विश्वास रखना।
    समय का सदुपयोग (Utilizing Time):अफसोस और भटकाव को छोड़कर अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करना।जितना समय आप लक्ष्य पर व्यतीत करते हैं वही सही जीवन जीना है।व्यर्थ के कार्यों में समय को बर्बाद करना जीवन के अमूल्य क्षणों को नष्ट करना है जो कभी लौटकर नहीं आते हैं।
  • सम्मान और नैतिकता (Respect and Morality):गुरुओं,माता-पिता और साथियों के प्रति आदर और दया का भाव रखना।क्योंकि माता-पिता,गुरुओं और समाज का हमारे ऊपर ऋण रहता है जो किसी भी कीमत पर नहीं चुकाया जा सकता है अतः उनके प्रति कृतज्ञता और आदर भाव रखना चाहिए।जब एक छात्र-छात्रा सिद्धान्त और आदर्शों को अपनाता है,तो वह केवल एक अच्छा विद्वान ही नहीं,बल्कि एक बेहतर इंसान बनता है।केवल किताबी ज्ञान (डिग्री) लेना अधूरा है जब तक उसमें नैतिकता,धर्म और अध्यात्म का समावेश न हो।सही दिशा में मेहनत करना,ईमानदारी से पढ़ाई करना और गुरु/माता-पिता का आदर करना ही छात्र का सबसे पहला धर्म है।धर्म विद्यार्थी को भटकाव (धोखा देना,अफसोस,गलत संगत) से बचाता है।
  • मानसिक शांति और एकाग्रता में मदद (Mental Peace and Concentration):आजकल के विद्यार्थियों में अवसाद,चिंता और व्याकुलता एक आम समस्या बन चुकी है।जब हम गलत राह पर (जैसे अफसोस,छल या दूसरे से अस्वस्थ तुलना) पर चलते हैं,तो हमारा मन अशांत हो जाता है।इसके विपरीत जब हम धर्म के पथ पर चलते हैं तो मन में अपराध बोध नहीं होता। आत्मविश्वास बढ़ता है।एकाग्रता में सुधार होता है। उसका मन शांत रहता है।शांत मन से एकाग्रता और स्मरणशक्ति (concentration and Memory power) बढ़ती है।

4.धर्म विद्यार्थियो की सफलता में सहायक (Helping Dharma Students Succeed):

  • धर्म केवल आध्यात्मिक क्षेत्र में ही उपयोगी नहीं है बल्कि हमारे सांसारिक जीवन,करियर निर्माण और सफलता में भी सहायक है।सफलता से अधिक चरित्र का महत्त्व है।चारित्रिक दृढ़ता से प्राप्त की गई सफलता ही सुन्दर लगती है और स्थायी होती है।
  • ज्ञान अगर बिना नैतिकता के हो,तो वह विनाशकारी हो सकता है।धर्म एक विद्यार्थी के अन्दर चरित्र का निर्माण करता है।
    एक मजबूत चरित्र वाला छात्र मुश्किल वक्त में भी टूटता नहीं है।वो सफलता (success) और असफलता (Failure) दोनों को समान रूप से स्वीकार करके आगे बढ़ना जानता है।
  • धर्म कोई बाहरी आदान-प्रदान नहीं,बल्कि आत्मा की अलौकिक माँग है।विद्यार्थियों के लिए धर्म को अपनाना कोई पुरानी परम्परा नहीं,बल्कि एक आधुनिक अवसर है।
  • जब आप विद्या-अध्ययन को अपना सबसे बड़ा धर्म  मानकर ईमानदारी से आगे बढ़ेंगे,तो आपकी आत्मिक भूख भी शांत होगी और जीवन में सच्ची सफलता मिलेगी।

5.अध्यात्म धर्म का दिशानिर्देशक (The Spirituality Guides to  Righteousness):

  • अध्यात्म धर्म का मार्ग निर्देशक है (The Spirituality Guides to  Righteousness) जिसके ज्ञान के बिना धर्म अन्धविश्वास एवं पाखण्ड मात्र रह जाता है तथा वह अपने मार्ग से ही भटक जाता है।धर्म जीवात्मा की आध्यात्मिक उपलब्धि की विधि है।बिना आध्यात्मिक दिशा निर्देश (Without spiritual guidelines) के धर्म पर चलने वाला बिना कम्पास के जहाज को समुद्र में छोड़ देने के समान है जिससे वह कभी अपने गन्तव्य तक नहीं पहुंच सक‌ता है।धर्म वह विद्या है जिससे मनुष्य इस जीवन और आगामी जीवन को सुखी बनाकर स्वचेतना का विकास करते हुए अन्त में भगवदीय चेतना से संयुक्त हो जाता है जो उसकी परमगति है।
  • धर्म इसी परमगति को प्राप्त करने की विधि है।अध्यात्म विज्ञान है और धर्म इसकी तकनीक है।अध्याय ज्ञान पक्ष है तथा धर्म उसका आचरण एवं क्रियापक्ष है जिस पर चलकर जीवात्मा अपनी उन्नति करता चला जाता है।धर्म के बिना उसकी उन्नति नहीं होती।
    आज धर्म का अर्थ वैसा नहीं समझा जाता जैसा वास्तव में है बल्कि मानव समूहों द्वारा निर्मित सम्प्रदाय द्वारा माने जाने वाले सिद्धान्तों,रीति-रिवाजों और विश्वासों को धर्म नाम दे दिया गया है जबकि धर्म का वास्तनिक अर्थ है स्वभाव,जो धारण कर रखा हो,कर्त्तव्य और कर्त्तव्य का पालन करना।

Also Read This Article:Righteousness

6.धर्म आन्तरिक गुणों का प्रकटीकरण (Dharma Manifestation of Inner Qualities):

  • वैयक्तिक हो,चाहे सामाजिक सुव्यवस्था,दोनों के लिए धर्म-धारण अर्थात अध्यात्म से बढ़कर और कोई साधन नहीं हो सकता।व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में संव्याप्त अवांछनीयता पर बलपूर्वक नियंत्रण करने में शासन की अधिकांश क्षमताएँ नष्ट होती रहती हैं,फिर भी कुछ कहने लायक समाधान नहीं मिलता।यदि धर्म-धारणा को प्रखर और समुन्नत बना सकने योग्य वातावरण उत्पन्न किया जा सके,उचित साधन जुटाये जा सकें,तो निस्सन्देह सामाजिक सुव्यवस्था और राष्ट्रीय समर्पण का प्रयोजन सहज ही पूरा हो सकता है।सार्वभौम और सर्वकालीन सुख-शान्ति की स्थापना धर्म-धारणा (Religious Perception) को सुदृढ़ और समुन्नत बनाकर ही की जा सकती है।
  • यों तो आज सुख-शान्ति के लिए अधिक सुविधाजनक साधनों की खोज में विज्ञान और शासन के प्रयास निरन्तर चल रहे हैं।दोनों अपने-अपने ढंग से अपनी-अपनी क्षमताओं को मनुष्य को समुन्नत बनाने में खपा रहे हैं और उसकी फलश्रुतियाँ भी सामने हैं,इतने पर भी इस तथ्य को भुला ही दिया जाता है कि मनुष्य एक चेतनात्मक परिपूर्ण सत्ता है।
  • आनन्द का उद्गम उसके भीतर है।वही अन्तज्योंति (Antarjyoti) जब बाह्यजगत पर प्रतिबिम्बित होती है तो सौन्दर्य,संतोष एवं रसानुभूति का अनुभव होता है।अतः उत्कर्ष चेतना का भी होना चाहिए।चेतना का परिष्कार किए बिना,विचारणा का स्तर ऊँचा उठाये बिना विपुल साधन-सम्पत्ति होने पर भी न आनन्द मिल सकेगा और न उल्लास व संतोष।विचारणा को उत्कृष्टता के स्तर तक उठाने और सुदृढ़ बनाने में धर्म का तत्वज्ञान ही समर्थ हो सकता है।भौतिक विज्ञान इस प्रयोजन की पूर्ति में बहुत अधिक सहायता नहीं कर सकता।
  • इस संदर्भ में प्रख्यात मनोवेत्ता जुंग ने अपनी कृति ‘मॉडर्न मैन इन सर्च ऑफ सोल’ में कहा है कि जब विज्ञान में भी किसी वस्तु का ज्ञान प्राप्त करने के लिए विशिष्ट यंत्र ही आवश्यक व उपयोगी होते हैं।इसमें न तो माइक्रोस्कोप द्वारा दूरस्थ तारे को देखा जा सकता है,वरन शक्तिशाली टेलिस्कोप की जरूरत पड़ती है और न ही सर्जन की छुरी-कैंची से मलेरिया के अत्यन्त सूक्ष्मजीवाणु-विषाणु देखे जा सकते हैं।
    उपयुक्त यंत्र-उपकरण से ही तत्सम्बन्धित वस्तुओं की,बीमारियों की जाँच-परख की जा सकती है।इसी प्रकार बुद्धि के द्वारा आध्यात्मिक सत्यों का परीक्षण नहीं किया जा सकता,भले ही वह कितनी ही तीक्ष्ण क्यों न हो।
  • पदार्थ से सुख मिलता है,यह सिद्धान्त भी अपने स्थान पर ठीक है,पर गलत यह भी नहीं कि उत्कृष्ट चिन्तन उपलब्ध साधनों की मात्रा अधिक न होने पर भी जो हस्तगत है,उससे इतना आनन्द (Pleasure) उठाया जा सकता है,जो परिपूर्ण संतोष प्रदान कर सके।इसी तरह भौतिक विज्ञान द्वारा सुविधा-साधनों की दिशा में निरन्तर किये जा रहे अभिवृद्धि के प्रयासों से भी समुचित लाभ तभी उठाया जा सकेगा,जब भावना एवं दृष्टिकोण (Sentiment and Attitude) को ऊँचा उठा सकने में समर्थ धर्मतत्व को समझने के लिए भी समानान्तर प्रयास किया जाए।
  • आज जहाँ विज्ञान ने शक्ति को पदार्थ के रूप में और पदार्थ को शक्ति के रूप में परिवर्तित करके यह सिद्ध कर दिया है कि सूक्ष्म को स्थूल में और स्थूल को सूक्ष्म में परिवर्तित किया जा सकता है,वहीं दर्शन और अध्यात्म (Philosophy and spirituality) हजारों वर्षों पूर्व से यह सिद्ध करता आ रहा है कि विचार को घटना के रूप में विकसित किया जा सकता है और घटनाएँ विचारों का निर्माण कर सकने में समर्थ हैं।

7.धर्म विलासितापूर्ण जीवन जीने में नहीं (Righteousness is not in living a life of luxury):

  • वस्तुतः मानव जीवन उतना जटिल नहीं है जितना कि बन गया है या बना दिया गया है।हँसी-खुशी की संभावनाओं से वह भरा-पूरा है।शरीर और मन की संरचना इस प्रकार हुई है कि वह बाहर के तनिक से साधनों की सुविधा प्राप्त हो जाने पर सहज ही स्वस्थ और सुखी रह सकता है।अतिस्वल्प साधनों से अन्य जीवधारी अपना संतोषपूर्ण व्यवस्थाक्रम चलाते रहते हैं,न उन्हें रुग्णता सताती है और न खिन्नता।यदि उन्हें सताया न जाए तो शरीरयात्रा की प्रचुर परिमाण में उपलब्ध साधन-सामग्री से ही अपना काम चला लेते हैं और हँसी-खुशी के दिन काटते हैं।
  • मनुष्य को यह सुविधा तो और भी अधिक मात्रा में उपलब्ध है।उसका अस्तित्व एवं व्यक्तित्व इतना समर्थ है कि न केवल शारीरिक सुविधा की सामग्री,वरन मानसिक प्रसन्नता (Mental Happiness) की परिस्थिति भी स्वल्प प्रयत्न से प्रचुर मात्रा में प्राप्त कर सकता है।इतने पर भी देखा यह जाता है कि मनुष्य खिन्नता और अतृप्ति से ही घिरा रहता है।भौतिक सम्पदा व विज्ञानजन्य विपुल साधन-सुविधा उपलब्ध होने पर भी असंतोष व आधि-व्याधियों की घटाएँ उस पर सदा छायी ही रहती हैं।
  • तमाम सुविधाएँ एवं सौभाग्य जैसे समस्त साधन प्राप्त होने पर भी दुर्भाग्य की जलन में झुलसते रहने के पीछे एक ही कारण ढूँढ़ा जा सकता है कि सहज रीति-नीति को छोड़कर हम जाल-जंजाल भरी विद्रूप विडम्बनाओं में उलझ गये और अपना मार्ग स्वयं कंटकाकीर्ण बना लिया।सहज स्वाभाविकता का नाम है:’धर्म’ और इसके विपरीत आचरण को अधर्म कहते हैं।वैयक्तिक और सामाजिक कर्त्तव्यों को जो सही तरह समझता है और सही तरह पालन करता है,उसे स्वल्प साधनों में भी तुष्ट,पुष्ट और प्रगतिशील देखा जा सकेगा।धर्म की धारणा निश्चित रूप से सुख-शान्ति के प्रतिफल प्रदान करती है।
  • मूर्धन्य मनीषी एलिस ने कहा है कि मनुष्य के मन और शरीर को आधि-व्याधियों ने इसलिए घेरा है कि उसे धर्म का समुचित संरक्षण नहीं मिला।यदि आहार-निद्रा की तरह धर्म को भी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता (The Essential Necessity of Life) माना गया होता तो हम आज जिन शोक-सन्तापों की विविध विधि ज्वालाओं में घिरकर जल-भुन रहे हैं,उन व्यथाओं को सहने से सहज ही बच सकते थे।
  • सन्त आगस्टीन ने मानव की,मानव के प्रति कर्त्तव्य घोषणा को माना है,जबकि सेन्टपाल का कथन है कि पतन के गर्त से उत्थान के शिखर पर चढ़ने की सीढ़ी को धर्म कहना उपयुक्त होगा।हेम्रोज ने भी अपना मन्तव्य कुछ इसी तरह से व्यक्त किया है।उन्होंने धर्म को दो धाराओं में विभक्त किया है:एक आस्थामूलक और दूसरी व्यवहारपरक।आस्था की स्थापना ‘अध्यात्म’ के आधार पर होती है और आचरण-व्यवहार का समीकरण धर्माचरण पक्ष द्वारा किया जाता है।दोनों के समन्वय को ‘धर्म’ कह सकते हैं।परमात्मवाद के सहारे ही धर्म-सिद्धान्तों की व्याख्या और पुष्टि की जा सकती है।

8.धर्म एक-दूसरे को रौंदना या गिराना नहीं (Righteousness is not about trampling or knocking each other down):

  • दार्शनिक विलियम बैक ने धर्म को आत्मा का कवित्व कहा है।वे कहते हैं कि पुराणों के अलंकार में परियों की गाथाएँ और जादुई किम्बदन्तियाँ भरी पड़ी हैं।इन सबका सार-निष्कर्ष यह है कि आत्मा की भावसरिता यदि उत्कृष्टता की दिशा में बह निकले तो उसका प्रतिफल व्यक्ति और समाज के लिए उतना ही सरस और आकर्षक हो सकता है,जैसा कि देवताओं का सौन्दर्य,वैभव और कर्तृत्त्व।इसी तरह ल्यूवा ने धर्म को एक सनातन राजमार्ग (Religion is an eternal highway) बताया है,जिस पर धीरे-धीरे चलते हुए मनुष्य जाति विकास के वर्तमान स्तर तक पहुँचने में समर्थ हुई है और भविष्य में अधिक कुछ पाने की आशा कर सकती है।
  • इस संबंध में फ्रेजर का अपना अलग मत है।वे धर्म को भगवदीय आदेश और आत्मतृप्ति का आधार मानते हैं।कोमटे की तो मान्यता है कि अन्तरात्मा के मृदुल रस को बाह्य संसार के साथ समन्वित करके कैसे बहुमुखी सरसता उत्पन्न की जा सकती है,इस आवश्यकता की पूर्ति कर सकने वाली कला का नाम ही धर्म है।
    धर्म-धारणा के सम्बन्ध में वस्तुतः अलग-अलग मनीषियों,दार्शनिकों के अपने अलग-अलग मत हैं,इतने पर भी सबने उसे मानवी कर्तव्यनिष्ठा से जुड़ा हुआ बताया है।संत डाइनाइसिअस का निरूपण यह था कि अदृश्य जगत और दृश्यजगत के परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली धाराओं को एकात्म बना देने वाले महासमुद्र का नाम धर्म है (The name of the ocean that makes it unifying is Dharma)।उसके आधार पर ही विरोध को सहयोग में एवं पृथकता को एकता में बदला जा सकता है।
  • वर्तमान समय की तो यह एक अनिवार्य आवश्यकता ही बन गयी है।जब एक देश-दूसरे देश से,एक धर्मावलम्बी दूसरे धर्मावलम्बी से ही नहीं,वरन मानव समाज का प्रत्येक वर्ग,प्रत्येक घटक एक-दूसरे से आगे बढ़ने और समृद्धिशाली बनने की होड़ में सम्मिलित है और एक-दूसरे को रौंदकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है,ऐसी स्थिति में धर्मधारणा ही एकमात्र वह कारगर उपाय रह जाता है,जो भूले हुओं को सही मार्ग पर ला सकता है और कर्त्तव्यबोध करा सकता है।
    प्रख्यात जर्मन दार्शनिक मैक्समूलर ने अपनी कृति ‘ऐन इन्ट्रोडक्सन टू दि साइन्स ऑफ रिलीजन’ में धर्म की विवेचना करते हुए लिखा है कि धर्म अन्तरात्मा की पुकार है,जो तर्क और जानकारियों को प्रभावित तो करती है,पर उससे प्रभावित नहीं होती।उसका आधार अतीन्द्रिय है।दिव्यचेतना ही हमें धर्मनिष्ठा अपनाने के लिए प्रेरित करती है।
  • इसी सन्दर्भ में विलियम जेम्स ने लिखा है कि धर्म एक दूरगामी चिन्तन (Religion is a far-reaching thought) है,जिससे व्यक्ति की सामयिक परिस्थितियों की अपेक्षा समष्टि की सर्वांगीण और सर्वकालीन आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता है।
    मनीषी अलबर्ट का कहना है कि धर्म हमारे भौतिक जीवन को सुखी बनाने में सहायक हो सकता है,पर भौतिक सुखों के लिए धर्म का उपयोग करना न तो उचित होगा और न संभव।धर्म एक आध्यात्मिक भूख है,जिसे तृप्त करने के लिए भौतिक कष्ट भी सहने पड़ सकते हैं।

9.धर्म मस्तिष्क की नहीं अन्तःकरण की देन है (Righteousness is not a gift of the mind but of the conscience):

  • धर्म वस्तुतः एक नैतिक,भावनात्मक एवं सामाजिक परिष्कार की नियोजित प्रक्रिया है।इसका लाभ परलोक में मिलेगा,इसकी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।धर्म-धारणा जहाँ भी होगी,वहाँ आत्मसंतोष और आत्म-उल्लास की ऐसी शक्ति विद्यमान रहेगी,जिसके सामने भौतिक दृष्टि से अभावग्रस्त समझा जाने वाला जीवन भी शान्ति और धैर्यपूर्वक सरल एवं सुरम्य बनाया जा सके।
  • धर्म मस्तिष्क की नहीं,अपितु अन्तः-करण की देन है।इस संबंध में दार्शनिक पास्कल का कहना है कि हृदय के विवेक से धर्म का उदय होता है।उसे मात्र तर्कों की वैशाखी लगाकर खड़ा नहीं किया जा सकता।कान्ट ने भी धर्म की परिभाषा करते हुए उसे ऐसी मानवी कर्तव्यनिष्ठा (Human Devotion to Duty) बताया है,जो मस्तिष्क तक सीमित न रहकर अंतःकरण में निष्ठा में घनीभूत हो गयी।
  • तत्त्वदर्शियों के उपर्युक्त अभिवचनों में धर्म शब्द के अन्तर्गत जिस आधार की चर्चा की गयी है,उसे उत्कृष्टतावादी चिन्तन और आदर्शवादी कर्तृत्व के अन्तर्गत ही गिना-समझा जाना चाहिए।कर्तव्य-परायणता का ही दूसरा नाम धर्म है।शारीरिक,मानसिक,पारिवारिक,सामाजिक और सार्वभौमिक जिम्मेदारियों से मनुष्य की उच्छृंखलता को मर्यादित किया गया है,उसे अपने स्तर के अनुरूप सृष्टि-संतुलन के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ भी निवाहनी होती हैं।धर्म का प्रयोजन (The Purpose of Religion) इसी मानवोचित शालीनता और कर्तव्यनिष्ठा को अक्षुण्ण बनाये रखना है।
  • संस्कृति और सम्प्रदायों में क्षेत्रीय और सामयिक परिस्थितियों के अनुसार आचार-व्यवहार की व्यवस्था रहती है।इसलिए परिस्थिति के अनुसार इनमें बार-बार सुधार परिवर्तन करना पड़ता है,पर धर्म के बारे में ऐसी बात नहीं है।वह शाश्वत और सनातन है।उसका स्वरूप सदाचार,मर्यादा और लोकहित के रूप में चिरअतीत से ही निर्धारित किया जा चुका है।उसमें परिवर्तन की आवश्यकता कभी भी किसी को भी नहीं पड़ सकती। आवश्यकता है तो मात्र इतनी कि हम उसे अपने जीवन में धारण करें,गुण,कर्म,स्वभाव का अंग बनायें,चिंतन,चरित्र,व्यवहार में उतारें।स्थायी सुख-शांति तभी मिल सकती है।
  • उपर्युक्त आर्टिकल में धर्म एक आध्यात्मिक भूख:आंतरिक शांति और उद्देश्य के लिए एक छात्र की मार्गदर्शिका (Righteousness as Spiritual Hunger:A Student’s Guide to Inner Peace and Purpose) के बारे में विस्तार और गहराई से समझाया गया है।
  • ### 📢 यदि आपको यह गणित का आर्टिकल पसंद आया हो:
    * 👥 **मित्रों के साथ शेयर करें:** ज्ञान बांटने से बढ़ता है,इसलिए इसे अपने दोस्तों के साथ ज़रूर साझा करें।
    * 🔔 **वेबसाइट को फॉलो करें:** अगर आप यहाँ पहली बार आए हैं, तो हमारे **ईमेल सब्सक्रिप्शन** को फॉलो करें।साथ ही, **Push Notification (घंटी के आइकॉन) को भी अलाउ (Allow) करें** ताकि हर नए ज़रूरी आर्टिकल और टेस्ट सीरीज़ का नोटिस आपके मोबाइल पर तुरंत मिल जाए!
    * 💬 **अपने सुझाव दें:** यदि आपकी कोई समस्या है या कोई सुझाव देना चाहते हैं,तो नीचे **कमेंट** करके हमें ज़रूर बताएं।
    **पूरा आर्टिकल पढ़ने के लिए आपका स्वागत है!** 🙏

Also Read This Article:Review of Secularism in India

10.मौलवी को धर्म का सही पाठ पढ़ाया (हास्य-व्यंग्य) (The cleric was taught the right lesson in Righteousness) (Humour-Satire):

  • एक दिन अब्राहम लिंकन किसी सभा में जा रहे थे। अचानक रास्ते में,एक गड्‌ढे में सुअर धंसा हुआ था।सुअर जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही धँसता जा रहा था।
  • लिंकन ने सोचा इसे बचाना ही सही धर्म है और वे उसे निकालने के लिए आगे बढ़े।
  • मौलवी ने उन्हें टोका:तुम सुअर को निकालोगे तो तुम्हारा धर्मभ्रष्ट हो जाएगा।
  • लिंकन ने हँसते हुए कीचड़ में कूदकर,सुअर को निकाला।
  • मौलवी ने लिंकन को हिकारत (घृणा) की दृष्टि से देखा।
    लिंकन:इस तरह क्या देख रहे हो? धर्म केवल नमाज,पूजा-पाठ करना ही नहीं है,बल्कि प्राणीमात्र की सेवा भी धर्म है।
    मौलवी की आँखें खुल गयी और मन ही मन लिंकन को नमन किया।

11.धर्म एक आध्यात्मिक भूख:आंतरिक शांति और उद्देश्य के लिए एक छात्र की मार्गदर्शिका (Righteousness as Spiritual Hunger:A Student’s Guide to Inner Peace and Purpose) से सम्बन्चित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नः  प्रश्नः1.धर्म क्या है? (What is religion?):

प्रश्नः1.धर्म क्या है? (What is religion?):

उत्तर:जीवन से आनन्द को प्राप्त करने की प्यास ही धर्म है।

प्रश्न:2.धर्म के अभाव में व्यक्ति की क्या स्थिति हो जाती है? (What is the condition of a person in the absence of religion?):

उत्तर:जहाँ धर्म नहीं,वहाँ विद्या,लक्ष्मी,स्वास्थ्य आदि का भी अभाव होता है।धर्मरहित स्थिति में बिल्कुल शुष्कता होती है,शून्यता होती है।

प्रश्न:3.सच्चे धार्मिक की परीक्षा कब होती है? (When is the true religious tested?):

उत्तर:आपत्ति के समय भी जो धर्म का त्याग नहीं करता वह श्रेष्ठ है,वह ही सच्चा धार्मिक है।

  • उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर द्वारा धर्म एक आध्यात्मिक भूख:आंतरिक शांति और उद्देश्य के लिए एक छात्र की मार्गदर्शिका (Righteousness as Spiritual Hunger:A Student’s Guide to Inner Peace and Purpose) की प्राइमरी टर्म्स के बारे जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  • *”यह आर्टिकल **Satyam Mathematics** ब्लॉग पर **Satyam Coaching Centre** के द्वारा तैयार किया गया है।”*

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *